भाई-बहन सेक्स कहानी-
साक्षी दीदी और मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन हम एक-दूसरे को इस तरह प्यार करने लग जाएंगे। हम दोनों बचपन से एक-दूसरे के साथ बड़े हुए थे। असल में दीदी मुझसे तीन साल बड़ी है।
हम एक ही छोटे से घर में रहते थे जो दिल्ली में है। उसी घर में मैं, साक्षी दीदी और हमारे माता-पिता रहते थे। पापा एक आईटी कंपनी में ऑफिस के कंप्यूटर पर काम करते थे और घर पर ज़्यादातर बिज़ी रहते थे। माँ घर का सारा काम संभालती थी, लेकिन वह ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, इसलिए कई बार हमारी बातें या भावनाएँ वह ठीक से समझ नहीं पाती थी।
इसी वजह से घर में कोई भी अपनी फीलिंग्स पर खुल कर बात नहीं करता था — ना पापा, ना माँ, और ना ही मैं। बस साक्षी दीदी ही थी जिसके साथ मैं सब कुछ शेयर कर पाता था। हम दोनों एक-दूसरे से अपनी फीलिंग्स, अपने मन की बातें, हर वो चीज़ जो हमें खुश करती थी, खुले दिल से बात करते थे। हमारे बीच यही वजह थी कि हम एक-दूसरे के और भी क़रीब आते गए।
धीरे-धीरे हमारी बातें सिर्फ पढ़ाई, घर या दोस्तों तक सीमित नहीं रही। हम प्यार के बारे में बात करने लगे — रिश्तों के बारे में, लड़कियों के बारे में, और कई बार तो दीदी मज़ाक-मज़ाक में पॉर्न तक की बातें छेड़ देती थी। वह मुझसे बड़ी थी, इसलिए कभी-कभी मुझे चिढ़ाने के लिए ऐसे सवाल पूछती थी जिनका जवाब देते समय मेरे गाल लाल हो जाते थे। शायद वह बस अपने छोटे भाई को छेड़ना चाहती थी… लेकिन वह समझ नहीं पाती थी कि जब वह प्यार या पॉर्न जैसी बातें करती थी, तो मेरे मन में क्या चलने लगता था।
मैं बारहवीं में था, मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी, और सच कहूँ तो मैं किसी लड़की को ठीक से जानता भी नहीं था। पूरे घर में एक ही लड़की थी जिससे मैं सबसे ज़्यादा बात करता था… मेरी वही बड़ी बहन साक्षी दीदी। इसलिए जब वह प्यार की बात करती, लड़कियों की बात करती, या कभी कभी शरारत में कुछ बोल देती मेरा दिमाग उसी दिशा में चला जाता जिसे समझाने की हिम्मत मुझमें नहीं थी।
उन बातों ने मेरे अंदर कुछ नया जगा दिया था। एक ऐसा एहसास जिसे मैं रोक नहीं पाता था, और दीदी शायद समझ भी नहीं पाती थी कि उसकी हँसी मज़ाक मेरे दिल में कैसी हलचल कर रही थी।
साक्षी दीदी के साथ उन हँसी मज़ाक वाली बातों के बाद मेरे अंदर जो हलचल उठी थी, वह रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। अब जब भी वह मेरे सामने आती, मैं उन्हें एक अलग नज़र से देखने लगा था। मैं चाहता नहीं था, फिर भी मेरे मन में उनका हर हाव भाव, हर चलना फिरना बस जाता था।
अब ऐसा होता था कि जब वह छोटे शॉर्ट्स पहन कर कमरे में चलती थी, तो मेरा ध्यान अपने आप उनके हिलते हुए गोल-मटोल पिछवाड़े पर अटक जाता था। जितना रोकता, उतना ही नज़र वहाँ फिसल जाती। उनके हर स्टेप में एक अजीब सी मिठास थी, और मेरा दिल तेज़ धड़कने लगता था।
