ये कहानी मेरे और मेरी बड़ी बहन आशना के बीच की है। वो मुझसे तीन साल बड़ी है और बचपन से ही हम दोनों हमेशा साथ रहते थे। हमारा घर मुंबई के पास मुम्ब्रा में था। वहाँ का माहौल बहुत अलग था। छोटी छोटी गलियाँ, हर तरफ लोगों की भीड़, मस्जिदों की आवाज़, और ऐसा माहौल जहाँ हर कोई एक-दूसरे को जानता था।
उस एरिया में लोगों की सोच भी काफी सख्त थी, इसलिए हमारे अब्बू हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि लोग हमारे परिवार के बारे में सिर्फ अच्छी बातें करें।
अब्बू का मानना था कि बच्चों की परवरिश ऐसी होनी चाहिए कि पूरा मोहल्ला उनकी मिसाल दे। इसी वजह से हमारे घर में बहुत सारे नियम थे।
बाहर ज्यादा घूमना, जोर से बोलना, या किसी भी तरह की ऐसी हरकत करना जो लोगों को गलत लगे, ये सब हमारे लिए मना था। मैं लड़का होने की वजह से कभी कभी दोस्तों के साथ नीचे खेलने चला जाता था, लेकिन आशना दीदी की जिंदगी काफी अलग थी। उन्हें इतनी आज़ादी नहीं थी। वो ज्यादातर घर में ही रहती थी। अगर बाहर जाना होता, तो सिर्फ कॉलेज, ट्यूशन या फिर अब्बू की टेलर की दुकान तक। और जब भी उन्हें घर से बाहर जाना पड़ता, उन्हें हमेशा बुर्का पहनना पड़ता था। चाहे कितनी भी गर्मी हो या कितनी भी जल्दी हो, बिना बुर्के के बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी।
अब्बू की छोटी सी टेलर की दुकान अंधेरी में थी। दुकान बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन अब्बू ने मेहनत से उसे संभाल रखा था। पूरे दिन मशीनों की आवाज़, कपड़ों के टुकड़े, नाप लेने वाले फीते और ग्राहकों की बातें यही उनकी दुनिया थी। कभी-कभी आशना दीदी भी वहाँ मदद करने चली जाती थी। वो कपड़े पैक करती, हिसाब लिखती या ग्राहकों को कपड़े दिखा देती। अब्बू को उन पर बहुत भरोसा था क्योंकि वो बचपन से ही जिम्मेदार थी।
लेकिन घर के अंदर हमारी दुनिया बिल्कुल अलग थी। मैं और आशना दीदी सिर्फ भाई बहन नहीं थे, हम एक-दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त थे। बचपन में हम दोनों हर चीज साथ करते थे। कभी तकियों से लड़ाई, कभी छुपन-छुपाई, कभी बिना वजह हँसना, और कभी ऐसी शरारत करना जिससे अम्मी परेशान हो जाएँ। कई बार हम दोनों पूरे घर में भागते रहते और अम्मी पीछे से चिल्लाती रहती कि थोड़ा शांत बैठो।
हम दोनों का रिश्ता इतना मजबूत था कि अगर मुझे किसी बात का डर लगता, तो सबसे पहले मैं दीदी के पास जाता। और अगर दीदी उदास होती, तो वो भी सबसे पहले मुझसे ही बात करती। बाहर की दुनिया हमारे लिए सख्त थी, लेकिन घर के अंदर हम दोनों एक-दूसरे की छोटी सी दुनिया थे। शायद यही वजह थी कि समय के साथ हमारी दोस्ती और भी ज्यादा गहरी होती चली गई।
लेकिन जब मैं बाहरवीं में था, तब मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी। मेरी क्लास में एक लड़की थी और धीरे-धीरे मैं उसके करीब आ गया। कुछ ही महीनों में वो मेरी गर्लफ्रेंड बन गई। मुझे लगा था कि ये बस एक छोटी सी बात है और किसी को पता नहीं चलेगा, लेकिन हमारे घर में ऐसी चीजें बहुत बड़ी मानी जाती थी। सबसे बड़ी बात ये थी कि अब्बू पहले से ही अपने भाई को वादा कर चुके थे कि मेरी पढ़ाई पूरी होने के बाद मेरी शादी उनकी बेटी से होगी। वो मेरी कज़िन थी और दोनों परिवारों में ये बात सालों से तय मानी जाती थी।
