पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-8
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
अगली सुबह मैं और साक्षी दीदी उनकी बेली पियर्सींग निकालने के लिए शहर चले गए। सुधा दीदी हमारे साथ नहीं आ सकी क्योंकि उनको कॉलेज में कुछ काम था। उस समय साक्षी दीदी के साथ अकेले कार में बैठे रहना मुझे अजीब लग रहा था। क्योंकि ज़िंदगी में पहली बार मैंने सिर्फ सुधा दीदी के साथ सेक्स किया था। उनके अलावा मुझे किसी और के पास जाने की हिम्मत भी नहीं थी। फिर भी साक्षी दीदी को खुश करने का वादा मैंने किया था।
उनका एक्स बॉयफ्रेंड उनको इतने अच्छे से चोदता था, कि साक्षी दीदी को वह एहसास दोबारा चाहिए था। और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या वाकई मैं साक्षी दीदी को उस तरह खुश कर पाऊंगा।
अगले ही पल साक्षी दीदी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ अपना हाथ मेरी जाँघ पर रख दिया। उन्होंने मेरी ओर देखा और धीरे से कहा, “तुम्हारा लंड कितना बड़ा है, गोलू?”
मैंने उनका चेहरा देखा। ऐसा लगा जैसे मैं उनके शब्दों पर यक़ीन नहीं कर पा रहा था। दिल की धड़कन तेज़ थी, पर मैंने नज़रें हटा ली और धीमी आवाज़ में कहा, “ऐसी गंदी बातें मत कहो, दीदी।”
कार में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई। बाहर सड़क पर भागती गाड़ियाँ और अंदर हमारे बीच बढ़ता हुआ तनाव — दोनों की आवाज़ें अलग-अलग थी। साक्षी दीदी ने अपना हाथ वहीं रहने दिया, जैसे किसी जवाब का इंतज़ार कर रही हों। उनकी आँखों में शरारत थी, पर आवाज़ नरम। मैंने गहरी साँस ली और स्टीयरिंग पर पकड़ कस ली।
अगले मोड़ पर उन्होंने फिर से मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा। इस बार उनकी मुस्कान में भरोसा भी था और चुनौती भी। धीमे से बोलीं, “मेरे सवाल का जवाब मत दो, गोलू… बस अपना वादा याद रखना।” यह कहते हुए उन्होंने मेरा चेहरा ध्यान से देखा, जैसे मेरी आँखों में वह वादा ढूँढ रही हों। कुछ पल बाद उनका लहजा सख़्त हो गया। बिना मुस्कान के उन्होंने साफ़ कहा, “अगर तुमने मुझे वैसे नहीं चोदा, जैसे मैं चाहती हूँ, तो मैं अपने एक्स बॉयफ्रेंड के पास वापस चली जाऊँगी।”
करीब आधे घंटे बाद कार टैटू शॉप के सामने जाकर रुकी। ब्रेक लगते ही साक्षी दीदी ने अपना हाथ मेरी जाँघ पर से उठाया। हम दोनों कार से उतरे और साथ-साथ दुकान के अंदर गए। काउंटर के पीछे खड़े मालिक को हमने बताया कि बेली पियर्सिंग हटवानी है। उन्होंने सिर हिला कर हामी भरी और अंदर की ओर इशारा किया।
हम दुकान के पीछे बने छोटे से कमरे में पहुँचे। अंदर हल्की रोशनी थी और एक सिंगल बेड रखा था। तभी टैटू आर्टिस्ट अंदर आया और काम समझते हुए बोला, “बेली पियर्सिंग हटाने के लिए आपको कुर्ती उतारनी पड़ेगी और बेड पर सीधा लेटना होगा।” उसकी बात सुन कर साक्षी दीदी ने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे बेड की ओर बढ़ गई।
उन्होंने गहरी साँस ली और कुर्ती के नीचे की गाँठ ढीली करने लगी। कपड़ा धीरे-धीरे ऊपर से सरकता हुआ उनके कंधों से फिसला और उन्होंने उसे उतार कर पास की कुर्सी पर रख दिया। कुर्ती उतरते ही उनकी गुलाबी ब्रा सामने आ गई। हल्की रोशनी में वह रंग और भी मुलायम लग रहा था। ब्रा के कप्स के नीचे उनके स्तन सधे हुए उभार की तरह दिख रहे थे, कपड़े का खिंचाव उनकी बनावट को साफ़ उभार रहा था। जब वह बेड पर लेटी, तो उनकी साँसों के साथ ब्रा हल्के-हल्के उठने-गिरने लगी। कपड़े के भीतर स्तनों की मौजूदगी साफ़ महसूस हो रही थी।