जब भी वह झुक कर कोई चीज़ उठाती थी, उनका लंबा, गहरा क्लीवेज नज़र आता… और उस एक पल में मेरा गला सूख जाता था। मुझे खुद पर शर्म भी आती थी, लेकिन चाह कर भी नज़रें हटती नहीं थी।
और सबसे ज़्यादा तो तब होता था जब दीदी बाथरूम से सिर्फ तौलिया लपेट कर बाहर आती थी। उनके भीगे बाल, टपकते कतरे, और तौलिये के नीचे उनकी उभरती हुई गोलाइयाँ… मेरे बस का नहीं था इन्हें ना देखना। मेरा दिल किसी अनजानी आग में जलने लगता था जिसे बुझाना मुश्किल हो रहा था।
कभी-कभी तो जब वह हँसते हुए मुझे गले लगा लेती थी, उनकी मुलायम छातियाँ मेरे सीने से दब कर लगती थी, और उस स्पर्श से मेरा पूरा शरीर सिहर उठता था। मैं चाह कर भी उस एहसास को भूल नहीं पाता था।
मैंने बहुत कोशिश की इसे नज़र-अंदाज़ करने की, खुद को समझाने की कि वह मेरी बड़ी बहन है… लेकिन सच्चाई यह थी कि मैं अब उनकी खुबसूरती को नज़र-अंदाज़ कर ही नहीं पाता था।
शायद… शायद दीदी ने भी धीरे-धीरे यह समझना शुरू कर दिया था कि मैं उनके लिए क्या महसूस करने लगा था। वह मुझसे थोड़ा दूर रहने की कोशिश करने लगी थी। बातों में कंपन आता, नज़रें जल्दी हटा लेती, और कई बार तो बिना वजह कमरे से बाहर चली जाती।
लेकिन मेरी हालत ऐसी थी कि मैं उनसे दूर रह ही नहीं पा रहा था। जब भी वह बाथरूम में नहाने जाती, मेरा दिल एक अजीब सी बेचैनी से भर जाता। एक-आध बार मैंने हिम्मत करके बाथरूम के पास जाकर देखने की कोशिश भी की… बस इतना उम्मीद में कि शायद कहीं से उनकी एक झलक मिल जाए, सिर्फ एक पल भर का दीदार। मगर मैं उनका खुला बदन कभी नहीं देख पाया सिर्फ पानी की आवाज़ें, उनके हिलते कदमों की हल्की परछाई… और उतना भी मेरे भीतर आग लगा देने के लिए काफी था।
और फिर… जब वह नहा कर बाहर निकलती, तो मैं चोरी-चुपके उनके पीछे बाथरूम में चला जाता था। वहाँ अक्सर उनका गीला ब्रा और पैंटी टंगी रहती थी। उनके शरीर की गर्मी अभी भी उनमें महसूस होती थी। उन कपड़ों को हाथ में लेते ही मेरा पूरा शरीर काँपने लगता था।
मैं उन भीगे कपड़ों को अपने चेहरे, अपनी गर्दन से लगाता… और फिर मेरे हाथ अपने आप मेरे लंड पर चले जाते। धीरे-धीरे, मजबूरी में, मैं अपना लंड उन कपड़ों पर रगड़ना शुरू कर देता। उनकी खुशबू, उनका स्पर्श, उस कपड़े की नमी सब मिल कर मुझे पागल कर देती थी। कुछ ही मिनटों में मैं अपनी सारी चाहत उन कपड़ों पर बहा देता… और कुछ पल के लिए ऐसा लगता कि मेरा दिल थोड़ा हल्का हो गया हो।
एक दिन दोपहर का समय था। साक्षी दीदी रसोई में पानी की बोतलें भर कर फ्रिज में रख रही थी। मैं कमरे से उन्हें देख रहा था, और पता नहीं क्यों… अचानक मेरे कदम खुद ब खुद रसोई की तरफ बढ़ गए। शायद मैं मदद का बहाना बना रहा था, लेकिन असल में तो बस उनके पास रहना चाहता था।
जैसे ही मैं अंदर गया, दीदी ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ कहा, “क्या हुआ? मदद करोगे?”