जब अब्बू को मेरे रिश्ते के बारे में पता चला, तो वो गुस्से से पूरी तरह टूट गए। मैंने उन्हें पहली बार इतना गुस्से में देखा था। उन्हें लगा कि मैंने सिर्फ उनका भरोसा नहीं तोड़ा, बल्कि पूरे परिवार की इज्जत खराब कर दी। उस दिन घर का माहौल इतना डरावना था कि मैं आज तक नहीं भूल पाया। अब्बू ने मुझे बहुत मारा और कई दिनों तक मुझसे ठीक से बात भी नहीं की।
कुछ ही दिनों बाद उन्होंने फैसला कर लिया कि मुझे मुम्ब्रा से दूर भेज दिया जाएगा। उन्होंने मेरा एडमिशन एक बोर्डिंग कॉलेज में करवा दिया जहाँ मुझे दो साल रहना था। मेरे लिए सबसे मुश्किल बात कॉलेज नहीं थी… सबसे मुश्किल बात थी आशना दीदी से दूर होना। बचपन से हम कभी इतने लंबे समय के लिए अलग नहीं हुए थे। जिस दिन मैं घर छोड़ कर जा रहा था, उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैं दीदी के बिना कितना अकेला महसूस करने वाला हूँ।
मैं बोर्डिंग कॉलेज चला गया और आशना दीदी मुंबई में ही रह गई। शुरुआत के कुछ दिन मेरे लिए बहुत मुश्किल थे। वहाँ सब कुछ नया था। नए लोग, नए कमरे, नए नियम… लेकिन इन सब से ज्यादा मुश्किल था दीदी के बिना रहना। मैं हर छोटी बात उन्हें बताने का आदी था। रात को सोने से पहले उनसे बातें करना, उनके साथ हँसना, या बस उनके आस-पास रहना ये सब अचानक मेरी जिंदगी से गायब हो गया था।
मुझे कई बार उनसे बात करने का मन करता था, लेकिन बोर्डिंग कॉलेज में मोबाइल रखने की इजाज़त नहीं थी। वहाँ का माहौल बहुत सख्त था। हर चीज का टाइम फिक्स था। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक सब नियमों के हिसाब से चलता था। कई बार मैं रात को अकेले बैठ कर बस यही सोचता रहता कि इस समय दीदी क्या कर रही होंगी।
सबसे ज्यादा दर्द मुझे ईद के समय हुआ। मुझे पूरा यकीन था कि शायद त्योहार पर घर जाने की इजाज़त मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाकी बच्चे भी उदास थे, लेकिन मेरे अंदर कुछ और ही चल रहा था। पहली बार मैं ईद अपने परिवार और खास कर आशना दीदी के बिना मना रहा था।
धीरे-धीरे वही बोर्डिंग लाइफ मेरी पूरी जिंदगी बन गई। दिन, महीने और फिर साल गुजरते चले गए। शुरुआत में जो जगह मुझे जेल जैसी लगती थी, वही अब मेरी रोज की दुनिया बन चुकी थी। लेकिन इन दो सालों में एक चीज कभी नहीं बदली… आशना दीदी की यादें।
फिर आखिरकार वो दिन आ गया जब मेरे दो साल पूरे हो गए। मैं वापस मुंबई लौट रहा था। ट्रेन में बैठा हुआ मैं बार-बार सिर्फ एक ही बात सोच रहा था… अब आशना दीदी कैसी दिखती होंगी। दो साल बहुत लंबा समय होता है। मेरे दिमाग में उनकी वही पुरानी तस्वीर थी, लेकिन अब मैं उन्हें फिर से देखने के लिए बेचैन हो चुका था। मुंबई वापस लौटने की सबसे बड़ी खुशी मेरे लिए सिर्फ एक थी… आशना दीदी से दोबारा मिलना।
शाम के समय मैं आखिरकार घर पहुँच गया। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, अम्मी ने मुझे देखा और तुरंत खुशी से मेरे पास आ गई। उनकी आँखों में खुशी साफ दिख रही थी। वो बार-बार मेरे चेहरे को देख रही थी जैसे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा हो कि मैं सच में वापस आ गया हूँ। अब्बू भी बाहर आए। वो हमेशा की तरह शांत थे, लेकिन उनके चेहरे पर भी हल्की खुशी साफ दिखाई दे रही थी। शायद वो खुल कर नहीं दिखाते थे, लेकिन उन्हें भी मेरी कमी महसूस हुई थी।
मैंने कुछ देर अम्मी और अब्बू के साथ बैठ कर बातें की। घर की बातें, कॉलेज की बातें, रिश्तेदारों की बातें… लेकिन सच कहूँ तो मेरा ध्यान कहीं और ही था। इतने सालों बाद मैं सिर्फ एक इंसान को देखने के लिए सबसे ज्यादा बेचैन था।
आखिरकार मैंने इधर उधर देखते हुए पूछा, “आशना दीदी कहाँ हैं?”
