पिछला भाग पढ़े:- नेहा दीदी के होंठों में लंड की पहली आग-5
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
उस दिन के बाद मैं पूरे हफ्ते इंतजार करता रहा कि कब इतवार आएगा और मैं नेहा दीदी के करीब जा सकूंगा। इन दिनों नेहा दीदी भी मुझे अपनी हरकतों से तड़पाने की कोशिश करती रही। कभी वह बाथरूम से नहा कर बिना कपड़ों के बाहर आती और मेरे सामने कुछ देर उसी तरह नंगी रह कर अपने बाल सुखाने की कोशिश करती।
जब भी वह पढ़ाई करने के लिए बैठती अक्सर अपनी टी-शर्ट निकाल कर बाजू में रखती, उस समय उन्होंने बस ब्रा ही पहना होता। उस पतले ब्रा के अंदर से भी उनके मुलायम स्तन नज़र आते। इस तरह की हरकतों के बाद मुझे खुद को रोकने में मुश्किलें आ रही थी, क्योंकि मैं नेहा दीदी को बहुत पहले से चाहता था और फिर भी मैंने बस एक बार अपना लंड उनके मुंह में दिया था।
नेहा दीदी की यह धीरे-धीरे की गई छेड़खानी मेरे अंदर आग जलाती रही। हर रात बिस्तर पर लेट कर मैं बस सोचता कि आखिर कब वह पल आएगा, जब मैं उनके शरीर को खुल कर छू पाऊंगा। कई बार रात में बाथरूम जाते हुए मैंने देखा कि दीदी ढीली पतली नाइटी में सोई होती, इतनी पतली कि नीचे का हर कटाव दिखाई देता।
उनकी जांघों के बीच की हल्की सी उभरी जगह को देख कर मेरा दम रुक जाता। वह करवट बदलती और नाइटी ऊपर खिसक जाती, जिससे पूरी जांघें बाहर नज़र आती। मैं बस खड़ा-खड़ा उन्हें देखता रहता और खुद पर काबू करता।
एक रात तो हद ही हो गई। गर्मी ज्यादा थी। पंखा चल रहा था लेकिन कमरे में हवा कम थी। मैं पानी पीने उठा और जैसे देखा कि दीदी चारपाई पर सो रही थी। नाइटी उनकी कमर तक ऊपर चढ़ी हुई थी और एक टाँग बिस्तर से बाहर लटकी थी। उनकी जांघें पूरी तरह खुली हुई थी और अंदर की तरफ की वो मुलायम, हल्की-सी गहरी जगह साफ नज़र आ रही थी।
मैं एक पल को जम गया। मेरी सांस रुक गया। लगा जैसे कोई मुझे वहीं जड़ कर रहा है। दीदी के सीने की हल्की-हल्की उठती गिरती लय और ब्रा के कपड़े के नीचे से बाहर निकला हुआ हिस्सा सब कुछ मेरे अंदर तेज आग की तरह फैल रहा था।
मैं धीरे से करीब गया और बस कुछ इंच दूर खड़ा होकर उन्हें देखने लगा। दीदी नींद में हल्का-सा सिसकी जैसी आवाज निकाल रही थी, मानो कोई सपना देख रही हों। उनकी जांघों की चिकनाई रोशनी में चमकती हुई लग रही थी और मैं बिना छुए भी महसूस कर पा रहा था कि मेरी उंगलियाँ कैसे वहां फिसल सकती हैं।
उस रात मैं खुद को रोकते-रोकते पागल हो गया। एक सेकंड के लिए लगा कि मैं आगे बढ़ कर उनके पैरों को पकड़ लूँ, जांघों को खोल दूँ और अपनी चाहत पूरी कर लूँ… लेकिन मैं वही खड़ा रहा, साँस रोक कर उन्हें बस अपनी आँखों में उतारता रहा।
और फिर आखिरकार इतवार आ गया। जैसे ही मेरी आंखें खुली, मैं सोचने लगा कि आज नेहा दीदी के बदन का मज़ा किस तरह ले सकूंगा।
मैं सोच रहा था कि उनके साथ सेक्स करते हुए मुझे किस तरह का सुख मिलेगा। उनके बदन में बहुत सी जगहें थी जहां मैं अपना लंड रखना चाहता था – उनका मुंह, उनका पिछवाड़ा और उनका वह नाज़ुक हिस्सा। मैं ठीक से तय भी नहीं कर पा रहा था कि इस इतवार मैं किस तरह उनका मज़ा लूं।