टैटू आर्टिस्ट ने दस्ताने पहने और औज़ार तैयार करने लगा। कमरे में धातू की हल्की-सी खनक गूँजी। साक्षी दीदी ने आँखें बंद कर ली, पर उनकी उँगलियाँ चादर को कस कर पकड़ रही थी। ब्रा के भीतर उनके निप्पल ठंडे कमरे की हवा से सख़्त होते जा रहे थे, कपड़े पर छोटे-छोटे उभार साफ़ दिखने लगे। मैं वहीं खड़ा सब देख रहा था— उनकी साँसों की तेज़ी, पेट का हल्का उठना-गिरना, और मेरी छाती में बढ़ती हुई गर्मी।
उसी पल मैं उनके पास गया। मैंने झुक कर उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनकी उँगलियाँ ठंडी थी और हल्का-सा काँप रही थी। मैंने धीरे से दबाव दिया, जैसे उन्हें यक़ीन दिला रहा हूँ कि वह अकेली नहीं थी। झुक कर उनके कान के पास धीमी आवाज़ में कहा, “डरो मत… मैं यहीं हूँ, तुम्हारे साथ।” मेरी आवाज़ सुन कर उनकी पकड़ थोड़ी ढीली पड़ी। उन्होंने आँखें खोलीं, एक पल के लिए मेरी तरफ देखा और बिना कुछ कहे सिर हल्का सा हिला दिया।
टैटू आर्टिस्ट ने धीरे-धीरे पियर्सिंग के आस-पास की जगह को साफ़ किया और सावधानी से उसे पकड़ लिया। एक पल के लिए साक्षी दीदी की भौंहें सिकुड़ी। जैसे ही पियर्सिंग बाहर आई, उन्हें हल्का-सा दर्द महसूस हुआ और नाभि के पास से थोड़ा-सा खून निकल आया। उन्होंने होंठ दबा लिए और गहरी साँस ली। आर्टिस्ट ने तुरंत रुई का टुकड़ा दिया और बोला कि इसे दबा कर रखें। साक्षी दीदी ने रुई को नाभि पर टिकाया और कुछ ही पलों में खून रुक गया।
काम पूरा होते ही उन्होंने राहत की साँस ली। फिर उठ कर कुर्सी से अपनी कुर्ती उठाई और पहन ली। मैंने उनके चेहरे की ओर देखा, दर्द की जगह अब सुकून था। हम दोनों कमरे से बाहर निकले, भुगतान किया और चुपचाप वापस कार की ओर बढ़े। कार में बैठते ही उन्होंने सीट बेल्ट लगाई और खिड़की से बाहर देखने लगी, मानो अभी-अभी बीता पल पीछे छोड़ रही हों।
मैंने कार स्टार्ट की और धीरे-धीरे सड़क पर निकाल दी। साक्षी दीदी मेरी बगल वाली सीट पर बैठी थी, सीट बेल्ट लगाए, नज़रें सामने टिकाए। कुछ देर तक हम दोनों चुप रहे। सिर्फ इंजन की आवाज़ और बाहर की हलचल सुनाई दे रही थी। थोड़ी दूर चलने के बाद मैंने हल्की आवाज़ में पूछा, “दीदी… क्या अब ठीक हो? दर्द तो नहीं हो रहा?”
मेरे सवाल का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ सेकंड बाद उन्होंने खिड़की से बाहर देखते हुए बात बदल दी। हल्की-सी मुस्कान उनके होंठों पर आई और बोली, “गोलू, याद है जब हम छोटे थे और खेला करते थे?” उन्होंने मेरी तरफ देखा, जैसे किसी पुरानी याद में खो गई हो। “तू हमेशा कहता था कि घर-घर खेलेंगे, और मैं हर बार तुम्हारी पत्नी का रोल निभा लेती थी।”
मैंने भी हल्की मुस्कान के साथ उनकी तरफ देखा और सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ दीदी… मुझे याद है।”
वह बात आगे बढ़ाते हुए बोली, “और याद है एक दिन सुधा दीदी ने भी मज़ाक-मज़ाक में हमारी शादी करवा दी थी।” उनकी आँखों में शरारत नहीं, सिर्फ़ मासूमियत थी। “और शादी के बाद हम दोनों ने एक-दूसरे को चूमा था, याद है?” उन्होंने हल्की हँसी हँसी।
मैंने हल्की मुस्कान के साथ स्टीयरिंग पर नज़र टिकाए रखी और कहा, “हाँ दीदी, मुझे याद है… लेकिन आज तुम ये सब मुझे क्यों याद दिला रही हो?”
