पिछला भाग पढ़े:- नेहा दीदी और मेरा सिक्रेट अफेयर-8
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
नेहा दीदी पूरी तरह नंगी होकर सेक्स चेयर पर मेरे सामने लेटी थी। कमरे की पीली रोशनी में उनका गोल-मोल पिछवाड़ा चमक रहा था और मेरा सख्त लंड उसके ठीक करीब थरथरा रहा था। उनके दोनों हाथ कुर्सी के हैंडल को कस कर पकड़े हुए थे, मानो पहले से ही समझती हों कि आगे क्या होने वाला था।
मैंने धीरे-धीरे अपनी कमर आगे बढ़ाई। जैसे ही मेरा लंड उनके मुलायम पिछवाड़े के बीच धँसने लगा, नेहा दीदी ने दाँत भींच कर लंबी साँस छोड़ी। उनका पेट नीचे सख्त होकर सिकुड़ गया, और चेयर पर उनका बदन हल्का-सा ऊपर उठ गया, जैसे हर नस मेरे छूने से जाग रही हो।
लेकिन मैं रुका नहीं। मैं और आगे बढ़ा, सावधानी से उनके कसाव को महसूस करता हुआ। अंदर जाते ही मुझे लगा जैसे मेरा लंड किसी गर्म और तंग दीवार के बीच फँस गया हो। वह जगह इतनी तंग थी कि मेरी साँसें भारी हो गई। मैं धीरे-धीरे धक्का देने लगा, हर स्ट्रोक लंबा और गहरा। नेहा दीदी के होंठों से घुटी हुई कराह निकली, आधी दर्द में, आधी चाह में।
जब मेरा लंड पूरी तरह अंदर तक समा गया, मैंने उनकी कमर पकड़ कर एक पल रुक कर देखा। उनके गाल लाल हो चुके थे, आँखें बंद थी। मैंने फुसफुसा कर पूछा, “दर्द तो नहीं हो रहा?” उन्होंने हल्की काँपती आवाज़ में कहा, “बस धीरे… और मत रुको।” उनके शब्द सुनते ही मैं फिर से हिला, इस बार ताल में, धीरे-धीरे, लेकिन बिना पीछे हटे।
हर धक्के के साथ उनका शरीर कुर्सी पर आगे-पीछे सरकने लगा। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों और रगड़ की आवाज़ थी। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। हर पल मुझे और दीदी को पागलपन की हद तक भड़काता जा रहा था।
उन्होंने कुर्सी का हैंडल कस कर पकड़ लिया। वह धीरे-धीरे साँस छोड़ रही थी, जैसे हर हलचल उन्हें भीतर तक महसूस हो रही हो। “नेहा दीदी… आप ठीक हैं ना?” मैंने फुसफुसा कर पूछा।
उन्होंने हल्का सिर हिलाया, आँखें बंद रखते हुए बोली, “हाँ… बस धीरे… तुम हो ना?”
मैंने उनकी कमर को थोड़ा ऊपर उठाया और अपने लंड को फिर से पूरा अंदर तक धँसाया। इस बार उनकी कराह और भारी हो गई। उनके पैरों की उंगलियाँ मुड़ गई और उनका सिर पीछे की ओर झटका, जैसे उनके भीतर कोई बिजली दौड़ गई हो।
मैं धीरे-धीरे बाहर आया और फिर से अंदर गया, हर बार थोड़ा और गहरा, थोड़ा और तेज़। नेहा दीदी की साँसें अब टूट रही थी, और उनके होंठों से हर धक्के के साथ हल्की-हल्की चीखें निकल रही थी।
उनका शरीर अब पूरी तरह मेरे हिलने को अपनाने लगा था। उनके कूल्हे खुद-ब-खुद ऊपर उठ कर मुझे अंदर और आगे खींच रहे थे। उन्होंने धीमे से कहा, “हाँ… ऐसे ही… मत रुकना…”
कमरा हमारे शरीरों की आवाज़ और दीदी की भारी साँसों से भर गया था। मैं अब अपने हर धक्के में और भूख डाल रहा था, जैसे दीदी का हर कराह मुझे और पागल बना रहा हो।
और तभी, मैंने महसूस किया कि दीदी का बदन अचानक पहले से ज़्यादा तन गया।उनका पिछला हिस्सा मेरे लंड के चारों ओर सिकुड़ने लगा, जैसे वह मुझे भीतर और कैद कर लेना चाहती हो। उन्होंने कुर्सी का हैंडल और ज़ोर से पकड़ लिया, गले से टूटी आवाज़ निकली, “ओह्ह… रुको मत… बस… बस ऐसे ही…”
