पिछला भाग पढ़े:- जुड़वाँ दीदियों के साथ जिस्म की चाहत-8
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
रात के तक़रीबन दस बजे मैं, नेहा दीदी और पायल दीदी होटल लाॅबी में खाना खाने के लिए चले गए। चलते हुए जब भी पायल दीदी के हाथ मेरे पास से गुजरते मुझे वहीं पल याद आते जब उन्होंने मेरे लंड को पकड़ा था। उनके वह मुलायम हाथ मेरे यादों से जाने के लिए मना कर रहे थे।
अगले ही पल जब हम कुर्सियों पर आकर बैठ गए, तब मैंने एक बात साफ़ महसूस की। आस-पास बैठे कुछ लोग बार-बार नेहा दीदी और पायल दीदी की तरफ़ देखने लगे। उनकी खूबसूरती ऐसी थी कि नज़रें अपने आप खिंच जाती थी। कोई एक पल देखता, फिर नज़र हटाता, और थोड़ी देर बाद फिर उसी तरफ़ लौट आती।
नेहा दीदी शांति से बैठी थी, चेहरे पर हल्की मुस्कान, जैसे उन्हें इस सब का एहसास हो लेकिन आदत भी हो। पायल दीदी ने बैठते ही अपने बाल पीछे किए और कुर्सी पर आराम से टिक गई। उनके इस छोटे से हाव-भाव ने भी कई नज़रों को थाम लिया। उस पल मुझे एहसास हुआ कि मैं कितना खुशक़िस्मत हूँ। इन दो खूबसूरत दीदियों के साथ बैठा होना मुझे खास महसूस करा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी बहुत कीमती चीज़ के पास बैठा हूँ, जिसे हर कोई देख तो सकता है, लेकिन छू नहीं सकता।
कुर्सियों पर बैठते ही हमने खाना मंगाया और धीरे-धीरे खाने लगे। प्लेट की खनक, हल्की बातें और आस-पास की हलचल के बीच अचानक मुझे एक अजीब सा एहसास हुआ। टेबल के नीचे किसी चीज़ ने हल्के से मेरी टांग को छुआ। पहले तो लगा शायद गलती से हो गया हो, लेकिन अगले ही पल वह स्पर्श फिर से महसूस हुआ।
मैंने बिना सिर उठाए ध्यान लगाया। वह नेहा दीदी का नंगा पाँव था, जो टेबल के नीचे धीरे से मेरी टांग से लगा हुआ था। धीरे-धीरे उनका पाँव मेरी टांग पर ऊपर की ओर बढ़ने लगा। हर छोटे से हिलने पर दिल की धड़कन तेज़ होती जा रही थी। मैंने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया और खाने में लगे रहने का नाटक करता रहा, लेकिन भीतर एक अलग सी गर्मी और रोमांच फैल चुका था।
कुछ ही देर में उनका पाँव आखिरकार मेरे लंड तक पहुँच गया। कपड़ों के ऊपर से ही उनके नंगे पाँव का एहसास साफ़-साफ़ महसूस हो रहा था। उसी पल मेरे बदन में तेज़ गर्मी दौड़ गई। पसीना माथे पर उभरने लगा और साँसें अपने आप भारी होने लगीं। मैं पूरी तरह सख़्त हो चुका था, फिर भी खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था।
मेरे चेहरे का रंग बदलता देख पायल दीदी की नज़र मुझ पर टिक गई। उन्होंने हल्की सी चिंता के साथ पूछा, “क्या हुआ गोलू, तुम ठीक तो हो?”