उन्होंने गहरी साँस ली, थोड़ी देर खामोश रही, फिर मेरी तरफ देखा। उनकी आवाज़ अब मज़ाक में नहीं थी। वो बोली, “क्योंकि गोलू… मुझे तुम हमेशा से अच्छे लगते हो।”
उन्होंने नज़रें फिर से सामने सड़क पर टिका दीं। “जब हम बड़े हुए, तो वो एहसास और साफ़ हो गया। मैं खुद को रोक नहीं पाई, इसलिए ही मैंने तुम्हारे घर आना कम कर दिया… ताकि अपने दिल को संभाल सकूँ।”
मैं कुछ कहना चाहता था। शब्द दिमाग़ में थे, मगर ज़ुबान तक आते-आते बिखर जाते। मैंने बस गाड़ी चलाते रहना चुना। सड़क लंबी लग रही थी, और मेरे भीतर की उलझन उससे भी लंबी।
तभी उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। उनकी उँगलियों की गर्माहट ने मुझे चौकन्ना कर दिया। बिना मेरी तरफ देखे, शांत लेकिन साफ़ आवाज़ में बोली, “गोलू, मैं अपने एक्स बॉयफ्रेंड के पास वापस नहीं जाना चाहती। मैं यहाँ, तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ।” मैंने उनकी तरफ देखा, उनकी आँखों में डर नहीं था, बस भरोसा और एक साफ़ सी चाह। उन्होंने आगे कहा, “मुझे बस इतना चाहिए तुम मुझे जोर से चोद कर मुझे खुश कर दो।”
कुछ दूर आगे बढ़ते ही सड़क अचानक खाली लगने लगी। दोनों तरफ़ सिर्फ़ पेड़ों की कतारें थी और बीच में लंबी, शांत सड़क। दीदी ने चारों ओर नज़र घुमाई, फिर हल्की-सी आवाज़ में बोली, “गोलू… क्या तुम गाड़ी कुछ मिनट के लिए रोक सकते हो?”
मैंने गाड़ी किनारे लगा दी। इंजन बंद करते ही खामोशी और गहरी हो गई। मैंने उनकी तरफ देखा और पूछा, “क्या हुआ, दीदी?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बस थोड़ा और पास सरक आई। उनकी नज़रें मेरी आँखों पर टिक गई और फिर उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे जांघ पर रख दिया, मेरे लंड के बिल्कुल पास। उस हल्के से स्पर्श में भी बहुत कुछ कहा जा रहा था। मेरी साँसें रुक-सी गई, और उस पल में शब्दों की ज़रूरत ही नहीं लगी।
थोड़ी देर बाद उन्होंने बेहद धीमी आवाज़ में कहा, “गोलू… आज रात से पहले मैं तुम्हारे लंड को ठिक से जानना चाहती हूं।”
मैं समझ पाता, उससे पहले ही वह और करीब आ गई। उनके होंठ मेरे होंठों से छुए— पहले बस हल्का-सा स्पर्श, जैसे परख रही हों कि मैं पीछे तो नहीं हटूँगा। फिर उन्होंने मेरे निचले होंठ को हल्के से दाँतों में लिया। मैंने जवाब में अपने होंठ उनके होंठों पर रख दिए। हमारे होंठ एक-दूसरे को महसूस कर रहे थे, जैसे बरसों की बातें बिना शब्दों के कही जा रही हों। उनकी साँस मेरी साँस से मिल रही थी, और हर पल के साथ वह चूमना थोड़ा और गहरा होता जा रहा था।
होंठों की वही नज़दीकी बनी रही। उसी पल उन्होंने मेरी कमर की ओर हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ बटन पर रुकी, जैसे आख़िरी इजाज़त माँग रही हों, फिर बिना रुके उन्होंने पैंट का बटन खोल दिया। हल्के-हल्के खींचते हुए पैंट मेरे घुटनों तक सरक गई। उसी बहाने उनकी उँगलियाँ मेरी त्वचा को छूती चली गई। उन्होंने नीचे झुक कर, होंठों की वही गर्माहट बनाए रखते हुए, अंडरवियर भी साथ-साथ नीचे कर दिया। मेरी साँसें तेज़ हो गई, और मैं सीट के सहारे खुद को थामे रहा।
जिंदगी में पहली बार साक्षी दीदी मेरे खुले लंड को देख रही थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए पहले मेरा चेहरा देखा और बाद में लंड की तरफ देखने लगी, मानो वह कोई खजाना हो। मुझे थोड़ी-सी शर्म आ रही थी क्योंकि सुधा दीदी के अलावा पहली बार मुझे कोई दूसरा इंसान इस तरह देख रहा था। वह हल्की-सी मुस्कान के साथ मेरी ओर झुकी। आँखों में झिझक थी, लेकिन आवाज़ में भरोसा, “क्या मैं इसे छू सकती हूँ, गोलू?”
