ये कहानी केवल शुद्ध मनोरंजन के लिए लिखी गयी है, वास्तविकता से इसका कोइ लेना-देना नहीं है।
भूमिका:- दो शब्द मेरे परिवार के बारे में।
हां तो पाठको, मैं हूं इस कहानी का नायक धीरज राठी, इक्कीस साल का, खासम-खास हरियाणा का रहने वाला।
हमारा परिवार हरियाणा के शहर करनाल का रहने वाला है। करनाल में हमारा पुश्तैनी मकान हुआ करता था जो अब भी है। मगर अब उसमें कोइ रहता नहीं है।
मेरे दादा नफे सिंह राठी हरियाणा पुलिस में सीनियर सुपरिंटेंडेंट पुलिस थे। पुलिस में सीनियर सुपरिंडेंटेंड पुलिस और उसकी धाक ना हो? मेरे दादा जी की भी इलाके में पूरी धाक थी।
उनकी पोस्टिंग हरियाणा के अलग-अलग शहरों में होती रहती थी। मेरे दादा जी को हरियाणा के सब शहरों में से गुड़गांव सब से ज्यादा पसंद था। शायद इसलिए कि एक तो ये दिल्ली की नज़दीक है और गुडगाँव के आस-पास साठ सत्तर के दशक से ही डेवेलपमेंट बहुत तेज़ी से होना शुरू हो गया था।
अब पुलिस में इतने सीनियर अफसर को किसी भी चीज़ कमी तो होती नहीं। दादा जी को भी कोइ कमी नहीं थी। सो दादा जी ने पुराने गुडगाँव शहर में सेक्टर ग्यारह में तीन सौ गज़ में बना हुआ एक पुराना मकान खरीद लिया जो बड़ी ही जर्जर हालत में था। दादा जी ने इस मकान को तुड़वा कर नया दुमंजिला मकान सब सुविधाओं से लैस आज के डिज़ाइन के हिसाब से बनवाया।
जब मैं अभी छोटा ही था, तो हम सब करनाल से गुडगाँव के इस मकान में शिफ्ट हो गए। मेरे दादा जी का देहांत 2021 में हो गया। दादी जी पहले ही गुज़र चुकी थी।
मेरे पिता यशपाल राठी गुडगाँव हरयाणा में डिस्ट्रिक्ट ब्लॉक डेवलपमेंट अफसर हैं – जिला विकास अधिकारी। ये नौकरी भी उनको दादा जी की बदौलत ही हासिल हुई थी। पापा की इस जॉब में तबादला होता रहता है, मगर उनकी पोस्टिंग अक्सर गुडगाँव के आस-पास ही रहा करती है, इसलिए हम – मैं, मेरी बहन दिव्या और मेरी मम्मी यहां ही, गुडगाँव के इसी घर में रहते रहे हैं।
मम्मी भी गुडगाँव के सरकारी स्कूल में टीचर थी और कुछ साल पहले उन्होंने रिटायरमेंट ले ली। पापा यशपाल राठी अड़तालीस साल के हैं, लम्बे-चौड़े तंदरुस्त हैं मगर अब शरीर से थोड़े भारी शरीर हो गए हैं। भारी शरीर के कारण वो अपनी उम्र से ज्यादा के दिखाई देते हैं।
मेरी मम्मी सुधा राठी चवालीस की है। शरीर स्लिम और कसा हुआ है। देखने में सुन्दर आकर्षक है इसलिए लगती अड़तीस चालीस से कम ही है। अगर चाहे तो अब भी चोदने वालों की भीड़ इक्क्ठा कर सकती है। मगर संस्कारी है इसलिए इस चुदाई-वुदाई के चक्करों में नहीं है।
गुडगाँव वाले हमारे इस घर में नीचे की मंजिल में तीन कमरे हैं। दो कमरे बैडरूम की तरह इस्तेमाल होते हैं हुए एक कमरा ड्राइंग रूम के तरह इस्तेमाल होता है। इसी तरह ऊपर के मंजिल में भी तीन कमरे हैं, दो बेडरूम और बड़ा सा खुला कमरा है जिसमें किचन और डाइनिंग हाल इकट्ठे हैं।
पहले नीचे एक कमरे में मैं और दूसरे कमरे में मेरी छोटी बहन दिव्या सोया करते थे। मेरे मम्मी पापा शुरू से ही ऊपर के कमरे में रहते रहे हैं। पहले ऊपर एक कमरा खाली रहता था।