लेकिन तभी मेरी नींद पूरी तरह खुल गई और मैंने देखा कि नेहा दीदी कमरे में नहीं थी। पहले तो मैंने सोचा शायद वो बाथरूम में होंगी। मैं उठ कर वहां गया, दरवाज़ा खोला, पर वो वहां भी नहीं थी। थोड़ा घबरा कर मैंने अपना मोबाइल उठाया और उन्हें कॉल लगाया। फोन उठाते ही मैंने पूछा, “आप कहाँ हैं?” उन्होंने आराम से कहा कि वो कॉलेज में हैं, क्योंकि उन्हें एक प्रोजेक्ट सबमिट करना था।
मैंने लंबी सांस ली। अब कुछ और करने को था भी नहीं, तो मैं खुद नहाने चला गया। ताज़ा पानी मेरे बदन पर गिर रहा था और मेरे दिमाग में बस वही ख्याल था—शाम तक दीदी लौट आएंगी… और आज शायद मेरी तमन्ना पूरी हो जाएगी।
नहाने के बाद मैंने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहने, बैग उठाया और कॉलेज के लिए निकल गया। पूरा रास्ता मैं बस यही सोचता रहा कि जब मैं अपना लेक्चर खत्म करके वापस घर आऊंगा, शायद वह पहले से वहाँ होंगी… और फिर मैं पूरी तरह अपनी इच्छा पूरी कर सकूंगा।
कॉलेज पहुंच कर मैंने पहला लेक्चर निपटाया, लेकिन ध्यान पढ़ाई में कहां था। जैसे ही छुट्टी हुई, मैं सीधा कैंटीन की तरफ घूम गया कुछ खाने के लिए। जैसे ही मैंने अंदर कदम रखा, मेरी सांस एक पल को रुक गई – नेहा दीदी पहले से वहाँ थी।
वो अपनी दो सहेलियों के साथ एक टेबल पर बैठ कर खाना खा रही थी। लाइट नीली कुर्ती में उनका चेहरा और भी चमक रहा था। उन्होंने जैसे ही मुझे देखा, हल्की मुस्कान चेहरे पर आई।
मैं धीरे-धीरे उनकी टेबल की तरफ बढ़ा। हर कदम के साथ दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी। जैसे ही मैं उनके पास पहुँचा, उन्होंने मुझे देख कर आँखें ऊपर उठाई और पूछा, “क्या कर रहे हो यहाँ? तुम्हारी आज कोई क्लास नहीं है क्या?”
मैंने मुस्कुराकर हल्के से सिर हिलाया और कहा कि, “मेरा लेक्चर अभी अभी खत्म हुआ है और मैं नाश्ता करने यहाँ आया हूँ।” उनकी नज़र एक पल के लिए मेरे चेहरे पर अटकी रही, जैसे कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही हों, फिर होंठों पर वही हल्की मुस्कान लौट आई और उन्होंने अपनी उंगलियों से पास वाली कुर्सी की तरफ इशारा किया कि बैठ जाओ।
मैं उनके बिल्कुल पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। दीदी ने बिना कुछ पूछे मेरे लिए भी नाश्ता ऑर्डर कर दिया, जैसे उन्हें पहले से पता था कि मुझे भूख लगी होगी। खाना आते ही मैंने चुप-चाप खाना शुरू कर दिया। दीदी और उनकी सहेलियाँ अपनी ही बातों में हँसती-हँसाती रही, और मैं बस प्लेट में देखता रहा, लेकिन असली भूख तो कुछ और ही थी।
उनकी कुर्ती के नीचे से उनका बड़ा, मुलायम सा गोल पिछवाड़ा कुर्सी से जैसे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। वो हर हल्की सी हरकत के साथ हिलता था। मेरी नज़र वहीं अटक गई थी। मैं खाना तो चबा रहा था, लेकिन निगाहें बार-बार बस उस गोलाई पर टिक जाती थी। ऐसा लगता था जैसे वो कुर्सी पर टिक ही नहीं पा रहा—बस बाहर छलक पड़ना चाहता हो।
