पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-5
भाई-बहन सेक्स कहानी का अगला भाग-
उस पल मुझे लगा था कि सुधा दीदी मजाक कर रही थी, क्योंकि हम दोनों ने भाई बहन की सारी हदें पार कर दी थी। मैंने उन्हें पूरी तरह से नंगी देखा था और उन्होंने भी मुझे पूरी तरह से नंगा देखा था। इसके बाद मुझे पूरा यकिन था कि दीदी मुझसे कभी दूर नहीं जाएंगी लेकिन उस दिन के बाद उनका बर्ताव पूरी तरह बदल गया।
उसके बाद के दिनों में उन्होंने मुझे नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। घर में होते हुए भी वो मुझसे बात करने से बचती रही। जहाँ भी मैं उनके पास जाने की कोशिश करता, वो किसी ना किसी बहाने से दूरी बना लेती। कभी फोन में उलझ जाती, कभी किसी काम का बहाना कर लेती। रसोई में हों तो मैं अंदर जाता, तो वो चुप-चाप बाहर निकल जाती। छत पर खड़ी दिखतीं तो मैं ऊपर चढ़ता, उससे पहले ही वो नीचे उतर जाती।
पहले जो आँखें मुझे ढूँढती थी, अब मुझसे बचती थी। उनके चेहरे पर वही शांति थी, लेकिन मेरे लिए नहीं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि गलती कहाँ हुई, या क्या वो सब कुछ भूल जाना चाहती थी? हर कोशिश के साथ उनकी खामोशी और गहरी होती गई, और मैं उसी खामोशी में खुद को और अकेला महसूस करने लगा।
एक सुबह की बात है। नहा कर जब वो बाथरूम से बाहर आई, तो घर में अजीब सी खामोशी थी। पानी की हल्की सी खुशबू हवा में घुली हुई थी और उनके कदमों की आवाज़ धीमी थी। मैं अपने कमरे से निकल कर बिना शोर किए उनके कमरे की ओर चला गया। दरवाज़ा आधा खुला था।
उस समय उन्होंने अपने बदन को तौलिये से ढका हुआ था। उनके लंबे गीले बाल खुले हुए थे और कंधों को छू रहे थे। तौलिया ठीक से लिपटा नहीं था और सामने की खुली जगह साफ दिखाई दे रही थी। वो बिस्तर के सामने खड़ी थी और अलमारी की तरफ देखते हुए सोच रही थी कि आज क्या पहनना है। उनके हाथ कभी तौलिये को संभालते, कभी कपड़ों की तरफ बढ़ते, जैसे मन ही मन फैसला करने की कोशिश कर रही हों। उन्होंने मेरी तरफ नहीं देखा और मैं वहीं खड़ा रहा।
मैं अब खुद को रोक नहीं पाया और एक कदम आगे बढ़ कर कमरे के अंदर चला गया। जैसे ही मेरे कदमों की आहट पड़ी, वो चौंक गई और अचानक मेरी तरफ देखने लगी। उनकी आँखों में हैरानी साफ थी। मैंने पीछे मुड़ कर दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।
उन्होंने घबराकर कहा, “तुम यहाँ क्या कर रहे हो, गोलू?”
मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और रुक कर खड़ा हो गया। दिल तेज़ धड़क रहा था। मैंने सीधा उनकी तरफ देखते हुए कहा, “आप मुझे इग्नोर क्यों कर रही हो, दीदी?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने सिर आगे बढ़ कर तौलिए के एक बाजू के पकड़ा और उसे खींचने लगा। पहले तो दीदी ने उसको जोर से पकड़ा, लेकिन कुछ ही देर बाद उनकी पकड़ ढीली पड़ गई और तौलिया मेरे हाथों में आ गया। अब दीदी पूरी तरह से नंगी खड़ी थी और दोनों हाथ पास लाकर अपने स्तनों को छुपाने की कोशिश कर रही थी।
वो एक पल के लिए आँखें बंद कर के गहरी साँस लेने लगी। कमरे में सिर्फ़ हमारी साँसों की आवाज़ थी। उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “बस…अब हम दोनों कुछ भी नहीं कर सकते।” उनकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन उसमें साफ़ी थी।
मैंने तौलिया अपने हाथ से नीचे गिरा दिया। वो फर्श पर गिरते ही एक हल्की सी आवाज़ हुई, जैसे कमरे की खामोशी और गहरी हो गई हो। मैंने एक कदम पीछे हटते हुए कहा, “लेकिन क्यों नहीं?”
