पिछला भाग पढ़े:- दीपिका दीदी और मेरा राज-4
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
मैं दीपिका दीदी की बात को समझ नहीं पा रहा था। उनके हिसाब से अगर मुझे उनके साथ सेक्स करना था, तो पहले मुझे उनसे शादी करनी पड़ेगी। लेकिन यह कैसे मुमकिन हो सकता था? क्योंकि हम दोनों भाई बहन थे। बेशक मैं उनको बचपन से चाहता था और उन्होंने मेरा लंड भी अपने मुंह में लिया था। फिर भी कोई कैसे अपनी सगी बहन के साथ शादी कर सकता है।
मैंने उनके साथ हमेशा सेक्स करने के बारे में सोचा था। लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि वह मेरे साथ शादी करना चाहती थी। मैं अपने कमरे में लौट कर आया और बिस्तर पर गिर गया। दिमाग में बस दीपिका दीदी की बातें गूंज रही थी। वह मेरी बहन थी, बचपन से साथ खेलते बड़े हुए थे, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह एक दिन मुझसे शादी जैसी बात करेंगी।
मैंने धीमे से खुद से कहा, “मैंने कभी आपको बहन की तरह नहीं देखा… पर शादी?”
जब वह मुंबई में पढ़ाई कर रही थी तो हर दिन में उनकी कमी मुझे सताती थी। उनके मैसेज, उनकी हंसी, और वो वीडियो कॉल जिनमें वो कभी-कभी हल्के कपड़ों में आ जाती थी, सब चीज़ें मुझे पागल कर देती थी।
और जब वो इस बार घर लौटी तो जैसे पूरी बदल चुकी थी। उनका शरीर और भी भरा हुआ था, सीने पर कसाव इतना कि नज़र हटाना मुश्किल हो जाता।
उस दिन जब उन्होंने मुझे चूमा था और मेरे लंड को अपने मुंह में लिया था मुझे लगा था यही रिश्ता हमारे लिए काफी है। हम एक-दूसरे का आनंद ले सकते हैं, बिना किसी बंधन के, लेकिन वो शादी की बात कर बैठी तो मेरा दिल जैसे अचानक रुक गया।
अगली सुबह मैं नीचे लिविंग रूम में आया तो वह वहां पहले से बैठी खाना खा रही थी। मैं चुप-चाप कुर्सी खींच कर बैठ गया और प्लेट में सर्व किया हुआ खाना खाने लगा। किचन में माँ चाय चढ़ा रही थी, बर्तनों की आवाज़ आ रही थी। मैंने हिम्मत करके दीपिका दीदी की तरफ देखा और हल्की मुस्कान दी, लेकिन उन्होंने सीधा नज़रें फेर ली और जल्दी-जल्दी खाना खाने लगी।
कुछ मिनट तक सन्नाटा रहा, बस चम्मच की खनक। फिर उन्होंने बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाहट में कहा, “तुमने मेरे सवाल का जवाब क्यों नहीं दिया… और रात को ऐसे अचानक वापस क्यों चले गए?”
मैं धीमे से बोला, “क्योंकि… जो आप कह रही थी वो मेरे लिए आसान नहीं है। हम बचपन से साथ में रहे हैं… आप मेरी बड़ी बहन हो। मैं आपसे कैसे शादी कर सकता हूं?”