एक सेकंड के लिए मेरी उंगलियाँ कांप गई जैसे उसे पकड़ लेने की कल्पना से ही। मैं मन ही मन सोच रहा था, काश अभी यही हाथ बढ़ा कर उसे जकड़ लूँ… महसूस करूँ कि कितना नरम और गर्म है वो।
नेहा दीदी और उनकी सहेलियां बहुत देर तक बातें करती रही। धीरे-धीरे उनकी बातें धीमी पड़ने लगी। फिर वो पल आया जब उन्होंने अपनी सहेलियों के साथ बात करना पूरी तरह बंद कर दिया।
उसी पल मैं उनके करीब झुका। मेरे होंठ लगभग उनके कान को छू रहे थे। उन्होंने सिर ज़रा सा मोड़ा, शायद सुनने के लिए, और उसी पल मैं फुसफुसाया “आज… आज मैं तुम्हारी गांड मारना चाहता हूँ, नेहा दीदी।”
मेरे शब्द उनके कान में पड़ते ही उन्होंने तुरंत ही हल्का सा झटका महसूस किया, जैसे कोई तेज़ चुंबक उनके बदन से टकरा गया हो। एक सेकंड के लिए वो जड़ सी हो गई। फिर अगले ही पल वो ज़ोर से हँसने लगी, जैसे मैंने कोई मज़ेदार जोक सुनाया हो। ताकि उनकी उनकी सहेलियाँ सोचे कि मैंने कोई मजेदार बात उनके कान में बताई है।
लेकिन मैं उनके चेहरे को देख रहा था, हँसी के पीछे उनकी आँखें चमक रही थी, और उनके गाल लाल पड़ गए थे। वो जानती थी कि मैंने जो कहा था, वो मज़ाक नहीं था। वो चाह कर भी मेरी बात को अनसुना नहीं कर पा रही थी।
मैंने प्लेट खाली की, पानी पिया और धीरे से कुर्सी से उठ गया। दीदी ने भी बिना कुछ बोले मेरी तरफ देखा, बस उस नज़र में एक गहरी चमक थी। जैसे वो भी चाहती हों कि मैं जल्दी से इस कैंटीन से निकल जाऊँ… ताकि अगली मुलाकात और गरम हो सके।
मैंने उनके सामने से गुजरते हुए एक आखरी नज़र उनके गोल पिछवाड़े पर डाली और सीधे अपनी अगली क्लास की तरफ निकल पड़ा।
लेक्चर हॉल में बैठते ही टीचर बोर्ड पर कुछ लिखने लगे, पर मेरा दिमाग कहीं और था। मैं कलम हाथ में लिए बैठा था, पर शब्द समझ ही नहीं रहा था कि सामने क्या लिखा है। नज़रें कभी-कभी बोर्ड पर जाती, लेकिन दिमाग में बस एक ही तस्वीर— नेहा दीदी का वो बड़ा, मुलायम, हिलता हुआ पिछवाड़ा।
आखिरकार जब शाम को सारे लेक्चर खत्म हो गए, मैं खुशी के मारे उस छोटे से कमरे की तरफ चल पड़ा, जहां नेहा दीदी मेरा इंतजार कर रही थी। पूरे रास्ते भर मैं बस नेहा दीदी के पिछवाड़े के बारे में सोचता रहा। उनका वह खुबसूरत पिछवाड़ा जिसमें मैं अपना लंड डालने वाला था।
कमरे के सामने पहुँच कर मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैंने गहरी सांस ली और दरवाजा धीरे से खोला। जैसे ही मैंने कमरे के अंदर कदम रखा, मेरी आंखें फटी रह गई। नेहा दीदी बेड पर सोई हुई थी। उनका चेहरा नीचे की तरफ था, और बाल बिखरे हुए कंधों पर फैले पड़े थे। उन्होंने ढीला-ढाला पायजामा पहन रखा था, पर उस ढीले कपड़े से भी उनका गोल-मटोल भारी पिछवाड़ा पूरी तरह से उभर कर नज़र आ रहा था।