उन्होंने सिर उठाया और बिना मेरी तरफ आए बोलने लगी। “क्योंकि पिछली बार जब मैंने तुमसे रुकने को कहा था, तुम नहीं रुके। उस समय मुझे बहुत दर्द हुआ था, और तुम उस वक़्त जानवरों की तरह पेश आए।”
मैंने हिचकिचाते हुए कहा, “दीदी, मुझे लगा था कि आपकी कही बातों को समझ कर ही मैं आगे बढ़ा था। मुझे लगा था कि पिछवाड़े से करने पर आपको तकलीफ़ नहीं होगी… अगर मैंने गलत समझा, तो मुझसे बड़ी गलती हो गई।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा भी नहीं। आवाज़ सख़्त थी और फैसला साफ़। उन्होंने कहा, “गोलू, मुझसे अब बात मत करो। बाहर जाओ।”
लेकिन मैंने उनकी बात नहीं मानी और उल्टा एक कदम आगे बढ़ कर उनके और पास गया। इतना पास की उनकी गर्म सांसें मुझे अपने चेहरे पर महसूस होने लगी। मैंने आगे बढ़ कर उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उन्होंने पिछे हटने की कोशिश की लेकिन मैंने उनको अपनी बांहों में भर लिया और जोर से चूमने लगा। उनके मुलायम होठ मेरे होंठों और दांतों के बीच दबने लगे।
उनके होंठ मेरे होंठों से टकराते ही साफ़ महसूस हो रहे थे। ना ज़्यादा नरम, ना सख़्त, बस गर्म और नम। जब मैं दबाव बढ़ाता, तो उनके होंठ हल्के से अंदर की तरफ मुड़ते और फिर वापस अपनी जगह आ जाते। हर बार सांस लेते समय उनके होंठ थोड़े खुलते और मेरी सांस उनसे टकराती। बीच-बीच में उनका निचला होंठ मेरे होंठों के नीचे फँस जाता और छूटते ही हल्की सी फिसलन महसूस होती।
अचानक उन्होंने मेरे होंठों को एक पल के लिए छोड़ा और हाँफती हुई बोली, “गोलू, ये तुम क्या कर रहे हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते। मैं तुम्हारी बड़ी बहन हूँ।” उनकी आवाज़ में घबराहट और सख़्ती दोनों थी।
मैंने उनकी आंखों में देखते हुए कहा। “लेकिन दीदी आप ही तो मुझे सेक्स करना सिखाना चाहती थी। और अब मैं आपके बिना नहीं रह सकता।”
और फिर मैंने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर उनके स्तन को पकड़ लिया। वह अब भी पानी कि वजह से थोड़ा नमक था और निप्पल मेरे उंगलियों के नीचे सख्त महसूस हुआ। निप्पल हाथ में आते ही लगा जैसे मेरे पूरे बदन में बिजली दौड़ गई हो।
दीदी के स्तन हरबार की तरह बहुत मुलायम और नाज़ुक लग रहे थे मानो हाथ लगाते ही पिघल जाएंगे। मैंने दोनों उंगलियों के बिच उनके निप्पल को मरोड़ा तो वह हल्का लाल पड़ गया। दीदी के सांसें उसी के साथ ही थोड़ी गहरी हो गई।
तभी उन्होंने झटके से मेरा हाथ झटक दिया और एक कदम पीछे हट गई। मेरी पकड़ से निकलते हुए उन्होंने सख़्त आवाज़ में कहा, “अब बस करो, गोलू। अभी यहीं रुक जाओ।”
मैंने फिर से आगे बढ़ने की कोशिश की और उनका हाथ पकड़ना चाहा। अगले ही पल उनका हाथ उठा और तेज़ थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा। वह चिल्लाई, “गोलू, बाहर निकलो। अभी इसी वक्त मेरे कमरे से बाहर जाओ।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस हाथ पीछे खींचा, नज़र झुकाई और बिना एक शब्द बोले उनके कमरे से बाहर निकल आया।
