पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-7
भाई बहन सेक्स कहानी अब आगे से-
सुधा दीदी के साथ मेरा रिश्ता समय के साथ और भी गहरा हो रहा था, क्योंकि शुरुआत में दीदी मुझे सिर्फ सेक्स के बारे में सिखाना चाहती थी। लेकिन बाद में हम दोनों के बीच का रिश्ता आगे बढ़ता ही गया। हम दोनों एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं पा रहे थे। वह मुझे सिर्फ सेक्स के बारे में सिखा नहीं रही थी, दीदी मुझसे प्यार करने लगी थी और मैं भी दीदी से प्यार करने लगा था।
हम दोनों के बीच महज एक जिस्मानी रिश्ता नहीं रहा था बल्कि हम दोनों को एक दूसरे के पास रहने कि आदत लग गई थी। इसलिए हम दोनों ज्यादातर समय एक-दूसरे के पास बिताने की कोशिश करते। रात होते ही मैं चुप-चाप उठ कर दीदी के कमरे में जाता और उनके साथ अपनी रातें रंगीन करता।
जब घर में कोई नहीं होता था तो जैसे पूरी दुनिया हमारी हो जाती थी। पापा दफ़्तर के बहाने शहर से बाहर होते और मां बाजार या किसी रिश्तेदारी के काम में चली जाती। जैसे ही मेन गेट बंद होने की आवाज़ आती, हम दोनों बिना बोले ही एक-दूसरे की तरफ खिंच जाते थे। दीदी मुस्कुराते हुए कहती, “अब तो खूब समय है,” और मेरा दिल धक-धक करने लगता।
हम सबसे पहले कमरे का दरवाज़ा बंद करते और पर्दे गिरा देते, ताकि बाहर की दुनिया हम पर झाँक ना सके। दीदी कभी सोफे पर बैठ जाती, कभी बिस्तर पर लेट जाती, और मुझे इशारे से बुलाती। हम दोनों एक-दूसरे से लिपट कर देर तक लेटे रहते, उनके बाल मेरे चेहरे पर गिरते और मैं धीरे-धीरे उन्हें चूमते हुए गले लगा कर रखता।
कभी हम बाथरूम में जाते। दीदी पहले शॉवर खोलती और पानी की बूंदें गिरते ही मैं उनके कंधों पर हाथ रख देता। वह मुस्कुराती और धीरे-धीरे मेरे पास सिमट जाती। हम मज़ाक करते, एक-दूसरे पर पानी छींटते, और हर पल को ऐसे जीते जैसे वह हमारा राज़ हो।
कभी दीदी किचन में खाना बनाती और मैं उनके बिल्कुल पास खड़ा रहता, बार-बार उन्हें छूने के बहाने ढूँढता। वह पलट कर मुझे घूरती और मेरी हर हरकत पर मुस्कुराती, जैसे उसे पता हो मैं क्या सोच रहा हूँ। खाना बनाते-बनाते वह अचानक मेरी तरफ मुड़ कर गले लग जाती और हम वही खड़े-खड़े खो जाते।
एक दिन सुबह मैंने बिस्तर से उठ कर मुँह धोया और नीचे लिविंग रूम में आया तो घर बिलकुल खाली खाली सा लगा। टीवी बंद था, पंखे की धीमी आवाज़ आ रही थी और माहौल अलग ही शांत था।
मैंने सोचा सब लोग शायद बाहर गए होंगे, लेकिन तभी रसोई से चम्मचों की हल्की आवाज़ आई। मैं धीरे-धीरे उधर गया और देखा कि सुधा दीदी किचन में खड़ी होकर नाश्ता बना रही थी। स्टोव पर तवा गरम हो रहा था और दीदी बालों को क्लिप से बांधे पूरी तरह काम में लगी थी।
मैंने हल्की हैरानी से पूछा, “दीदी, मम्मी पापा कहाँ हैं?”
