पिछला भाग पढ़े:- जब दीदी ने खुद को मेरे सामने खोला-8
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
वाणी दीदी के दोनों हाथ टी-शर्ट के सहारे बिस्तर से हल्के से टिके थे और वह मुझे मुस्करा कर देख रही थी। धीरे-धीरे मैंने भी अपने कपड़े खोलना शुरू किया। पहले मैंने अपनी टी-शर्ट ऊपर से पकड़ी और सिर के ऊपर खींच कर उतार दी। दीदी की आँखें मेरे सीने पर टिक गई, जैसे वह पहली बार मुझे इस तरह देख रही हो।
फिर मैंने अपनी ट्रैक पैंट की डोरी ढीली की। उसके खुलते ही कपड़ा नीचे सरक गया और दीदी की सांस एक पल को अटक गई। मैं भी शर्म और उत्तेजना के बीच खड़ा था, कपड़े उतारते समय उसकी हर नज़र मेरे अंदर तक उतर रही थी। वाणी दीदी ने धीमे से अपनी जाँघें थोड़ा और फैलाई और फुसफुसा कर बोली “अब आ जाओ…”
मैंने हल्की हँसी के साथ कहा, “इतनी जल्दी नहीं…”
फिर मैंने अपनी टी-शर्ट पकड़ी और उसे मोड़ कर वाणी दीदी की आँखों पर रख दिया। वह चौंक कर मुस्कराई और बोली, “ये क्या कर रहे हो तुम?”
मैं उसके बिल्कुल पास झुक कर धीरे से बोला, “मैंने भी एक वीडियो में देखा था… उसमें लड़का लड़की की आँखें ऐसे ही ढक देता है।”
दीदी ने आँखों पर रखी टी-शर्ट के नीचे हल्का सा सिर हिलाया, जैसे मुस्कान रोक नहीं पा रही हों। उनका चेहरा ढका था, पर होंठों की वो छोटी सी मुस्कान साफ दिख रही थी।
मैंने अपनी टी-शर्ट उनकी आँखों पर रखी हुई थी, जिससे वह कुछ देख नहीं पा रही थी। उनका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था और दोनों हाथ बिस्तर पर टिके हुए थे। मैं उनके बिल्कुल पास आया और फिर अपने घुटने उनके पेट के दोनों तरफ टिका कर ऊपर बैठ गया, ऐसे कि मेरा पूरा वज़न उन पर ना पड़े, पर उन्हें साफ-साफ महसूस हो कि मैं उनके ऊपर था।
वाणी दीदी ने पेट के नीचे हल्का दबाव महसूस होते ही एक छोटी सी कराह निकाली, दर्द वाली नहीं, बल्कि उत्तेजना वाली। उनका पेट मेरे वजन से थोड़ा दबा था पर संभालने लायक था।
मैंने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया और उनके बाएं स्तन पर पहले बहुत हल्का थप्पड़ मारा। आवाज़ हल्की थी, पर असर साफ दिख रहा था।
“आह…” दीदी की आवाज़ दबी हुई निकली। उनका शरीर एक सेकंड के लिए हल्का सा हिल गया।
मैंने फिर वही थप्पड़ दोहराया, इस बार भी धीमा और इतना कि उन्हें झटका ना लगे। उनके होंठ टी-शर्ट के नीचे से हिले और उन्होंने साँस बीच में खींचते हुए कहा,
“हम्म… और… कर सकते हो।”
उनकी आवाज़ में सीधा इशारा था, कोई घुमा फिरा कर बात नहीं। मैंने उनका स्तन पकड़ कर इस बार थोड़ा ज़्यादा ज़ोर से थप्पड़ लगाया। आवाज़ साफ आई, और उनके शरीर ने तुरंत इशारा दिया। उनकी कमर हल्की ऊपर उठी, उंगलियाँ चादर पकड़ने लग गई।
“आह्ह… हाँ…” उनकी कराह इस बार ज्यादा साफ और तेज़ थी।
मैं ऊपर से उनका शरीर महसूस कर पा रहा था। उनका पेट मेरे वजन को अच्छी तरह संभाल रहा था, और उनकी साँसें तेज़ हो चुकी थी।
मैंने रुक कर पूछा, बिल्कुल सीधे शब्दों में,”इतना काफी है? या और चाहिए?”
