पिछला भाग पढ़े:- नेहा दीदी के होंठों में लंड की पहली आग-4
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
कुछ दिन घर पर मम्मी-पापा के साथ रहने पर मैं और नेहा दीदी दिल्ली वापस लौट आए। हमारा छोटा सा कमरा पूरी तरह बिखरा हुआ था, जैसे जल्दी-जल्दी जाते समय हमने कुछ भी ठीक से नहीं रखा हो।
कमरे में कदम रखते ही नेहा दीदी ने गहरी साँस ली और हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “गोलू… पहले हमें इसे साफ़ करना पड़ेगा।”
मैंने तुरंत सिर हिलाते हुए कहा, “ओके दीदी…”
हम दोनों अपने-अपने कपड़े बदलने लगे ताकि सफाई करने में आसानी हो। दीदी ने एक पुरानी, ढीली सी टी-शर्ट पहन ली और साथ में शॉर्ट्स—इतने छोटे कि उनके मुलायम जाँघें साफ़ दिख रही थी। टी-शर्ट के अंदर उन्होंने ब्रा नहीं पहनी थी, शायद इसलिए क्योंकि घर में रहने की वजह से उन्हें आराम चाहिए था।
मैंने भी शॉर्ट्स पहन लिए, लेकिन मेरी टी-शर्ट कहीं नहीं मिल रही थी। इतनी गर्मी में मुझे वैसे भी पसीना आ रहा था, तो मैंने बिना शर्ट के ही सफाई शुरू कर दी। जैसे ही हम दोनों झाड़ू-पोछा करने लगे, कमरे में हल्का सा शरारती माहौल फैल गया था। कभी-कभी जब दीदी नीचे झुक कर फर्श को रगड़ती, उनकी ढीली टी-शर्ट आगे से खुल कर हल्का सा सरक जाती—और मुझे उनकी गहरी, ब्रा रहित क्लीवेज की झलक साफ़ नज़र आ जाती।
मैं हर बार नज़र हटाने की कोशिश करता, लेकिन वो झलकें जैसे खुद ब खुद मेरी आँखों को खींच लेती थी।
दीदी शायद समझ रही थी कि मैं उन्हें देख रहा हूँ, मगर उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनकी चाल में आज थोड़ी नर्मी, थोड़ी मासूमियत और थोड़ी अनजानी गर्माहट थी… जैसे वो भी चाहती हों कि मैं उन्हें देखूँ।
कमरा धीरे-धीरे साफ़ हो रहा था, लेकिन हमारे बीच का माहौल और ज़्यादा गर्म होता जा रहा था।
थोड़ी देर बाद दीदी ने बाल्टी का पानी फर्श पर डाल दिया ताकि ठीक से सफाई हो सके। हम दोनों घुटनों के बल बैठ कर फर्श रगड़ने लगे। सफाई करते-करते दीदी ने अचानक मुझे पानी के छींटे मार कर चिढ़ाने लगी। ठंडा पानी मेरे सीने पर गिरा तो मैं उछल पड़ा।
“दीदी!” मैंने हँसते हुए कहा।
वो खिलखिला कर बोली, “अच्छा? तुम भी मारो!”