उसी पल नेहा दीदी ने टेबल के नीचे से अपना पाँव धीरे से हटा लिया। नेहा दीदी ने मेरी तरफ़ झुक कर, होंठों पर शरारती मुस्कान लिए, धीमी और चिढ़ाती हुई आवाज़ में कहा, “अरे गोलू… ये क्या हो गया? इतना पसीना क्यों आ रहा है? बताओ ना।”
मैंने दोनों के चेहरों की तरफ़ देखा, हल्की सी मुस्कान लाने की कोशिश की और धीमे से कहा, “दीदी… मैं ठीक हूँ।”
कुछ देर बाद जब डिनर खत्म हो गया, तो माहौल अपने आप हल्का हो गया। मैंने वेटर को इशारे से बुलाया और रेड वाइन की एक बोतल ऑर्डर कर दी। थोड़ी ही देर में वेटर बोतल लेकर आया, उसे मेज़ पर रखा और चुप-चाप चला गया।
मैंने बोतल उठाई और गिलासों में वाइन डालने लगा। गहरे लाल रंग की धार काँच के गिलास में गिरते ही रोशनी में चमकने लगी। नेहा दीदी और पायल दीदी ने अपने अपने गिलास उठाए और छोटे-छोटे घूँट लेने लगीं। उनके चेहरे पर आई नर्मी और आँखों की चमक से साफ़ लग रहा था कि उन्हें स्वाद पसंद आ रहा है।
मैंने भी अपना गिलास उठाया और पहला घूँट लिया। वाइन का स्वाद गाढ़ा, मुलायम और थोड़ा सा मीठा था। जैसे ही वह घूँट भीतर उतरा, मुझे अजीब सा एहसास हुआ— मानो वहीं स्वाद नेहा दीदी के होंठों की नरमी जैसा हो। ऐसा लगा जैसे किसी ख्याल में वह मुझे हल्के से चूम रही हों, और वही एहसास वाइन के साथ मेरे अंदर फैल गया।
बोतल खत्म होते-होते रात काफ़ी गहरी हो चुकी थी। हम तीनों उठे और अपने-अपने कमरों की तरफ़ चल दिए। गलियारे की पीली रोशनी में उनके कदमों की आहट दूर होती गई और मैं अपने कमरे का दरवाज़ा खोल कर अंदर आ गया।
कमरे में आते ही मैंने थके हुए बदन को बिस्तर पर छोड़ दिया। आँखें बंद करने की कोशिश की, लेकिन नींद मुझसे दूर ही रही। दिमाग़ में वही पल घूमने लगे की कैसे पायल दीदी ने अपने हाथों से मेरे लंड हो छूआ था और कैसे नेहा दीदी अपने पांव से उसी लंड को छूने की कोशिश कर रही थी। मेरी दोनों बहनें मुझसे कितना प्यार करती थी।
रात और गहरी होती चली गई। बाहर कहीं दूर से गाड़ियों की आवाज़ आ जा रही थी और कमरे की घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी। मैं करवट बदलता रहा, तकिये को ठीक करता रहा, लेकिन मन शांत नहीं हो पा रहा था। यादें बार-बार उभरती और फिर अपने आप थम जाती।
लगभग रात के दो बजे होंगे कि अचानक दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। मैं चौंक कर उठ बैठा। पल भर को लगा शायद किसी ने गलती से खटखटा दिया हो, फिर वही आवाज़ दोबारा आई। मैं उठ कर दरवाज़े तक गया और जैसे ही दरवाज़ा खोला, मेरी साँसें थम सी गई। सामने नेहा दीदी खड़ी थी।
उन्होंने सफ़ेद रंग का लंबी गर्दन वाला नाइट गाउन पहन रखा था, जो कमरे की हल्की रोशनी में और भी नरम दिख रहा था। गाउन का कपड़ा उनके शरीर के साथ सलीके से गिर रहा था, और गर्दन के पास की खुली बनावट से उनके स्तनों की आभा साफ़ झलक रही थी। कपड़े के नीचे उनके स्तन उभरे हुए महसूस हो रहे थे। चलते-चलते हल्की सी हरकत के साथ उनका आकार नज़र आता, जैसे कपड़ा खुद उनकी मौजूदगी का एहसास करा रहा हो।
उनकी साँसें शांत थी, लेकिन नज़रें कुछ और ही कह रही थी। गाउन के नीचे से उनके स्तनों का भराव कपड़े को आगे की ओर खींच रहा था। मैंने नज़रें हटाने की कोशिश की, मगर पल भर के लिए भी नज़रें वहाँ से हट नहीं पाई।
उन्होंने मेरी ओर देखा, होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी। आँखों में नींद नहीं, बल्कि कोई बेचैनी सी झलक रही थी। धीमी आवाज़ में बोली, “गोलू, मुझे नींद नहीं आ रही।” फिर एक पल रुक कर, उसी मुस्कान के साथ पूछा, “क्या हम थोड़ी देर टहलने चलें?”