चार-पांच साल पहले जब मैं सोलह सत्रह साल का हुआ तो मम्मी पापा ने फैसला किया कि अब दिव्या को नीचे नहीं रहना चाहिए और मम्मी-पापा के साथ अब ऊपर उनके बगल वाले कमरे में रहना चाहिए।
कारण साफ़ ही था, मैं जवान हो रहा था। लंड के आस-पास छोटे-छोटे बाल उगने लगे थे। और उधर दिव्या भी जवान हो रही थी।
दिव्या के मम्मे और चूतड़ उभरने लगे थे। दिव्या का शरीर भरने लगा था। दिव्या घंटो शीशे के सामने खड़ी अपने आप को देखती रहती थी। अगर मेरी झांटे उगने लगी थी तो पक्की बात है दिव्या की भी फुद्दी के आस-पास नरम-नरम रेशमी बाल आने लग ही गए होंगे।
मजे के लिए लंड की मुट्ठ मारनी तो मैं दो साल पहले ही शुरू कर चुका था, अब मजे के लिए दिव्या भी कुछ ना कुछ करती ही होगी। अब क्या करती होगी, ये मुझे पता नहीं।
वैसे सभी जवान होती हुई लड़कियां मजे के लिए कुछ ना कुछ तो करती ही हैं।
मम्मी-पापा को लगा होगा कहीं ऐसा ना हो नई-नई आती जवानी के जोश में मैं किसी दिन अपनी बहन दिव्या को ही चोद दूं, या फिर दिव्या ही बहक कर मुझसे चुदाई ना करवा ले।
घरों में अक्सर इस तरह के रिश्ते बन जाते हैं, ये कोइ बड़ी बात भी नहीं है। मगर दिव्या ने ऊपर के कमरे में जाने से साफ़ मना कर दिया। कारण?
एक तो दिव्या को तेज़ आवाज में म्यूजिक – गाने – सुनने की शौक़ीन थी। दूसरे दिल्ली से हमारी मौसी की बेटी माधवी जब भी उनके यहां आती थी तब दिव्या और माधवी, दोनों मिल खूब धमा-चौकड़ी करती थी। दिव्या को लगा होगा अगर वो ऊपर शिफ्ट हो गयी तो उसका “ये” शोर शराबा नहीं हो पायेगा। लिहाजा उसने ऊपर के कमरे में शिफ्ट होने से मना कर दिया और ऊपर मैं शिफ्ट हो गया।
मेरे लिए ये कोई बड़ा इश्यू – मुद्दा – नहीं था। रात को सोना ही तो होता है, क्या ऊपर क्या नीचे।
ये तो थी भूमिका, अब आगे चलते हैं – “एक फैमिली ऐसी भी” की असली कहानी की तरफ।
तो दोस्तों अब मैं इक्कीस साल का हो चुका हूं और बाईसवें में चल रहा हूं – दिव्या उन्नीस पूरे कर चुकी है, और भरपूर जवानी की दहलीज़ पर खड़ी है।
मैं गुडगाँव के सरकारी इंजीनियरिंग कालेज से इंजीनरिंग की डिग्री कर रहा हूं और इस डिग्री के तीसरे साल में हूं। मेरी ये ये डिग्री का कोर्स अगले साल जुलाई में खत्म हो जाएगा।
दिव्या कालेज जाती है और बी.ए. के आख़री साल में है। दिव्या खूबसूरत है – जवान तो वो है ही। खुले दिमाग की भी है – इंग्लिश में अगर कहा जाए तो “बोल्ड एंड ब्यूटीफुल।”
मेरी एक मौसी है – कौशल्या – मेरी मम्मी से दो साल छोटी जो दिल्ली रोहिणी सेक्टर 32 में रहती है। कौशल्या मौसी का लम्बा चौड़ा दुमंजिला बड़ा सा घर है – ऊपर-नीचे मिला कर सात आठ कमरे हैं।
मौसी कालेज की पढ़ी लिखी है मगर घर पर ही रहती है – शुरू से ही नौकरी नहीं की। मेरे मौसा मनोहर लाल सांगवान को मौसी की नौकरी करना पसंद नहीं था। मौसी भी मम्मी की तरह खूबसूरत और सेक्सी है – ख़ूबसूरती में अगर कहा जाए तो मम्मी से कुछ इक्कीस ही होगी, उन्नीस तो नहीं है।