उन्होंने पलट कर मुझे देखा और मुस्कुराते हुए बोली, “ओह, तुम उठ गए! वो दोनों सुबह-सुबह रेलवे स्टेशन गए हैं।”
मैं आगे बढ़ कर खड़ा हो गया, “किसलिए?”
दीदी ने पलट कर परांठा तवे पर रखा और बोली, “साक्षी दीदी आने वाली हैं ना, उनकी ट्रेन आज पहुँच रही है। इसलिए मम्मी पापा उन्हें लेने गए हैं।”
साक्षी दीदी असल में मेरी माँ की बड़ी बहन की बेटी थी, मतलब मेरी कज़न। उम्र में बस एक साल बड़ी थी। बचपन में वो अक्सर हमारे घर आ जाती थी क्योंकि उनके घर की हालत कुछ ख़ास नहीं थी। हफ्तों तक हमारे साथ रहना, मेरे साथ खेलना, शरारतें करना, सब आम था।
लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े हुए, उनकी ज़िंदगी बदलती गई। पढ़ाई, दोस्त, घर की जिम्मेदारियाँ, सब में उलझ कर वो धीरे-धीरे आना बंद कर बैठी। पिछले कई सालों से वो हमारे घर नहीं आई थी, इसलिए आज का दिन खास था।
मैंने खुद से ही बुदबुदाया, “इतने साल बाद…” और दिल में एक हल्की सी बेचैनी दौड़ गई।
उसी समय सुधा दीदी ने कहा, “गोलू, प्यास लगी है… पानी की बोतल देना।”
मैंने फ्रिज खोला और ठंडी बोतल निकाली। जैसे ही उसे देने की कोशिश की, दीदी ने अपने दोनों हाथ दिखाए, आटे से बिलकुल लथपथ थे।
वो हँस कर बोली, “हाथ गंदे हैं… तू ही पिला दे।”
वो हल्का सा सिर पीछे झुका कर होंठ थोड़ा सा खोल कर खड़ी हो गई। मैंने बोतल उठाई और धीरे-धीरे पानी उनके मुँह में डालने लगा। कुछ घूँट सही जगह पहुँचे, लेकिन काफी पानी उनके होंठों से बहने लगा और सीधे उनकी गर्दन से लुढ़कता हुआ नीचे गया। पानी उनकी गर्दन से होता हुआ सीने के बीच वाले हिस्से में जमा हुआ और फिर उनके गले से अंदर, ब्रा तक पहुँच गया।
दीदी ने झटके से हँसते हुए कहा, “अरे पागल! धीरे पिला… पूरे बूब्स भीगा लगा रहा है अब।”
मैं हड़बड़ाते हुए बोला, “सॉरी दीदी… मैं सुखा देता हूँ।”
मैंने बोतल किचन पर रख दी और आगे बढ़ कर उनको अपनी बाहों में भर लिया। उनक गीला छाती का कपड़ा मेरी छाती से दबा था। वो आँखें नीचे करके शर्म से लाल चेहरे के साथ फुसफुसाई, “गोलू… ये… क्या कर रहा है तू?”