उन्होंने बिना सोचे, भारी साँसों के बीच कहा, “और… अगर तुम मार सकते हो तो… और ज़ोर से मारो।”
उनकी बात सुनते ही मैंने घुटनों की पकड़ थोड़ी मजबूत की और एक और थप्पड़ उनके दाएँ स्तन पर मारा। इस बार पिछले से ज्यादा साफ ताक़त के साथ।
“उफ़्फ… आह…” वाणी दीदी की कराह इस बार काबू में नहीं रही। उनका पेट मेरे नीचे थोड़ा सख़्त हुआ, जैसे वह खुद को ज़ोर संभालने के लिए कस रही हों।
मैंने नीचे झुक कर उनकी साँसें सुनी। तेज़, गर्म, और बिना किसी झिझक के चाहत से भरी हुई। उनके हाथ अब बिस्तर के हैंडल को और कस कर पकड़ चुके थे।
मैंने पूछा, “ज़्यादा लगा?”
उन्होंने तुरंत सिर थोड़ा मोड़ कर कहा, “नहीं… रुकना मत… ऐसे ही करो।”
मैंने अपने घुटनों की पोज़ीशन ठीक की ताकि उनका पेट मेरे वजन को आराम से पकड़ सके। फिर मैंने उनका बायां स्तन पकड़ा, अंगूठे से निप्पल का सेंट्रल हिस्सा दबाया, इतना कि उन्हें महसूस हो जाए कि मैं रुकने वाला नहीं था।
उनकी साँस वहीं अटक गई। मैंने सीधे हाथ से उनके सीने पर एक और थप्पड़ मारा। इस बार बिल्कुल माप कर, उतना ही ज़ोर जितना उन्होंने खुद माँगा था।
“आह्ह्ह… हाँ… वहीं…” उनकी आवाज़ टूट कर बाहर आई। शरीर मेरे नीचे हिल गया, पर उन्होंने खुद को संभाला, पेट को सख़्त करके मुझे सहारा दिया।
मैंने देखा उनकी जाँघें हल्की ऊपर उठने लगी थी, जैसे शरीर खुद से कंट्रोल खो रहा हो।
कुछ सेकंड बाद उन्होंने गहरी साँस ली और धीमी, पर साफ़ आवाज़ में बोली “गोलू… मुझे किस्स चाहिए।”
उनकी आँखों पर अभी भी मेरी टी-शर्ट ढकी थी, इसलिए मैं उनके चेहरे के बहुत पास जाकर रुक गया। उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे वह मेरी गर्म साँस महसूस कर लेना चाहती हों।
मैंने धीमे से पूछा, “कहाँ?”
वह हल्का-सा मुस्कराई, फिर जैसे ही मैंने उनके चेहरे के पास होंठ लाने चाहे, उन्होंने झटके से अपना सिर दूसरी तरफ मोड़ लिया। मैं रुक गया।
उन्होंने गर्दन मोड़ कर जाते हुए कहा “चेहरे पर नहीं… होंठों पर नहीं… मुझे तुम्हारा किस्स नीचे चाहिए।”
मैं एक पल के लिए रुक गया, मैंने सोचा शायद मैंने ठीक सुना नहीं।
मैंने पूछा, “नीचे… मतलब?”
वाणी दीदी ने टी-शर्ट के नीचे से अपने होंठ भींचे, फिर साफ़-साफ बोली, “मेरी चूत पर… वहीं किस्स करो।”
मैंने जैसे ही उनकी बात सुनी, मेरे हाथ अपने आप नीचे खिसकने लगे। वाणी दीदी की आँखों पर अभी भी मेरी टी-शर्ट ढकी थी, लेकिन उनका शरीर हर सेकंड में बता रहा था कि उन्हें ठीक-ठीक क्या चाहिए। उन्होंने गहरी साँस ली, पैर थोड़े मोड़े हुए थे, और उनकी कमर बिस्तर पर ढीली पड़ी थी।
मैं धीरे-धीरे उनके पेट से पीछे हट कर नीचे की ओर आया। उनके शरीर ने मेरी हर हलचल को महसूस किया। उनके पेट की मांसपेशियाँ हल्की-सी टाइट हो गई जैसे उनका शरीर खुद अंदाज़ा लगा ले कि मैं कहां जा रहा था।
मैं उनके घुटनों के पास आकर रुका। उनके दोनों पैर पास-पास थे, हल्के काँपते हुए। मैंने नीचे झुक कर उनके दोनों पैरों को अपने हाथों से पकड़ा। उनकी त्वचा गर्म थी, और जैसे ही मैंने पकड़ मजबूत की, वाणी दीदी का पूरा शरीर एक सेकंड के लिए थरथराया।
मैंने हल्के दबाव से उनके दोनों पैर अलग किए। उनकी जांघें धीरे-धीरे फैलने लगी। कोई विरोध नहीं, सिर्फ एक धीमी-सी कराह जैसे उनके मुँह से निकली।
अब मैं उनके पैरों के बीच था, बिल्कुल सामने। उनके फैलते ही अंदर का हिस्सा साफ़ दिखने लगा। उनका पैंटी पहले ही हट चुकी थी। उनकी साँसें ऊपर से तेज़ सुनाई दे रही थी, और टी-शर्ट के नीचे उनके होंठ खुले हुए थे, जैसे वह खुद को रोक नहीं पा रही हों।
उनकी जाँघों के बीच का हिस्सा अब मेरे बिल्कुल सामने था। गर्म, मुलायम, और हल्की सी चमक लिए हुए। जैसे उनका पूरा शरीर मुझे वहीं बुला रहा हो।
मैंने धीरे से अपना दायां हाथ बढ़ाया और उनकी भीतरी जाँघ को उँगलियों से छुआ। सिर्फ छुआ ही था कि वाणी दीदी का पूरा शरीर एक तीखी साँस के साथ हिल गया।
मैंने फुसफुसा कर पूछा, “यहीं… चाहिए ना?”