मौसा जी – मनोहर लाल सांगवान पुश्तैनी अमीर हैं। बवाना में उनके दो इंडस्ट्रियल शेड हैं पांच-पांच सौ गज के – जिनमें एक में उनकी फैक्ट्री है, जहां ऑटोमोबाइल पार्ट्स – ट्रकों और कारों कि कल पुर्जे बनते हैं।
मौसा जी की फैक्ट्री बहुत बढ़िया चल रही है – टॉप क्लास।
फैक्ट्री का सारा काम कैश पर होता है। साउथ के डीलर ट्रक और कारों के पार्ट्स आकर ले जाते हैं बिना पैकिंग करवाए – और फिर जिस तरह की मार्किट हो, जिस कम्पनी का मॉल ज्यादा बिकता हो, उसका ठप्पा लगा कर उसी कम्पनी की पैकिंग बना कर माल सप्लाई करते हैं।
हमारे देश में बिज़नेस ऐसे ही होते हैं।
दूसरा शेड खाली है और फ़िलहाल गोदाम की तरह इस्तेमाल होता हैं।
मौसा जी के परिवार और हमारे परिवार का अच्छा तालमेल है। मौसी और मौसा जी को छोड़ सब एक-दूसरे को नाम से ही बुलाते है। मम्मी पापा को यश बुलाती हैं, मौसी मौसा जी को मनु बोलती है। पापा मौसी को नाम से बुलाते है – कौशल्या, और मौसा जी और मौसी मम्मी को जीजी कह कर बुलाते हैं। उधर मम्मी मौसा जी को नाम से यानि मनोहर या मनु बुलाती है और मौसी मेरे पापा को जीजा जी। पापा और मौसा जी एक-दूसरे का नाम से ही बुलाते हैं – यश, मनोहर।
मौसा मनोहर, पापा यश को कई बार कह चुके हैं कि जब धीरज की डिग्री और ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी तो उनके बवाना वाले खाली शेड में धीरज को फैक्ट्री लगा देंगे। आज कल CNC मशीनों का जमाना है। मौसा जी कहते हैं, ताइवान से मशीनें आ जाएंगी और ऑटोमोबाइल पार्ट्स का चला चलाया बिज़नेस तो है ही, उसी को धीरज आगे बढ़ाये और मौज करे।
अब तक मेरे पापा यश ने “हां” नहीं की – शायद कोइ हिचकिचाहट है।
एक दिन दोनों परिवार – मम्मी-पापा और मौसा-मौसी – इकट्ठे बैठे थे तो मौसा जी ने फिर से बात छेड़ दी।
मौसा मनोहर ने पापा से कहा, “यश देखो, माधवी मेरी इकलौती बेटी है। बहुत पैसा जायदाद है मेरे पास, जिंदगी भर खत्म नहीं होने वाला। मुझे इतनी कमाई किसके लिए करनी है? मैं चाहता हूँ धीरज बवाना के मेरे दूसरे वाले पांच सौ गज के शेड में ही फैक्ट्री लगा ले। फिर भी अगर धीरज को बवाना में बिजनेस करवाने में तुम्हें अगर कोइ हिचकिचाहट है कि धीरज मेरे शेड में मशीनें लगा रहा है तो मैं दूसरा वाला शेड धीरज के नाम “गिफ्ट” ही कर दूंगा – धीरज के नाम ही कर दूंगा।”
“धीरज अपना काम चलाये बढ़िया सुपरवाइजर रखे और मेरी वाली फैक्ट्री का भी काम देखे। और फिर यश तुमने भी तो रिटायर होना है, तुम ही कब तक काम करते रहोगे, और क्या रिटायर होने के बाद घर बैठोगे? चलता-फिरता आदमी हमेशा फिट और ठीक रहता है? रिटायर होने के बाद फैक्ट्री आओ और धीरज की हेल्प करो, मैं भी आ जाया करूंगा। मैं और तुम बैठ फैक्ट्री में बैठ कर गप्पें हांका करेंगे।”
मौसा मनोहर बोले, “यश, मैंने कौशल्या से बात की है, उसे इसमें कोइ एतराज नहीं है।”
फिर मनोहर मौसा जी मम्मी की तरफ देखते हुए बोले, “जीजी आप बताइये आपको जमता है आईडिया?”