मैंने बिना जवाब दिए उन्हें और कस कर पकड़ा। उनके स्तनों की कसावट मुझे अपनी छाती के नीचे साफ महसूस हो रही थी। मैंने सिरे नीचे लेजा कर अपने होंठ उनके स्तनों पर रख दिए। कपड़े की वजह से मैं उन्हें ठीक से महसूस नहीं कर पा रहा था, हालांकि मैंने उनका निप्पल अपने दांतों के बीच दबा दिया। धीरे-धीरे मैंने उनके टी-शर्ट को ऊपर की तरफ खिसकाया। कपड़ा ऊपर उठते ही उनकी साँसें और तेज हो गई। दीदी ने मेरी तरफ देखा, आँखों में घबराहट और चाहत दोनों चमक रहे थे।
उन्होंने आधी आवाज़ में कहा, “अगर कोई आ गया तो…?” मैंने उनके कान के पास जाकर फुसफुसाया, “कोई नहीं आएगा… बस हम हैं।”
मैंने अपना चेहरा उनके गीले स्तनों के बीच सरकाया और गर्म साँसें उनके सीने पर छोड़ी। दीदी ने अनायास अपनी कमर ऊपर उठाई और मेरी गर्दन के चारों ओर हाथ रख दिए जैसे खुद को रोकना उनके बस का नहीं रहा। मैं नीचे झुक कर धीरे-धीरे पानी से भीगे उनके स्तनों को चाटने लगा। कपड़े के बीच से मीठा नमक जैसा स्वाद मेरे मुँह में भर गया।
दीदी का बदन पूरी तरह काँप रहा था। उन्होंने मुँह से धीमी सी कराह निकाली, “गोलू… पागल हो गया है क्या…” लेकिन उनकी उंगलियाँ मेरी पीठ में धँसती जा रही थी, और वो खुद भी मुझे छोड़ने वाली नहीं थी।
मैंने कपड़ा एक-दम ऊपर खिसका दिया और उनका गुलाबी निप्पल सामने आ गया। मैं झुक कर उसे अपने होंठों के बीच दबाया, पहले हल्का सा… फिर गहराई से। मैंने निप्पल को पूरी तरह अपने मुँह में भर लिया और उसे जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया। दीदी ने मेरी पकड़ में खुद को ढीला छोड़ दिया। उनका सीना हर चूसने के साथ ऊपर-नीचे उछल रहा था। मैंने निप्पल को होंठों से छोड़ ही दिया, लेकिन तुरंत दूसरे को पकड़ कर अपने मुँह में भर लिया और उसे भी उसी जोश से चूसने लगा।
दीदी की साँसें पूरी तरह टूट चुकी थी। वो मेरे बालों में उंगलियाँ फँसा कर मुझे रोकने की कोशिश करती, लेकिन उनका शरीर खुद आगे झुक कर मेरे मुँह की तरफ आ रहा था।
वो काँपती आवाज़ में बोली, “गोलू… बस… नहीं तो मैं… ओह्ह…”
मैंने एक हाथ उनकी कमर पर ले जाकर उन्हें और करीब खींच लिया और मुँह से निप्पल छोड़ने से पहले उसे हल्का सा दाँतों से दबा दिया। दीदी ने सीना पीछे खींचते हुए धीमा सा चींहा सा आवाज़ निकाली, लेकिन तुरंत फिर मेरी बाँहों में ढह गई जैसे वही दर्द भी अब मज़ा बन चुका था।
मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर उनकी पैंट के अंदर डाला लेकिन इससे पहले कि मैं उनके नाज़ुक हिस्से को छू पाता, बाहर से डोरबेल बजने की आवाज़ हुई। मैंने झट से सुधा दीदी को छोड़ दिया।
दीदी अचानक सीधी होकर फुसफुसाई, “गो गो गोलू, तुरंत अपने कमरे में जाओ… अभी!”
उनके चेहरे पर डर और हड़बड़ाहट साफ दिख रही थी। मैंने कुछ सेकंड तक उन्हें देखा, लेकिन उन्होंने फिर तेज़ आवाज़ में कहा, “गो टू योर रूम, जल्दी!”