उस समय वह सफ़ेद टी-शर्ट पहने थी—इतनी हल्की और पतली कि उसके नीचे छिपा कुछ भी सच में छिप नहीं पाता था। बोतलें भरते समय जैसे ही उन्होंने झुक कर टोंटी खोली, उनकी टी-शर्ट का गला थोड़ा नीचे खिंचा… और उनका लंबा, गहरा क्लीवेज पूरी तरह मेरी नज़रों में भर गया।
मेरी आँखें वहीं अटक गई। मैं समझ रहा था कि मुझे नज़रें हटानी चाहिए… लेकिन हट नहीं रही थी। उनकी हर सांस के साथ उनकी छातियाँ हल्की-हल्की उठ गिर रही थी, और मैं बस वहीं जड़ होकर खड़ा था, जैसे किसी ने मुझे पकड़ रखा हो।
उधर दीदी बोतल भरने में बिजी थी, और इधर मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि मुझे खुद अपनी आवाज़ सुनाई दे रही थी।
फिर अचानक… दीदी रुक गई। जैसे उन्होंने महसूस कर लिया हो कि मेरी निगाहें कहाँ थी। वह सीधी खड़ी हुई, अपनी टी-शर्ट का गला थोड़ा ऊपर खींच कर ठीक किया… और मेरी तरफ बिना पलक झपकाए देखा।
उनकी आवाज़ धीमी थी, मगर सीधे सीने में लगने वाली, “गोलू… लड़कियों की छाती घूरना बहुत खराब आदत होती है। ऐसा नहीं करते।”
मैं तुरंत नज़रें नीचे करके बहुत धीमी आवाज़ में बोला, “सॉरी… दीदी।”
उस घटना के बाद मैंने सच में कोशिश की कि मैं सावधान रहूँ। दीदी के सामने अपनी नज़रें, अपना बर्ताव, सब कुछ कंट्रोल में रखूँ। मगर मेरे अंदर की चाहत शांत नहीं हो रही थी। मैं जितना खुद को रोकता, उतना ही मेरा मन उनके आस-पास भटकने लगता था।
फिर एक दिन मेरी किस्मत फिर खराब निकली। दीदी नहा कर अभी-अभी बाथरूम से बाहर गई थी। जैसे मैं पहले भी कई बार करता था, मैं तुरंत उनके पीछे खाली बाथरूम में चला गया। मुझे पता था कि वह कपड़े बदल कर जल्दी ही कमरे में चली जाएँगी।
अंदर जाकर मैंने जल्दी से दरवाज़ा बंद किया, लेकिन लॉक करना भूल गया शायद जल्दी में दिमाग ही काम नहीं कर रहा था।
मैंने इधर-उधर देखा। उनका पहना हुआ पैंटी उसी जगह रखा था जहाँ वह हमेशा छोड़ देती थी। वह अभी भी थोड़ी गीली थी। मैं उसे हाथ में लेकर सीधा अपनी नाक के पास ले गया। उसमें दीदी के शरीर की हल्की सी महक थी, सीधी, साफ़ और बहुत पास महसूस होने वाली।
मेरे हाथ अपने-आप नीचे गए। मैंने पैंटी को अपने लंड पर रखा और रगड़ना शुरू कर दिया। मैं साफ़ दिमाग से सोच भी नहीं रहा था सिर्फ वही कर रहा था जो मैं हर बार करता था।
कुछ सेकंड बाद मैं पूरी तरह उसी काम में खो गया। ना बाहर की आवाज़ सुनाई दे रही थी, ना दरवाज़ा खुलने का डर महसूस हो रहा था। मेरा पूरा ध्यान सिर्फ पैंटी और अपने लंड पर था।
और तभी दरवाज़ा अचानक खुल गया। मैंने झटके से ऊपर देखा तो साक्षी दीदी दरवाज़े पर खड़ी थी। वह शायद कुछ लेना भूल गई थी कंघी, तौलिया, कुछ भी। लेकिन अब उनकी आँखों के सामने सिर्फ एक ही चीज़ थी।
मैं… उनका पैंटी पकड़ कर, अपने लंड पर रगड़ते हुए, खुल्लम-खुल्ला हिला रहा था।
मैं एक-दम जड़ हो गया। मेरे हाथ वहीं रुक गए। पैंटी मेरे लंड पर थी। मेरी साँस अटक गई। दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गई थी कि मुझे खुद सुनाई दे रही थी।
वह दो सेकंड तक कुछ नहीं बोली। बस मुझे घूरती रही। मेरे हाथ, मेरा लंड, उनकी पैंटी… सब कुछ। मैं इतना घबरा गया था कि बोल भी नहीं पा रहा था।