अम्मी कुछ सेकंड चुप रही। फिर उन्होंने हल्की उदासी के साथ बताया कि मेरे जाने के कुछ महीनों बाद ही अब्बू ने आशना दीदी की पढ़ाई रुकवा दी थी। उनका मानना था कि लड़की को इतनी पढ़ाई कराने का कोई फायदा नहीं है। वो कहते थे कि आखिर में उसे घर ही संभालना है, इसलिए ज्यादा पैसे और समय बर्बाद करने का मतलब नहीं।
ये सुनते ही मेरे अंदर कुछ टूट सा गया। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि आशना दीदी की पढ़ाई बंद करवा दी गई। वो लड़की जो हमेशा पढ़ना चाहती थी… जिसने कभी किसी चीज की शिकायत नहीं की… उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना ऐसे ही रोक दिया गया।
मैंने एक पल के लिए अब्बू की तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। दो सालों में मैंने इतना समझ लिया था कि इस घर में कुछ बातें बोल कर बदली नहीं जा सकतीं। मैं बिना कुछ बोले धीरे से खड़ा हुआ… और सीधा छत की तरफ चल पड़ा।
जैसे ही मैं छत पर पहुँचा, मेरे कदम अपने आप धीरे हो गए। सामने का नज़ारा देख कर मैंने एक गहरी साँस ली। दो साल पहले जो लड़की मैं छोड़ कर गया था… आशना दीदी अब वैसी बिल्कुल नहीं दिख रही थी। वो पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही थी।
छत पर कुछ छोटी लड़कियाँ बैठी थी और आशना दीदी उनके सामने खड़ी होकर उन्हें कुछ समझा रही थी। उनके हाथ में एक किताब थी और वो बड़े ध्यान से बच्चों को पढ़ा रही थी। उनकी आवाज़ पहले जैसी ही नरम थी, लेकिन अब उसमें एक अलग ही बात आ गई थी।
शाम की हल्की हवा चल रही थी। उनके बाल बार-बार चेहरे के सामने आ रहे थे और वो हर कुछ सेकंड बाद उन्हें कानों के पीछे करने की कोशिश कर रही थी। उस छोटी सी हरकत को देख कर भी मेरी नज़र उनसे हट नहीं रही थी।
उन्होंने एक सिंपल सा सूट पहना हुआ था। नीचे से कपड़ा ढीला था, लेकिन ऊपर से वो उनके शरीर पर काफी फिट बैठ रहा था। उसी वजह से उनके स्तन कपड़ों के अंदर साफ उभर कर दिख रहे थे। जब वो हाथ उठाती या किताब पकड़ती, तब कपड़ा उनके सीने पर और ज्यादा खिंच जाता था। उनके स्तनों का गोल आकार सूट के अंदर बहुत साफ दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कपड़ा उन्हें छुपाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन पूरी तरह छुपा नहीं पा रहा था।
दो सालों में उनका शरीर काफी बदल चुका था। उनकी कमर पहले से पतली लग रही थी और उसके ऊपर उनका भरा हुआ सीना तुरंत ध्यान खींच रहा था। हवा चलने पर कपड़ा हल्का सा उनके बदन से चिपक जाता और उनके शरीर की बनावट और ज्यादा साफ दिखने लगती। जब वो झुक कर किसी लड़की की कॉपी देखती, तब उनका ऊपरी बदन और ज्यादा उभर कर सामने आता।
उनकी गर्दन, उनके हाथों की हल्की हरकतें, और बात करते समय उनके होंठों का धीरे-धीरे हिलना… सब कुछ मुझे पहले से अलग महसूस हो रहा था। मैं बस चुप-चाप खड़ा उन्हें देख रहा था, जैसे दो साल बाद पहली बार सच में समझ पा रहा हूँ कि आशना दीदी अब सिर्फ वही पुरानी शरारती लड़की नहीं रहीं… वो अब पूरी तरह जवान हो चुकी थी।