मैंने सिर हल्के से हिला कर हाँ कहा और उनके साथ चल पड़ा। हम चुप-चाप आगे बढ़ते रहे। होटल के पीछे की तरफ़ पहुँचते-पहुँचते माहौल और भी शांत हो गया। वहाँ स्विमिंग पूल था, जिसकी सतह पर हल्की रोशनी पड़ रही थी। इतनी देर रात हो चुकी थी कि हर तरफ़ सन्नाटा छाया था। ना कोई आवाज़, ना कोई हलचल। होटल का कोई स्टाफ़ भी नज़र नहीं आ रहा था। बस ठंडी हवा, पानी की हल्की चमक और हमारे क़दमों की धीमी आहट ही उस पल की गवाही दे रही थी।
पूल के पास आकर वह कुछ पल रुक गई। फिर उन्होंने मेरी ओर देखा और धीमी सी मुस्कान के साथ बोली, “गोलू… तुम्हें क्या लगता है, पायल दीदी को हमारे सीक्रेट के बारे में कुछ पता है?”
मैंने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ जवाब दिया, “नहीं नेहा दीदी, उन्हें हमारे सिक्रेट के बारे में कुछ भी नहीं पता। अगर उन्हें ज़रा सी भी भनक होती, तो वो ज़रूर आपसे इस बारे में बात करती।”
इसके बाद लगभग आधे घंटे तक हम वहीं टहलते रहे और धीमी आवाज़ में बातें करते रहे। हमने तय किया कि अपने सिक्रेट को कैसे संभाल कर रखना है, किसके सामने कैसे व्यवहार करना है और अगर कभी किसी को शक भी हो जाए तो किस तरह बात को हल्के में टाल देना है। नेहा दीदी बार-बार सावधानी की बातें करती रही, और मैं हर बात पर हामी भरता रहा।
लेकिन भीतर ही भीतर मेरा मन भारी था। मैं चाह कर भी उन्हें यह नहीं बता पाया कि पायल दीदी के साथ भी मेरा एक सिक्रेट समझौता बन चुका है। कुछ देर बाद उन्होंने बात का रुख बदलते हुए हल्के से मुस्कुरा कर कहा, “गोलू, काश मैं अपनी बिकिनी भी साथ ला पाती… क्योंकि मैं स्विम करना चाहती थी।”
मैंने हल्की सी शरारत के साथ उन्हें छेड़ा और कहा, “नेहा दीदी, यहाँ तो बस हम दो ही हैं। आप चाहें तो बिना बिकिनी भी तैर सकती हैं।” फिर मुस्कुराते हुए धीरे से जोड़ दिया, “वैसे भी… मैंने आपको पहले भी कई बार नंगी देखा है।”
मेरी बात सुन कर मैं खुद ही हँस पड़ा। लेकिन नेहा दीदी ने मेरे चेहरे को बड़े ध्यान से देखा। उनकी आँखों में कोई उलझन नहीं थी, बस एक अजीब सी शांति। अगले ही पल उन्होंने कुछ कहे बिना अपनी नाइट गाउन के बटन खोलने शुरू कर दिए।
एक-एक करके बटन खुलते गए। गाउन उनके कंधों से फिसलती हुई नीचे आई, और उन्होंने उसे बहुत सलीके से ज़मीन पर रख दिया। गाउन के नीचे उन्होंने गुलाबी रंग की ब्रा और उसी रंग की पैंटी पहन रखी थी। उन्होंने बिना हड़बड़ी के पहले ब्रा के हुक खोले, उसे उतार कर गाउन के पास रख दिया। फिर पैंटी भी उतार कर वहीं रख दी।
मैं घबराई हुई आवाज़ में बोल पड़ा, “ये… ये आप क्या कर रही हो, नेहा दीदी?”