फिर अचानक उन्होंने तेज़ कदमों से अंदर आकर ज़ोर से मेरे हाथ से अपनी पैंटी छीन ली। जैसे ही पैंटी उनके हाथ में आई, उन्होंने उसी पल मुझे एक जोरदार थप्पड़ मारा।
मेरी गर्दन एक तरफ झटक गई। चेहरा जलने लगा। मैं घबराहट में तुरंत नीचे देखने लगा। मेरा लंड अभी भी बाहर था। मैंने हड़बड़ा कर तुरंत अपने लंड को वापस पैंट के अंदर ठूंस लिया और काँपते हाथों से चेन बंद की। दीदी मेरी तरफ गुस्से से देख रही थी… फिर उनके हाथ में पकड़ी पैंटी की तरफ।
उन्होंने दाँत भींचते हुए कहा, “जब मम्मी मार्केट से आएँगी ना… मैं उन्हें सब बता दूँगी कि तू क्या करता है।”
मेरी सांसें रुक गई। दिल जैसे पेट में गिर गया। मैंने घबरा कर सिर हिलाया, मगर आवाज़ बाहर नहीं निकली। दीदी अब भी उस पैंटी पर लगे सफ़ेद दाग़ को देख रही थी… और उनका गुस्सा हर पल बढ़ता जा रहा था।
मैंने हकलाते हुए कहा, “द…दीदी प्लीज़… मैं… मैं माफ़ी चाहता हूँ… मुझसे गलती हो गई…”
मैंने हाथ जोड़ने की भी कोशिश की, आवाज़ काँप रही थी, शरीर पूरा पसीने में भीगा था। मगर दीदी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनका चेहरा गुस्से से लाल था।
और अचानक… उनकी आँखों में आँसू भर आए। उन्होंने पैंटी को मुट्ठी में कस लिया, होंठ काँप रहे थे।
मैंने घबरा कर कहा, “दीदी प्लीज़… सुनो तो।”
लेकिन वह सुनने की हालत में नहीं थी। वह एक झटके से मुड़ी… और रोते हुए भाग कर अपने कमरे में चली गई। कमरे के भीतर से हल्की सी सुबकियाँ सुनाई दे रही थी, जैसे वह खुद को संभालने की कोशिश कर रही हो। दीदी की आँखों में आँसू मैंने कभी इस तरह नहीं देखे थे।
धीरे-धीरे मैं उनके कमरे के पास पहुँच गया। दरवाज़ा बंद था लेकिन अंदर रोने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। मैंने हिम्मत जुटा कर धीरे से कहा, “दीदी… सुनो…”
अंदर से कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ उनकी टूटी हुई साँसें। मैंने थोड़ा पास झुक कर फिर कहा, “प्लीज़ दीदी… बस एक सेकंड सुन लो…”
अचानक अंदर से उनकी चीख जैसी आवाज़ आई, जिसमें दर्द और गुस्सा दोनों मिले हुए थे, “मेरे कमरे से में मत आना!”
लेकिन मैं रुका नहीं। ना जाने कैसे, दरवाज़ा थोड़ा-सा धक्का देने पर खुल गया और मैं अंदर चला गया। जैसे ही उन्होंने मुझे अंदर आते देखा, वह एक-दम सहम कर पीछे सरक गई। उनकी आँखें लाल थी, चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ। वह काँपती हुई आवाज़ में चिल्लाई, “डोंट… डोंट कम नियर मी! दूर रहो! बाहर जाओ!”
उनकी हालत देख कर मेरा दिल बैठ गया। मैं भी डर गया… सच में डर। मेरी आँखों में अपने आप आँसू आ गए।
मैं रुआँसी आवाज़ में बोला, “द… दीदी प्लीज़… मम्मी पापा को मत बताना… प्लीज़… मैं डर गया हूँ… मैं कुछ नहीं करूँगा… बस मत बताना…”
लेकिन इससे पहले कि मैं अपनी बात पूरी करता, वह अचानक फट पड़ी। उनकी आवाज़ ज़ोर से गूँजी, कच्चे गुस्से से भरी हुई, “तू पागल हो गया है क्या! अपनी ही बड़ी बहन के बारे में ऐसे सोचने की हिम्मत कैसे हुई तेरी! क्या कमीनी हरकत है ये, गोलू! तू… तू कितना घटिया बन गया है!”