मैंने और कुछ नहीं पूछा। मैं तेजी से पलटा, कमरे से बाहर भागा और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपने कमरे में घुस गया। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि लगता था नीचे तक सुनाई दे रहा होगा। अंदर पहुँचते ही मैंने दरवाज़ा धक्का देकर बंद कर लिया और पूरी ताकत से कुंडी लगा दी।
अगले आधे घंटे तक मैं कमरे में बैठा रहा। फिर मैंने अपने कपड़े बदले क्योंकि उन पर दीदी के हाथो से आटा लगा था। मैंने इंतजार किया और फिर नीचे लिविंग रूम में बढ़ा।
मैं हॉल में पहुँचा तो एक पल को मेरी साँस रुक सी गई। मम्मी पापा सोफे पर बैठे थे, लेकिन मेरा ध्यान सीधा उन दोनों के पास बैठी सुधा दीदी और… साक्षी दीदी पर अटक गया।
साक्षी दीदी। उसी पल लगा जैसे दिल ने जोर से छाती पर धक्का मार दिया हो। पाँच साल हो गए थे उसे देखे हुए। आखिरी बार जब मैंने उसे देखा था वह एक बच्ची जैसी थी, रोती, शरमाती, पतली सी। लेकिन सामने बैठी लड़की उससे बिल्कुल अलग थी। वो मुस्कुरा रही थी, और उस मुस्कान के साथ उसकी आँखों की चमक कमरे की सारी रौशनी को अपने अंदर समेट ले रही थी।
उसने टाइट फिटिंग क्रीम कलर की कुर्ती पहनी थी, जिसमें उसके गोल से उभरे हुए सेब जैसी छातियाँ बिल्कुल साफ दिख रही थी, जैसे कपड़ा खुद खिंच कर उनको काबू में रख रहा हो। नीचे हल्की सफेद पाइजामा, जिसकी मोड़ टखने तक ऊपर उठी थी, और उसके पैरों की नाज़ुक उंगलियाँ फर्श पर टिके-टिके हल्का हिल रही थी।
उसका बदन अब किसी स्कूल की बच्ची जैसा नहीं था। उसकी कमर पतली और कमान जैसी मुड़ी हुई थी, और जब भी वो थोड़ा सा हिलती, उसकी कुर्ती उसके शरीर की बनावट को और साफ उभार देती। मैं बस वहीं खड़ा रह गया। पापा कुछ पूछ रहे थे, मम्मी कुछ बोल रही थी, सुधा दीदी हँस रही थी… लेकिन मेरी आँखों और दिमाग में सिर्फ एक ही चीज़ थी, साक्षी दीदी।
तभी मम्मी ने एक-दम नॉर्मल आवाज में कहा, “इस बार साक्षी थोड़े दिनों के लिए नहीं आई है।”
मैं और सुधा दीदी दोनों ने एक साथ मम्मी की तरफ देखा।
मम्मी ने आगे कहा, “ये यहाँ अपनी पढ़ाई पूरा करने आई है। अब कम से कम एक डेढ़ साल यहीं रहेगी।”
उस पल मैंने और सुधा दीदी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। दोनों को समझ नहीं आया कि ये खबर खुशी है या डर। ऐसा लगा जैसे हमारी साँस थोड़ी अटक गई हो। इतने समय तक एक ही घर में रहने का मतलब था, बहुत कुछ बदलने वाला है।
अगले कुछ ही दिनों में घर का माहौल सचमुच एक-दम से बदल गया। पहले जब घर में सब लोग सो जाते, मैं सुधा दीदी के कमरे में जा सकता था। लेकिन अब उनके कमरे में साक्षी दीदी उनके साथ सोने लगी थी। जब भी मैं और सुधा दीदी एक-दूसरे के करीब आने का मौका ढूंढने की कोशिश करते, साक्षी दीदी बिच में टपक पडती। हम दोनों बस एक-दूसरे को चोरी-चोरी देखते, आँखों से बात करते, लेकिन हाथ तक छूने का मौका नहीं मिलता।