उनका पूरा शरीर काँपने लगा था, मेरी कमर खुद-ब-खुद और तेज़ चल रही थी। मैं अब उनके हर झटके में खो गया था, कोई रुकना नहीं, कोई सोच नहीं, बस हम दोनों के बीच गहराता पागलपन।
मैंने अपनी पकड़ थोड़ी और कस ली और धीरे-धीरे लेकिन लगातार धक्का देता रहा। नेहा दीदी अब हर मूवमेंट के साथ काँप रही थी, उनके होंठ आधे खुले हुए, साँसें बढ़ गई। मैं बस उनके बदन की गर्मी और कसाव में खोता जा रहा था। कमरे की हवा भारी हो चुकी थी, दोनों के पसीने की महक घुली हुई।
मैं बस चलता रहा, बिना रुके, बिना जल्दबाज़ी, बस इतना कि वह हर पल महसूस कर सकें। और दीदी धीरे-धीरे हाँफती रही, उनका पिछला हिस्सा मेरी कमर की हर धक्के के साथ पीछे धकेलता जा रहा था, जैसे वह चाहती हों कि मैं और गहरा उतर जाऊँ।
मैंने उनकी कमर को और कस कर पकड़ते हुए थोड़ा आगे झुका। मेरा सीना उनकी पीठ से लगभग छू रहा था। वह हल्की आवाज़ में बुदबुदाई, “थोड़ा और… बस वहीं…” मैं बिना कुछ बोले उसी तरह में चलता रहा, दोनों एक-दूसरे में खोए हुए, अगले पल की ओर खिंचते हुए।
मैंने अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी। कमर थामे हुए अगला धक्का दिया तो दीदी की आवाज़ फिसल कर हवा में फैल गई, “हाआँ… हाँ… वहीं… वहीं…” उनकी पीठ हल्की उठी और मैंने महसूस किया कि वह मुझे और अंदर खींच रही थी।
मैंने हल्की हँसी में फुसफुसाया, “नेहा दीदी… आप रुकने नहीं देंगी आज।”
उन्होंने आधी साँस में कहा, आवाज़ काँपते हुए, “चुप… बस… करते रहो… तुम रुक गए तो मैं पागल हो जाऊँगी…”
उनकी बात सुनते ही मेरा शरीर और गर्म हो गया। मैंने अपनी कमर और तेज़ चलाना शुरू किया, हर धक्का पिछले से ज़्यादा भरपूर और गहरा। दीदी की चीख अब दबकर नहीं रह रही थी। हर बार अचानक बाहर निकलती और हवा में बिखर जाती। मैं उनका हर कंपन, हर कसाव, हर गर्मी अपने लंड पर महसूस कर रहा था।
उसी पागल ताल के बीच मैंने आगे झुक कर उनके कान के पास फुसफुसाया, “दीदी… आप तो पूरी तरह खो गई हैं…”
उन्होंने काँपती हँसी दबा कर कहा, “तुमने ही किया है ये… अब जिम्मेदारी भी तुम्हारी है… मत रुकना…”
मैंने उनकी बात पर एक लंबा धक्का दिया तो दीदी का पूरा शरीर कुर्सी पर तन गया। उन्होंने हैंडल इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई।
“ऊऊह्ह…! रुक मत… एक पल भी नहीं…” उन्होंने कंपकँपाती आवाज़ में कहा, शब्दों के बीच उनकी साँसे फँस रही थी। मैंने अपने दोनों हाथ उनकी कमर से ऊपर ले जाकर पीठ पर रख दिए, उनके पसीने से गरम त्वचा को दबाते हुए। मैंने धीमे लेकिन गहरे स्ट्रोक देना शुरू किया। हर धक्का पूरा भीतर उतरता और फिर लगभग बाहर तक लौट आता।
नेहा दीदी की साँसें टूटी लकीर की तरह बाहर निकल रहीं थी। उन्होंने सिर पीछे झुका कर कहा, “तुम… तुम मुझे बर्बाद कर रहे हो…”
मैंने धीमी, भारी आवाज़ में जवाब दिया, “आज दीदी… मैं आपको छोड़ने नहीं वाला।”
उनकी कमर खुद-ब-खुद मेरे साथ ताल मिलाने लगी। हर मूवमेंट में उनका शरीर खुल रहा था, आवाज़ें और तेज़, और बिना रोक-टोक बहती हुई।
“और गहरा…” उन्होंने करवट भरी कराह के साथ कहा।
मैंने पूछा, “इतना काफी है…?”