टी-शर्ट के नीचे से उनकी भारी, काँपती आवाज़ आई, “हाँ… वहीं… वहीं किस्स करो… गोलू… और इंतज़ार मत कराओ…”
मैंने अपने दोनों हाथ उनकी जाँघों के नीचे सरकाए ताकि उन्हें अच्छी तरह पकड़ सकूँ और उनका वजन मैं संभाल लूँ। दीदी की साँस ऊपर से बहुत तेज़ सुनाई दे रही थी।
मैंने अपना चेहरा उनके बिल्कुल पास लाया और पहले बहुत हल्के से उनके उस हिस्से के बिल्कुल ऊपर होंठ रखे, सीधा चूत पर नहीं, थोड़ा ऊपर, ताकि उन्हें साफ पता चले कि मैं क्या करने वाला था।
जैसे ही मेरे होंठ उनकी गर्म त्वचा से छुए, उन्होंने तुरंत एक गहरी, कटी-कटी कराह निकाली, “आह्ह… गोलू…”
मैंने उनकी जाँघों की पकड़ थोड़ी मजबूत की और इस बार अपने होंठ उनकी चूत के बिलकुल ऊपर ले जाकर सीधे वहीं किस्स किया – धीरे, साफ, बिना किसी जल्दी के।
जैसे ही मेरे होंठ वहाँ टिके, वाणी दीदी का पूरा शरीर मेरे हाथों में काँप गया। उनकी कमर एक-दम हल्की ऊपर उठी, जैसे वह खुद अपने आप मुझे ज़्यादा पास लाना चाहती हों।
मैंने दूसरी बार किस्स किया, इस बार थोड़ा नीचे। उनकी साँस अटक गई।
तीसरी बार, सीधे उनकी चूत के बीच वाले हिस्से पर।
जैसे ही मैंने होंठ वहाँ दबाए उनकी कराह बिना रुके बाहर आई, “ह्ह्म्म्म… ओह्ह… वहीं…”
अब मैंने अपना मुँह थोड़ा खोला और धीरे-धीरे अपनी जीभ बाहर निकाली। पहले मैंने सिर्फ उनकी नमी को हल्के से छुआ, इतना कि वो महसूस हो लेकिन झटका ना लगे।
जैसे ही मेरी जीभ उनके उस हिस्से पर लगी, दीदी ने अपने घुटनों को थोड़ा और फैला दिया, खुद ही, किसी दबाव के बिना। उनका शरीर अब पूरी तरह खुल चुका था।
मैंने पहले एक सीधी, लंबी स्ट्रोक में अपनी जीभ ऊपर से नीचे तक चलाई। दीदी की आवाज़ मेरी जीभ के नीचे एक-दम कांपने लगी, “आह्ह… हाँ… ऐसे ही… ऐसे ही कर… रुकना मत…”
अब मैं थोड़ा नीचे आया, फिर ऊपर, और उनकी चूत के बिल्कुल बीच वाले हिस्से को अपनी जीभ से हल्के-हल्के दबाते हुए खेलने लगा। मैंने जीभ को गोल नहीं घुमाया, बस सामने का हिस्सा इस्तेमाल किया। आगे-पीछे, छोटे-छोटे स्ट्रोक, और बीच-बीच में हल्का सा दबाव।
वाणी दीदी अब पूरी तरह बिखरने लगी थी। उनकी जाँघें मेरे हाथों में बार-बार कस रही थी, और उनके पेट की मांसपेशियाँ लगातार सख्त हो रही थी।
मैंने पूछा ही नहीं, सीधे वहीं अपनी जीभ और साफ दबाई, जितना वो सह सकें।
उनकी आवाज़ टूट कर बाहर आई, “गोलू… ओह्ह… ये… ये मत रोकना… प्लीज़…”