मैं कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा उन्हें देखता रहा। फिर आखिर मैंने धीरे से आवाज़ दी, “आशना दीदी…”
मेरी आवाज़ सुनते ही वो अचानक रुक गई। पहले तो उन्होंने हैरानी से इधर-उधर देखा, लेकिन जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, उनके चेहरे पर इतनी बड़ी मुस्कान आ गई कि मैं बस उन्हें देखता रह गया। अगले ही पल वो किताब एक लड़की को पकड़ाकर तेजी से मेरी तरफ भागी।
“तू सच में आ गया…”
इतना कहते ही उन्होंने सीधे आकर मुझे जोर से गले लगा लिया। दो सालों का सारा इंतजार जैसे उस एक पल में बाहर आ गया था। उनका शरीर पूरी तरह मेरे सीने से लगा हुआ था। उनके बड़े और भरे हुए स्तन मेरे सीने पर दब गए थे। सूट के कपड़े के ऊपर से भी उनकी नरमी साफ महसूस हो रही थी। मैं पहली बार इतना करीब से उनके बदन को महसूस कर रहा था।
उन्होंने मुझे कुछ सेकंड तक वैसे ही पकड़े रखा। फिर धीरे से पीछे हटकर दोनों हाथों से मेरा चेहरा पकड़ लिया। उनकी आँखें हल्की सी चमक रही थी, जैसे वो खुद यकीन नहीं कर पा रही हों कि मैं सच में उनके सामने खड़ा हूँ। अगले ही पल वो हल्का सा आगे झुकी और अपने होंठ मेरे गाल पर रख दिए।
उनके होंठ बहुत नरम थे। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “मैंने तुझे बहुत मिस किया गोलू…”
उसके बाद उन्होंने उन छोटी लड़कियों की क्लास खत्म कर दी। लड़कियाँ धीरे-धीरे अपनी किताबें उठा कर नीचे चली गई और छत पर सिर्फ मैं और आशना दीदी रह गए।
हम दोनों छत के कोने में जाकर बैठ गए। शुरुआत में बस एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे, जैसे दो सालों की बातें कहाँ से शुरू करें ये समझ ही नहीं आ रहा था। फिर धीरे-धीरे बातें शुरू हुई… और पता ही नहीं चला कब समय निकलता चला गया।
हम लगभग दो घंटे तक लगातार बात करते रहे। मैं उन्हें बोर्डिंग कॉलेज की बातें बता रहा था — वहाँ के सख्त नियम, हॉस्टल के लड़के, अकेलापन, और कैसे हर त्योहार पर मुझे घर की याद आती थी। और वो मुझे घर की बातें बता रही थी। मोहल्ले में क्या बदला, कौन कहाँ चला गया, अम्मी अब भी कैसे हर बात पर चिंता करती हैं… सब कुछ।
फिर बातों बातों में उन्होंने बताया कि मेरे जाने के बाद उन्होंने एक डायरी लिखना शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा कि जब भी उन्हें बहुत अकेलापन महसूस होता, या किसी से बात करने का मन करता, तो वो अपनी सारी बातें उसी डायरी में लिख देती थी। वो हल्का सा हँसते हुए बोली,
“तेरे जाने के बाद घर बहुत खाली लगने लगा था… इसलिए लिखना शुरू किया।”
उनकी आवाज़ में हल्की उदासी साफ महसूस हो रही थी। फिर कुछ सेकंड चुप रहने के बाद उन्होंने बताया कि उन्हें अभी भी अपनी कॉलेज लाइफ बहुत याद आती है। अपनी सहेलियों के साथ बातें करना, क्लास में बैठना, बाहर जाना… ये सब अचानक खत्म हो गया था।
हम दोनों इतने समय से बातें कर रहे थे कि नीचे से अम्मी की आवाज़ आई, “खाना तैयार है… नीचे आ जाओ दोनों!”