उस दिन के बाद से मैंने भी दीदी के पास जाने की कोशिश छोड़ दी, लेकिन उनसे दूर रहना मुझे नामुमकिन सा लग रहा था। हम दोनों एक ही छत के नीचे रहते थे, और हर रोज़ मेरी आँखों के सामने कुछ ना कुछ ऐसा आ जाता, जो मन को फिर उलझा देता।
अगले दिनों में ये उलझन और गहरी होती गई। जब भी वह फर्श से कुछ उठाने के लिए झुकतीं, पल भर को उनकी लंबी क्लीवेज मेरी नज़रों के सामने आ जाती, और मैं ना चाहते हुए भी ठहर सा जाता। बाथरूम में नहाने के लिए जाता तो अक्सर बाहर टंगी उनकी ब्रा और पैंटी दिख जाती। उनके नहाने के बाद की नमी अभी बाकी होती, जैसे कमरे में उनकी मौजूदगी ठहरी हो। शाम को हॉल में टीवी देखते हुए या सोफे पर लेटे-लेटे झपकी लेते वक्त, वह शॉर्ट्स पहनकर सामने से गुजरतीं। उनका गोल मटोल पिछवाड़ा मेरी आंखों के सामने आ जाता और मैं भीतर ही भीतर खुद को संभालने की कोशिश करता रहता।
धीरे-धीरे मैं उनकी छोटी-छोटी आदतों पर ध्यान देने लगा। चाय बनाते वक्त उनका दुपट्टा कंधे से सरक जाता, तो मैं नज़रें झुका लेता, जैसे खुद से कोई वादा निभा रहा हूँ। कभी-कभी उनकी खुशबू कमरे में देर तक ठहरी रहती, और वही खुशबू मेरे विचारों को भटका देती। वे मुझसे ज़्यादा बात नहीं करती थी, पर उनकी खामोशी भी कुछ कहती हुई लगती।
रात को जब मैं सोने जाता, तो नींद आने से पहले अक्सर उन्हीं के ख्यालों में डूबा रहता। जिन्हें मैं दिन में जितना दबाने की कोशिश करता, रात में उतनी ही ताकत से वे लौट आते। कभी सपने में मुझे पुराने दिनों की याद आती जब उनके होंठ मेरे लंड को छू रहे होते, कभी मैं उनके स्तन को दबा रहा होता, तो कभी हम दोनों एक दूसरे को चूमते रहते। वह एहसास इतना गहरा होता कि सब कुछ असली लगता। जब सुबह उठता तो पता चलता कि मेरी अंडरवियर गंदी हो चुकी है।
इसके बाद मैंने तय किया कि मुझे उन्हें इग्नोर करना होगा। यह फैसला दिमाग से लिया गया था, दिल से नहीं। मैं कोशिश करता कि उनके सामने कम आऊँ, बातचीत को छोटा रखूँ। लेकिन सच यही था कि उन्हें नज़र-अंदाज़ करना मेरे लिए बेहद कठिन था। एक ही घर में रहते हुए उनकी मौजूदगी हर जगह महसूस होती थी, कभी किसी कमरे से आती आवाज़, कभी पास से गुजरने की आहट, और कभी बस यह एहसास कि वह आस-पास हैं।
एक दिन मैं खुद को और ज्यादा संभाल नहीं पाया। रात के समय मैं उनके कमरे के सामने गया और उसको खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन वह अंदर से बंद था।
फिर अगले पल मैंने हल्के से दरवाज़ा खटखटाया। कुछ सेकंड की खामोशी के बाद अंदर से कदमों की आहट आई और कुंडी खुली। दरवाज़ा खुलते ही वह सामने खड़ी थी सफेद टी-शर्ट और नीले शॉर्ट्स में। कमरे की पीली रोशनी में उसका चेहरा थोड़ा चौंका हुआ लगा, जैसे अचानक किसी को देख लिया हो।