मैंने उनकी ओर देखा। दिल ज़ोर से धड़क रहा था, फिर भी आवाज़ साफ़ निकली—“हाँ, दीदी… छू सकती हो।”
इसके बाद उन्होंने मुझे एक हल्की-सी मुस्कान दी और मेरा लंड अपने हाथ में ले लिया। यह पहली बार था जब साक्षी दीदी ने इस तरह मेरा लंड पकड़ा था। उनकी पकड़ ना ढीली थी, ना ज़्यादा कसी हुई, बस इतनी कि मुझे साफ़ महसूस हो। उनकी उँगलियाँ मेरे लंड पर धीरे-धीरे चलने लगी, हल्के-हल्के हाथ फेरते हुए। हर बार उँगलियाँ उपर से नीचे गुजरती तो उनकी हथेली की नरमी और उँगलियों की गर्माहट साफ़ महसूस होती।
फिर उन्होंने मेरे लंड को अपने पास खींचा और वहाँ अपने होंठ लगाए। पहले एक बार, फिर थोड़ी देर बाद दोबारा। कोई जल्दी नहीं थी। उस एहसास से मेरे शरीर में हलचल हुई। लंड पर उनके होंठ लगते ही दिल की धड़कन और तेज़ हो गई, और मैं बस उन्हें देखता रह गया, हिल भी नहीं पाया।
उन्होंने अपना चेहरा थोड़ा ऊपर किया और मेरी तरफ देखा। आँखों में वही हल्की-सी मुस्कान थी। फिर बिना कुछ कहे उन्होंने फिर से होंठ लगाए, इस बार थोड़ा ज़्यादा देर तक। उनके होंठों की नमी और गर्म साँस साफ़ महसूस हो रही थी। मैं कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला सूख गया था।
उनके बाल बार-बार उनके चेहरे के सामने आ रहे थे जब भी वह नीचे झुक कर अपने होंठ मेरे लंड पर रखती। इसलिए मैंने अपने दोनों हाथों से उन्हें पीछे से अपने हाथों में पकड़ लिया। मैंने महसूस किया कि साक्षी दीदी के होंठों पर मुस्कान फैल गई है। मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही उन्होंने मेरा लंड अपने मुंह के अंदर भर लिया। पहले मुझे नोक पर उनके होंठों का छूना महसूस हुआ, और वह लगातार अपने मुंह के अंदर मेरे लंड को धीरे-धीरे लेने लगी।
अगले ही पल, मेरे मुँह से अपने आप निकल गया, “धीरे, साक्षी दीदी…” मेरी आवाज़ काँप रही थी। लेकिन उन्होंने मेरे शब्दों पर ध्यान नहीं दिया। उनके मुंह की पकड़ और पक्की हो गई, और सिर की हरकत में वही रुकावट-हीन लय बनी रही। मैंने फिर से कहना चाहा, पर आवाज़ गले में ही अटक गई। वह मेरी बात सुने बिना अपने ही अंदाज़ में आगे बढ़ती रहीं, जैसे उन्हें पता हो कि मैं क्या चाहता हूँ, भले ही शब्द कुछ और कह रहे हों।
मेरे शब्द सुनते ही उनके चेहरे पर बड़ी-सी मुस्कान फैल गई। इसके बाद उन्होंने फिर से मेरा लंड अपने मुंह में लिया। इस बार उनका सिर पहले से ज़्यादा साफ़ तरीके से ऊपर-नीचे हो रहा था। ऊपर आते समय वह एक पल रुकती, जैसे साँस ले रही हो, और फिर सीधे नीचे की तरफ जाती। कभी वह थोड़ा धीरे करती, कभी अचानक तेज़ कर देती, लेकिन उनका तरीका एक जैसा बना रहा। उनके होंठ हर बार ऊपर से नीचे जाते हुए मुझे साफ़ महसूस हो रहे थे।
गर्दन की हरकत साफ़ दिख रही थी और उसी के साथ मेरे शरीर में होने वाला असर भी बढ़ रहा था। उनके मुंह की गर्माहट चारों तरफ़ महसूस हो रही थी, और मैं वहीं बैठा, बिना कुछ बोले, सब कुछ झेल और महसूस कर रहा था।