वह हाँफते हुए बोली, “नहीं… जब तक तुम थक नहीं जाते… तब तक…”
मैंने कमर और तेज़ हिलाई, हर धक्का ऐसा जैसे भीतर तक गूँजता हो। उनके अंदर घर्षण गर्म था, रेशमी और फिर भी कसावट से भरा, हर बार मेरे लंड को खींचता हुआ। दीदी काँप रही थी, उनकी जाँघें कुर्सी के किनारों से टकरा कर छोटी थप-थप पैदा कर रही थी, उनकी साँसें गर्म होकर कमरे की हवा में मिल रही थी।
“दीदी… अब बहुत पास हूँ…” मैंने गहरी, काँपती आवाज़ में कहा।
उन्होंने तुरंत जवाब दिया, आवाज़ काँपती हुई लेकिन साफ़, “हाँ… हाँ… बस… छोड़ दो… मेरे अंदर… सब…”
मैंने कमर और नीचे झुका कर, दोनों हाथ उनकी कमर पर जमाए, और पूरी ताकत से धक्का पर धक्का मारने लगा। हर स्ट्रोक उनके शरीर को आगे धकेल देता, उनकी पीठ हल्की उठती, फिर वह मेरे ऊपर हजार छोटे स्पर्शों की तरह वापस लौटती। कुर्सी हर जोर से चरमराती, मानो वह भी इस लय में शामिल हो।
“नेहा… दीदी… मैं…” मेरी साँस टूट रही थी, शब्द आधे निकल कर हवा में खो रहे थे।
“हाँ! हाँ! अभी!” उन्होंने लगभग चीखते हुए कहा। उसी पल उनका पूरा शरीर मेरे नीचे पत्थर की तरह तन गया, जाँघों से लेकर पीठ तक एक झटका दौड़ा, उनके उँगलियों ने हैंडल को इस तरह पकड़ा जैसे वह उसी में घुस जाना चाहती हो।
मेरे भीतर भी बस एक ही पल बचा था। मैं खुद को रोक नहीं पाया। एक आखिरी, लंबा, गहरा धक्का, फिर शरीर ढीला छोड़ कर मैं उन्हीं पर टिक गया।
नेहा दीदी धीरे-धीरे ढीली होती गई। उनकी पकड़ हैंडल से छूटी, कंधे नरम पड़े, और सिर पीछे की ओर टिक गया। उनका बदन कंपकपाहट से भरा हुआ था, मानो अभी भी कुछ अंदर चल रहा हो।
उनकी साँसें पहले तेज़ थी, फिर धीरे-धीरे लंबी और शांत होने लगी, जैसे हर एक्सहेल के साथ वह खुद को थोड़ा और समेट रही हों। उनके गाल गरम थे, आँखें आधी बंद, और होंठों पर उस पल की नर्म थकान तैर रही थी।
मैंने धीरे से उनकी पीठ सहलाई। उन्होंने बिना खोले आँखों के, थकान भरी मुस्कान के साथ फुसफुसाया, “रुको… अभी उठ नहीं सकती… थोड़ा साँस ले लूँ।”
मैं वहीं खड़ा रहा, बस उन्हें देखते हुए, कैसे उनका शरीर उस लहर के बाद शांत होता जा रहा था, कैसे उनके कंधे नीचे बैठ रहे थे, और कैसे हर साँस उन्हें वापस उनके ही भीतर ला रही थी।
करीब आधे घंटे बाद दोनों ने धीरे-धीरे उठ कर कपड़े पहने। अभी भी शरीर में हल्की थकान थी, लेकिन चेहरों पर एक ऐसी शांति जो किसी बाहरी आँख से नहीं देखी जा सकती।
हम दोनों कमरे से बाहर निकले और सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे रिसेप्शन तक पहुँचे। मैंने जेब से चाबी निकाली और काउंटर पर रख दी।
काउंटर पर बैठा आदमी हमारी तरफ देख कर हल्का सा मुस्कुराया, जैसे वह सोच रहा हो कि हम कोई आम पति पत्नी हैं। बस साथ में थोड़ी नज़दीकी चुराने आए हों।
मैंने भी सिर हिला कर मुस्कान लौटा दी। लेकिन भीतर मैं और नेहा दीदी दोनों जानते थे हमारी कहानी वैसी नहीं थी जैसी वह समझ रहा था। यह रिश्ता सिर्फ हमीं समझते थे, सिर्फ हमारे बीच था, और शायद हमेशा रहेगा।