वह थोड़ा सा मेरी तरफ़ बढ़ी। उनके क़दमों की आहट बहुत हल्की थी। पास आकर उन्होंने मेरी आँखों में देखा और शांत स्वर में बोली, “क्या हुआ, गोलू? तुमने तो मुझे पहले भी कई बार ऐसे ही देखा है।”
वह मेरे सामने खड़ी थी। रोशनी उनकी त्वचा पर पड़ रही थी। उनके स्तन खुली हवा में थे, भरे हुए, साफ़ उभरे हुए, और हर सांस के साथ हल्का सा ऊपर-नीचे होते हुए। निप्पल ठंड में थोड़े कड़े दिख रहे थे, जैसे ध्यान खींच रहे हों।
मेरी नज़र नीचे गई, कमर की लाइन, फिर जांघों का फैलाव। उनके बीच का नाज़ुक हिस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था। उनके नाज़ुक हिस्से के आस-पास बाल नहीं थे, त्वचा स्मूद दिख रही थी, और बीच में हल्की सी दरार साफ़ नज़र आ रही थी। वह वैसे ही मेरे सामने खड़ी रही, बिना जल्दी किए, जैसे चाहती हों कि मैं उन्हें ठीक से देखूँ।
वह फिर एक कदम और पास आ गई। अब हमारे बीच की दूरी लगभग ख़त्म हो चुकी थी। मैं उनकी साँसों की गर्माहट अपने गाल पर महसूस कर सकता था। उनका शरीर मेरे इतना क़रीब था कि उनकी त्वचा की गर्मी सीधा मेरी त्वचा तक आ रही थी। मेरी धड़कन अपने आप तेज़ हो गई।
उन्होंने हल्का सा झुक कर मेरे कान के पास कहा, “क्या सोच रहे हो?” फिर सामने आकर मेरी ठोड़ी हल्के से उठाई। उनकी उँगलियाँ ठंडी नहीं थी, उनमें वही गर्मी थी जो पूरे शरीर से निकल रही थी।
वह आँखों में आँखें डाल कर बोली, “बताओ ना गोलू… मैं कैसी लग रही हूँ?”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था। वह मेरे जवाब का इंतज़ार करते हुए और भी पास आ गई, इतनी कि अब उनके स्तन मेरी छाती को हल्के से छू रहे थे। उन्होंने धीमी आवाज़ में फिर कहा, “डरो मत… सच-सच बताना। तुम्हें मैं कैसी लग रही हूँ?”
मैं कुछ पल चुप रहा। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। होंठ हिले, लेकिन आवाज़ निकलने में वक़्त लगा। फिर थोड़ी सी हिचक के साथ, धीमी आवाज़ में मैंने कहा, “आप… आप बहुत… बहुत ज़्यादा अच्छी लग रही हो, नेहा दीदी।”
मेरी बात सुनते ही उनके चेहरे पर एक नरम सी मुस्कान फैल गई। वह बिना कुछ कहे मेरी तरफ़ से मुड़ी और स्विमिंग पूल की ओर बढ़ गई। चलते हुए उनके क़दमों में एक सहज भरोसा था, जैसे उन्हें पता हो कि मैं वहीं खड़ा देखता रहूँगा।
पूल के किनारे पहुँच कर उन्होंने पहले एक पैर आगे बढ़ाया। पैर की उँगलियाँ पानी को छूते ही हल्का सा सिहरन उनके चेहरे पर दिखी। उन्होंने उँगलियाँ पानी में हिलाई, जैसे तापमान को महसूस कर रही हो। पानी की सतह पर छोटे-छोटे घेर बनते गए। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ एक नज़र डाली, वही हल्की मुस्कान होंठों पर लिए।
अगले ही पल, बिना किसी झिझक के, उन्होंने खुद को आगे की ओर धकेला और पानी में छलाँग लगा दी। पानी की आवाज़ के साथ लहरें उठी और पल भर में वह पानी के भीतर गुम हो गई।