जैसे मेरी बातें बस उनके अंदर आग बन कर घुस गई हों। वह कुर्सी के थोड़ा और करीब झुक आई, आँखों में हल्का गुस्सा चमक रहा था, और फुसफुसा कर बोली—
“तुम्हें अच्छा लगता है जब मैं तुम्हारा लंड चूसती हूँ, तुम मुझे चोदना चाहते हो… तुमने मुझसे कहा था तुम मुझे प्यार करते हो… तो फिर शादी क्यों नहीं कर सकते?”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। सिर झुका कर चुप-चाप खाना खाता रहा। भीतर बेचैनी और अपराधबोध एक साथ चढ़ता जा रहा था, पर मैं बोल नहीं पाया। उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया। दीदी पहले जैसी नहीं रहीं। अब वह मुझे नजर-अंदाज़ नहीं करती थी, बल्कि उल्टा, हर पल मुझे नोटिस कराती थी कि वो मेरे लिए कितनी दीवानी थी।
जब घर में कोई नहीं होता था, वह बेबाक और बेशर्म होकर सामने आती थी। कई बार मैं टीवी देख रहा होता और वह बाथरूम से बिना कपड़ों के बाहर निकल आती, भीगे शरीर से टपकते पानी की बूंदें, उभरे हुए गर्म स्तन उछलते हुए, और उनकी आँखों में चुनौती की चमक। कभी-कभी वो मेरे कमरे में आती और बिना कुछ कहे अपनी ब्रा उतार कर फर्श पर फेंक देती, फिर मुस्कुरा कर दरवाज़ा बंद कर देती।
और जब दूरी रह जाती, वह उसे तोड़ देती मैसेजों से। दिनों-दिन तस्वीरें, कभी झुके हुए उभरे स्तन, कभी उघड़ा हुआ पेट, कभी पूरा नंगा बदन बिस्तर पर लेटा हुआ।
एक दिन तो हद हो गई। मेरे फोन में एक वीडियो आया, वह पूरी तरह नंगी थी। कैमरा नीचे से ऊपर की ओर जा रहा था। फिर उन्होंने अपने पैर फैलाए, अपनी भीगी हुई नाज़ुक जगह कैमरे में दिखाते हुए हाँफीं, और अपनी दो उंगलियाँ अपनी गीली दरार में डाल कर बाहर-भीतर करने लगी।
उस वीडियो के बाद बात वहीं नहीं रुकी। अगले दो-तीन दिन हर बार जब घर खाली होता, वह मेरे सामने और बेशर्मी से आती। कभी अपने हाथों से स्तन दबाते हुए पूछती, “ये तुम्हारे हैं, तो लेने कब आओगे?” कभी मैं कमरे में पढ़ रहा होता और वो धीमे से अपना पैंटी मेरे बिस्तर पर रख कर चली जाती, जैसे कोई निशानी छोड़ रही हो।
और एक शाम, जब मैं किचन में पानी लेने गया, वह फ्रिज का दरवाज़ा खोले खड़ी थी। जैसे ही मैंने पास कदम रखा, उन्होंने मेरी तरफ देखा, अपनी टी-शर्ट उठा कर पूरे स्तन उघाड़ दिए और फुसफुसाई “तू ना बोले, पर तेरी आँखें सब बता देती हैं।”
इतना सब होने के बाद भी मेरे मन की उलझन खत्म नहीं हुई। एक तरफ उनकी दीवानगी, दूसरी तरफ मेरा डर, और बीच में शरीर की आग। आखिर एक दिन मैंने फैसला किया भले वो कितना भी गुस्सा हों, मुझे बात साफ करनी ही पड़ेगी। लेकिन घर में रह कर इतना कहना मुश्किल था।
मैंने उनका हाथ पकड़ कर बस इतना कहा, “दीदी, मुझे आपसे बात करनी है… आज शाम कैफ़े चलते हैं।”
शाम होते ही हम दोनों घर से निकले। मैंने कोई आम कैफ़े नहीं चुना, ऐसी जगह चाहिए थी जहाँ मैं खुल कर बात कर सकूँ। इसलिए मैं उसे लेकर एक कपल कैफ़े पहुँचा, जहाँ छोटे-छोटे प्राइवेट केबिन मिलते थे, थोड़ी मद्धम लाइट और बिल्कुल हमारी जगह।