अब मेरे बदन शरीर में तनाव साफ़ बढ़ चुका था। साँसें खुद-ब-खुद भारी हो गई। पेट के अंदर एक अजीब-सी खिंचाव थी, जिसे रोक पाना मुश्किल हो रहा था। मैंने उनकी तरफ झुकते हुए, टूटती आवाज़ में कहा “मैं… मैं आ रहा हूँ, साक्षी दीदी।”
उन्होंने पल भर के लिए अपना चेहरा ऊपर किया। आँखें मेरी आँखों से मिली, और होंठों पर वही भरोसे वाली मुस्कान थी। बहुत शांत आवाज़ में उन्होंने कहा, “मेरे मुंह के अंदर ही कर दो गोलू… ”
दीदी ने अपना मुंह झटकों के साथ दो बार ऊपर-नीचे किया और उसी पल मैं उनके मुंह के अंदर ही फट पड़ा। गरम पानी की धार अंदर फैल गई, पहले एक तेज़ झटका, फिर लगातार आती हुई गर्मी। उनका गला रुक-रुक कर हिलता रहा, जैसे वह सब संभाल रही हों। होंठ कस कर बंद थे, फिर भी किनारे पर गर्म नमी जमा होने लगी। कुछ बूंदें होंठों के कोने से निकल कर नीचे की तरफ़ फिसल गई। बूंदें भारी नहीं थी पतली, चमकती हुई, जो ठोड़ी तक आते-आते टूट गई।
उनके मुंह की गर्मी बाहर तक महसूस हो रही थी, और हर गिरती बूंद के साथ मेरे शरीर में वही खिंचाव धीरे-धीरे ढीला पड़ता गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपनी उँगलियों से होंठ पोंछे, ठोड़ी के पास हल्का-सा निशान साफ़ किया और मेरी तरफ देख कर धीमे से कहा, “पसंद आया?”
मैंने एक पल रुक कर उनकी तरफ देखा। दिल की धड़कन अब भी तेज़ थी। फिर बिना ज़्यादा सोचे, सच्ची आवाज़ में बोल पड़ा, “तुम्हारे होंठ बहुत अच्छे हैं, साक्षी दीदी।”
कुछ पल की ख़ामोशी रही। मैंने जल्दी से अपनी पैंट ठीक की, शर्ट सीधी की और गहरी साँस ली, जैसे खुद को नॉर्मल दिखाना चाहता हूँ। साक्षी दीदी भी चुप-चाप बैठी रहीं, नज़रें नीचे थी। उनके गाल हल्के-से लाल थे, जैसे अभी भी वो पल उनके अंदर घूम रहा हो।
मैंने ड्राइविंग सीट संभाली, इंजन स्टार्ट किया। कार चल पड़ी। सड़क की हल्की आवाज़ और इंजन की गुनगुनाहट के बीच उनकी चुप्पी साफ़ महसूस हो रही थी। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा, फिर एक पल के लिए मेरी तरफ। चेहरे पर वही हल्की झिझक थी, होंठ बंद, और गाल अब भी थोड़े लाल।
कुछ देर की इस ख़ामोशी के बाद, उन्होंने हल्का सा गला साफ़ किया। उनकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन शब्द बिल्कुल साफ़, “आज रात… मैं तुम्हारे कमरे में आऊँगी।”
मैंने गाड़ी की रफ़्तार संभालते हुए उनकी तरफ देखा। उन्होंने नज़रें मेरी आँखों से मिलाई, फिर तुरंत आगे सड़क की तरफ देख लिया। गाल और ज़्यादा लाल हो गए थे। उन्होंने बिना मेरी तरफ देखे, लगभग फुसफुसाते हुए आगे कहा, “तैयार रहना… मुझे खुश करने के लिए।”
मैंने हल्की मुस्कान दबाई, स्टीयरिंग पर पकड़ थोड़ी कस ली और उसी शांत आवाज़ में जवाब दिया, “हाँ, दीदी… जैसे आप चाहें, मैं आपको खुश करूँगा।”
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