मैंने भी जवाब में पानी छींट दिया। कुछ ही पलों में हम दोनों बच्चों की तरह एक-दूसरे पर हल्का सा पानी फेंकने लगे। धीरे-धीरे दीदी की टी-शर्ट पूरी तरह गीली हो गई। गीले कपड़े में उनका शरीर और साफ़ झलकने लगा—भीतर का आकार पूरी तरह उभर आया था। उनके स्तनों की गोलाई और निपल्स की हल्की छाप भीग चुके कपड़े के पीछे से साफ़ दिखाई दे रही थी।
मैं उन्हें देखने से खुद को रोक नहीं पा रहा था। शायद दीदी को भी मेरे देखने का एहसास हो रहा था… लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बल्कि पानी की बूँदों से चमकते उनके गाल और भी मोहक लग रहे थे।
कुछ देर तक पानी से खेलते-खेलते दीदी पूरी तरह भीग चुकी थी। उनकी गीली टी-शर्ट उनके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उनके स्तनों का आकार और निपल्स की हल्की उभार साफ़ दिखाई दे रही थी। पानी उनके बालों से टपक कर गर्दन और सीने तक बह रहा था।
दीदी ने मुझे देखते हुए हल्की मुस्कान दी और बोली, “ये तुम्हारे लिए कितना आसान है ना गोलू… लड़के तो कभी भी बिना शर्ट के घूम सकते हैं, लेकिन लड़कियों के लिए बहुत अनफेयर है।”
मैंने शरारती अंदाज़ में कहा, “तो आप भी उतार दो ना, दीदी… यहाँ कोई है भी नहीं। सिर्फ़ मैं हूं। और मैंने तो आपको खुली देखा है।”
मेरी बात पर दीदी ने भौंहें उठाई, जैसे हैरान भी हों और जैसे कुछ महसूस भी कर रही हों। उनके गालों पर हल्की लाली आ गई, पानी की वजह से या मेरी बात की वजह से—मैं नहीं जानता।
मैंने तो बस मज़ाक में कहा था… लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसकी मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।
दीदी ने एक पल मेरी आँखों में सीधे देखा, जैसे यह जाँच रही हों कि मैं सच में वही चाहता हूँ या सिर्फ़ चिढ़ा रहा हूँ। फिर बिना कुछ कहे, बहुत धीरे-धीरे… उन्होंने अपनी भीगी हुई टी-शर्ट के किनारों को पकड़ा और उसे ऊपर खींचना शुरू किया।
मेरा दिल एक-दम तेज़ धड़कने लगा। पानी की बूंदें उनके पेट से होते हुए नीचे गिर रही थी, और टी-शर्ट ऊपर उठते हुए उनकी कमर, फिर पेट, फिर सीने तक पहुँच गई। और अचानक—उन्होंने पूरी टी-शर्ट सिर के ऊपर से निकाल कर एक तरफ फेंक दी।
अब वो मेरे सामने बिल्कुल बिना शर्ट के खड़ी थी।
उनके स्तन इतने पास से देखते हुए मैं कुछ पल साँस लेना ही भूल गया। गोल, भरे हुए, पानी से चमकते हुए… जैसे हर बूंद उन पर चिपकी हो। निपल्स गीलेपन और ठंड की वजह से सख़्त होकर हल्के से उठे हुए थे, मानो मेरे देखने का जवाब दे रहे हों।
दीदी ने अपनी बाहों को हल्का सा सीने के पास खींचा, लेकिन ढका नहीं, बस शर्म और चाहत के बीच अटके हुए अंदाज़ में। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “अब तो खुश हो ना, गोलू?”
मैं कुछ बोल ही नहीं पाया। बस उन्हें देखता रह गया। दीदी हल्का सा हँसीं, फिर बोली, “चलो, अब काम भी कर लो थोड़ा। फर्श तो अभी भी गंदा है।”