रिसेप्शन से बाहर निकल कर हम सड़क पर पहुँचे। कुछ देर तक साथ-साथ चलते रहे, कोई शब्द नहीं, कोई योजना नहीं, बस एक खामोश समझदारी। फिर हम अलग दिशा में मुड़ गए।
मैं ऑटो लेकर वापस कॉलेज होस्टल पहुँच गया। वहाँ पहुंचते-पहुंचते रात गहरी हो चुकी थी। गेट के बाहर सिक्योरिटी वाला आँखें तरेर कर वॉच देखा, मैंने सिर झुका कर भीतर कदम रखा।
पहली रात मुझे लगा कि कोई कमी नहीं है, वही शहर, वही दूरी, और दीदी बस कुछ स्टॉप दूर। लेकिन दो तीन दिन नहीं बीते कि एहसास बदलने लगा।
होस्टल में नियम सख़्त थे। सुबह से शाम तक लेक्चर की लाइनें, अटेंडेंस मिस नहीं कर सकते। रात को गेट बंद, छुट्टी मांगो तो दस सवाल। बाहर जाने की इजाज़त तो जैसे नाम की भी नहीं थी।
धीरे-धीरे मुझे लगा मैं किसी गलत जगह आ गया हूँ, गलत कॉलेज, गलत कमरा, गलत होस्टल। जैसे पूरा ढांचा मेरे और दीदी के बीच दीवार बन गया हो। दिन भर क्लास में आँखें पट्टी की तरह बंधी रहती और रात में बिस्तर पर लेटते ही वही एक विचार कि क्यों मुझे अभी उनके पास नहीं होना चाहिए? क्यों मैं स्टेशन के उस मोड़ तक नहीं जा सकता जहाँ से उनका घर दिखता है?
कभी-कभी दिल में धड़कन इतनी तेज़ हो जाती कि लगता अभी उठ कर भाग जाऊँ, लेकिन दिमाग याद दिलाता कि अगर पकड़े गए तो। कुछ ही दिनों में यह सवाल मेरे भीतर जगह बनाने लगा, अगर मैं दीदी को सच में महसूस नहीं कर पा रहा, तो यह पढ़ाई, यह आज़ादी, यह नया शहर, सब किस काम का?
लेकिन उन मुश्किल पलों में भी नेहा दीदी ने कभी मेरा साथ नही छोड़ा। हर रोज वह किसी ना किसी बहाने से मुझे अपने पास होने का एहसास दिला देती। कभी-कभार सिर्फ ब्रा पहन कर वह मुझे अपनी तस्वीरें भेजा करती, तो कभी ऐसी तस्वीरें भेजा करती जिसमें उन्होंने बदन पर कुछ भी पहना नहीं होता। वह पुरी तरह नंगी होकर तरह तरह के पोजीशन में तस्वीरें निकालती, ताकि मैं उनकी कमी को कभी महसूस ना कर सकूं।
कई बार रात को हम दोनों व्हिडीओ काॅल पर बातें करते, उस समय नेहा दीदी अपने पुरे कपडे निकाल देती और मुझे अपने नाज़ुक हिस्सा दिखा देती। उस हिस्से को वह उंगलियों से सहलाती मानो वह हिस्सा मेरे लिए तैयार कर रही हो।
कई रातें तो ऐसी भी बीतती जब कॉल लगते ही उन्होंने एक शब्द तक नहीं बोला। बस कैमरा नीचे किया और अपनी टांगें फैला दी। उनकी साँसें तेज़, आँखों में शरारत और होंठों पर एक हल्की मुस्कान। मैं स्क्रीन में बस उन्हें देखता रहता, दिमाग सुन्न, और दिल पागलों की तरह धड़कता हुआ।
“तुम्हें याद है ना तुम्हारा वादा?” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।
मैं कुछ बोल नहीं पाया, बस सिर हिलाया।
नेहा दीदी ने हँस कर कहा, “जब तक तुम वापस नहीं आते, मैं खुद को छू कर ही काम चलाऊंगी। लेकिन जिस दिन तुम लौटोगे ना… मुझसे कुछ भी संभलेगा नहीं।”