कभी मैं रसोई में जाता तो सुधा दीदी पहले से खड़ी होती, लेकिन जैसे ही मैं पास जाता, तभी साक्षी दीदी पानी पीने आ जाती। रात को सुधा दीदी खामोशी से मेरे कमरे के सामने तक आ जाती, पर दरवाज़ा खोलने की हिम्मत ही नहीं होती क्योंकि साक्षी दीदी को भी पता नहीं क्यों हमेशा कुछ ना कुछ याद आ जाता और वो भी बाहर निकल आती। ऐसा लगता था जैसे क़िस्मत हमें करीब आने ही नहीं देना चाहती। हम बस इंतजार कर रहे थे एक मौके का, जब घर खाली हो, और हम दोनों खुल कर एक-दूसरे तक पहुँच सकें।
लेकिन जब वो मौका नहीं मिला, मैं अकेले अपने कमरे में लौट आता और सुधा दीदी की पुरानी यादों में खो जाता। मेरे फोन में उनकी कुछ पुरानी नंगी तस्वीरें थी, जो उन्होंने मुझे पहले भेजी थी। मैं उन्हें खोल कर देखता और उन यादों में खो कर ही ख़ुद को संभाल लेता।
कभी-कभी तो ऐसा भी होता कि जब हम बाहर घूमने की योजना बनाते, साक्षी दीदी भी साथ आने की ज़िद कर देती। नए शहर में वो किसी से घुली-मिली नहीं थी, इसलिए वो हर पल हमारे साथ रहना चाहती थी। और सबसे हैरान करने वाली बात तो तब हुई जब मैं बाथरूम गया। वहाँ सूखी कपड़ों के ढेर में दो गीली पैंटियाँ पड़ी थी, एक शायद सुधा दीदी की, और दूसरी शायद साक्षी दीदी की लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि कौन सी किसकी है।
फिर भी, मैं साक्षी दीदी से कभी नाराज़ नहीं हो पाया। वो वही लड़की थी जिसने अपना पूरा बचपन मेरे साथ बिताया था। उसने मेरे घर में, मेरी दुनिया में हमेशा अपने लिए जगह बनाई थी। और सच्चाई ये थी कि इन पलों के बीच, चाहें मैं कितना भी बेचैन हो जाऊँ, उसकी मौजूदगी ने ही घर को जिंदा और खुश रखा हुआ था।
एक दिन दोपहर को मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर मूवी देख रहा था। दरवाज़ा आधा खुला था। तभी साक्षी दीदी अंदर आई और बिस्तर के किनारे बैठ गई। नीली छोटी शॉर्ट्स और सफ़ेद फिटेड टी-शर्ट पहने हुए। टी-शर्ट उनके बदन से इस कदर चिपकी थी कि अंदर की हर हलचल बाहर तक महसूस हो रही थी।
उनकी गोल, भरी हुई छातियाँ कपड़े के अंदर दो साफ़ उभारों की तरह धड़ से जुड़ी हुई दिख रही थी, जैसे टी-शर्ट उन्हें पकड़े रखने में मशक्कत कर रही हो। जब वह हल्का दब कर बैठी, तो कपड़ा खिंच गया, और उनके स्तनों की गोलाई और भी उभरकर सामने आ गई।
साक्षी दीदी घर में अक्सर बदन पूरा ढंकने वाले कपड़े पहनती थी लेकिन उस दिन जब उन्होंने छोटे कपड़े पहने तो पहली बार मेरी नज़र उनके पेट पर पड़ी, और वहीं मैंने देखा उनकी नाभि में एक छोटा सा बेली पियर्सिंग चमक रहा था। जैसे ही वो बिस्तर के किनारे बैठी और हल्का झूली, वह पियर्सिंग धीरे-धीरे हिलने लगा और मैं बस उसे देखते रह गया, पूरी तरह खोकर।
मैंने तुरंत लैपटॉप बंद किया और उसे एक तरफ सरका कर खुद उनके सामने बैठ गया। मेरी नज़रें अब भी उनकी चमकती नाभि से हट नहीं रही थी। मैं मुस्कुराते हुए बोला, “मुझे तो पता ही नहीं था कि आपके पास बेली पियर्सिंग भी है, दीदी।”
मेरी बात पर उन्होंने होंठ काटते हुए हल्की मुस्कान दी, जैसे कोई पुरानी याद अचानक सामने आ गयी हो। उन्होंने धीरे से कहा, “ये बहुत पुराना है गोलू… मेरे बॉयफ्रेंड को पहले ये बहुत पसंद था।” एक पल रुक कर वो बोली, “लेकिन अब सोच रही हूँ निकाल दूँ। कोई खास मतलब भी नहीं रह गया इसका।”
मैंने तुरंत पूछा, बिल्कुल सहज होकर, “क्यों दीदी?”