कुछ ही सेकंड बाद वह ऊपर आई और तैरना शुरू किया। पानी के साथ उनका शरीर लय में हिल रहा था। हर स्ट्रोक के साथ सतह पर चमकती बूंदें उछलती, और कुछ पल के लिए उनके नंगे बदन की झलक दिख जाती, छाती का उभार, कमर की रेखा और पीछे का गोल घुमाव, फिर लहरें सब ढक लेती।
वह गहर साँस लेती और फिर से पानी के नीचे चली जाती। पानी उनकी त्वचा पर फिसलते ही उसे और चमकदार बना रहा था। रोशनी और पानी मिल कर उनके बदन पर एक मुलायम सी चमक बिखेर रहे थे।
तभी वह पानी से ऊपर आई और उनकी नज़र सीधी मेरे चेहरे पर पड़ी। शायद मेरे हाव भाव ने सब कह दिया था। उन्होंने हँसते हुए, थोड़ी ऊँची आवाज़ में पुकारा, “गोलू! ऐसे क्या देख रहे हो? तुम भी अंदर आओ, पूल में।”
मैंने एक पल के लिए नज़रें चुरा ली। दिल की धड़कन अभी भी तेज़ थी, लेकिन क़दम जैसे जड़ हो गए थे। हल्की सी घबराहट के साथ मैंने सिर हिलाया और साफ़ कहा, “न… नहीं, नेहा दीदी।”
इसके बाद वह फिर से तैरने लगी। समय जैसे धीमा हो गया। लगभग पाँच मिनट तक वह पानी में इधर-उधर तैरती रही, कभी दीवार के पास, कभी बीच में। पानी की हल्की आवाज़ और उनकी साँसों की लय दूर से भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
फिर वह पूल की दीवार के पास आकर रुकी। दोनों हाथ दीवार पर टिकाए उन्होंने ऊपर देखा और मेरी तरफ़ मुस्कुराई। थोड़ी थकी सी, लेकिन वही भरोसे वाली आवाज़ में बोली, “गोलू… अपना हाथ दो। मुझे अब बाहर आना है।”
मैंने झिझकते हुए हाथ आगे बढ़ाया। जैसे ही मेरी हथेली उनकी उँगलियों से मिली, उन्होंने शरारत से मुझे अपनी ओर खींच लिया। संतुलन बिगड़ा और मैं आधा सा पानी में आ गया। ठंडा पानी कपड़ों से टकराया तो मैं चौंक उठा।
वह खिलखिला कर हँस पड़ी। मेरी हालत देख कर उन्हें और मज़ा आ रहा था। उन्होंने पानी के छींटे मेरे चेहरे की तरफ़ उछाल दिए। मैं भी हँसते हुए वही करने लगा। कुछ पल में ही हम दोनों पानी के छींटों में भीग गए।
मैं कपड़ों में था, इसलिए हर छींटा ज़्यादा ठंडा लग रहा था। जब मैंने हल्के से पानी उनकी तरफ़ उछाला, तो वह हँसते हुए आँखें मूँद लेती। पानी ऊपर से गिर कर उनकी त्वचा पर पतली धारों में बहने लगा, कंधों से फिसलता हुआ, स्तनों की वक्र रेखाओं के बीच रास्ता बनाता, फिर नीचे की ओर चला जाता। हर बूंद रोशनी पकड़ लेती, जैसे उनके बदन पर छोटी-छोटी चमकती लकीरें खिंच गई हों।
हम दोनों लगातार एक-दूसरे पर पानी उछालते रहे। हँसी और छींटों में समय का एहसास ही नहीं रहा। कब हम खेल खेल में पास आते गए, पता ही नहीं चला। हर बार हाथ आगे बढ़ता, पानी हवा में टूटता, और हम एक-दूसरे के और क़रीब आ जाते।
एक पल में, पानी उछालते हुए मेरा हाथ ज़रा सा भटक गया। अनजाने में मेरी उँगलियाँ उनके बदन से छू गई। वह एक पल भर का स्पर्श था, लेकिन मेरे चेहरे की मुस्कान वहीं थम गई। दिल ने जैसे एक बीट छोड़ दी।
उन्होंने यह बदलाव तुरंत देख लिया। हँसी धीमी पड़ गई और उन्होंने मेरी तरफ़ देखते हुए पूछा, “क्या हुआ, गोलू?”