अंदर पहुँच कर मैंने एक केबिन बुक किया। हल्का अंधेरा, दीवार पर लटकी लाइटें बस चेहरा चमकाती थी। परदों से ढका कमरा जैसे सिर्फ हमारा हो। मैं कुर्सी पर बैठ गया, और दीदी मेरे एक-दम पास वाली सीट पर बैठ गई, इतनी नज़दीक कि उनकी गर्म साँस मेरे गाल को छू रही थी। दिल धड़कन तेज़ हो गई थी, अब बात टालने का रास्ता नहीं बचा था।
मेरी बात सुन कर वह कुछ सेकंड चुप रही। फिर मेरी तरफ झुक कर बेहद धीमे स्वर में बोली, “गोलू… मैं सब जानती हूँ। समाज क्या सोचता है, लोग हमें क्या समझते हैं, इससे मुझे फ़र्क नहीं पड़ता।”
उन्होंने मेरी उंगलियों को अपने हाथों में कस कर पकड़ लिया और आगे कहा, “मुझे बस तू चाहिए। हम दोनों चुप-चाप शादी कर लेंगे किसी को बताए बिना।”
वो पल भर रुकी, और आवाज़ और भी नरम हो गई, “मेरे लिए सबसे मुश्किल ये था कि सबके सामने तू मुझे बहन कहता रहा… और मैं रातों में तेरे बिना तड़पती रही। मैं अब ये दिखावा नहीं कर सकती कि तू मेरा भाई है। मैं तेरे साथ तभी सेक्स कर सकती हूं जब हमारा रिश्ता भाई-बहन से बदल जाएगा।”
इतना सुन कर मेरे अंदर जो दबा था वो फूट पड़ा। मैंने लगभग झुंझलाहट में कहा “दीदी, शादी कोई छोटा फैसला नहीं है! हम सिर्फ इसलिए शादी नहीं कर सकते कि मुझे तुम्हारे साथ सेक्स करना है।”
मेरी बात सुनते ही उन्होंने मुस्कुरा कर मेरा चेहरा देखा। और फिर धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरे पैंट के ऊपर, ठीक जहाँ मेरा लंड था, अपनी नरम हथेली रख दी। मैं तड़प गया। साँस रुक गई।
वो होठों पर शरारती मुस्कान लिए फुसफुसाई, “सच बोल… जब मैं यूँ छूती हूँ, अच्छा नहीं लगता?”
मेरी जुबान अपने आप खुल गई, “हाँ… अच्छा लगता है, दीदी।”
मेरे इतने कहते ही उन्होंने आँखें झुका ली, होंठों पर वही पागल कर देने वाली मुस्कान लौट आई। धीरे-धीरे उन्होंने मेरी पैंट की बटन खोलनी शुरू की। एक-एक कर उंगलियाँ चलती रही, जैसे मेरे दिल की धड़कन के साथ ताल मिला रही हो। फिर उन्होंने मेरी अंडरवियर नीचे खींच दी।
मेरा लंड आज़ाद होकर बाहर गिरा, गर्म, धड़कता हुआ। हल्की रोशनी में उसकी नसें तक दिख रही थी। दीपिका दीदी ने उसे ऐसे देखा जैसे कोई प्यासा पानी को देखता है। उनकी साँस भारी हो रही थी। उन्होंने उंगलियाँ मेरे लंड के चारों ओर लपेटी, धीरे, मजबूती से। उनकी हथेली नरम थी, गर्म थी, और हर मूवमेंट के साथ मेरा पूरा शरीर सिहर गया।
उन्होंने धीरे-धीरे हाथ ऊपर-नीचे करना शुरू किया। मैं कुर्सी पर पीछे टिक गया, साँसें काँपने लगी। दीदी ने मेरा चेहरा देखा और होंठों पर जीभ फेरते हुए बोली “देखा? तू मना करता है… पर तेरे शरीर को सब सच पता है।”
उनकी कलाई की हर हरकत मेरे पेट के नीचे आग जला रही थी। मैं दबे स्वर में कराह निकाला, खुद रोक नहीं पाया।
“दीदी… धीरे…” मैंने कहा, पर खुद ही जानता था कि मैं और चाहता हूँ।
वो मुस्कुराई, थोड़ी और झुक गई, इतना कि उनके बाल मेरे पेट को छू रहे थे। एक हाथ से मेरा लंड पकड़ कर वह उसे धीरे-धीरे सहला रही थी और दूसरा हाथ मेरी जाँघ पर घूम रहा था, मानो मेरे अंदर की बातें उंगलियों से सुन रही हों।
