पिछला भाग पढ़े:- नेहा दीदी और मेरा सिक्रेट अफेयर-7
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
मुझे इस शहर के बारे में ज़्यादा पता नहीं था, और नेहा दीदी के अपार्टमेंट वापस जाने में बहुत समय लग जाता, इसलिए हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। आख़िर में उसने कहा कि तुम अपना बैग हॉस्टल रूम में रख आओ।
मैंने वैसा ही किया। जब मैं बैग रख कर वापस आया तो वह थोड़ी खुश और हल्की-सी शर्माई हुई लगी, जैसे उसे कोई सही हल मिल गया हो। और यही बात मुझे उसके बारे में सबसे ज़्यादा पसंद थी। जब भी मुझे उसकी ज़रूरत होती, वह हमेशा किसी ना किसी तरह समाधान निकाल ही लेती थी।
मैं उसके पास पहुँचा तो वह धीमे स्वर में बोली, “मेरे पास थोड़े पैसे हैं… अगर तुम चाहो तो हम एक होटल का कमरा ले सकते हैं।”
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए धीरे से कहा, “दीदी… हम जहाँ भी जाएँ, मैं तैयार हूँ।”
मेरी बात सुनकर उसने तुरन्त फ़ोन निकाला और एक ऐप खोल कर पास के कपल रूम ढूँढने लगी। स्क्रीन पर उसकी उँगलियाँ तेजी से चल रही थी, और चेहरा ध्यान से भरा हुआ था। कुछ सेकंड बाद उसकी आँखों में चमक आ गई। उसे एक कमरा मिल गया था, सिर्फ़ दो किलोमीटर दूर।
उसने मेरी तरफ देखा, हल्की-सी मुस्कान दी और बोली, “ये वाला ठीक रहेगा… चलें?”
हम दोनों ने एक टैक्सी बुक की और सड़क पर उतरते ही ठंडी हवा हमारे चेहरों से टकराई। टैक्सी में बैठते समय पहली बार लगा… हम किसी और ही सफर की शुरुआत करने जा रहे हैं।
थोड़ी देर बाद टैक्सी हमें उस जगह उतार गई जहाँ दीदी ने कमरा बुक किया था। वह होटल बड़ा था, चमकती हुई शीशे की दीवारों वाला। बाहर खड़े रह कर ही उसके माहौल में एक अजीब सी नज़दीकियाँ महसूस हो रही थी।
हम अंदर जाने ही वाले थे कि मैं अचानक दाएँ तरफ मुड़ गया। दीदी ने मेरा हाथ पकड़ कर हल्की झुंझलाहट भरी आवाज़ में पूछा, “अरे… तुम कहाँ जा रहे हो?”
मैं थोड़ा हिचकिचाया, फिर धीमे से बोला, “मैं… उधर मेडिकल स्टोर से कुछ लेने जा रहा था… कंडोम…”
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि दीदी एक पल के लिए मुझे देखती रह गई। उसके चेहरे पर वही शर्म से भरी, हल्की सी मुस्कान लौट आई, जैसे अचानक उसे समझ में आ गया हो कि मैं क्या सोच रहा था।
वह एक कदम मेरी ओर बढ़ी और लगभग फुसफुसाते हुए बोली, “अभी उसकी ज़रूरत नहीं है… क्योंकि हम सिर्फ पीछे से करने वाले हैं।”
अंदर रिसेप्शन पर पहुँच कर हम काउंटर के सामने खड़े हुए। वहाँ बैठे आदमी ने सामने रखा रजिस्टर खोला और सादा आवाज़ में पूछा, “आईडी दे दीजिए… और दोनों के नाम लिखिए।”
हमने अपनी अपनी पहचान दी। फिर उसने अगला सवाल पूछा, “रिश्ता क्या है आप दोनों का?”