फिर मैं और आशना दीदी साथ में नीचे गए। खाने की मेज पर बैठ कर हम सब ने साथ खाना खाया। इतने समय बाद घर का खाना खाकर मुझे अलग ही सुकून महसूस हो रहा था। बीच बीच में आशना दीदी मुझे देख कर मुस्कुरा देती थी और मैं भी उन्हें देखता रह जाता था।
खाना खत्म होने के बाद मैं अपने कमरे की तरफ जाने लगा, लेकिन तभी अम्मी ने मुझे रोक दिया।
उन्होंने कहा, “तेरा कमरा अभी साफ नहीं हुआ है… आज रात तू आशना के कमरे में ही सो जा।” ये सुनते ही मैंने एक पल के लिए आशना दीदी की तरफ देखा… और वो हल्का सा मुस्कुरा दी।
दो साल बाद अचानक फिर से दीदी के साथ रात में एक ही कमरे में सोने का मौका मिलना मुझे थोड़ा अजीब लग रहा था। बचपन में ऐसा कई बार हुआ था। कभी मोबाइल देखते देखते नींद आ जाती थी, कभी खेलते-खेलते हम दोनों एक ही बिस्तर पर सो जाते थे। तब सब बहुत आम लगता था। लेकिन अब दो साल की दूरी के बाद सब कुछ थोड़ा अलग महसूस हो रहा था।
हम दोनों उनके कमरे में गए। कमरा पहले जैसा ही था, बस अब वहाँ उनकी किताबों के साथ वो डायरी भी रखी हुई थी जिसके बारे में वो ऊपर बता रही थी। कमरे में हल्की सी खुशबू थी और पंखे की हवा धीरे-धीरे चल रही थी। उनका बिस्तर छोटा था, इसलिए हमें काफी पास-पास लेटना पड़ा।
लेकिन आशना दीदी ऐसे बात कर रही थी जैसे कुछ भी अजीब ना हो। वो हँस रही थी, मुझे पुरानी बातें याद दिला रही थी, और बीच-बीच में मेरे बाल खींच कर चिढ़ा भी रही थी। मैं उन्हें देखता रहा और सोचता रहा कि शायद सिर्फ मैं ही इतना अलग महसूस कर रहा हूँ।
धीरे-धीरे रात और गहरी होती गई। बात करते-करते कब आधी रात हो गई, हमें पता ही नहीं चला। फिर आखिरकार उनकी आवाज़ धीमी होने लगी। वो थक चुकी थी। कुछ देर बाद उन्होंने करवट ली और सोने की कोशिश करने लगी।
छोटा बिस्तर होने की वजह से हमारा शरीर बार-बार एक दूसरे से छू रहा था। उनकी टाँगें हल्के से मेरी टाँगों से लगी हुई थी। जब वो नींद में थोड़ा और करीब आई, तो उनका गर्म बदन साफ महसूस होने लगा। उनके स्तनों का हल्का दबाव भी मुझे साफ महसूस हो रहा था।
फिर जब वो दूसरी तरफ मुड़ी और धीरे से और करीब आई, तो उनका पिछवाड़ा मेरी जाँघों से हल्के-हल्के टकराने लगा। कुछ पल बाद उन्होंने नींद में ही खुद को थोड़ा और पीछे सरकाया। अब उनका मुलायम पिछवाड़ा मेरे कपड़ों के ऊपर से सीधे मेरे लंड से हल्के से छू रहा था। कपड़ों की परत होने के बावजूद भी मुझे उनके पिछवाड़े की नरमी साफ महसूस हो रही थी। वो शायद पूरी तरह अनजान थी कि उनकी हर हल्की हरकत मेरे अंदर कैसी बेचैनी पैदा कर रही थी।
मैं काफी देर तक उसी हालत में लेटा रहा, लेकिन मुझे नींद ही नहीं आ रही थी। आखिरकार मैं धीरे से उठ कर बैठ गया ताकि उनकी नींद ना टूटे। वो पूरी तरह नींद में थी। उनके बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे और वो गहरी साँस लेते हुए आराम से सो रही थी।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ। तभी मेरी नज़र टेबल पर रखी उनकी डायरी पर गई। मैं धीरे से उठा, टेबल के पास गया और उसे खोल लिया। लेकिन वो कोई पूरी डायरी नहीं थी। उसमें बस अलग अलग चीजें लिखी थी जो वो अपनी जिंदगी में करना चाहती थी। जैसे उनकी अपनी छोटी सी बकेट लिस्ट हो।