इसके बाद वह अपनी दो उंगलियां अपने अंदर ले गई। वीडियो के उस छोटे से फ्रेम में भी मैं साफ़ देख सकता था कि वह कितनी गीली हो चुकी थी। वह अपनी उंगलियों को अंदर-बाहर करती और हर हरकत पर हल्की सी सिसकारी निकलती।
“तुम होते तो कितना अच्छा होता…” उन्होंने दाँत भींचते हुए कहा।
मैं पागल हो जाता। स्क्रीन पकड़ कर चूमना चाहता। हर रात वह मुझे ऐसे ही तड़पाती, कभी अपना सीना दबाते हुए, कभी अपने निप्पल मरोड़ते हुए, तो कभी अपने निचले हिस्से पर हाथ फिराते हुए।
लेकिन फिर उसने मुझे एक और नए तरीके से छेड़ना शुरू किया। वह दिन के बीचो-बीच अचानक आवाज़ मैसेज भेजती सिर्फ उसकी साँसों की आवाज़। धीमी, लंबी, गहरी। बिना किसी शब्द के। मैं क्लास में बैठा होता और जेब में फोन कंपन करता। प्ले करते ही बस वही गर्म साँसें, मानो वह मेरे कान में आकर फूँक मार रही हों।
कभी वह रिकॉर्डिंग में फुसफुसाती, “अभी… मैं सिर्फ उँगली से छू रही हूँ। रात को क्या करूँगी, सोचना भी मत।”
एक बार उसने गलती से, या शायद जान बूझ कर, मुझे 12 सेकंड की वीडियो भेजी। कैमरा थोड़ा हिल रहा था, पर साफ दिख रहा था कि वह बाथरूम की दीवार से टिक कर खड़ी थी। एक हाथ से उसने शावर चलाया हुआ था, पानी उसके उभरे हुए सीने से फिसल कर नीचे जा रहा था, और दूसरे हाथ से वह अपने बीच में गई हुई थी।
वीडियो खत्म होने से ठीक पहले उसने कैमरे में देख कर मुस्कुराते हुए कहा, “बस सोच कर रहो। करने नहीं दूँगी… अभी नहीं।”
लेकिन फिर उसने मुझे और जलाना शुरू किया। अब वह सिर्फ भेजती नहीं थी, मुझसे माँगती भी थी। “तुम भी भेजो ना…” एक रात उसने लिखा।
मैंने पूछा, “क्या?”
झट से रिप्लाई आया, “सब कुछ। जैसे मैं भेजती हूँ।”
पहले तो मैं झेंप गया। उसने तुरंत अगला मैसेज भेजा “डरते हो मुझसे?”
मैं और तड़प गया। मैंने शर्ट उठा कर एब्स की फोटो भेजी। उसने देखा और दो सेकंड में जवाब आया “ना… यह नहीं। नीचे से भेजो।”
मैंने धीरे-धीरे पैंट उतारी, लंड पहले से ही तन चुका था। मैंने फोटो खींच कर भेज दी।
पाँच सेकंड बाद नेहा दीदी का मैसेज आया, “हम्म… अब अच्छा लगा। इसे सोच कर ही मैं अभी गीली हो रही हूँ।”
हफ़्तों तक बस कॉल, मैसेज और तस्वीरों ने हमें बाँध कर रखा था। दूरी जितनी बढ़ती गई, चाहत उतनी ही गहरी होती गई। मगर एक रात सब कुछ बदल गया। उस शाम नेहा दीदी ने ना मैसेज किया, नख कॉल। पहली बार लगा जैसे दुनिया अचानक बहुत शांत हो गई हो। कमरे की दीवारें काटने लगी। छत घूरते-घूरते बेचैनी ने दिल जकड़ लिया।
मुझे समझ नहीं आया की मेरे साथ क्या हो रहा था। लेकिन लग रहा था मानो नेहा दीदी के बदन के बिना मैं दो पल और नहीं रह सकता, इसलिए मैंने रात को होस्टल से बाहर जाने कि सोचा। इसमें बहुत सारी मुश्किलें थी और अगर कोई मुझे पकड़ लेता तो मुझे वहां से निकाल दिया जाता। लेकिन उस पल मैं अपनी नेहा दीदी के साथ एक रात गुजारने के लिए कोई भी हदें पार करने को तैयार था।
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