पिछला भाग पढ़े:- जब दीदी ने खुद को मेरे सामने खोला-9
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
अगले दिन मैं दिल्ली से घर वापस लौट आया, लेकिन वापस आने के बाद भी वाणी दीदी की यादों ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा। उनके साथ बिताए हुए वह खुबसूरत लम्हें हर दिन मुझे बार बार याद आते। वह नाज़ुक लम्हें जब वह प्यार से मेरा लंड अपने हाथों में पकड़ती। हर बार याद आता वह पल जब मैं उनके गांड में अपना लंड डाल कर उनको पागल बना देता था। जब भी मैं पानी पीने के लिए ग्लास उठाता, मुझे उनके नाज़ुक होठों की याद आती। कैसे उन्होंने मेरा लंड चूसा था और मेरा पानी पी गई थी।
उन यादों में खो कर ही कई रातें निकल गई। मैं जब भी अपने कमरे में अकेला होता, आंखें बंद करते ही दीदी का चेहरा सामने आ जाता। उनकी मुस्कान, उनकी धीमी सांसें, उनका गर्म शरीर मेरे सीने से लगा हुआ। सब कुछ इतना असली सा लगता कि लगता वह मेरे पास ही हैं।
पर जैसे जैसे दिन बीतते गए, मेरी बेचैनी भी बढ़ती गई। जिस रातों में वाणी दीदी ने मुझे अपने साथ ऐसे जोड़ा था कि मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा था। उसका असर मुझ पर और गहरा होता जा रहा था।
एक रात मैं अपने बेड पर लेटा-लेटा करवटें बदल रहा था। नींद मुझे छू भी नहीं रही थी। अचानक मेरा हाथ खुद ही मेरी पैंट के अंदर चला गया और मैंने अपने लंड को पकड़ लिया। मैं जैसे-तैसे अपने आप को रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन दिमाग में सिर्फ एक चीज़ थी – वाणी दीदी की गर्म गांड और उनके कराहते हुए शब्द।
धीरे-धीरे मेरी सांसें भारी होने लगी। मैंने अपनी आंखें बंद की और खुद को वही समझाया मानो मैं फिर से वाणी दीदी की जांघों के बीच हूं। फिर मैंने हल्के-हल्के ऊपर-नीचे अपने हाथ को चलाना शुरू किया। जैसे ही मैं रगड़ बढ़ाता, मुझे लगता दीदी मेरे कान में फुसफुसा रही हो, “और तेज़, गोलू… मत रुक।”
मैंने अपनी गति और बढ़ा दी। पूरा शरीर खिंचने लगा था, ऐसा लग रहा था जैसे दीदी की गर्मी मेरे ऊपर सवार है। मेरा लंड धड़क रहा था, नसें तन कर कड़ी हो चुकी थी। कुछ ही पलों में मैंने महसूस किया कि अब मैं रुक नहीं पाऊंगा।
मैंने दांत भींच लिए, आंखें कस कर बंद कर ली और एक जोरदार झटके के साथ मेरा पानी निकल गया। मेरा पूरा हाथ भीग गया, और मैं हांफते-हांफते बेड पर फैल गया।