मैं धीरे-धीरे कदम दबाते हुए उनके करीब गया। मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि मुझे लग रहा था कहीं वह इसी आवाज़ से जाग ना जाएं। पर वह गहरी नींद में थी— सांसें धीमी और लंबी, जैसे पूरा शरीर ढीला होकर आराम में डूबा हो।
मैं बेड के बिलकुल पास घुटनों के बल बैठ गया। मेरा चेहरा ठीक उनके भारी उभरे हुए पिछवाड़े के पास था। इतने करीब कि मुझे गर्माहट महसूस हो रही थी। पायजामे का कपड़ा हल्के से तन गया था और उनकी कर्व्स मेरे चेहरे के सामने हिलती सी लग रही थी।
मैंने धीरे से हाथ बढ़ा कर उनके पायजामे की नाड़ी खोल दी और उसको नीचे खींचा। मैं यह सब इतने आराम से कर रहा था कि उनकी निंद ना टूट जाए। उन्होंने अंदर गुलाबी रंग की पैंटी पहन रखी थी, जिस पर हल्के-हल्के फूल बने थे। उसके अंदर से दीदी के पिछवाड़े की गर्मी साफ़ महसूस हो रही थी। मैंने उनकी पैंटी को भी नीचे खींचा और फिर उनका बड़ा-सा पिछवाड़ा मेरे सामने खुला हो गया।
उनका गोरा, नरम और भारी पिछवाड़ा जैसे मेरे सामने सांस ले रहा था। त्वचा की गर्म चमक मानो मुझे बुला रही थी। मैंने उंगली के पोरों से हल्के से उसके ऊपर लकीर खींची। जैसे गर्म रेशम छू रहा हूं। नेहा दीदी की सांस एक पल को भटकती-सी लगी। मैं ठहर गया। मगर वह फिर गहरी नींद में डूब गई।
अब मैं और नहीं रुक सका। अपना चेहरा थोड़ा झुका कर मैंने उनके नरम गोले को हल्के से चूमा। मेरी गर्म सांस उनके नंगे बदन से टकरा कर जैसे वापस मुझे ही धकेल रही थी।
मुझे खुद पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था। मैंने अपनी पैंट खोल कर बाजू में रख दी और फिर अंडरवियर के साथ भी वैसा ही किया। अब मेरा खुला सख्त लंड हवा में तन कर खड़ा था इस इंतजार में कि कब मैं उसको नेहा दीदी के पिछवाड़े के अंदर डाल दूं। धीरे-धीरे मैंने अपने दोनों हाथों से उनके गोल-मटोल पिछवाड़े को पकड़ा—पूरा हथेली में भी नहीं भरे। वह भारी, गर्म और मुलायम था।
मैं झुक कर उनके दोनों गालों को धीरे-धीरे अलग करता गया, जैसे कोई सबसे अनमोल चीज़ खोल रहा हो। भीतर की गुलाबी लाइन गहरी और गीली सी चमक रही थी। मैंने लंड से उस दरार को छुआ—बस हल्का सा।
अब मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मैंने उंगलियों से उनके गालों को हल्का और अलग किया, और फिर अपना पूरा लंड ले जाकर उस तंग गरम खोल के बिल्कुल सामने टिका कर थोड़ा धक्का दिया। पहले तो मेरा लंड थोड़ा-सा अंदर गया। मैं सब बहुत धीरे करना चाहता था लेकिन जैसे ही मेरा लंड थोड़ा-सा अंदर गया मैं खुद को रोक नहीं पाया और एक जोरदार धक्का दे बैठा।
जैसे ही मेरा पूरा लंड अंदर गया, दीदी दर्द से कराह उठीं। उनकी नींद पूरी तरह टूट चुकी थी। वह झटके से जागी और तकिए को भींचते हुए चीख पड़ी, “गोलू! निकालो इसे बाहर! तुम क्या कर रहे हो?!” उनका बदन दर्द से काँप रहा था, सांसें तेज़ चल रही थी, और आँखों में सदमे का डर साफ दिख रहा था। फिर भी उनका ग़र्म, तंग शरीर मेरे लंड को कस कर पकड़े हुए था, जैसे छोड़ना ही नहीं चाहता हो।
