ये सब उस वक़्त शुरू हुआ, जब मैं मुंबई में रहता था और अपनी पढ़ाई कर रहा था। उस समय मैं मुंबई में अकेला रहता था और मेरा पूरा परिवार पटना में रहता था। हमारे परिवार में हम चार लोग हैं – मैं, मेरे माता-पिता और मेरी बड़ी बहन सोनाली।
सोनाली दिल्ली में एक आईटी कंपनी में काम करती थी। वो मुझसे दो साल बड़ी है। उसने अभी-अभी एक नई कंपनी जॉइन की थी और वहीं से उसकी कमाई शुरू हुई थी। मेरी कॉलेज की फ़ीस भी वही भरती थी। मैं उसे बहुत मानता था, क्योंकि वो भी मुझे उतना ही प्यार करती थी। हम बिल्कुल आम भाई बहन की तरह रहते थे… जब तक कि वह दिन नहीं आ गया।
एक दिन उसने मुझे फोन किया और बताया कि वो मुंबई आ रही थी। क्योंकि उसकी कंपनी ने मुंबई में नई ब्रांच खोली थी और अब उसे वहीं काम करना होगा। परिवार वाले ये सुन कर खुश हो गए कि अब हम दोनों एक ही शहर में रहेंगे। सिर्फ सात दिन बाद ही उसने मुंबई आने का प्लान कर लिया। मैंने कहा था कि मैं उसे एयरपोर्ट से लेने आ जाऊँगा, लेकिन उसने मना कर दिया। बोली, “मेरी कंपनी ही सारी व्यवस्था कर देगी, तुम परेशान मत होना।”
उस शाम अचानक उसका फोन आया। उसकी आवाज़ कुछ दब सी, थकी सी लग रही थी। मैंने तुरंत पूछा, “दीदी… आप आ गई क्या मुंबई?”
लेकिन उसने धीरे से कहा, “मुझे थोड़ी दिक्कत हो रही है। तुम्हें मेरे पास आना पड़ेगा… मैं तुम्हें लोकेशन भेज रही हूँ।”
लोकेशन मिलते ही मैंने जल्दी से एक टैक्सी बुक की और उसकी भेजी जगह की तरफ निकल पड़ा। रास्ते भर दिल में अजीब सी बेचैनी थी। दो साल बाद मैं उसे सामने देखने वाला था। जब मैं वहाँ पहुँचा तो बिल्डिंग के बाहर, स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में, वो अकेली खड़ी थी… अपने सूटकेस के साथ।
दो साल बाद उसे देखकर मैं कुछ पल तो बस उसे ही देखता रह गया। वो पहले जैसी ही थी… लेकिन फिर भी कुछ बदल गई थी। उसके बाल थोड़े लंबे हो गए थे, हवा में हल्के से उड़ते हुए उसके चेहरे को छू रहे थे। हल्का सा मेकअप, आँखों में थकान लेकिन फिर भी वही गहरी चमक, और उसके चेहरे पर एक नर्म सी मुस्कान, जिसे देख कर समझ जा रहा था कि वो मुझे देख कर राहत महसूस कर रही थी।
वो एक सिंपल सी जींस और ढीली टी-शर्ट में थी। लेकिन उसमें एक ऐसी खुबसूरती आ चुकी थी जो पहले नहीं थी। जैसे दिल्ली की तेज रफ़्तार ने उसे और भी कॉन्फिडेंट और… खूबसूरत बना दिया हो।
उसकी ढीली टी-शर्ट के नीचे भी उसके स्तनों की नरम, खूबसूरत गोलाई साफ झलक रही थी। कपड़े ढीले थे, पर हल्की रोशनी में उनका उभार धीमे से उभर कर दिख जाता था, जैसे हर साँस के साथ कपड़ा उसके सीने पर हल्का-सा उठता और गिरता हो।
टी-शर्ट इतनी मुलायम थी कि उसके अंदर छिपी गोलाई की नरमी साफ महसूस होती थी, और नीचे की तरफ कपड़ा उसके शरीर से हल्का सा चिपक कर उसकी कमर और पेट की कोमल लाइन को उभार देता था।
