आशना दीदी और मेरे राज-1

ये कहानी मेरे और मेरी बड़ी बहन आशना के बीच की है। वो मुझसे तीन साल बड़ी है और बचपन से ही हम दोनों हमेशा साथ रहते थे। हमारा घर मुंबई के पास मुम्ब्रा में था। वहाँ का माहौल बहुत अलग था। छोटी छोटी गलियाँ, हर तरफ लोगों की भीड़, मस्जिदों की आवाज़, और ऐसा माहौल जहाँ हर कोई एक-दूसरे को जानता था।

उस एरिया में लोगों की सोच भी काफी सख्त थी, इसलिए हमारे अब्बू हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि लोग हमारे परिवार के बारे में सिर्फ अच्छी बातें करें।
अब्बू का मानना था कि बच्चों की परवरिश ऐसी होनी चाहिए कि पूरा मोहल्ला उनकी मिसाल दे। इसी वजह से हमारे घर में बहुत सारे नियम थे।

बाहर ज्यादा घूमना, जोर से बोलना, या किसी भी तरह की ऐसी हरकत करना जो लोगों को गलत लगे, ये सब हमारे लिए मना था। मैं लड़का होने की वजह से कभी कभी दोस्तों के साथ नीचे खेलने चला जाता था, लेकिन आशना दीदी की जिंदगी काफी अलग थी। उन्हें इतनी आज़ादी नहीं थी। वो ज्यादातर घर में ही रहती थी। अगर बाहर जाना होता, तो सिर्फ कॉलेज, ट्यूशन या फिर अब्बू की टेलर की दुकान तक। और जब भी उन्हें घर से बाहर जाना पड़ता, उन्हें हमेशा बुर्का पहनना पड़ता था। चाहे कितनी भी गर्मी हो या कितनी भी जल्दी हो, बिना बुर्के के बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी।

अब्बू की छोटी सी टेलर की दुकान अंधेरी में थी। दुकान बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन अब्बू ने मेहनत से उसे संभाल रखा था। पूरे दिन मशीनों की आवाज़, कपड़ों के टुकड़े, नाप लेने वाले फीते और ग्राहकों की बातें यही उनकी दुनिया थी। कभी-कभी आशना दीदी भी वहाँ मदद करने चली जाती थी। वो कपड़े पैक करती, हिसाब लिखती या ग्राहकों को कपड़े दिखा देती। अब्बू को उन पर बहुत भरोसा था क्योंकि वो बचपन से ही जिम्मेदार थी।