हम दोनों फिर से झाड़ू-पोछा करने लगे, लेकिन माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। दीदी बिना शर्ट के, पानी में भीगी त्वचा चमकती हुई… और मैं बिल्कुल शांत नहीं रह पा रहा था।
जब भी मैं पानी डालता, वो शरारती अंदाज़ में मुझे गुस्से से देखने का नाटक करतीं। कभी कभी वो भी मेरी तरफ पानी छींट देतीं और हँस देती।
मैं जहाँ भी मौका मिलता, उनके करीब जाने की कोशिश करता, इतना करीब कि मेरे हाथ गलती से उनकी कमर या उनके भीगे हुए पीठ से छू जाए। मैं हर बार ऐसा ऐसे दिखाता जैसे ये बस एक एक्सीडेंट था।
दीदी हर बार हल्के से मुझे घूरती, फिर मुस्कुरा देती, जैसे सब समझ रही हों, पर रोक भी नहीं रही हों।
कभी वो नीचे झुक कर फ़र्श रगड़ती और मैं उनके पास जाकर पानी डालता, ताकि बहाने से मेरी उंगलियाँ उनके बाजू या पीठ को छू जाएँ। वो हर बार थोड़ा सिहरती थी… पर पीछे नहीं हटती थी।
फर्श पूरी तरह साफ़ हो चुका था। पानी इधर-उधर फैला हुआ था, लेकिन काम लगभग खत्म हो गया था। दीदी अपने बाल पीछे करती हुई बोली, “ठीक है गोलू, मैं ज़रा बाथरूम जाकर ये गीलापन साफ़ कर लूँ।”
वो मुड़ कर बाथरूम की ओर जाने लगी। उनके भीगे हुए स्तन हिलते हुए पानी की चमक के साथ और भी उभर कर दिख रहे थे। मैं बस उन्हें जाता हुआ देख रहा था और तभी कुछ मेरे अंदर हुआ। बिना सोचे समझे मैंने झटके से उनका हाथ पकड़ लिया।
दीदी रुक गई। धीरे-धीरे मुड़ कर मेरी तरफ देखने लगी। उनके चेहरे पर हल्की हैरानी और एक दबा हुआ सवाल था। पानी की बूंदें अभी भी उनके कंधे से फिसल कर नीचे गिर रही थी।
मैंने गहरी साँस ली, फिर धीमी लेकिन काँपती आवाज़ में कहा, “दीदी… हम… कुछ कर सकते हैं क्या? मैं… मैं आपको ऐसे देख रहा हूँ तो… कंट्रोल ही नहीं हो रहा। मैं हार्ड हो गया हूँ।”
मेरी बात सुनते ही दीदी की आँखें एक पल के लिए बड़ी हो गई। उनके होंठ आधे खुले रह गए, जैसे वो समझ नहीं पा रहीं हों कि मैं इतना साफ-साफ बोल दूँगा। उनके सीने की साँसें तेज़ हो गई। उन्होंने नीचे मेरी पकड़ में अपने हाथ को देखा, फिर मेरी आँखों में। कुछ सेकंड तक वो कुछ बोली नहीं। बस हमें घेरते सन्नाटे में पानी की बूंदों की टप-टप की आवाज़ गूँजती रही।
फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपना हाथ मेरी पकड़ से नहीं छुड़ाया… बल्कि हल्का सा और आगे बढ़ कर मेरे करीब खड़ी हो गई।
उनकी भीगी नंगी छाती अब बस कुछ ही इंच दूर थी। उनके निपल्स मेरी सांसों की गर्मी से हल्के हल्के कांपने लगे।
उन्होंने बेहद धीमी आवाज़ में कहा, “लेकिन आज… आज तो संडे नहीं है। और तुम जानते हो, मैंने वादा किया था कि हम सिर्फ़ संडे को ही कुछ करेंगे।”
मेरी साँस जैसे अटक गई। मैं कुछ बोल पाता उससे पहले उन्होंने मेरी उँगलियों को अपनी उँगलियों में और कस कर थाम लिया।
फिर उसी मुलायम, गीली आवाज़ में बोली, “पर इसका मतलब ये नहीं कि मैं तुम्हें खुश नहीं कर सकती… और तुम मुझे। बस… बिना वादा तोड़े। बिना उधर छुए। समझे?”
मैं कुछ समझ ही नहीं पाया। मेरे चेहरे पर उलझन साफ़ दिख रही थी।
मैंने धीरे से कहा, “दीदी… मैं समझा नहीं। कैसे… मतलब कैसे?”