मैंने आँखे बंद कर ली। पूरी तरह उनके स्पर्श में खो गया। तभी वो और करीब सरक कर मेरे कान के पास आई, गर्म साँस मेरे गाल से टकराई, और उन्होंने धीमे से कहा, “गोलू… अब बस महसूस कर। सोच, तेरा ये लंड… मेरी चूत के अंदर जा रहा है।”
उनके ये शब्द सुनते ही मेरे पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। मैं हाँफ उठा, मेरी कमर खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी जैसे वो कल्पना सच करने को तैयार हो। वो वहीं मुस्कुरा कर मेरा लंड सहलाती रही और फुसफुसाई, “सोच, मैं तेरे ऊपर बैठी हूँ… तेरा हर इंच अंदर ले रही हूँ… धीरे-धीरे, पूरा…”
मैंने दाँत भींच कर कहा, “दीदी… प्लीज़… मत रुकना।”
फिर उन्होंने हाथ रोका नहीं, लेकिन सिर मेरे कंधे से छुआते हुए फिर से फुसफुसाई “अब कुछ और सोच…”
मैंने आँख खोली, उनके चेहरे पर शरारत ही नहीं, एक पागलपन था। फिर उन्होंने और भी धीमी आवाज़ में कहा, “सोच गोलू… तेरा ये सख्त लंड… मेरी टाइट गांड के अंदर घुस रहा है।”
मेरी साँस अटक गई। उन्होंने हाथ जरा और टाइट किया और बोली, “सोच… मैं आगे झुकी हुई हूँ… मेरी कमर तेरे सामने… और तू मुझे पीछे से पकड़ कर अंदर डाल रहा है… हर धक्का गहरा… हर धक्का तेज़…”
अब मेरा शरीर उनकी बातों का गुलाम था। कमर खुद ही उठ रही थी, दिल धड़कता था जैसे फट जाएगा। दीदी ने मेरी गर्दन अपने होंठों से छुआई और बोली, “बस सोचते रह… मैं भी चाहती हूँ… वहीं… पीछे से… पूरा… तेरा… मेरे अंदर…”
मैं खुद को रोकने की कोशिश करता रहा, लेकिन उनके शब्द, उनका हाथ, और मेरा जलता हुआ शरीर, सब मिल कर मुझे बेकाबू कर रहे थे।
मैंने आँखें कस कर बंद कर ली, हाथ कुर्सी की बाँहों पर जम गए, और मेरी आवाज़ टूटती हुई बाहर निकली, “दीदी… मैं… रोक नहीं पा रहा…”
उन्होंने ज़रा भी हाथ धीमा नहीं किया बल्कि और तेज़, और गहरा पकड़ कर सहलाने लगी।
“हाँ… बस छोड़ दे,” उन्होंने फुसफुसाया, “मेरे लिए छोड़ दे…”
और उसी पल मैं बिखर गया। मेरी कमर ऊपर उठी, साँस रुक गई और गर्म, घना सफेद पानी उनके हाथों पर फूट पड़ा। मैं हाँफता हुआ कुर्सी से लगभग फिसल गया, लंड अब भी उनके हाथ में धड़क रहा था। दीदी ने उसे आखिरी बार धीरे से दबाया, मेरी टांगों पर नीचे गिरती बूंदें देखी और मुस्कुराई।
मैं थरथराता रहा और उन्होंने अपनी उंगलियाँ मेरी जाँघ के पास सरकाई, जहाँ सफेद पानी की कुछ बूंदें टिकी थी। उन्होंने हल्के से उन्हें उठाया, उंगलियों पर घुमाया, और फिर धीरे से अपनी जीभ के नीचे उंगलियाँ रख दी।
उनकी आँखें मेरी आँखों में जमी थी जब उन्होंने वह स्वाद चखा। फिर होंठ चाटते हुए बोली, “अब सोच गोलू… ये सिर्फ शुरुआत है।”
वो और करीब झुकी, उनकी उंगलियाँ अभी भी गीली थी, और फुसफुसाई “कल्पना कर… तू जब चाहे , जहाँ चाहे… मेरे साथ सब कुछ कर सकता है।”