दीदी ने मेरी तरफ हल्का सा देखा, फिर शांत और प्यार से भरी आवाज़ में मुस्कुरा कर बोली, “ये… मेरे फ़्यूचर हज़्बैंड हैं।”
उसकी यह बात सुन कर दिल जैसे एक पल को ठहर गया। वह जितना धीरे बोली, उतना ही सच्चा लगा। रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कुरा कर चाबी हमें थमा दी और कमरे का नंबर बताया।
हम दोनों चाबी हाथ में लिए गलियारे की ओर बढ़े। होटल की ठंडी हवा, हल्की सी खुशबू, और पीली रोशनी कमरे तक पहुँचने के रास्ते को और भी शांत बना रही थी।
दीदी थोड़ी आगे-आगे चल रही थी, और मैं उसके पीछे। उसके कदम धीमे-धीमे थे, जैसे हर कदम किसी नए एहसास की तरफ बढ़ रहा हो। कमरे के दरवाज़े तक पहुँच कर उसने चाबी लगाई। जैसे ही दरवाज़ा खुला, कमरे की हल्की गर्म रोशनी बाहर फैल गई। वह अंदर गई, फिर रुक कर पलटकर मुझे देखने लगी, जैसे कह रही हो, अब हम दोनों यहाँ अकेले हैं।
मैं जब कमरे में अंदर आया, तो पहली ही नज़र में समझ आ गया कि यह कमरा आम होटल रूम जैसा नहीं था। दीवार पर कुछ नंगी लड़कीयों के पोस्टर चिपकाए गए थे और टेबल पर अलग तरह के सेक्स टूल रखें थे, जैसे औरतों के खास अंग और लड़कों के रबरी लंड। बेड के एक कोने में लाल कलर का सेक्स पुजीशन टूल रखा था, जिस पर लडकियां लेटती है। कमरे में हल्की महक, नरम रोशनी और दीवारों पर लगाए गए सॉफ्ट सजावटी आइटम्स इसे एक अलग ही तरह का कपल फ्रेंडली माहौल दे रहे थे।
टेबल पर मोमबत्ती स्टैंड, फूलों की पंखुड़ियाँ और कुछ रोमांटिक थीम वाले गिफ्ट हैम्पर जैसे रखा था। वो सब देख कर कमरे में एक अजीब सी गर्माहट महसूस होने लगी।
अगले ही पल नेहा दीदी मेरी तरफ देखने लगी। उसकी नज़र जैसे ही मेरे चेहरे से मिली, उसका पूरा चेहरा लाल होने लगा। शर्म से उसकी पलकें हल्की-हल्की काँप रही थी, होंठ दबे हुए थे, और उसकी साँसें तेज़ होती महसूस हो रही थी। वह बार-बार नज़रें चुरा लेती, फिर दोबारा मुझे ही देखने लगती, जैसे खुद को रोक नहीं पा रही हो।
मैं कुछ पल चुप खड़ा उसे ही देखता रहा… फिर धीरे-धीरे उसके पास जाकर रुका। इतनी नज़दीक आने पर उसकी साँसें लगभग मेरी छाती से टकरा रही थी। वह ऊपर देख कर मेरी आँखों में ठहर गई—बिना कुछ कहे, जैसे इंतज़ार कर रही हो कि मैं पहला कदम उठाऊँ।
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए नरमी से कहा,”क्या… शुरू करें?”