टी-शर्ट उसके शरीर पर आराम से बैठी हुई थी, लेकिन कपड़े की हल्की तनी हुई सिलवटें साफ़ बता रही थी कि उसके स्तन कितने भरे हुए थे। कपड़े के नीचे उनकी गोलाई हल्के उभार के साथ दिख रही थी, ना ज़्यादा खुली, ना छुपी, बस इतनी कि मेरी नज़र वहीं ठहर जाए। सांस लेते समय टी-शर्ट का कपड़ा धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था, और उसी लय में वह उभार भी हल्का सा हिल रहा था।
नीले शॉर्ट्स घुटनों के ऊपर तक थे, लेकिन पूरे पहनावे में एक सहज घरेलू सादगी थी। वह दरवाज़े के फ्रेम से टिक कर खड़ी थी, एक हाथ से दरवाज़ा पकड़े हुए, और उसी सादगी में उसकी मौजूदगी कमरे से बाहर तक महसूस हो रही थी।
वह एक पल मुझे ऊपर से नीचे तक देखती रही, फिर हल्की सी आवाज़ में बोली, “क्या चाहिए तुम्हें, गोलू?”
मैंने थोड़ी झिझक के साथ उसकी ओर देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “मुझे आपसे बात करनी है, दीदी।”
उसने बिना कुछ कहे एक कदम पीछे हट कर मुझे अंदर आने का इशारा किया। मैं कमरे में दाख़िल हुआ तो उसने दरवाज़ा हल्के से बंद कर दिया। कमरे में वही पीली रोशनी थी और एक अजीब सी खामोशी। मैं आगे बढ़ कर पलंग के किनारे बैठ गया। वह मेरे ठीक सामने खड़ी रही और मुझे देखते हुए जैसे इंतज़ार कर रही हो कि मैं अपनी बात शुरू करूँ।
मैंने सिर झुकाया, फिर हिम्मत जुटा कर उसकी ओर देखा और कहा, “दीदी, मैं आपके बिना रह नहीं पाता। मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ, बस आप मुझसे अजनबी की तरह मत पेश आओ।”
वह मेरे और क़रीब आई। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें दबा हुआ गुस्सा साफ़ महसूस हो रहा था। उसने फुसफुसाकर कहा, “तुम ये सब इसलिए कह रहे हो क्योंकि तुम्हें बस तुम बस मुझे चोदना चाहते हो। तुम्हें मेरी फिलिंग्स की कोई परवाह नहीं है।”
मैंने गहरी सांस ली और सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “हाँ, मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारी भावनाएँ मेरे लिए मायने नहीं रखतीं। पिछली बार जो हुआ, उसके लिए मुझे सच में अफ़सोस है। तुम ही एक हो जो मुझे समझ सकती हो।”
वह कुछ नहीं बोली। उसकी नज़रें मुझसे हटकर सामने वाली दीवार पर टिक गई, जैसे वह वहाँ कुछ ढूँढ रही हो। कमरे में खामोशी और गहरी हो गई। मुझे लगा शायद वह मेरी बात समझ नहीं पाई। मैं उठने लगा, तभी उसने बिना मेरी तरफ़ देखे धीमे लेकिन सख़्त लहजे में कहा, “पिछले कुछ दिनों में मैंने तुम्हारे कपड़े धोए हैं… तुम्हारा अंडरवियर गंदा था।”
मैं फिर से पलंग पर बैठ गया और शांत आवाज़ में कहा, “मैं खुद पर काबू रखने की कोशिश करता हूँ, दीदी। लेकिन जब भी आँखें बंद करता हूँ, मेरे सपनों में सिर्फ़ तुम ही आती हो और उन्हीं पलों में मुझे सुकून मिलता है।”
उसने तब मेरी तरफ़ देखा। नज़रें कुछ पल मेरे चेहरे पर टिकी रहीं, फिर हल्की नाराज़गी के साथ उसने कहा, “तो फिर तुम अपने हाथों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?”