मैं उसके और करीब गया, शायद इतना कि उसके चेहरे का हल्का-सा काँपना भी देख पा रहा था। मुझे देखते ही वो एक पल के लिए ठिठकी… और फिर बिना कुछ कहे सीधे मेरी तरफ बढ़ आई।
जैसे ही मैं बिल्कुल उसके सामने पहुँचा, उसने धीरे-से अपने दोनों हाथ मेरे गले के पीछे रखे… और अचानक पूरी गर्मी के साथ मुझे कस कर अपनी बाँहों में ले लिया। और उसी पल, उसका सीना सीधे मेरे सीने से आकर लगा।
उसकी ढीली टी-शर्ट के नीचे छिपे उसके स्तन मेरी छाती पर इतने मुलायम, इतने गर्म महसूस हुए कि एक पल के लिए मेरी साँस अटक गई। वो ना तो बहुत जोर से चिपके थे, ना ढीले, बस इतने करीब कि उनकी असली नरमी मेरी टी-शर्ट के कपड़े से होते हुए भी साफ महसूस हो रही थी।
दो साल बाद पहली बार उसे इतने करीब महसूस करते हुए… उसके शरीर की वो गर्म, मुलायम छुअन मेरे पूरे बदन में उतर गई थी।
मैंने धीरे-से पूछा, “क्या हुआ?” ये सुनते ही उसने मुझे तुरंत छोड़ दिया। उसके हाथ काँप रहे थे, आँखें अचानक भर आई, और वो मुँह मोड़ कर साँस रोकने लगी, जैसे रोना चाह कर भी खुद को रोक रही हो।
“क्या हुआ… बताओ ना,” मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
वो मुश्किल से अपनी आवाज़ संभाल पाई, “जो अपार्टमेंट कंपनी ने मेरे लिए बुक कीया था… वो अभी अवेलेबल ही नहीं है। ओनर के फैमिली इशू हो गए… अचानक से उन्होंने जगह खाली ही नहीं की।” उसकी आवाज़ टूटने लगी थी, “मुझे… मुझे रहने को कुछ भी नहीं मिला अभी। मैं पूरी तरह स्टक हो गई हूँ…”
मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और कहा, “सुनो… यहाँ अँधेरा होने वाला है। चलो मेरे साथ। कल सुबह होते ही हम नया अपार्टमेंट ढूँढ लेंगे। अभी तुम अकेली ऐसे बाहर नहीं रहोगी।”
मैंने तुरंत मोबाइल निकाला और टैक्सी बुक कर दी। टैक्सी आई तो मैंने उसका सूटकेस पीछे रखा और उसे पहले बैठने दिया। मैं उसके बगल में जाकर बैठा ही था कि वो धीरे-धीरे सरक कर और करीब आ गई… फिर बिना कुछ कहे अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।
उसके बालों की हल्की-सी खुशबू मेरे गले तक आ रही थी। उसका गर्म सा गाल मेरे कंधे से लगा हुआ था, और उसके बदन की हल्की-हल्की थकान मेरी बाँहों तक महसूस हो रही थी।
टैक्सी की रौशनी और सड़क के झटकों के साथ उसकी नेकलाइन थोड़ी खिसकी हुई थी… और मेरे नीचे देखते ही मेरी साँस अटक गई। उसके सीने की गहराई साफ दिख रही थी, कपड़ों के अंदर उसके मुलायम हौले-हौले हिलती हुई… हर छोटे झटके पर उसके स्तन हल्के से उछलते, फिर अपनी जगह लौट आते। मैं ना चाहते हुए भी बार-बार उसकी ओर देख रहा था।