लेकिन उन नाज़ुक पलों में वाणी दीदी कभी मुझे भुली नहीं। उनका ज्यादातर समय काम की वजह से ऑफिस में निकल जाता फिर भी जब समय मिलता। वह ऑफिस के बाथरूम में जाती और धीरे से अपना स्कर्ट निकाल कर अपनी पैंटी की तस्वीरें भेजती। कई बार वह पैंटी के किनारों को पकड़ कर एक तरफ करती और अपने नाज़ुक हिस्से के किनारे की तस्वीरें भेज कर मेरा दिन बनाती।
कुछ ही हफ्तों में वह और ज्यादा खुल गई। अब तस्वीरें सिर्फ छुपे हिस्सों तक सीमित नहीं रही। कभी वह बिस्तर पर लेट कर अपनी टाँगें हल्की सी खोल कर फोटो भेजती। कभी शीशे के सामने खड़ी होकर पूरी पीठ, जाँघें और गोल कसा हुआ पिछला हिस्सा दिखाती। जब-जब उनका कैमरा उस जगह के और करीब जाता, मेरा पूरा शरीर गर्म होने लगता।
उनकी हर तस्वीर मेरे लिए एक तरह का इशारा बन जाती। मैं चाहता था कि वह लौट आएं, कि फिर से वह गर्म शरीर मेरे ऊपर आकर टिका हो, कि मैं फिर उनके अंदर घुस जाऊं और उन्हें पागल कर दूं। पर अभी दूरी थी और हम दोनों इसे सिर्फ तस्वीरों, कल्पनाओं और तड़पती रातों से भर रहे थे।
एक दिन दोपहर के वक्त, मैं अपने घर में अकेला था। खाना खाकर लेट गया था और कब हल्की सी नींद लग गई, पता ही नहीं चला। कमरे में शांति थी और पंखे की आवाज़ ही बस चल रही थी।
अचानक मोबाइल ज़ोर से वाइब्रेट हुआ। नींद टूट गई। आँखें खोल कर स्क्रीन की तरफ देखा तो वाणी दीदी का वीडियो कॉल था। दोपहर में उनका कॉल आना वैसे ही कमाल होता था, वह भी वीडियो कॉल—इसलिए बिना सोचे तुरंत उठा लिया।
स्क्रीन खुली और सामने जो नज़ारा था, उसे देख कर नींद पूरी गायब हो गई। वाणी दीदी अपने ऑफिस के टॉयलेट में बैठी हुई थी। पीछे सफेद टाइलें, ऊपर हल्की फ्लोरोसेंट रोशनी और दीवार के सहारे उनका शरीर। वह सीट पर हल्का सा आगे झुक कर बैठी थी। उनके घुटने करीब थे, लेकिन उनकी स्कर्ट ऊपर खिंची हुई थी, जिससे पूरी जाँघें खुल गई थी। वह एक हाथ से कैमरा पकड़े थी और दूसरा हाथ धीरे से अपने घुटने पर रखे हुए था, मानो अगला कदम सोच रही हो।
उन्होंने कैमरे के ज़रा और पास आकर फुसफुसाते हुए कहा, “गोलू… आवाज़ मत करना… कोई सुन लेगा तो पकड़ भी लेगा मुझे।”
मैं हड़बड़ा कर फुसफुसाया, “लेकिन दीदी… आप कर क्या रही हैं? यहाँ तो ऑफिस है ना?”
वह मेरे सवाल का कोई जवाब नहीं बोली। बस होंठ बंद रखते हुए हल्की सी मुस्कान दी। फिर कैमरा अपनी गोद की तरफ नीचे किया। दूसरे हाथ से स्कर्ट के सामने वाला बटन खोला। खुलते ही ज़िप नीचे खिसकाई। स्कर्ट ढीली पड़ गई और उन्होंने उसे अपने पैरों तक खींच कर पूरी तरह उतार दिया। अब उनकी जाँघें पूरी खुली थी और मैं साफ-साफ उनकी हल्की गुलाबी पैंटी देख पा रहा था, जो जाँघों के बीच से कस कर लगी हुई थी।