मेरे घुटने काँप गए, आँखों में आँसू भर आए। मैं फूट पड़ा, आवाज़ टूटती हुई, “दीदी प्लीज़… प्लीज़ मम्मी-पापा को मत बताना… मैं मर जाऊँगा डर से… मैं ऐसा फिर कभी नहीं सोचूँगा… प्लीज़ दीदी…”
मैं उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा था, साँसें तेज़, आँखें लाल। डर मेरे पूरे शरीर में फैल चुका था। कुछ देर तक वह बस मुझे ही घूरती रही, फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने गाल से आँसू पोंछे, नज़रों को मुझसे हटाया और भारी आवाज़ में बोली, “बस… बहुत हो गया। दूर हट। अभी के अभी निकल मेरे कमरे से… गोलू, अभी।”
मैं तुरंत पीछे हट गया। अपने कमरे में जाकर मैंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, जैसे कोई मुझे सुन लेगा। बिस्तर पर गिरते ही सब दबा हुआ दर्द फट पड़ा। मैंने चेहरा तकिये में छिपा लिया और रोना शुरू कर दिया। सिसकियां रुक ही नहीं रही थी। पूरा कमरा अँधेरा था, और उस अँधेरे में सिर्फ मेरी टूटी हुई साँसें और रोने की आवाज़ गूँज रही थी।
उस दिन के बाद मैं इतना डर गया था कि सच में लगा जैसे मैं मर ही जाऊँगा। लगता था बस अब सब खत्म हो जाएगा। पर सबसे बड़ी बात कि दीदी ने किसी को कुछ नहीं बताया। ना मम्मी को, ना पापा को।
दिन बीतते गए… एक हफ्ता, फिर दूसरा। पर मैं हिम्मत ही नहीं जुटा पाता था उनसे बात करने की। जब भी रसोई में, हॉल में या कहीं भी हमारी आँखें अचानक मिल जातीं, मैं तुरंत अपनी नज़रें फेर लेता, जैसे मुझे कोई जला दे रहा हो।
मम्मी-पापा को जल्दी समझ आ गया कि घर में कुछ अजीब चल रहा है। कई बार उन्होंने पूछा, “कुछ हुआ है क्या तुम दोनों के बीच?”
मैं तो वैसे ही डर से चुप रहता, और दीदी हर बार एक ही बात कहती, “कुछ नहीं हुआ। बस ऐसे ही।”
फिर एक दिन साक्षी दीदी के एग्जाम शुरू हो गए। उनको सुबह जाने के लिए देर हो रही थी और पापा भी ऑफिस के लिए निकल चुके थे। अगर दीदी बस से जाती तो उनका पेपर मिस हो जाता। मम्मी ने कहा कि मैं उन्हें कार में छोड़ आऊँ।
हम दोनों जल्दी-जल्दी नीचे आए और कार में बैठ गए। दीदी ने बैग गोद में रखा और हल्की सी थकी हुई मुस्कान दी। मैंने चाबी लगाई और कार स्टार्ट कर दी। सड़क पर अभी ट्रैफिक कम था, हवा खिड़की से अंदर आकर दीदी के बालों को छू रही थी। हम दोनों लगभग तीन महीनों बाद अकेले थे। मैं ड्राइव कर रहा था और दीदी साइड में चुप-चाप बैठी थी।
थोड़ी देर बाद उन्होंने धीरे से मेरी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “गोलू… मुझे तुमसे उस दिन वाली घटना के बारे में बात करनी है।”
उनकी बात सुन कर मेरा गला सूख गया। स्टीयरिंग पकड़ते-पकड़ते मेरी उंगलियाँ थोड़ी कांप गई। मैंने डर-डर कर उनकी तरफ देखा और धीरे से बोला, “दीदी… उस दिन के बाद मैंने कभी आपकी पैंटी को हाथ भी नहीं लगाया… अगर मैंने कुछ गलत किया हो तो… मुझे माफ कर देना।”
दीदी ने मेरी बात सुन कर बहुत हल्की सी मुस्कान दी, जैसे किसी बच्चे के डर को समझते हुए। वे थोड़ी आगे झुक कर धीरे से बोली, “तुमने कुछ भी गलत नहीं किया गोलू… कुछ भी नहीं। बस… मैं ये जानना चाहती थी कि उस दिन तुमने मेरी पैंटी पर क्यों मास्टरबेट किया? क्या मैंने तुम्हें कभी कोई गलत इशारा दिया था…?”