उन्होंने पलकें झपकाई, नज़रें थोड़ी दूर टिकाई और बोली, “क्योंकि हमारा ब्रेकअप हो गया है… कुछ महीने पहले।”
उस पल उन्होंने खुद को संभालने की कोशिश की, लेकिन आँखों में नमी तैरने लगी। वह लगभग रोने लगी थी। बिना सोचे मैं उनके करीब गया और उन्हें धीरे से अपनी बाहों में ले लिया। उनका शरीर पलभर सख्त हुआ, फिर अचानक ढीला पड़ गया, जैसे बहुत देर से रोके हुए आँसू आखिर निकलने को तैयार हों।
मेरी बाँहों में टिक कर उन्होंने साँस भरते हुए अपने पुराने रिश्ते के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने बताया कि कैसे वह एक अजनबी लड़के से काॅलेज में मिली और उसको अपना दिल दे बैठी लेकिन वह लड़का उनका प्यार नहीं समझता था। उस लड़के को तो बस उनके साथ सोना था।
उसने कुछ ही दिनों में दीदी को काबू कर लिया और उनके साथ सोने लगा। पहले तो दीदी मना करती, लेकिन बाद में उनको भी मजा आने लगा। उनको अच्छा लगने लगा की कैसे वह लड़का अलग-अलग तरह से उनके साथ सब कुछ करता था। लेकिन जब उनका रिश्ता थोड़ा पुराना हो गया लड़के को कोई और मिल गई फिर उसने दीदी को छोड़ दिया।
वो बताते बताते रुक गई, होंठ काँपने लगे। आवाज़ भर्रा गई, “अब… अब तो छह महीने से ज़्यादा हो गए गोलू… किसी के साथ कुछ भी नहीं किया मैंने।”
उन्होंने सिर उठाया, आँखें लाल, गला भरा हुआ। “पहले लगता था मैं संभल जाऊँगी… पर अब तो लगता है मैं पागल हो जाऊँगी।”
उन्होंने मेरी शर्ट पकड़ ली, जैसे अंदर का तूफ़ान बाहर फटना चाहता हो। “कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि वापस उसके पास चली जाऊँ… बस एक बार… आखिरी बार… ताकि वो मुझे वैसे ही चोद दे… जैसे पहले करता था।”
मैंने उनके गालों को दोनों हाथों से पकड़ कर सिर हल्का अपने करीब कर लिया। मेरी आवाज़ धीमी थी, लेकिन पूरी तरह सच्ची। “ऐसी बातें मत बोलो दीदी…” मैं फुसफुसाया। “आपको किसी ऐसे इंसान की जरूरत है जो सच में आपकी कद्र करे… जो आपको प्यार दे… ना कि सिर्फ आपके शरीर को इस्तेमाल करे।”
वो मेरी बात सुन कर कुछ पल चुप रही। फिर धीरे से मेरी उँगलियों को अपने चेहरे से हटाया, “तुम समझते ही नहीं हो, गोलू,” उन्होंने भारी साँस लेते हुए कहा। “अब मुझे किसी ऐसे लड़के की ज़रूरत नहीं जो मुझे प्यार करे, फूल दे, बातें करे… मैं बस एक लड़की हूँ। अगर कोई एक बार मुझे चोद देता है… तो वो एहसास बार-बार चाहिए।”
उन्होंने होंठ गीले किए, निगाहें जल रही थी। “मुझे वो लड़का नहीं चाहिए जो मुझे प्यार करे… मुझे तो कोई चाहिए जिसके लंड में दम हो… जो मुझे पकड़ कर रखे… और मेरी कमी पूरी कर दे।”