मैंने धीरे से उनकी पीठ के पास झुक कर फुसफुसाया, “लेकिन दीदी, मैंने तो पहले ही कहा था ना… आज मैं तुम्हारी गांड मारने वाला हूँ।”
उन्होंने लगभग चिल्लाते हुए कहा, ” गोलू तुम मेरी मार सकते हो, लेकिन मुझे तैयार होने दो। पहले इसको बाहर निकालो।”
मैंने उनकी बात सुन कर अपनी कमर पीछे कर ली। जैसे ही मेरा लंड उनके छोटे से छेद से बाहर आ गया, नेहा दीदी बिस्तर पर बैठ गई और उंगलियों से अपने छेद को सहलाने लगी। उनका चेहरा दर्द के भरा हुआ था लेकिन उन्होंने मुझे कुछ भी कहा नहीं। उन्होंने सिर्फ मेरे सख्त लंड की तरफ देखा और मेरी हालत को समझ गई। धीरे-धीरे उन्होंने अपने दोनों हाथ पीछे ले जाकर अपनी कुर्ती उठाई। ढीली कुर्ती और ब्रा दोनों एक साथ नीचे सरक गई और उनके स्तन पूरी तरह खुले में आ गए।
नेहा दीदी ने करवट बदली, साँसें तेज़ थी और शरीर पसीने से चमक रहा था। उन्होंने मेरी ओर देखते हुए मुस्कुरा कर कहा, “गोलू… अब तुम लेट जाओ। अब मेरी बारी है। मैं तुम्हें अपनी गांड का सबसे यादगार मज़ा देने वाली हूँ।”
मैंने बिना कुछ कहे बिस्तर पर पीठ के बल लेट गया। दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि खुद सुनाई दे रहा था। दीदी धीरे-धीरे आगे सरकीं, उनकी जाँघें मेरे दोनों ओर थी, पिछवाड़े के गाल पूरी तरह खुले हुए, मुलायम और भारी।
उन्होंने अपनी गर्म हथेलियों से अपने पिछवाड़े फैलाए और नीचे झुक कर मेरा लंड अपनी दरार के बीच में फिट किया।
“बस आराम से… बाकी मैं करूँगी,” उन्होंने धीमे से कहा।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कमर नीचे की ओर दबाई, उनके पिछवाड़े का कोमल छेद मेरे सिरे से टकराया। हल्की सी गरमाहट और झनझनाहट दोनों तरफ फैल गई। दीदी ने हल्का कराहते हुए अपनी कमर और नीचे छोड़ी, जैसे खुद को मजबूरी और आनंद के बीच धकेल रही हों।
अंदर जाते ही उनके पिछवाड़े काँप गए लेकिन वो रुकी नहीं। उन्होंने दोनों हाथ मेरी छाती पर रखे और अपनी कमर को ऊपर नीचे चलाना शुरू किया। पूरा बिस्तर हल्का-हल्का हिल रहा था और दीदी हर धक्के के साथ गहरी सांस ले रही थी।
“देखा गोलू… मेरी गांड का मज़ा ऐसा होता है… धीरे-धीरे इसमें तुम खो जाओगे…” उन्होंने आँखें बंद रखते हुए कहा।
उनकी कमर की हर धीमी चाल मेरे अंदर बिजली सी दौड़ा रही थी। जैसे-जैसे वो ऊपर नीचे होती, उनकी साँसे गरम हवा बन कर मेरे चेहरे तक पहुँच रही थी। मैं नीचे से खुद को रोक नहीं पा रहा था और धीरे-धीरे कमर ऊपर उठा कर उनके धक्कों का जवाब देने लगा।
नेहा दीदी ने आँखें खोल कर मेरी तरफ देखा— वो नज़रों में एक पागलपन था, एक भूख थी जिसको मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उन्होंने मेरे सीने पर हाथ रख कर खुद को और ऊपर उठाया और फिर पूरी ताकत से नीचे बैठी। मैं दाँत कस कर रह गया। उनके मुँह से एक लम्बी, भारी कराह निकली।
उनका पिछवाड़ा मेरे पेट पर टकरा रहा था और वो बिना रुके, बिना थके अपनी रफ़्तार बढ़ाती जा रही थी। उनकी जाँघें काँप रही थी और पसीना उनकी रीढ़ से बह कर मेरे पेट तक आ रहा था।