कुछ बातें बिल्कुल सीधी थी — अपनी ग्रेजुएशन पूरी करना, अच्छी नौकरी पाना, अकेले ट्रैवल करना। लेकिन कुछ बातें पढ़ कर मैं सच में चौंक गया। उन्होंने लिखा था कि वो कभी किसी पार्टी में जाना चाहती हैं, लड़कों के साथ खुल कर घूमना चाहती हैं, पहली बार शराब ट्राय करना चाहती हैं, छोटे कपड़े पहन कर बिना डर के बाहर जाना चाहती हैं।
फिर आगे कुछ ऐसी बातें थी जिन्हें पढ़ कर मैं बार-बार वही लाइनें दोबारा देखने लगा। उन्होंने लिखा था कि वो एडल्ट फिल्में देखना चाहती हैं क्योंकि उन्हें हमेशा जानने की इच्छा रही कि लोग बंद कमरे में एक दूसरे के इतने करीब कैसे आ जाते हैं। उन्होंने लिखा था कि वो कभी बोल्ड फोटोशूट करवाना चाहती हैं जहाँ उन्हें किसी से डरना ना पड़े।
लेकिन उसके बाद जो लिखा था उसने मुझे पूरी तरह चुप कर दिया। उन्होंने साफ लिखा था कि वो कभी किसी लड़के का लंड अपने हाथों में महसूस करना चाहती हैं। वो जानना चाहती हैं कि असल में किसी लड़के के इतने करीब आने पर कैसा महसूस होता है। एक जगह उन्होंने लिखा था कि कभी-कभी रात में वो ऐसी बातें सोचती हैं जिन्हें वो किसी से कह भी नहीं सकती।
फिर नीचे एक लाइन में उन्होंने लिखा था कि वो कभी किसी लड़के को इतना करीब महसूस करना चाहती हैं कि उसकी साँसें अपने चेहरे पर महसूस कर सके। उसके ठीक नीचे उन्होंने जल्दी-जल्दी लिख दिया था कि वो कभी किसी लड़के का लंड अपने मुँह में लेकर उसे खुश करने का एहसास जानना चाहती हैं। वो ये सब लिखते हुए शायद खुद भी शर्माई होंगी क्योंकि उस लाइन के बाद उन्होंने तुरंत अगली लाइन में लिखा था — “ये सब शायद गलत है… लेकिन मैं ये सब सोचती हूँ।”
मैं वो सब पढ़ कर पूरी तरह हैरान रह गया। मुझे कभी नहीं लगा था कि मेरी मासूम दिखने वाली आशना दीदी के मन में इतनी सारी छिपी हुई बातें चलती होंगी। लेकिन फिर मैंने खुद ही सोचा… इसमें गलत भी क्या था? वो इक्कीस साल की लड़की थी। उनकी जिंदगी हमेशा बहुत बंधनों में बीती थी। ना कभी कोई बॉयफ्रेंड, ना दोस्तों के साथ खुलकर घूमना, ना अपनी मर्जी से कहीं जाना। शायद इसलिए उनके मन की सारी दबाई हुई बातें सिर्फ उसी डायरी के पन्नों में जगह पा सकी थी।
मैं धीरे से डायरी बंद करके वापस बिस्तर के पास आ गया। आशना दीदी अभी भी गहरी नींद में थी। मैं फिर से उनके पास लेट गया, लेकिन अब सब कुछ पहले जैसा नहीं लग रहा था। उनकी डायरी की वो लाइनें बार-बार मेरे दिमाग में घूम रही थी।
उस रात पहली बार मुझे लगा कि मैं आशना दीदी को एक अलग नज़र से देख रहा हूँ। सिर्फ अपनी बड़ी बहन की तरह नहीं… बल्कि एक ऐसी लड़की की तरह जो खुबसूरत थी और लंड चखना चाहता थी। शायद उसी रात से हमारी कहानी बदलनी शुरू हुई। एक आम भाई बहन की कहानी… जो धीरे-धीरे एक-दूसरे के बहुत ज्यादा करीब आने लगे।