मम्मी बोली, “भाई एक ही परिवार का मामला है, मुझे तो इसमें कोई बुराई नहीं लगती।” फिर मम्मी पापा की तरफ इशारा करके बोली, “फिर भी इनसे पूछ लो।”
पापा ने कहा, “मनोहर अभी तो एक साल पूरा पड़ा है – पहले डिग्री पूरी होगी, फिर ट्रैनिंग होगी, फिर फैसला करेंगे।”
मौसा जी पापा से बोले, “यार यश मुझे मालूम है तुम अभी भी हिचकिचा रहे हो – अब इसमें इतना भी क्या सोचना है। और मुझे मालूम है तुमने गुड़गांव में भी डेढ़ कनाल – एक हजार गज – का इंडस्ट्रियल प्लॉट ले रखा है। मेरे भाई, उसमे भी लगाने दो धीरज को फैक्ट्री।आजकल पढ़े-लिखे मैनेजर, सुपरवाइजर मिल जाते हैं, बस अच्छी सैलरी दो और सब काम ठीक चलता है।”
खैर पाठको मेरे परिवार का ये किस्सा अभी तो मैंने वैसे ही सुना दिया, लेकिन इस किस्से का इस कहानी के साथ बाद में बड़ा ज़बरदस्त लिंक बनने वाला है।
मौसा-मौसी की एक ही बेटी है – माधवी – लगभग दिव्या की उम्र की ही या फिर छह आठ महीने छोटी। दिव्या के साथ माधवी की खूब पटरी खाती है। छुट्टियों में या तो वो हमारे यहां आ जाती है या फिर दिव्या वहां माधवी के घर चली रोहिणी जाती है।
मगर दिव्या ने दिल्ली मौसा के यहां जाना हो या माधवी ने धीरज यहां आना हो, ये लाने ले जाने वाला काम हमारा होता है। हम सब शुक्रवार को रोहिणी चले जाते है और सोमवार सुबह वापस आते है।
मम्मी पापा जब भी मौसा जी के यहां जाते हैं, दो तीन रात रुक कर ही आते हैं। मौसा के घर कमरे बहुत हैं। मम्मी पापा, मौसा-मौसी के साथ वाले कमरे में ठहरते हैं, बाकी हम लोग यानी, मैं, दिव्या, माधवी जिस भी कमरे में रुकना चाहे रुक जाते हैं। वैसे दिव्या और माधवी हमेशा एक ही कमरे में ठहरती हैं – चाहे रोहिणी वाला मौसा जी का घर हो या गुडगाँव वाला हमारा घर हो।
मौसा जी के साऊथ इंडिया के ट्रिप काफी लगते रहते हैं – वहीं उनका माल सब से ज्यादा बिकता है।
अब चलते हैं वापस गुडगाँव।
गुडगाँव के अपने इस इंजीयरिंग कालेज में में अच्छा खासा पॉपुलर हूं, लेकिन मेरे इस पॉपुलर होने का कारण बड़ा ही अजीब है।
हुआ यूं कि जब मैंने यहां एडमिशन लिया तो हॉस्टल में पहली ही रात को रैगिंग के दौरान कालेज के सीनियर स्टूडेंट नए दाखिल हुए लड़कों को पकड़ कर कालेज की कैंटीन में ले गए और एक लाइन में खड़ा करके कहा, “बच्चो, चलो अपनी अपनी पैंटें, पायजामे, कच्छे उतारो और दिखाओ तुममें से कोइ हिजड़ा तो नहीं है – सब मर्द ही हैं ना। ये कालेज या तो मर्दों के लिए है या नाज़ुक-नाज़ुक लड़कियों के लिए, हिजड़ों को इस कालेज में एडमिशन नहीं मिलती। चलो भोसड़ी वालो जल्दी उतारो अपनी अपनी पेंटें।”
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