उन्होंने वह भी नहीं रोकी। अंगूठा अंदर डाल कर पैंटी को धीरे-धीरे नीचे खींचना शुरू किया। कपड़ा जाँघों से उतर कर पैरों तक गया और उन्होंने उसे एक तरफ रख दिया। कैमरा अब बिल्कुल सीधे उनके बीच वाले हिस्से पर था। मैं साफ देख सकता था— उनका नाज़ुक हिस्सा पूरी तरह नंगा, बाल कम और बीच की लाइन हल्की सी चमकती हुई, जैसे उसमें पहले से ही नमी आ चुकी हो।
वह वहीं नहीं रुकी। उन्होंने दो उंगलियाँ वहाँ रखी और हल्का सा फेंटा दिया। उनकी उंगलियाँ होठों को अलग करती हुई अंदर की नर्मी पर चली गई। फिर उन्होंने एक उंगली धीरे से अंदर की तरफ धकेली। मैं स्क्रीन में उनकी उंगली के अंदर गायब होने का नज़ारा साफ देख रहा था। उन्होंने उंगली धीरे-धीरे बाहर निकाली और फिर दोबारा अंदर डाली। फिर दूसरी उंगली भी जोड़ ली। अब वह दोनों उंगलियाँ अंदर-बाहर चल रही थी। उनकी साँसें भारी हो गई और छाती ऊपर नीचे होने लगी। पूरे टॉयलेट में हल्की-हल्की सिसकारी फैल रही थी, पर वह अब भी होंठ दबा कर आवाज़ रोक रही थी, जैसे डर हो कि कोई बाहर सुन लेगा।
कुछ सेकंड बाद उन्होंने कैमरा और पास किया। उनकी उंगलियाँ अब और तेज चल रही थी। वही भारी साँसों में उन्होंने फुसफुसा कर कहा, “गोलू… सोचो ये उंगलियाँ नहीं हैं… तुम्हारा लंड है मेरे अंदर…”
उनके यह कहते ही मेरा गला सूख गया। दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि खुद को सुनाई दे रहा था। मैं मोबाइल पकड़े हुए बिस्तर पर बैठ गया, आँखें स्क्रीन से हट ही नहीं रही थी।
वाणी दीदी ने अपनी उंगलियाँ और गहराई तक धकेली, जैसे सच में मेरा लंड उनके अंदर महसूस कर रही हो। उनकी कमर हल्के-हल्के आगे-पीछे होने लगी। अब वह खुद को बिल्कुल रोक नहीं पा रही थी।
उनकी फुसफुसाहट फिर आई, “गोलू… सोच… तू मुझे पकड़ कर जोर से भर रहा है… बस ऐसे ही…”
उनकी उंगलियाँ अब तेज़ी से अंदर-बाहर चल रही थी। कैमरे के सामने उनका नंगा हिस्सा हिल रहा था, भीतर की नमी उनकी उंगलियों पर चमक रही थी। उनकी सांसें अब रोकी नहीं जा रही थी। वह दाँत भींचे हुए भी सिसकारियाँ निकाल रही थी, जैसे कहीं कोई बाहर सुन ना ले।
उनकी हर हरकत तेज होती गई थी। अचानक उन्होंने सिर को दीवार से टिका दिया, और हल्की सी मुस्कान के साथ फुसफुसाई, “गोलू… सोच… मैं तेरी असली बहन नहीं हूँ… बस तेरी बड़ी वाली दीदी बन कर तेरे नीचे कराह रही हूँ…”
उन्होंने उंगलियाँ और तेज चलाई, जैसे सच में मेरी जगह कुछ और हो। “गोलू… सोच… ये मेरी उंगलियाँ नहीं… तेरा लंड है… तेरी बड़ी दीदी के अंदर जा रहा है…” उनकी आवाज़ टूटते-टूटते बाहर आई।
उनके शब्दों ने तो जैसे मेरे होश ही छीन लिए। मैं मोबाइल को कस कर पकड़े देख रहा था और सांस तक लेना भूल गया था।
