यह कहानी उन दिनों की है, जब पापा झारखंड के एक सुदूर कस्बे में तैनात थे। यह बात 90 के दशक की है। वह कस्बा आज के मुकाबले बहुत कम विकसित था। सुख-सुविधाएं सीमित थीं और विकास की रफ्तार अभी धीमी थी। हमें रहने के लिए सरकारी आवास मिला हुआ था। कहने को तो वहां बिजली थी, लेकिन उसका व्यवहार किसी मेहमान जैसा था, जो अपनी मर्जी से आती और बिना बताए घंटों के लिए चली जाती थी।
हमारा वह सरकारी क्वार्टर अच्छी स्थिति में था। उसकी दीवारें और आंगन हमारे बचपन की शरारतों और पापा-मम्मी के अनुशासन के गवाह थे। उस दौर की सादगी और सीमित संसाधनों में भी एक अलग ही सुकून था, जो आज के शोर-शराबे वाले शहरों में कम ही देखने को मिलता है।
चूंकि वह कस्बा ज्यादा विकसित नहीं था और बिजली की आंख-मिचौली चलती रहती थी। इसलिए हमारा सामाजिक जीवन बहुत गहरा था। हमारे आस-पास अन्य प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के परिवार भी रहा करते थे। वह माहौल किसी मोहल्ले जैसा नहीं, बल्कि एक बड़े संयुक्त परिवार जैसा था। एक-दूसरे के सुख-दुख और बच्चों की शरारतों में पूरा पड़ोस शामिल रहता था।
बिजली की कमी ने हमारे जीवन को एक अनुशासित और प्राकृतिक लय दे दी थी। मनोरंजन के साधन सीमित थे, इसलिए शाम ढलते ही सारा काम निपटा लिया जाता था। हम लोग जल्दी रात का खाना खा लेते और फिर गहरी नींद में सो जाया करते थे। लालटेन की मद्धम रोशनी और आंगन में होने वाली गपशप ही उस दौर का असली सुकून था। पापा के प्रिंसिपल होने के बावजूद, हमारे घर में सादगी और अनुशासन का मेल था।
उन दिनों मौसम के मिजाज के हिसाब से हमारा बिस्तर बदल जाया करता था। सर्दियों और सामान्य दिनों में हम कमरों के भीतर रहते, लेकिन गर्मियों की तपिश में आंगन ही हमारा रैनबसेरा होता था। हम तीनों भाई-बहन चाहे स्कूल और कॉलेज में थे, लेकिन पापा-मम्मी के कमरे में ही सोया करते थे। कमरे में दो पलंग लगे थे, एक पर पापा-मम्मी और दूसरे पर हम तीनों।
गर्मी के उन दिनों की एक बात मुझे आज भी अच्छी तरह याद है। हम सब आंगन में गहरी और मीठी नींद में सो रहे थे। अचानक प्रकृति का मिजाज बदला और तेज आंधी के साथ बारिश की बूंदें गिरने लगीं। वह ‘कच्ची नींद’ का आलम था; धूल भरी हवाओं और बारिश की बौछारों ने हमें हड़बड़ा कर जगा दिया।
चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। हम सब अपनी नींद आंखों में भरे, आधे होश और आधे जोश में अपना-अपना बिस्तर समेट कर कमरे की ओर भागे। उस अंधेरे और शोर के बीच कमरे की छत के नीचे पहुंचना किसी सुरक्षित किले में शरण लेने जैसा महसूस हो रहा था।
बाहर आंधी और बारिश का शोर था, तो अंदर सन्नाटा। बिजली तो जैसे बहाना पाकर पहले ही भाग गई थी। मम्मी ने फुर्ती दिखाई और मच्छरदानी लगा कर हम तीनों को बिस्तर पर लिटा दिया ताकि मच्छरों और कीड़ों से बचे रहें। मेरी छोटी बहन राजकुमारी तो थकी हुई थी, इसलिए वह गहरी और बेसुध नींद में सो गई। लेकिन मुझे और रानी को नींद कोसों दूर थी। हम दोनों चुप-चाप आँखें बंद किए शांत लेटे थे, जैसे सो रहे हों, पर हमारे कान बाहर की बारिश और कमरे की हर आहट पर लगे थे।
मम्मी भी सारा काम समेट कर पापा के पास पलंग पर सोने चली गईं। थकान और दिन भर की भाग-दौड़ के बाद पापा ने मम्मी से पैरों में मालिश करने को कहा। उस घुप अंधेरे में मम्मी थोड़ा हिचकिचाई और धीरे से बोली, “अरे, इतनी आंधी-बारिश और अंधेरे में अब तेल की कटोरी कहाँ से खोजूँ?”