मैंने तुरंत सिर हिलाया, सांस अटकती हुई सी आवाज़ में बोला, “ना, नहीं दीदी… आपने मुझे कभी कोई गलत हिंट नहीं दिया। बस… जब आप मेरे साथ पॉर्न के बारे में इतनी खुल कर बात करती थी ना… तब मैं खुद को रोक नहीं पाता था।”
मैंने स्टीयरिंग से हाथ थोड़ा हटाया, दिल की धड़कन तेज थी, और बहुत धीरे से कहा, “और… दीदी… मेरी ज़िंदगी में आप ही एक लड़की हैं… जो मुझसे प्यार से बात करती हैं, मुझे समझती है। आप ही हो जो मेरे साथ ऐसे रहती हो कि मुझे लगता है मैं भी किसी के लिए खास हूँ… इसलिए उस दिन मैं खुद को कंट्रोल नहीं कर पाया।”
कुछ ही मिनट बाद कॉलेज का गेट नज़दीक दिखाई देने लगा। सड़क थोड़ी भीड़-भाड़ वाली थी, लेकिन मेरा ध्यान सिर्फ ड्राइविंग पर नहीं था। दीदी की बातों से दिल अभी भी तेज धड़क रहा था। मैंने कार धीरे करते हुए कॉलेज के सामने रोकी। दीदी ने बैग उठाया, दरवाज़ा खोला, लेकिन बाहर निकलने से पहले एक पल के लिए रुक गई। हवा में उनके बाल हल्के हल्के उड़ रहे थे, और चेहरा… जैसे किसी भारी सोच के नीचे दबा हो।
वो कार से बाहर निकल कर मेरी तरफ झुकीं और बहुत धीमी, लगभग फुसफुसाहट जैसी आवाज़ में बोली, “गोलू… उस दिन के बाद से… मुझे अपने व्यवहार पर बहुत बुरा लगा। मैं पूरी रात सो नहीं पाई थी।”
मेरी सांस वहीं अटक गई। मैं बस उन्हें देखता रह गया। दीदी ने नजरें इधर-उधर देखी, फिर मेरी तरफ झुक कर और भी हल्के सुर में कहा, “अगर… अगर तुम चाहो तो… मैं माफ़ी के तौर पर… अपने बूब्स दिखा सकती हूँ।”
मैं सीट पर जमे रह गया। दिल जैसे सीने से बाहर फट पड़े। कार के बाहर कॉलेज की हलचल थी, लेकिन उस पल मेरे लिए दुनिया ठहर गई थी। दीदी आँखें झुका कर वहीं खड़ी रही, हल्के कांपते होंठों से बस इतना कह पाई, “अगर तुम देखना चाहो तो… मैं आज शाम… दिखा दूंगी।”
यह कह कर उन्होंने धीरे से कदम पीछे खींचे, एक छोटी सी झिझकी भरी मुस्कान दी और फिर कॉलेज के गेट की ओर मुड़ गई।
मैं वहीं बैठा उनकी चाल को देखता रहा। हल्की हवा में उनका दुपट्टा उड़ता, बैग कंधे पर झूलता, और हर कदम जैसे मेरे दिल की धड़कन के साथ ताल में चल रहा था।
वो गेट के अंदर जाते-जाते एक पल के लिए रुकी, मुड़ कर मुझे देखा। मेरे हाथ स्टीयरिंग पर ही थे, लेकिन मन… अब उनके शाम वाले वादे में अटका हुआ था।
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