उन्होंने कमर को सीट से उठा कर आगे झटका, जैसे सच में किसी चीज़ को अंदर आने दे रही हों। उनकी उंगलियाँ अब पूरी ताकत से चल रही थी, अंदर तक जाती, फिर बाहर आती, फिर दुबारा धँसती। नमी बढ़ कर उनकी जाँघों तक बहने लगी थी।
वह पागलों की तरह हाँफते हुए फुसफुसाई, “गोलू… तुम्हारी बड़ी दीदी… तुम्हारा लंड चाहती है… अपनी चूत में… अभी…”
वह काँपने लगी थी। उनकी उंगलियाँ बिना रुके तेज़ी से चल रही थी, पूरी ताकत से धँसती और बाहर आती हुई। टॉयलेट की सीट हल्का-हल्का उनके साथ हिल रही थी। उनकी जाँघें पूरी तरह गीली हो चुकी थी और उंगलियों के बाहर आते ही चमकती दिख रही थी।
वाणी दीदी ने सिर ऊपर उठाया, दाँत भींचे और कमर जोर से आगे धकेली। उनके होंठ काँपते हुए खुल गए और उनका शरीर झटके लेने लगा।
उन्होंने आँखें बंद रखते हुए हाँफती टूटी आवाज़ में कहा, “गोलू… अगर तू यहाँ होता… मैं तुझे रोकती भी नहीं… बस… अंदर ले लेती… पूरा…”
उनके शब्द खत्म होते ही उनका पूरा शरीर अकड़ सा गया। उंगलियाँ अंदर ही रुक गई, जैसे वहीं अटक गई हों। कमर अचानक जोर से आगे धकी, फिर पीछे, फिर आगे।
उनकी साँसें और आवाज़ टूट कर बाहर आ रही थी, “ह्ह… हाँ… हाँ… ओह… गोलू…”
उनकी जाँघें काँप रही थी, पैर खुद ब खुद फैल गए थे। उंगलियाँ अंदर धँसी रहीं और उनकी नमी बाहर तक बहने लगी थी, उंगलियों से होते टॉयलेट सीट तक टपकती हुई। उन्होंने दीवार पकड़ ली, सिर पीछे टिका दिया और पूरी तरह काँपते हुए फुसफुसाई, “गोलू… मैं… आ… रही हूँ…”
इसके साथ ही उनका शरीर जैसे फट पड़ा, कमर तेज़ झटके से ऊपर उठा, उंगलियाँ अंदर कस कर धँसी रही, और एक लंबी दबाई हुई कराह उनके होंठों से निकल ही गई।
उनका शरीर कई सेकंड तक थरथराता रहा, साँसें फटती हुई, पेट सिकुड़ता, जाँघें हिलती हुई। उन्होंने आँखें कस कर बंद रखीं, दाँत भींचे, और अंदर से बहती हर गर्म लहर को महसूस करती रही, जब तक वह पूरा खत्म नहीं हुआ।
अगले कुछ दिन ऐसे ही चलते रहे। वाणी दीदी अपनी तस्वीरें भेज कर मुझे याद दिलाती रही कि वह मुझसे कितना प्यार करती थी और उनकी जिंदगी भी मेरे बिना कितनी अधूरी थी। उनकी वह खुबसूरत तस्वीरें जिनमें वह कई बार अपने स्तनों को दबा रही थी होती, अपने निप्पल को मरोड़ रही थी, उसको भेज कर मेरे अंदर गर्मी बढ़ा देती।
जब भी उसको मेरी याद आती वह अपनी नाज़ुक हिस्से के अंदर अपनी उंगलियों को सरकाती। कई बार तो ऐसा भी हुआ उनको अपनी प्यास बुझाने के लिए ककड़ी का सहारा भी लेना पड़ा। वह अक्सर लंबी और बड़ी ककड़ी अपनी चूत के अंदर डालती और मुझे बताती कि उनको किस तरह मेरे लंड की जरूरत है।