मैंने उसकी बात सुनी, पल भर चुप रहा, फिर धीरे से कहा, “मैं अपने हाथों से खुद को बहला सकता हूँ, लेकिन वह एहसास नहीं मिलता। मुझे तुम पसंद हो, दीदी, तुम्हारी मौजूदगी, तुम्हारी समझ। मेरे हाथ वो महसूस नहीं करा पाते जो तुम्हारे पास होने से होता है।”
वह अचानक रुक गई। उसकी आँखों में उलझन और मजबूरी साथ साथ दिख रही थी। कुछ पल वह मुझे देखती रही, फिर धीमी लेकिन साफ़ आवाज़ में बोली, “गोलू, अब हम ये सब नहीं कर सकते। यह यहीं रुकना चाहिए।”
मैंने उसका चेहरा देखा, उसकी पलकों की हल्की थरथराहट, होंठों की कसी हुई रेखा। वह गहरी साँस लेकर आगे बोली, “लेकिन… अगर इस वक़्त तुम्हें बहुत बेचैनी हो रही है, तो मैं तुम्हें अपने मुंह से थोड़ा सुकून दे सकती हूँ।” उसने तुरंत जोड़ दिया, “गलत मत समझना। जो भी हुआ, उसके बाद भी तुम मेरे भाई हो । और मैं तुम्हें इस हालत में देख नहीं पा रही।”
मैं उनके चेहरे को हैरानी से देखने लगा मानो मुझे अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था। जो सुधा दीदी इतने दिनों से मुझपर गुस्सा कर रही थी वह मुझे खुश करने के लिए एक ऐसा सुझाव दे रही थी जिसकी जरूरत मुझे वाकई थी।
“क्या कहते हो?” उन्होंने आगे जोड़ा। “क्या तुम मेरे मुंह से खुश हो जाओगे ?”
मैंने तुरंत जोड़ा। “हां, दीदी चलेगा।”
मेरी बात सुनते ही उसके गालों में हल्की सी लाली फैल गई, जैसे उसे अपनी ही बातों पर झिझक महसूस हो रही हो। उसने नज़रें झुका ली और पल भर के लिए खामोश रही। फिर वह मेरे सामने पलंग के सामने आकर बैठ गई। मैं पहले से ही पलंग पर बैठा था और वह ठीक मेरे सामने घुटनों के बल बैठी हुई थी। कमरे की पीली रोशनी में उसकी झिझक साफ़ दिख रही थी और उस पल दोनों के बीच बस साँसों की आवाज़ ही सुनाई दे रही थी।
उन्होंने हाथ आगे बढ़ा कर पहले मेरे पैंट के बटन को खोला और उसे नीचे खींचा। अब उनकी नजरें मेरे अंडरवियर पर थी। उनकी आंखों में झिझक साफ दिख रही थी मानो वह अपने लिए हुए फैसले को मन के अंदर तौल रही हो। उन्होंने निचला होंठ कांटते हुए फिर एक बार हाथ आगे बढ़ाया और इस बार मेरी अंडरवियर को नीचे खींचा। पिछले छह दिनों के बाद पहली बार सुधा दीदी की आंखें मेरे सख्त लंड पर पड़ी। उस समय मुझे थोड़ी-सी शर्म भी आई और नसों के अंदर एक रोमांचक एहसास भी महसूस होने लगा।
अगले ही पल उसने अपना एक हाथ मेरे सीने पर रख दिया और धीमी आवाज़ में कहा, “रिलैक्स।”
उन्होंने एक पल मेरे चेहरे को मुस्कुरा कर देखा और अगले पल अपने होंठ मेरे सख्त लंड पर रख दिए। उन्होंने जोर से उसको चूमना शुरु किया। पहले तो वह धीरे-धीरे चुमती रही ताकि मेरा लंड पूरी तरह से सख्त हो जाएं, जब वह पूरी तरह सख्त हो गया तो उन्होंने एक आखरी बार मुस्कान के साथ मेरी आंखों में देखा और अगले ही पल उसको पूरी तरह से अपने मुंह के अंदर ले लिया। उनका गीला मुंह और जीभ मुझे लंड के चारों तरफ महसूस हुई।