मैंने उनकी आँखों में देखा, वो बिल्कुल अलग आग से भरी थी। मेरा गला सूख गया, लेकिन मैंने खुद को संभालते हुए धीरे और सख़्त आवाज़ में कहा, “ऐसी गंदी बातें मत करो दीदी… आप बहुत ज़्यादा इमोशनल हो गई हो।”
उन्होंने धीरे से सिर हिलाया, चेहरा मेरे बिल्कुल पास, आँखें जैसे भड़कते अंगार। “नहीं गोलू… मैं इमोशनल नहीं हो रही,” वह धीमी लेकिन काँपती आवाज़ में बोली। “मैं बस सच बोल रही हूँ। उस लड़के ने मुझे रोज़… हर एक रात… इतनी ज़ोर से चोदा था कि मैं सुबह उठ कर चल भी नहीं पाती थी।”
उनकी साँसें भारी हो गई। “अब छह महीने हो गए हैं… और मेरा शरीर चीख रहा है। मुझे कोई लड़का नहीं चाहिए जो कॉल करके पूछे कैसी हो, या फूल दे। मुझे बस कोई चाहिए जिसके लंड में दम हो… जो मुझे भर दे… चाहे वो कोई भी हो।”
मैंने लंबी साँस खींची। दिल मानो कानों में धड़क रहा था। मैंने गला साफ किया, और आवाज़ धीमी होकर भी काँपती सी निकली, “तो फिर… अगर मैं कर दूँ, दीदी?”
वो पलकें झपकाना भी भूल गई। उनकी आँखें मेरी आँखों में अटक गई। मैंने होंठ भींचे, और हर शब्द तौलते हुए कहा, “अगर मैं तुम्हें वैसे ही चोद दूँ… जैसा तुम चाहती हो… जितना गहरा, जितना ज़ोर से… तो क्या तुम रोना बंद कर दोगी? क्या तुम उस लड़के को भूल पाओगी?”
वो अचानक पीछे हट गई, आँखें चौड़ी और हैरानी से भरी। उनका चेहरा सख़्त हो गया, जैसे मेरे शब्द बिजली बन कर गिरे हों। काँपती आवाज़ में उन्होंने कहा, “तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या, गोलू? तुम क्या बकवास कर रहे हो? तुम मेरे भाई हो!” उन्होंने लगभग चिल्लाते हुए कहा।
मैंने एक पल भी पिछे नहीं हटे तुरंत कहा, “दीदी… आप खुद कह रही थी ना कि आपको सिर्फ कोई चाहिए… जो आपको वैसे छुए… जैसे आप चाहती हो। और मैं भी बस ये चाहता हूँ कि आप फिर किसी और कुत्ते लड़के के पास मत जाओ… जो आपको इस्तेमाल करके छोड़ दे।” मैंने उनकी ओर बढ़ कर कहा, “आपको कोई चाहिए जो आपको चोदे… और मुझे चाहिए कि आप फिर कभी किसी कमीने लड़के से चोट मत खाओ। अगर मैं आपको वैसे ही चोद दूँ जैसे आप चाहती हो… तो आप किसी और लड़के के पास नहीं जाओगी। और शायद… शायद रोना भी बंद कर दोगी।”
उनके चेहरे पर कुछ पल तक खामोशी तैरती रही। फिर उन्होंने धीरे से अपनी आँखें पोंछीं, आँसू उंगलियों पर चमकते रह गए। वह मेरी ओर सीधी देखती हुई बोली, “ठीक है गोलू…” उन्होंने लंबी साँस लेते हुए कहा, “अगर तुम सच में मुझे वैसे चोद सकते हो जैसे मुझे चाहिए… तो कर लो।” वह और पास झुक गई, उनकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी हल्की हो गई। “लेकिन सुन लो… अगर तुमने मुझे वैसा नहीं चोदा जैसे मुझे चाहिए तो फिर मैं उसी लड़के के पास जाऊंगी जिसने मुझे छोड़ा है।”