तभी पापा ने तकिए के पास रखी अपनी टॉर्च जलाई। उसकी पीली रोशनी ने कमरे के एक कोने को रोशन कर दिया। पापा ने खुद तेल की कटोरी खोज कर मम्मी के हाथ में थमा दी। फिर उस शांत अंधेरी रात में, पापा के पैरों की मालिश करने लगी। कमरे में सिर्फ बारिश की टप-टप और मालिश की हल्की आवाज़ गूँज रही थी।
उस अंधेरे कमरे में, मम्मी पापा के पैरों की मालिश कर रही थी। पापा उस समय पाजामा पहने हुए थे। मालिश करते हुए मम्मी को शायद थोड़ी असुविधा हो रही थी, तो उन्होंने धीरे से कहा, “तेल लगाने में परेशानी हो रही है, इसे खोल दीजिए।”
पापा ने सहजता से उसे खोल दिया और मम्मी फिर से पूरी तन्मयता से मालिश करने लगी।
बाहर बारिश का शोर था, लेकिन कमरे के भीतर एक अजीब सी शांति और अपनापन था। कुछ देर बाद, पापा की धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ गूँजी, “दूसरे टांग में भी लगाओ, जान।”
वह शब्द ‘जान’ सुन कर मेरे कान जैसे खड़े हो गए। मैंने पहली बार पापा को मम्मी के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करते सुना था। वैसे तो वे दोनों आपस में इसी तरह प्रेम से बात करते होंगे, लेकिन थोड़ा कामुक सा अनुभव था।
मैं और रानी चुप-चाप आँखें बंद किए लेटे थे, लेकिन हमारे मन में उस एक शब्द ने जैसे कौतूहल पैदा कर दिया था। उस रात की वह मद्धम रोशनी, तेल की खुशबू और पापा-मम्मी के बीच का वह निजी संवाद मेरे ज़हन में हमेशा के लिए बस गया।
कमरे के भीतर अब फुसफुसाहटों का दौर शुरू हो गया था। मम्मी ने बिल्कुल दबी हुई आवाज़ में, हल्की सी हंसी के साथ पूछा, “क्या तीनों सो गए होंगे?” उनके स्वर में एक तरह की झिझक और यह पक्का करने की चाहत थी कि कहीं कोई हमें देख तो नहीं रहा।
पापा ने कोई रिस्क नहीं लिया। उन्होंने हाथ में पकड़ी टॉर्च की तेज़ रोशनी को सीधा हम तीनों के चेहरों पर फोकस किया। रोशनी की वह चुभन मेरी बंद पलकों के आर-पार महसूस हो रही थी, लेकिन मैं पत्थर की तरह शांत पड़ा रहा। रानी ने भी गजब का धैर्य दिखाया; हम दोनों अपनी सांसें रोक कर बस ‘सोने का नाटक’ कर रहे थे।
मम्मी ने एक-दो बार हमें हल्की आवाज़ में पुकारा, पर जब हमारी तरफ से कोई हलचल नहीं हुई, तो वे पूरी तरह आश्वस्त हो गईं। उस अंधेरे कमरे में, टॉर्च की वह घूमती रोशनी और मम्मी-पापा की वह सतर्कता मेरे बाल-मन के लिए किसी जासूसी फिल्म जैसा रोमांच पैदा कर रही थी। मुझे अहसास हो गया था कि अब मैं किसी नई दुनिया या संवाद का गवाह बनने वाला था।
आगे की कहानी अगले पार्ट में।