इसके बाद वह धीरे-धीरे अपना सिर आगे-पीछे हिलाने लगी। उसकी हर हरकत में एक लय थी, कभी वह नीचे तक जाती, कभी हल्का सा ऊपर आती, और हर बार उसका सिर मेरी गोद के पास झुकते उठते हुए उसी रफ्तार को पकड़ लेता। उसकी साँसें तेज़ होती गई, गालों की लाली और गहरी हो गई, और उसके सिर की यह हरकत मेरे पूरे बदन में फैलती गर्मी को और बढ़ा रही थी।
मैंने बेख़याली में अपना हाथ उसके सिर के पीछे ले जाकर उसे और क़रीब खींचना चाहा, ताकि उसके मुंह की गहराई को और महसूस कर सकूँ। लेकिन उसने तुरंत मेरा हाथ पकड़ कर अलग किया और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “गोलू, तुम बस बैठे रहो, रिलैक्स।”
फिर वह मेरे लंड को अपने मुंह के बहुत अंदर तक लेने लगी। उसकी ज़ुबान का पिछला हिस्सा तक मैं लंड की नोक के उपर महसूस कर पा रहा था। हौले-हौले वह अपनी रफ़्तार बढ़ाती जा रही थी। मेरे घूंटने, क़मर और पूरा बदन थरथराने लगा। मैंने अनजाने में ही बिस्तर के कपड़े को हाथों से पकड़ लिया। मैं अपने आखरी समय तक पहुंच गया था।
मैंने लगभग हांफते हुए कहा, “मैं आ रहा हूं…दीदी।” और अगले ही पल मैं उनके मुंह के अंदर की फट पड़ा। दीदी के आंखें और मुंह पुरी तरह तन गया जैसे वह कोशिश कर रही हो कि मेरे गर्म पानी की सफेद बूंदे उनके मुंह में ही कैद रहे लेकिन वह मेरा सारा पानी अपने मुंह के अंदर नहीं दबा सकी और कुछ बूंदें उनके होंठों के किनारे से बहते हुए नीचे टपकने लगी।
अगले ही पल वह खड़ी हुई। उसने बिस्तर के पास रखा गिलास उठाया, एक गहरी साँस ली और धीरे-धीरे पानी पीने लगी। पानी की ठंडक से उसका चेहरा थोड़ा शांत हुआ, उसने होंठों को पोंछा और एक पल के लिए आँखें बंद कर ली, जैसे अपने आप को संभाल रही हो।
इसके बाद मैं भी उठ गया। मैंने जल्दी जल्दी अपनी अंडरवियर और पैंट पहन ली और धीमी आवाज़ में कहा, “अब मुझे निकलना होगा दीदी, किसी के जागने से पहले।”
वह मेरे पास आई, आवाज़ बहुत हल्की थी। उसने कहा, “गोलू, मैं तुम्हें जब चाहो खुश कर सकती हूँ… लेकिन यह कभी मत भूलना कि मैं तुम्हारी बड़ी बहन हूँ, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।”
अगले पल मैं उसके क़रीब गया। हल्के से उसके गाल पर एक छोटा सा चुंबन दिया और धीरे से कहा, “हाँ दीदी।” फिर बिना शोर किए मैं अपने कमरे की ओर लौट आया। बिस्तर पर लेटते ही नींद तो आई नहीं लेकिन सोने से पहले मेरे दिमाग़ में बस एक ही एहसास घूमता रहा, कितना सुकून था उनकी मुस्कान में और कितना अच्छा लगा था दीदी के होंठों का वो छूना।