फिर अचानक वो आगे झुकी, मेरे कान के पास होंठ लाकर फुसफुसाई, “गोलू… अब ज़ोर से पकड़ मुझे… मैं रुकने वाली नहीं हूँ।”
मैंने दोनों हाथ उठा कर उनका भारी गर्म पिछवाड़ा कस कर पकड़ लिया, उँगलियाँ गहराई तक धँसती चली गई। दीदी ने कमर और तेज़ी से उठानी गिरानी शुरू कर दी, बिल्कुल जान देकर। उस पल दीदी जैसे किसी जंगली लय में उतर चुकी थी। उनका पूरा वज़न मेरी कमर पर गिरता और उठता, छेद हर बार और ज़्यादा कस कर मेरे लंड को जकड़ लेता। उनके बाल हवा में झूल रहे थे और हर उछाल के साथ उनकी पीठ की हड्डियाँ साफ़ दिख रही थी।
दीदी लगातार ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रही थी और मुझे खुद को संभालना मुश्किल हो रहा था। उनके पिछवाड़े का वह छोटा सा छेद मेरे लंड को ऐसे जकड़ रहा था जैसे अंदर से मुझे चूस रहा हो। हर धक्के के साथ मेरे लंड की नसें गरम होकर फड़फड़ाने लगी थी, मानो अब बस फटने वाली हों।
मैंने दाँत भींचे, साँसें तेज़ कर ली और हाँफते हुए बोला, “दीदी… मैं आ रहा हूँ…”
अचानक उन्होंने कमर को थाम कर खुद को रोक लिया। उनका शरीर काँपा और उन्होंने जल्दी से बोल दिया, “नहीं… मेरी गांड में नहीं…” आवाज़ धीमी लेकिन सख़्त थी।
उन्होंने मेरे लंड को एक झटके में बाहर निकाल लिया, वो गर्माहट और कसावट पल भर में गायब हो गई। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, दीदी नीचे झुक गई और तुरंत मेरा भीगा हुआ लंड अपने होंठों के बीच ले लिया।
उनके गर्म मुँह की पहली ही चुस्की ने मेरे पूरे बदन में करंट जैसा दौड़ा दिया। मेरी थरथराती हुई साँसें उनकी हर गहरी चूम और चूसन के साथ और भारी होती जा रही थी।
दीदी धीरे-धीरे नहीं, पूरे जोश के साथ मेरा लंड मुँह में ले रही थी, ज़ुबान सिरों पर कसकर घुमती, फिर बेस तक जाकर होंठों से निचोड़ देती।
कुछ ही सेकंड बाद मेरा पूरा शरीर तन गया और आँखें खुद ब खुद बंद हो गई। मेरा झटका लगा और गरम सफेद पानी का फव्वारा दीदी के मुँह में फूट पड़ा। उन्होंने होंठों को कस कर बंद कर लिया, मेरे हर धकेले के साथ निकलती हर बूंद को भीतर खींचते हुए। दीदी ने गले तक भर कर उसे निगल लिया, जैसे एक भी कतरा बर्बाद ना करना चाहती हो।
फिर भी आख़िरी दो तीन मोटी बूंदें उनके होंठों से फिसल कर ठुड्डी पर सरक गई और धीरे-धीरे उनकी गर्दन पर नीचे की ओर बहने लगी, दीदी ने बस मुस्कुरा कर जीभ से उन्हें चाट लिया।
फिर उन्होंने अपनी उँगली से मेरी टपकती लंड की नोक पर हल्का दबाव दिया, नज़रें मेरी आँखों में टिकीं। दीदी ने धीमी, शरारती मुस्कान के साथ फुसफुसाया, “तो बोल… कैसी लगी अपनी दीदी की गांड?”
नेहा दीदी के होंठों पर हल्की मुस्कान थी और किनारे पर सफेद पानी की बूंदे चमक रही थी। इतने दिनों की ख्वाहिश के बाद नेहा दीदी के साथ मैं वह सब कर रहा था जिसकी मुझे ख्वाहिश थी। पहले मैंने उनके मुंह में लंड दिया था और आज उनका पिछवाड़ा मेरा हो चुका था। मुझे लगने लगा आखिरकार नेहा दीदी के साथ मैं अपनी बदन की आग को बुझा रहा हूं।