एक शाम तो हद ही हो गई। उनके मैसेज आए, “मैं अब और नहीं रुक सकती गोलू।” साथ में उनका वीडियो आने लगा। कैमरे में दिख रहा था वह बिस्तर पर फैली हुई थी, बाल खुले, साँसें तेज़ और पैर पूरी तरह फैले हुए। वह अपनी उँगलियों को गीलेपन में डुबो कर बाहर निकालती और कैमरे के पास ले जाकर मुझे दिखाती, जैसे कह रही हों, “देखो, ये सब तुम्हारे लिए बह रहा है।” उनके शरीर के हर झटके से जैसा लगता वह मुझे बुला रही हैं।
फिर कैमरा थोड़ा पीछे गया, और मैंने देखा वही ककड़ी फिर से उनके हाथ में थी। लेकिन इस बार उन्होंने धीरे नहीं किया। दीदी ने एक झटके में आधी ककड़ी अंदर दबा दी और उनकी कराह मेरे कानों में बिजली की तरह दौड़ गई। वह फुसफुसाई, “काश ये तुम होते… तुम्हारा गर्म, सख्त लंड… मैं खुद को रोक नहीं पा रही।”
वाणी दीदी के बिना मुझे सब कुछ अधूरा सा लग रहा था। कई बार सोचा कि वापस दिल्ली जाकर उनके साथ सिर्फ एक बार सो जाऊं। फिर एक बार अपना लंड उनके मुंह में डालूं। लेकिन हालात ऐसे थे कि मुझे वापस जाने का मौका ही नहीं मिल रहा था। जल्दी ही मेरे एग्जाम होने वाले थे इसलिए घरवालों ने वापस दिल्ली जाने से मना किया था।
आख़िरकार मैंने सारे मन से खुद को समझाया कि वापस दीदी के पास जाना फिलहाल संभव नहीं था। इसलिए मैं सिर्फ उन तस्वीरों और वीडियो को देख कर खुद को खुश करता रहा।
लेकिन रातों में मामला काबू से बाहर हो जाता था। फोन हाथ में लेकर लेटे-लेटे जब उनकी भेजी हुई कोई तस्वीर खोलता, जहाँ वो सिर्फ तौलिया में होती, बाल गीले, और होंठों पर वो हल्की मुस्कान। मैं खुद को रोक नहीं पाता। मेरा पूरा शरीर गर्म हो जाता, दिल जोर-जोर से धड़कने लगता और दिमाग में सिर्फ एक ही ख्याल होता, काश वो मेरे पास होती।
फिर एक दिन सब कुछ अचानक बदल गया। मैं एग्ज़ाम देकर जैसे ही घर पहुँचा, अंदर से खाने की खुशबू आ रही थी। मैं सीधे किचन में गया, फ्रिज खोला और बोतल उठा कर पानी गटकने लगा। माँ गैस पर कुछ बना रही थी।
मुझे अजीब लगा। ये हल्का और सादा खाना था, और माँ आमतौर पर ये दोपहर में नहीं बनाती थी। मैंने पूछा, “माँ ये क्या? आज दोपहर में खिचड़ी-विचड़ी क्यों?”
उन्होंने मेरी ओर देखा, मेरे चेहरे की थकान पढ़ी और धीमे से बोली, “वाणी सो रही है कमरे में। तबियत ठीक नहीं है उसकी। उसे कुछ हल्का चाहिए था, इसलिए बना रही हूँ।”
मैं चौंक गया, दिल जैसे एक-दम रुक सा गया।
“वाणी दीदी? यहीं?” आवाज खुद ही ऊँची हो गई। “माँ, ये कैसे? वो तो कह रही थी प्रोजेक्ट बहुत ज़रूरी है… उसके बॉस छुट्टी नहीं देंगे!”