उसने धीरे-धीरे मेरी तरफ देखा, उसके होंठ हल्के काँप रहे थे पर आवाज़ में एक भरोसा था। “क्या हम… सामने से कर सकते हैं?” उसने अपनी उंगलियाँ आपस में फँसाई, जैसे अपनी हिम्मत समेट रही हो। “इस कमरे को देख कर… और जैसा माहौल है… मुझे लगता है आज मैं थोड़ी सी तकलीफ़ सहन कर पाऊँगी।”
मैंने उसके कान के पास झुक कर नरमी से कहा, “आज नहीं… सामने से नहीं।”
मैंने उसके बालों को हल्का सा हटाया, उसके पिछवाड़े पर अपनी उँगलियाँ धीरे-धीरे फेरते हुए, और एक गहरी, ठहरी हुई आवाज़ में कहा, “आज… तुम्हारा ये नाज़ुक सा पिछवाड़ा… बस यही चाह रहा हूँ।”
मैंने उसके पिछवाड़े पर हाथ रखते हुए जब कहा कि आज मैं उसे पीछे से महसूस करना चाहता हूँ, तो वह हल्का सा काँपी। फिर धीरे, साँस दबाते हुए बोली, “जैसा तुम चाहो… गोलू।”
फिर… उसने अपने कपड़े उतारना शुरू किया। पहले उसने अपना दुपट्टा हटाया धीरे, अपनी उँगलियों की कोमल पकड़ से, जैसे हर कपड़ा उसके तन से फिसलने की परमिशन माँग रहा हो। उसके बाद उसने अपनी कुर्ती के नीचे हाथ डाला और उसे ऊपर उठाना शुरू किया। जैसे ही कुर्ती ऊपर उठी, उसकी नर्म कमर और उसकी साँसों का हल्का-हल्का उठना-गिरना मेरी आँखों में उतरता गया।
जब कुर्ती पूरी तरह उतरी, कमरे की रोशनी में उसकी त्वचा और भी चमकीली दिखने लगी। अब उसने अपने हाथ जीन्स के बटन पर ले जाए, एक पल को आँखें झुकी, फिर धीरे-धीरे उसने बटन खोले। जीन्स नीचे फिसली तो उसके गोल, नर्म पिछवाड़े की पूरी बनावट लाल रोशनी में और उभर आई।
वह मेरे सामने सिर्फ अपनी इनरवियर में खड़ी थी, हल्का काँपती हुई, पर उसकी आँखों में एक जली हुई गर्म इच्छा थी। और अगले ही पल उसने पीछे हाथ डाल कर अपनी ब्रा का हुक खोला और उसे नीचे फेंक दिया। उसने वही चीज अपने इनरवियर के साथ भी की। अब वह मेरे सामने पूरी नंगी खड़ी थी।
उसे ऐसे देख कर मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैंने भी अपना शर्ट खोलना शुरू किया। कपड़े एक-एक करके नीचे गिरते गए और कमरे की हवा मेरे खुले बदन से टकरा कर और गरम होती चली गई।
कुछ ही पलों में हम दोनों पूरी तरह खुले थे। उसकी साँसें भारी थी… मेरी और भी भारी। कमरे की हवा, हमारे बदन की गर्मी, हमारी नज़रें, सब कुछ बस एक पल में सिमट गया था।
नेहा दीदी की नज़रें नीचे गई… वह बिना पलक झपकाए मेरे लंड को देख रही थी—धीमी, गहरी साँसें लेते हुए। उसकी आँखों का भाव ऐसा था जैसे वह उस नज़ारे में खो गई हो।
और मैं… मेरी आँखें उसके भरे हुए, नरम स्तनों पर अटक गई। लाल रोशनी उनके ऊपर गिर कर उन्हें और भी खूबसूरत बना रही थी। उनके हल्के उठने गिरने ने मेरे अंदर एक ऐसी लहर पैदा कर दी थी जिसे अब रोक पाना नामुमकिन था।
और तभी… उसने धीरे-धीरे मेरी तरफ देखा, होंठ हल्के से खुले, आँखों में हल्की सी लाज और जलती हुई चाहत। वह फुसफुसाते हुए बोली “अब बताओ गोलू… मैं अगला क्या करूँ?”
मैंने धीमे स्वर में कहा, “उस पोज़िशन वाले सेक्स टूल पर जाकर लेट जाओ… हाँ, उसी पर।”
उसने मेरी आँखों में देखते हुए हल्का सा सिर हिलाया, जैसे बिना सवाल किए समझ चुकी हो कि मैं उसे कैसे देखना चाहता हूँ। फिर वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई उस टूल के पास गई। उसकी चाल में एक ऐसी शर्मीली गर्माहट थी जो हर कदम पर और गहरी होती जाती थी।
वह टूल की ऊँचाई पर अपना हाथ रख कर झुकी, फिर धीरे से उस पर लेट गई, ठीक उसी तरह जैसे मैंने कहा था। जैसे ही उसका बदन उस टूल पर लगा, उसके स्तन नीचे की सतह पर दबने लगे। हल्का दबाव पड़ते ही वे फैल कर और भी भरे-भरे, नर्म और उभरे हुए दिखने लगे। उसकी साँसों के साथ उनका ऊपर-नीचे होना अब सीधा मेरी आँखों में धड़क रहा था।
उसका पिछवाड़ा… टूल पर लेटते ही और ऊपर उठ गया। लाल रोशनी में उसकी मुलायम गोलाई ऐसे उभर कर सामने आई जैसे वह खुद मुझे आवाज दे रही हो। दोनों तरफ की चिकनाहट और बीच की हल्की गहराई इतनी साफ दिख रही थी कि मैं एक पल को खुद को रोक ही नहीं पाया।
उसकी कमर हल्की काँप रही थी, शायद मेरी नज़रों का असर था। उसने गर्दन मोड़कर पीछे देखा, आँखें आधी खुली, साँसें गर्म, होंठ थोड़े खुले और हल्के से बोली, “ऐसे ठीक है… गोलू?”