मेरी बात सुनते ही उनके होंठों पर हल्की सी शरारती मुस्कान आई। उन्होंने अपना हाथ मेरी बाँह पर सरकाया और फुसफुसाई, “आओ, मैं समझाती हूँ।”
वो मेरी पकड़ से अपना हाथ छुड़ा कर आगे बढ़ी और उसी भीगे हुए फर्श पर बैठ गई। उनकी त्वचा पर पानी की बूंदें फिसल कर नीचे जा रही थी, और जैसे ही उन्होंने बैठने के लिए अपने पैर मोड़े, उनकी शॉर्ट्स भीग कर और चिपक गई।
कुछ पल बाद… उन्होंने धीरे-धीरे अपनी शॉर्ट पकड़ कर नीचे खींचनी शुरू की। गीला कपड़ा उनकी जांघों पर सरकता गया। उन्होंने उसे पूरी तरह उतार कर एक तरफ रख दिया।
अब वो मेरे सामने सिर्फ़ अपनी भीगी त्वचा में थी, ना ऊपर कुछ, ना नीचे कुछ। उन्होंने मेरी तरफ देखा और हल्का सा सिर टेढ़ा करते हुए कहा, “अब आओ… मेरे पास बैठो।”
मैंने बिना सोचे, बिना रुके, उनके बिल्कुल पास जाकर बैठ गया, इतना पास कि उनके घुटने मेरे घुटनों से छू गए। मैं उसके बिल्कुल पास बैठा था। दीदी का शरीर अभी भी भीगा हुआ चमक रहा था। पानी की हल्की परत उनकी जांघों पर एक पतली रेखा की तरह नीचे बह रही थी। जब उन्होंने अपने पैर थोड़े से फैला कर बैठने की जगह ठीक की… मेरी नज़र उनके नाज़ुक हिस्से पर चली गई।
उनका नाज़ुक हिस्सा इतना साफ़, मुलायम और गुलाबी था कि मेरी साँस कुछ पल रुक-सी गई। भीगेपन की वजह से उस जगह की हल्की चमक और उभर कर दिखाई दे रही थी। जांघों के जोड़ के पास उनकी त्वचा दूध जैसी चिकनी थी, और उसके बीच उनका वो नाज़ुक, हल्का गुलाबी हिस्सा… बिल्कुल फूल की पंखुड़ी जैसा कोमल।
भीगने से वहाँ की पतली लाइनों में हल्की सी चमक थी, जैसे पानी हर मोड़ को उभार दे रहा हो। ऊपर का छोटा हिस्सा नरम और सटा हुआ, और नीचे की दो महीन पंखुड़ियाँ हल्की-सी खुली हुई थी, जैसे साँस ले रही हों।
दीदी ने मेरी नज़रों को महसूस किया, पर हटाया नहीं। बल्कि उन्होंने अपनी जांघ को थोड़ा-सा और ढीला किया, ताकि मैं साफ़-साफ़ देख सकूँ। उनकी आवाज़ बेहद धीमी थी, मैं अभी भी उनकी बात और उनके शरीर में खोया हुआ था कि तभी उन्होंने अचानक कहा, “अब तुम अपने कपड़े उतारो।”
मैंने एक पल उन्हें देखा, उनकी आँखों में वही गर्म, पिघलती हुई चमक थी। बिना कुछ पूछे मैंने अपनी टी-शर्ट उतारी, फिर शॉर्ट्स। मैं उनके सामने पूरी तरह नंगा था।
मेरे सख्त लंड को देखते ही दीदी के होंठों पर हल्की, धीमी मुस्कान उभरी। वो मुस्कान जिसमें शरारत भी थी और चाहत भी।
उन्होंने आगे बढ़ कर मेरा लंड अपने हाथ में पकड़ लिया, नरम, गर्म पकड़ में। मेरी साँस एक-दम रुक सी गई। धीरे, बहुत धीरे वो उसे सहलाने लगी और बोली, “अब मैं तुम्हें खुश करूँगी… और तुम मुझे। बिना वादा तोड़े।”
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा… और उसे अपने नाज़ुक हिस्से पर ले जाकर रख दिया। मेरी उंगलियाँ उनके मुलायम, गर्म हिस्से को छूते ही उनका पूरा शरीर हल्का सा काँप गया।