उन्होंने मेरे लंड की तरफ देखा और फिर मेरी आँखों में, “तू अपना यह लंड चाहे मेरा मुँह हो… चूत हो… या गांड…सब जगह डाल सकता है, लेकिन पहले मुझसे शादी करनी होगी।”
हम दोनों कैफ़े से बाहर निकले तो रास्ते में कोई बात नहीं हुई। उसकी बातों और उसके हाथ की गर्मी अब भी मेरे दिमाग में घूम रही थी, लेकिन जवाब मेरे पास था ही नहीं। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या करूँ।
हम धीरे-धीरे बस घर की तरफ चलते रहे। उसके कदम बिल्कुल आम थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो, लेकिन मैं महसूस कर सकता था कि वह भी अंदर से इंतज़ार कर रही थी कि मैं कुछ बोलूँ। मगर मैं चुप था। मैं बोल ही नहीं पा रहा था।
सच कहूँ तो उस समय मेरा दिमाग बिल्कुल ब्लैंक हो चुका था। मैं अभी तक उसके शब्दों में फँसा हुआ था। उसने सीधा और साफ बोल दिया था कि वो मेरे साथ सोना चाहती है, मेरे साथ रहना चाहती है, लेकिन शर्त सिर्फ एक है। और मैं उस एक चीज़ पर अटक गया था।
हम घर पहुँचे और बिना कोई बात किए अपने-अपने कमरों में चले गए। दरवाज़ा बंद होते ही मैं बिस्तर पर गिर पड़ा। दिमाग फटने जैसा महसूस हो रहा था।
सच कहूँ तो मैं घर पहुँचते-पहुँचते सोचने लगा था कि शायद मैं मूर्ख हूँ। क्योंकि अगर दुनिया की किसी भी लड़के को मौका मिले कि दीपिका दीदी जैसी लड़की उसके साथ रहना चाहे, तो वो पल भर भी नहीं रुकेगा।
और दिपिका दीदी कोई आम लड़की नहीं थी। वो मोहल्ले की सबसे खूबसूरत लड़की थी और शायद उससे भी ज़्यादा। उनकी छोटी आँखें जब मुस्कुराती थी तो लगता था सामने वाली चीज़ सिर्फ उन्हीं पर रुकी है। लंबे काले बाल जो हर बार कंधों पर गिरते थे, जिसे देख कर कोई भी पल भर को ठहर जाए। वो बाल ऐसे थे कि बस उनसे छू जाए तो आदमी वहीं खो जाए।
उनकी छाती, वो तो हर बार सामने आती थी जब भी वो झुकती थी, कुछ उठाती थी या हँसती थी। बड़ी, गोल और भरी हुई। मैं खुद को कई बार रोक नहीं पाया था कि ना देखूँ, लेकिन आँखें चाह कर भी हटती नहीं थी।
और उनकी कमर सबसे ज्यादा खतरनाक चीज़। जब वो चलती थी तो लगता था हर कदम किसी को घायल कर देगा। उनका पिछवाड़ा इतना परफेक्ट कि कोई भी लड़का बस एक बार देखने की इच्छा रखे कि वो कैसे दिखता है कपड़ों के बिना। और मैं तो उसे कपड़ों के बिना देख चुका था।
सच कहूँ तो कौन लड़का ऐसा नहीं चाहेगा कि वो उसके साथ सोए? और वो खुद मुझसे कह रही थी कि वो मेरे साथ सोना चाहती थी। सिर्फ मेरे साथ। लेकिन बदले में चाहती थी शादी।
और मैं वहीं उलझ गया था। मैं पूरी तरह कन्फ्यूज़ था। हाँ बोल दूँ तो वो मेरी हो जाएगी सब कुछ दे देगी, जो मैं सोच भी नहीं सकता। मगर अगर किसी को पता चल गया? अगर परिवार को भनक लग गई? अगर सब कुछ खत्म हो गया तो?
उसी दिमागी लड़ाई में मैं तब तक लेटा रहा जब तक नींद नहीं आ गई। ना हाँ कह पाया, ना इंकार। बस उलझन में डूबा पड़ा रहा। और यही सबसे बड़ा सच था, मैं दीपिका दीदी जैसी लड़की को खोना भी नहीं चाहता था… और उसकी शर्त पूरी करने की हिम्मत भी मुझमें नहीं थी।