माँ ने सब्जी में कड़छी चलाई, फिर मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे ये बात पहले ही तय थी।
“हाँ, बेटा। प्रोजेक्ट था, सही। लेकिन इस बार वो बहुत बीमार पड़ गई। इतना खराब कि ऑफिस वाले भी कुछ नहीं कर पाए। उसने खुद ही कहा, घर आए बिना ठीक नहीं हो पाऊँगी।”
मैंने उस पर और कुछ नहीं कहा। मैं थोड़ी देर माँ के पास खड़ा रहा, लेकिन दिमाग में बस एक ही चीज़ घूम रही थी। वाणी दीदी ऊपर, उसी कमरे में, जिस पल मैं उनका नाम सुनता, मेरा शरीर वैसे भी गरम होने लगता था। अब वो सच में वहाँ थी।
मैंने बिना एक और शब्द बोले बोतल उठाई और फ्रिज में रख दी। बिलकुल माँ से नजरें मिलाए बिना मैं मुड़ा और लगभग भागते हुए सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। दिल मैच की तरह धड़क रहा था।
जैसे ही मैंने वाणी दीदी का कमरा खोला, ठंडी हवा का एक झोंका मेरे चेहरे से टकराया। पर्दे आधे बंद थे, कमरा हल्का अँधेरा। बिस्तर पर वो सीधी लेटी थी। सफेद टी-शर्ट शरीर से चिपकी हुई थी, और उसमें से उनके दोनों निप्पल सख्त होकर साफ दिख रहे थे। उन्होंने शायद ब्रा पहनना भूल गई थी, या जान-बूझ कर नहीं पहना था।
दरवाज़ा खुलने की हल्की आवाज़ पर उन्होंने आँखें खोली। उनींदी सी नींद टूटी। वो मुझे देख कर हल्का सा मुस्कुराई। बिना कुछ कहे उन्होंने दोनों हाथ फैलाए जैसे मुझे इशारा कर रही हों कि मैं आकर उन्हें पकड़ लूँ।
मैं आगे बढ़ा और सीधा उनके उपर ही लेट गया। इतने दिनों के बाद उनको इतना करीब से महसूस करना किसी खजाने जैसा लग रहा था। उनका मुलायम और गर्म बदन मेरे नीचे दब कर पिघल रहा था। वह हल्का सा कराहीं लेकिन हटने को कहा नहीं। मैं झुक कर टी-शर्ट पर से उनका सख्त निप्पल चूसने लगा। कपड़े के कारण सीधे महसूस नहीं कर पा रहा था, लेकिन उस पल में वही काफी था।
उन्होनें अपनी उंगलियाँ मेरे बालों में फंसा ली। उनकी साँसें गर्म थी, मेरे गाल से टकरा रही थी। उन्होंने फुसफुसाया, “धीरे… अभी माँ नीचे है।”
मैंने सिर उठाया, आँखों में आँखें डाल कर बोला, “दीदी, मैं रुक नहीं सकता था।”
वो मुस्कुराई, फिर बहुत धीरे अपनी टी-शर्ट ऊपर उठाई। उनका नंगा सीना मेरे सामने पूरी तरह खुल गया। सख्त निप्पल, हल्की पसीने की चमक, और इतनी नजदीकी कि मेरी साँस सीधे उनकी त्वचा से टकरा रही थी।
मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैंने दाहिना निप्पल मुंह में लिया, धीरे, फिर और जोर से। मेरी जीभ उसकी नोक पर घिसती रही। वाणी दीदी ने तुरंत लंबी, दबी-दबी कराह निकाली, “म्म्म… ओह…”
उनकी उंगलियाँ मेरे बालों में कस गई। उन्होंने पीठ मोड़ी, सीना ऊपर उठाया जैसे मेरा मुंह और अंदर दब जाए। मैं बारी-बारी से दोनों निप्पल चूसने लगा, कभी जीभ से घुमाता, कभी हल्के दांत से काटता। हर बार वो और जोर से सांस भरती, और एक एक आह जैसे मेरे अंदर उतर जाती।
“गोलू…” उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा, “क्या हम रात को कर सकते हैं, मुझे डर लग रहा अगर मां ने देखा लिया तो।”
मैंने उनकी आँखों में देखा, दिल की धड़कनें कानों में बज रही थी। मैं चाह कर भी उनके कहे का विरोध नहीं कर पाया।
मैंने उनके गाल पर हल्का सा चुम्बन रखा और उनके सीने से अपना हाथ हटाया, हालांकि दिल बिल्कुल नहीं मान रहा था। वो धीरे से मुस्कुराई, जैसे मेरी हालत समझ रही हों।
मैंने फुसफुसा कर कहा, “ठीक है। रात को… मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं।”
वो हल्के से सिर हिला कर बोली, “और मैं भी नहीं…।”