टैक्सी धीरे-धीरे रास्ते के गड्ढों से गुज़र रही थी। एक बड़ा झटका आया, और वो मेरे कंधे पर और भी ज़्यादा झुक गई इतनी कि उसका टीशर्ट थोड़ा और नीचे खिसक गया।
मेरी नज़र तेज ही नीचे गई… और उस पल मेरा दिल एक-दम थम सा गया। कपड़े की ढीली होती लाइन से उसका ब्रा का हल्का सा किनारा दिखाई दे रहा था, पतला, हल्का गुलाबी-सा, जो उसकी गर्म साँसों और शरीर की हरकत के साथ हौले-हौले हिल रहा था।
टैक्सी जैसे-तैसे उन आख़िरी कुछ मोड़ों से गुज़री और धीरे से मेरे अपार्टमेंट के सामने रुक गई। मैंने किराया दिया, उसका सूटकेस उतारा, और हम दोनों सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर आए।
अंदर घुसते ही उसने चारों तरफ देखा—मेरा छोटा सा रूम… एक कमरे वाला, बिल्कुल आम था। एक छोटा-सा किचन एक सिंगल बेड वाला बेडरूम और एक कॉमन बाथरूम, बस यही था मेरा पूरा सेटअप।
उसने सूटकेस बेड के पास रखा और धीमे से पूछा, “बाथरूम कहाँ है? मुझे शावर लेना है… बहुत थक गई हूँ।”
मैंने बाथरूम की ओर इशारा किया, “यहाँ… इस तरफ।”
वो बिना कुछ बोले उधर चली गई, दरवाज़ा अंदर से बंद हुआ और पानी चलने की आवाज़ आने लगी। मैं किचन की तरफ चला गया और गैस ऑन करके चाय चढ़ा दी।
लेकिन मेरा दिमाग… वो कहीं और ही अटक गया था। मैं चाह कर भी उस झटके में दिखी उसके ब्रा की वो हल्की गुलाबी झलक नहीं भूल पा रहा था… उसके स्तनों की वो मुलायम उछाल… उसकी गर्माहट… उसका सिर मेरे कंधे पर…चाय उबल रही थी, लेकिन मेरा दिमाग उसी पल में अटक कर धड़क रहा था।
कुछ मिनटों बाद पानी की आवाज़ धीरे-धीरे बंद हुई। तभी बाथरूम के दरवाज़े के पीछे से उसकी बहुत ही धीमी, शरमाई हुई आवाज़ आई “गोलू… मेरे… कपड़े दोगे?”
उसका सूटकेस बेड के पास रखा था। मेरा दिल धड़कता हुआ मैं उसके पास गया और हल्की आवाज़ में पूछ दिया, “कौन-से वाले, दीदी?”
शायद मेरी आवाज़ थोड़ी ज़्यादा तेज़ थी… क्योंकि बाथरूम के अंदर से दो सेकंड की हल्की चुप्पी आई। फिर उसकी शर्म से भरी, काँपती हुई आवाज़ निकलती हुई सुनाई दी, “वो… पिंक वाला टी-शर्ट… उधर ही रखा है… और… काला वाला शॉर्ट्स भी…”
उसने बोलते-बोलते एक लंबा साँस लिया, जैसे आगे कहना उसके लिए और भी मुश्किल हो रहा था। फिर बहुत धीरे… लगभग फुसफुसाहट में बोली, “और… मेरी वो… काला वाला ब्रा… और… काला वाला इनरवियर भी दे देना…”
मैं सूटकेस के पास झुका। उँगलियाँ कपड़ों के बीच चलते ही मेरा गला खुद ब खुद सूख गया। उसके शॉर्ट्स और टी-शर्ट तो आसानी से मिल गए… लेकिन जैसे ही उँगलियाँ उस पतली, काली ब्रा पर पड़ी… मेरा दिल एक बार में तेज़ धड़कने लगा।
ये पहली बार था जब मैं उसके किसी इतने निजी कपड़े को हाथ लगा रहा था। ब्रा का कपड़ा नरम था… बिल्कुल हल्का… जैसे उसके बदन की गर्माहट अब भी उस पर बाकी हो।