मैंने घबरा कर नज़रें नीचे कर ली और तुरंत कहा, “सॉरी दीदी… गलती से छू गया।”
मेरी आवाज़ में झिझक साफ़ थी।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे चेहरे को देखा, शांत, बिना किसी नाराज़गी के। अगले ही पल वह और क़रीब आ गई और मुझे कस कर अपनी बाँहों में ले लिया। अचानक हुई उस नज़दीकी से मेरी साँस अटक सी गई। पानी के बीच उनका बदन मेरे सीने से सट गया था; उनके खुले स्तन मेरे सीने पर दब रहे थे, और उनकी त्वचा की गर्माहट मुझे भीतर तक महसूस हो रही थी। वह पकड़ मज़बूत थी, जैसे वह मुझे वहीं थामे रखना चाहती हो, और उस पल सब कुछ ठहर सा गया।
वह मेरे कान के बिल्कुल पास झुकी और बहुत धीमी आवाज़ में फुसफुसाई, “बुरा मत महसूस करो, गोलू… सब ठीक है। तुम मुझे छू सकते हो। आखिर मैं तुम्हारी बड़ी बहन हूँ।”
उनके शब्दों के बाद मेरे भीतर हिम्मत सी लौट आई। माहौल फिर से हल्का हो गया और हम दोनों दोबारा पानी में खेलने लगे। इस बार हमारी दूरी कम थी। इसलिए कभी मेरा हाथ उनके बदन पर से गुज़र जाता, कभी कमर के पास से, तो कभी उनके स्तनों के उपर से। एक बार तो जब वह आगे तैरने की कोशिश करने लगी, तब मैं उनके टांगों को पकड़ने की कोशिश करने लगा था। लेकिन मेरा हाथ गलती से उनके नाजुक हिस्से को छू गया लेकिन नेहा दीदी हर बस मुस्कुराती रही। पानी की लहरों में हम साथ-साथ हिलते रहे, बिना किसी नाराज़गी के।
अगले एक घंटे तक हम दोनों उसी तरह खेलते रहे। उसके बाद थकान साफ़ महसूस होने लगी थी; साँसें गहरी हो गई थी और हँसी भी धीमी पड़ने लगी थी।
अंत में उन्होंने दीवार का सहारा लिया और कहा, “बस, गोलू… अब काफ़ी हो गया। चलो, कमरे में चल कर सोते हैं।”
वह पूल की दीवार के पास आई और बाहर निकलने की कोशिश करने लगी। उसी पल मैंने पीछे से उन्हें पकड़ लिया। अपनी बाँहें उनकी कमर के चारों ओर कस दी और उन्हें अपने पास खींच लिया। पानी की हल्की लहरें हमारे चारों ओर फैल गई। मेरा दिल तेज़ धड़क रहा था; उनकी पीठ मेरी छाती से लगी थी और उस अचानक आई नज़दीकी में कुछ पल के लिए हम दोनों बिल्कुल चुप हो गए।
तभी उन्होंने बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, “गोलू… यह क्या कर रहे हो?”
मेरी साँसें बेकाबू थी। मैंने उन्हें वहीं रोके रखा, आवाज़ में अब डर से ज़्यादा सच था। “दीदी… आपको ऐसे पास देख कर… मेरे लिए खुद को संभालना आसान नहीं है।”
मेरी पकड़ उनकी कमर पर थोड़ी और सिमट गई। पानी की ठंडी लहरें हमारे बीच से गुज़रती रहीं, लेकिन हमारे शरीर की गर्मी अलग ही कहानी कह रही थी। मैंने बहुत धीमे, थोड़ी बदतमीज़ हिम्मत के साथ जोड़ दिया, “ मैं आपको चोदना चाहता हूं, दीदी।”
वह एक पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई। फिर बहुत धीरे, मेरे कान के पास झुक कर बोली, “अगर तुम्हारे लिए खुद को रोक पाना इतना मुश्किल हो रहा है, गोलू… तो तुम मुझे चोद सकते हो।”
उन्होंने मेरी पकड़ हटाई नहीं। बस अपनी पीठ को और मेरे सीने से सटा दिया।
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