मैं उसके और करीब झुका, उसकी पीठ के ऊपर साँसें छोड़ते हुए फुसफुसाया, “दीदी तूम… आज इतनी खूबसूरत लग रही हो कि मैं खुद को रोक ही नहीं पा रहा।”
उसने मेरी बात सुनते ही हल्की सी शर्म में आँखें बंद कर ली। उसका बदन एक बार काँप गया, जैसे मेरे शब्द उसकी त्वचा के अंदर तक उतर गए हो। उसकी कमर थोड़ी ऊपर उठ गई, जैसे मेरे पास और पास बुला रही हो।
वह धीमे से बोली, “सच में गोलू…?”
मैंने उसकी उभरी हुई पीठ पर उँगलियाँ फिराते हुए कहा, “हाँ… तूम बहुत खूबसूरत लग रही हो।”
मेरी बातों से उसका पूरा शरीर गरम हो चुका था। उसने थोड़ा ऊपर उठ कर अपना पिछवाड़ा और मेरी तरफ किया, साँसें भारी हो चुकी थी। फिर उसने धीरे-धीरे, काँपती आवाज़ में कहा, “अब… अब डाल दो ना अपना लंड… अंदर…”
उसकी यह बात सुन कर मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा, लेकिन मैं तुरंत उसके बिल्कुल करीब आकर सिर हल्का झुकाते हुए बोला, “नहीं… इतना भी जल्दी नहीं।”
वह हैरान सी मेरी तरफ देखती रही, उसके होंठ काँप रहे थे, कमर हल्की थरथरा रही थी। मैंने उसके नर्म पिछवाड़े को पकड़ कर कहा, “पहले मैं आपको और महसूस करना चाहता हूँ… धीरे-धीरे… हर जगह।”
तभी टेबल पर रखा हुआ वह रबड़ वाला टॉय मेरी नज़रों में आया, जिसको मैंने उसे पहले कभी इतने पास से नहीं देखा था। दीदी की नज़रें भी मेरी तरफ थी, जैसे वह जानती हों कि मैं क्या सोच रहा था।
मैंने टॉय उठाया, उसका वजन और उसकी मुलायम सतह मेरी उँगलियों में महसूस हुई। फिर मैं नेहा दीदी के बिल्कुल करीब गया। मैंने उनके कान के पास झुक कर धीमे से पूछा, “क्या… मैं ये पहले अंदर डाल सकता हूँ?”