फिर नीचे उसके काले इनरवियर को उठाया नर्म, छोटा, और उतना ही निजी। उसे हाथ में पकड़ते ही मेरे अंदर अजीब-सी घबराहट और गर्मी एक साथ उठी।
मैंने कपड़ों का छोटा-सा ढेर बनाया और गहरी साँस लेकर बाथरूम की तरफ बढ़ा।
दरवाज़े के ठीक सामने पहुँच कर मैंने हल्की आवाज़ में कहा, “दीदी… ये रहे आपके कपड़े।”
अंदर से दरवाज़े की चिटकनी नहीं खुली, बस एक पतली सी लाइन खुली, जिसमें से उसका भीगा हुआ हाथ बाहर आया… और मैं कपड़े उसके हाथ पर रखते हुए एक सेकंड भी सांस लेना भूल गया। कपड़े उसके हाथ में देते ही दरवाज़ा फिर से हल्का सा बंद हो गया।
मैं बाहर खड़ा था, लेकिन दिमाग उसके अंदर की तस्वीरें खुद ही बना रहा था। भीगी त्वचा पर लुढ़कती पानी की धारें… उसके बाल कंधों से चिपके हुए… और शॉवर की धुंध में उसका पूरा बदन जैसे हल्का सा चमक रहा हो।
कुछ मिनट बाद, क्लिक की आवाज़ आई… दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला… और वो बाहर आई। उसने पिंक टी-शर्ट पहन लिया था, जो भीगे बालों की वजह से गर्दन के पास हल्का चिपका हुआ था। ब्रा की मुलायम उभार टी-शर्ट को नीचे से थोड़ा उठाए हुए थे… और गले की लाइन ढीली थी, जिससे साफ उसकी गहरी, गर्म क्लीवेज दिख रही थी।
उसका काला शॉर्ट इतना टाइट था कि उसकी जांघों की शेप और बीच की मुलायम लाइन हल्के-हल्के उभर कर दिखाई दे रही थी। इतनी कि कपड़ा उसके शरीर की बनावट का हर हिस्सा दिखा रहा था। वो मेरे पास आई, हल्की मुस्कान के साथ बोली, “चाय… बनी?”
मैंने कप उठा कर उसकी तरफ बढ़ाया। उसके भीगे बालों से पानी की दो बूंदें उसके गले पर फिसल कर टी-शर्ट के अंदर गायब हो गई… और मेरी आँखें अपने आप उस रास्ते को फॉलो करने लगी।
वो बेड पर बैठ गई पैर मोड़ कर। इस पोज़ में उसका शॉर्ट थोड़ा ऊपर चढ़ गया। उसकी जांघें और भी ज़्यादा खुल गई। टी-शर्ट ढीली थी, और जैसे ही उसने एक घूंट लिया, कप ऊपर उठा और उसकी क्लीवेज और गहरी दिखने लगी।
मैं सामने खड़ा था… पर नज़रें संभाल नहीं पा रहा था। उसके कपड़ों के अंदर की हर सुंदर लाइन इतनी साफ दिख रही थी कि जैसे कल्पना नहीं, हकीकत सामने रखी हो। कुछ देर बाद, उसने कप खाली किया, करवट बदली और बेड पर आधी लेट-सी गई। उसके चेहरे, बालों और कपड़ों पर गर्म रोशनी पड़ रही थी। वो थकी हुई थी… पर सुकून में भी।
मैं उसके पास वाली जगह पर बैठ गया। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ बातें शुरू की, दिल्ली, उसका ऑफिस, यहाँ आने का तनाव, पुराने दिनों की बातें… लगभग एक घंटा ऐसे ही बातें करते निकल गया। हम दोनों आराम में आ चुके थे। वो मेरे इतने पास थी कि उसकी साँसें मेरे हाथ को छू कर गुजर रही थी।
फिर उसने धीरे से आँखें मलते हुए कहा, “गोलू… मुझे ना… अब नींद आ रही है।”
मैं उठने लगा। वो बोली, “कहाँ जा रहे हो?”