उनका हाथ मेरे लंड को पकड़े था और मेरा हाथ उनके नाजुक हिस्से पर था। उसके बाद उन्होंने मेरे लंड को हिलाना शुरू किया और मुझे मुस्कुरा कर देखा, उस मुस्कान का मतलब मैं समझ गया। मैंने भी अपनी दो उंगलियां उसके नाज़ुक हिस्से के सरका दी और अंदर-बाहर करने लगा। वह मेरा लंड हिला रही थी और मैं उसके नाज़ुक हिस्से से खेल रहा था। हम दोनों खुश हो रहे थे।
मैंने जैसे ही अपनी उँगलियाँ थोड़ा और अंदर सरकाई, उसकी गरमाहट और भी साफ महसूस होने लगी। दीदी की साँस अटक अटक कर निकल रही थी। उनका चेहरा हल्का सा ऊपर उठ गया, होंठ आधे खुले, पलकों में कंपन—जैसे वो हर झटके को भीतर गहराई तक महसूस कर रही हों।
मेरी उंगलियाँ अंदर–बाहर होने लगी तो उनके चेहरे पर एक धीमी सी कसक तैर गई। वो आँखें बंद करके हल्का सा सिर पीछे झुकाती और फिर मेरी तरफ देखती—उस नज़र में लालसा भी थी और शर्म से भरी मिठास भी।
उनकी नरम कराहें मेरे कानों में घुल रही थी—धीमी, टूटी हुई… जैसे वो खुद भी रोक नहीं पा रही हों। उनके होंठों से “आह…” की छोटी छोटी आवाजें निकलतीं और उनकी उंगलियाँ मेरे लंड पर तेज़ी से चलने लगती।
उनका चेहरा देखते ही मेरा दिल और तेज़ धड़कने लगा, गाल हल्के लाल, साँसें गर्म, बाल माथे पर चिपकते हुए, और आँखों में वो गहराई… जिससे साफ समझ आ रहा था कि उन्हें मेरी उँगलियों की हर हरकत कितनी गहराई तक महसूस हो रही है।
उन्होंने मेरा लंड इतनी जोर से हिलाना शुरू कर दिया कि मैं जल्दी ही झड़ने लगा। मेरे लंड से बहता सफेद पानी उनकी उंगलियों से फिसलने लगा। मैं अपनी उंगलियाँ रोकने ही वाला था कि उन्होंने कहा, “रोकना मत गोलू… मेरा अभी हुआ नहीं।”
मैंने उनकी बात सुन कर अपनी उँगलियाँ और तेज़ कर दी। अंदर-बाहर की रफ़्तार बढ़ते ही उनके होंठ खुल गए और वो जोर से चीख पड़ी, एक लंबी, पकड़ी हुई साँस जैसी चीख।
“आह्ह… गोलू… बस… बस ऐसे ही…”
उनका पूरा शरीर झटकों से काँपने लगा। जाँघें मेरी कलाई को और कस कर पकड़ती गई। तेज़ साँसों के बीच उनका पूरा बदन थरथरा रहा था, जैसे वो खुद पर काबू ही ना रख पा रही हों।
वो हल्के से मुस्कुराई, शरमाई सी नज़र से मुझे देखा और अपनी उंगलियाँ ऊपर उठाई। उन उंगलियों पर मेरा सफेद पानी लिपटा हुआ था, पूरे पोर चमक रहे थे।
उन्होंने मेरी ओर देखा, होंठों पर हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी उंगलियों को ऊपर उठाया। मेरी गर्म सफ़ेदी अभी भी उनकी उंगलियों पर चमक रही थी।
फिर वो धीरे-धीरे उन उंगलियों को अपनी जीभ के पास ले गई… और मैं बस उन्हें घूरता रह गया। उनकी जीभ ने मेरी लिपटी हुई सफ़ेदी को छूते ही मेरा पूरा शरीर फिर से सिहर उठा। वो उन उंगलियों को चाटने लगी, धीमे, जान-बूझ कर, जैसे हर बूंद का स्वाद ले रही हों।
उनकी आँखें मेरी आँखों में टिकी थी जब वो बोली, “अच्छा लगा?”
मैंने थोड़ा सँभलते हुए कहा, “इतना भी नहीं…”
उन्होंने उंगलियाँ पूरी तरह होंठों में लेकर चूस ली, फिर धीरे से मुस्कुराते हुए बोली, “तो फिर… इस संडे मैं तुम्हें सच में खुश कर दूँगी।”
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