उनके उस हिस्से की नमी अब मेरी जीभ पर साफ महसूस हो रही थी। गर्म, गाढ़ी, और हर स्ट्रोक के साथ बढ़ती हुई। अब मैंने अपनी मूवमेंट तेज़ कर दी। उनकी सांसें रुक-रुक कर नहीं, बल्कि एक लंबी, भारी लहर की तरह निकल रही थी। उनकी जाँघें मेरे सिर को कस कर पकड़ने लगी, जैसे वो मुझे वहीं रोक देना चाहती हों।
वाणी दीदी बिस्तर पर पीछे की ओर खिंच गई, पूरा शरीर एक-दम तन गया। उनकी कमर मेरी जीभ के ऊपर खुद उठने लगी, जैसे उनका शरीर खुद रफ्तार मांग रहा हो।
उनकी आवाज़ अब टूट चुकी थी, लगातार, रुकती नहीं। “गोलू… ओह्ह… ओह्ह… रुक मत… प्लीज़… बस… बस…”
मैंने उनकी चूत के सबसे सेंसेटिव हिस्से पर जीभ टिका कर सीधी, तेज़ मूवमेंट दी। कुछ ही सेकंड में दीदी का पूरा शरीर मेरी पकड़ में जोर से काँप उठा, जैसे अचानक करंट दौड़ गया हो। उन्होंने अपनी जाँघों से मेरे सिर को इतना कस लिया कि मुझे खुद उन्हें पकड़ कर बैलेंस बनाना पड़ा। उनकी कमर ऊपर उठी, फिर एक-दम सख्त हो गई।
और अगले ही पल दीदी जोर से फूट पड़ी।
दीदी पूरी तरह शांत हो चुकी थी, साँसें भारी थी। लेकिन मेरा लंड अभी भी उतना ही सख्त था, जैसे अभी फट ही जाएगा। मैं धीरे-धीरे उनके ऊपर से हट कर उनके चेहरे के पास आया।
मैंने हौले से कहा, “दीदी… बस मुँह थोड़ा सा खोल लो।” वो थकी हुई थी, इसलिए कुछ बोल नहीं पाई। उन्होंने बस अपने होंठ हल्के से खोल दिए। अब मैं उनके चेहरे के बिल्कुल पास था। मैं उनके होंठों के ऊपर खड़ा होकर अपने लंड को पकड़ कर धीरे-धीरे हिलाने लगा।
दीदी सिर्फ नीचे से मुझे महसूस कर रही थी। उनकी भारी साँसें मेरे लंड को छू रही थी, लेकिन उन्होंने एक बार भी उसे हाथ नहीं लगाया।
मैंने खुद ही अपने लंड को उनके होंठों के सामने रखते हुए लगातार झटके मारने शुरू किए धीरे, फिर तेज़। वो हल्का सा सिर उठाती, फिर थक कर वापस गिर जाती, पर उनकी खुली सांसें मुझे और चढ़ा देती थी।
मेरी कमर की मूवमेंट खुद ही तेजी पकड़ती गई। मैं उनके चेहरे पर झुक कर लगातार अपने हाथ से झटका मार रहा था, उनका खुला हुआ गर्म मुँह बस कुछ इंच दूर था।
कुछ ही मिनटों में मेरा पूरा शरीर अकड़ गया। मैं दीदी के होंठों के बहुत पास आ गया… और एक तेज़ धड़कन के साथ मेरा गर्म सफेद पानी उनके मुँह के अंदर फूटने लगा।
दीदी हल्के से कराह उठी, आँखें बंद कर ली, लेकिन होंठ बंद नहीं किए। सब अपने आप अंदर जाने दिया। मैं वहीं उन पर झुक कर भारी साँसें लेता रहा, जबकि उनका चेहरा मेरी गर्मी से भीगा हुआ था, और उनका शरीर अभी भी मेरी साँसों के नीचे हल्का-हल्का कांप रहा था।