मैंने सहज ही कहा, “किचन में… वहीं सो जाऊँगा। बेड छोटा है ना…”
वो एक पल के लिए चुप रही… फिर धीरे, पर बहुत नरमी से बोली, “अरे पागल… मैं तेरी बड़ी बहन हूँ। मेरे साथ ही सो जा।”
मैं एक पल को उसके चेहरे को देखता रह गया। उसकी आँखें आधी बंद थी, आवाज़ में थकान थी… पर भरोसा भी।
मैंने हिचकते हुए बेड की दूसरी साइड पर लेटने के लिए कदम बढ़ाए।
वो पहले ही नींद में उतरने लगी थी, धीमी साँसें, शांत चेहरा, और उसके भीगे बाल अभी भी हल्की ठंडक छोड़ रहे थे।
मैं बेड पर लेट गया, पर मेरी धड़कनें आम नहीं हो रही थी। वो बस कुछ इंच की दूरी पर थी। उसकी पिंक टी-शर्ट हल्की-सी उठी हुई, और शॉर्ट्स उसके शरीर से चिपके हुए थे।
कुछ ही मिनटों में उसकी साँसे गहरी और धीमी होने लगी वो सो चुकी थी। लेकिन मैं… मैं बिल्कुल नहीं सो पा रहा था।
रात के बीच शायद ठंड लगी होगी या नींद में करवट बदली होगी… क्योंकि अचानक, बिना किसी आवाज़ के… वो मेरी तरफ खिसक आई।
उसकी जाँघ मेरे पैर से लग गई। उसका हाथ मेरे हाथ को हल्का छू गया। और अगले ही पल… उसकी छाती का नरम उभार मेरे हाथ के पास आकर टिक गया, इतना पास कि उसकी गर्माहट मेरी त्वचा तक महसूस हुई।
मेरी साँस वहीं अटक गई। वो गहरी नींद में थी… पर उसका बदन अनजाने में मेरे बिल्कुल करीब आ गया था। मैं हिल भी नहीं पा रहा था, उसके स्तनों की वो मुलायम, धीमी दबाव जैसी गर्मी सीधी मेरे हाथ तक पहुँच रही थी… और मेरा दिल पागलों की तरह धड़क रहा था।
मैंने फुसफुसाहट के साथ उसको पुकारा, “दीदी।”
लेकिन उन्होंने कोई भी जवाब नहीं दिया। पता नहीं उस समय मैं क्या सोच रहा था। मैंने सब हिम्मत एक साथ मिला कर उनके छाती पर हाथ रख दिया और तुरंत आंखें बंद कर ली, मुझे डर था कि कहीं वह जाग ना जाए।
उनकी साँसें वहीँ शांत थी… कोई हरकत नहीं। बस उनका गर्म, भारी स्तन मेरी हथेली के नीचे धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैंने हल्का सा दबाव दिया… उतना ही जितना नींद में किसी करवट जैसा लगे। पर उन्होंने फिर भी मेरा हाथ नहीं हटाया।
मेरी उंगलियाँ धीरे-धीरे फैली… और मैं उनकी गर्म, भरी हुई गोलाई को महसूस करने लगा। त्वचा के ऊपर टी-शर्ट की मुलायम कपड़े की लेयर थी, लेकिन उसके नीचे उनका नरम, गर्म मांस मेरे हाथ में भर रहा था।
मैं पूरा कांप रहा था, डर से भी, और उस एहसास से भी जो मैं पहली बार जिंदगी में महसूस कर रहा था।
वो अभी भी गहरी नींद में थी। उनका चेहरा मेरी तरफ आधा मुड़ा हुआ, बाल गालों पर बिखरे हुए… और छाती मेरे हाथ के बिलकुल नीचे।
मेरी उंगलियाँ अनजाने में थोड़ा और नीचे सरकी… और स्तन की पूरी गोलाई मेरी हथेली में समा गई। उनका शरीर किसी भी तरह का विरोध नहीं कर रहा था, जैसे वो नींद में भी मुझे वहीं रहने दे रही हों। मैंने साँस रोकी हुई थी… और मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था।
यहीं मुझे लगा, आज शायद मेरी किस्मत साथ थी।
धीरे-धीरे, बहुत सावधानी से, मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी टी-शर्ट के अंदर सरका दी। गर्म त्वचा का सीधा स्पर्श होते ही मेरा पूरा बदन सिहर गया। मैं पहली बार किसी लड़की के स्तन छू रहा था… और वो भी दीदी के।
मैंने बहुत धीरे, बहुत संभल कर उसे दबाया… उसकी त्वचा मेरी उंगलियों के नीचे पिघलती सी लगी। लेकिन जैसे ही मैंने दूसरी बार दबाया वो अचानक झटके से जाग गई। उसकी साँस अटक गई। आँखें पूरी खुल गई। और मेरा हाथ… अभी भी उसकी टी-शर्ट के अंदर था।