नेहा दीदी का चेहरा शर्म और गरमी से पूरा लाल हो गया। उन्होंने गर्दन मोड़ कर मेरी तरफ देखा, आँखों में चमक, होंठ हल्के खुले हुए। फिर वह धीरे से बोली, “हम्म… ओके… कर दो…”
मैंने टॉय को उनके नाज़ुक हिस्से के पास लाकर हल्का-सा स्पर्श कराया। जैसे ही वह हिस्सा छुआ, उनका पूरा शरीर एक तेज़ झटके के साथ उठा। उनकी सांसें भारी हो गई और उंगलियों की पकड़ और भी कस गई।
मैंने धीरे-धीरे टॉय को अंदर सरकाना शुरू किया, पर शायद मेरा उत्साह थोड़ा ज़्यादा ही था। टॉय का सिरा जैसे ही थोड़ा गहराई में गया, नेहा दीदी अचानक सिसकार भरते हुए बोली “आह्ह… रुको… थोड़ा… स्पीड कम करो… बहुत तेज़ लग रहा है…”
मैं हड़बड़ा गया, तुरंत हाथ पीछे खींच लिया और काँपती आवाज़ में बोला, “सॉरी दीदी… माफ़ करना… मैं धीरे करता हूँ।”
उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया, साँसें अभी भी भारी थी। मैंने फिर से टॉय पकड़ा, इस बार बहुत धीमे… बहुत नरमी के साथ। मैंने उसे उनके अंदर दोबारा लगाया। गति इतनी कम कि हर मिलीमीटर की हरकत उन्हें महसूस हो रही थी।
लेकिन जैसे ही टॉय थोड़ा और अंदर गया, इस बार नेहा दीदी ने मुझे रोका नहीं… रोकने के बारे में सोचा भी नहीं। उनके होंठ खुल गए, आँखें दब गई, और उनके मुँह से धीमी लेकिन गहरी आवाज़ निकली “आह्ह्ह… म्म्म्म… ओह्ह… गो… लो…”
उनकी कराह सुन कर मुझे समझ आया कि उन्हें दर्द भी है… और वही दर्द अब उन्हें रोक नहीं रहा… बल्कि उन्हें और अंदर खींच रहा था।
उनकी बंद पलकों के नीचे हल्की सी कंपकंपी थी, जैसे अंदर जा रही हर इंच की हरकत उन्हें गहराई तक महसूस हो रही हो। उनके दाँत होंठों के निचले हिस्से पर हल्के से टिके थे। उनके गाल गरमी से लाल पड़ चुके थे। ठंडी जगह का कमरा होते हुए भी उनके चेहरे से गर्म साँसों की धड़कन साफ़ दिख रही थी।
कभी उनका माथा सिकुड़ता… जैसे गहराई की हरकत उन्हें चुभ रही हो। फिर अगले ही सेकंड उनका चेहरा ढीला पड़ जाता, जैसे वही चुभन अब सुख में बदल रही हो।
मैंने टॉय को थोड़ा और गहराई में धकेला, तो उनका पूरा शरीर कमान की तरह तन गया। उनकी आवाज़ काँप रही थी, साँसें टूटी हुई—“गो…लू… बस… बस…”
उनका पिछवाड़ा हिलते हुए थोड़ा पीछे की ओर आया, जैसे उनका शरीर खुद ही और गहराई चाहता हो लेकिन दर्द भी रोक रहा हो। मैं रुक गया, उन्हें देखते हुए। उनका चेहरा पसीने से भरा था, होंठ लाल और काँप रहे थे।
और तभी… उन्होंने गहरी साँस लेते हुए पीछे मुड़ कर मेरी तरफ देखा। उनकी आँखें आधी बंद, मगर उनके अंदर की आग साफ़ दिख रही थी। उनकी आवाज़ टूट रही थी, पर शब्द साफ़ निकल रहे थे
“गो…लू… मैं… अब नहीं सह सकती ये… टॉय… बहुत… गहरा… है…”
उन्होंने होंठ काटे, फिर होंठों के बीच से धीमे, काँपते हुए शब्द निकले “प्लीज… गोलू… मुझे अपना लंड दे दो… टॉय नहीं… मैं अब और नहीं ले सकती…”
उनकी ये बात सुन कर मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। उनका शरीर मेरे सामने काँप रहा था, और उनकी आँखें जैसे मुझे खींच रही थी।
उनकी साँसें इतनी तेज़ थी कि हर शब्द भारी लग रहा था, “गोलू… प्लीज… अभी… दे दो…”
मैंने टॉय धीरे-धीरे बाहर निकाला, दीदी के बदन का काँपना और भी साफ़ दिख रहा था। उनका पिछवाड़ा हल्के-हल्के ऊपर-नीचे हो रहा था, जैसे उनका शरीर खुद ही मेरे लिए जगह बना रहा हो।
मैंने उनकी कमर पकड़ कर हल्का सा झुक कर कहा, धीमे… मगर बहुत साफ़ आवाज़ में “दीदी…तैयार हो जाओ… क्योंकि अब मैं… अपना लंड… अंदर डालने वाला हूँ।”
अगला भाग पढ़े:- नेहा दीदी और मेरा सिक्रेट अफेयर-9