पिछला भाग पढ़े:- दीपिका दीदी और मेरा राज-8
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
दीपिका दीदी बिस्तर पर पूरी तरह नंगी लेटी हुई थी और मेरा सख्त लंड उनकी चूत में जाने के लिए तैयार था। मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और उनकी टाँगों के बीच बैठ गया।
मेरी नज़र उनके माथे पर लगे कुमकुम पर पड़ी। उसे देखते ही मेरे मन में एक अजीब-सा एहसास हुआ। अब जब मेरा लंड उनके शरीर को छूने वाला था, तो मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लग रहा था, क्योंकि अब हम सिर्फ भाई-बहन नहीं थे, बल्कि पति-पत्नी बन चुके थे। अब मुझे लग रहा था कि उनके साथ सेक्स करने से मुझे कोई रोक नहीं सकता था।
मैंने धीरे से अपने लंड को उनकी चूत के बाहरी हिस्से से छुआ। वह जगह पहले से ही पूरी तरह गीली थी, जैसे उनका शरीर भी मेरे करीब आने का इंतज़ार कर रहा हो।
दीदी ने शर्म से अपने निचले होंठ को दाँतों के बीच दबा रखा था। उनका चेहरा पूरी तरह लाल हो गया था और वह मेरी तरफ देखने से बच रही थी। उनकी साँसें धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थी और हर बार जब वह लंबी साँस लेती, तो उनके भारी स्तन धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगते थे।
मैं उनकी टाँगों के बीच बैठा चुप-चाप उन्हें देख रहा था। उनके चेहरे की शर्म, उनकी तेज़ होती साँसें और मेरे इतने करीब होने की घबराहट उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी।
मैं धीरे से उनके कान के पास झुका और फुसफुसाते हुए बोला, “दीदी, तुम्हारी चूत बहुत मुलायम है।”
मेरी बात सुनते ही उनका चेहरा शर्म से और भी ज़्यादा लाल हो गया। उन्होंने अपनी आँखें हल्की-सी बंद कर ली और कुछ देर तक कुछ नहीं बोली। फिर धीमी और कांपती हुई आवाज़ में बोली, “गोलू, अब और बातें मत करो… बस अपना लंड मेरे अंदर डाल दो।”
उनकी बात सुनने के बाद भी मैंने तुरंत अपना पूरा लंड अंदर नहीं डाला। मेरा मन उनके साथ थोड़ी शरारत करने का था। मैंने बस अपने लंड की नोक उनकी चूत के मुँह पर रखी और उसे हल्का-सा अंदर धकेल कर फिर वापस बाहर खींच लिया। वह इतनी ज़्यादा गीली थी कि पहली बार अंदर जाते ही मेरे लंड की नोक उनके रस से पूरी तरह भीग गई।
मैं बार-बार अपनी नोक को थोड़ा-सा अंदर डालता और फिर वापस बाहर खींच लेता। हर बार ऐसा करते ही वह अपनी कमर बिस्तर से ऊपर उठा देती और उनके मुँह से धीमी सी आह निकल जाती। ऐसा लग रहा था जैसे वह चाहती थी कि मैं अब उन्हें और इंतज़ार न करवाऊँ।
कुछ ही देर में मेरा लंड उनके रस से पूरी तरह भीग गया था। गीलेपन की वजह से हर बार मेरी नोक आसानी से अंदर जाकर वापस बाहर आ रही थी। दीदी अपनी आँखें कस कर बंद किए हुए थी और बेचैनी में बार-बार अपनी कमर मेरी तरफ उठा रही थी। मैं जितनी बार उन्हें हल्का-सा छूता, उनके शरीर में सिहरन दौड़ जाती और उनका पूरा बदन हल्का-सा काँपने लगता।
उन्होंने तड़पते हुए कहा, “गोलू, अब और खेलो मत… बस अपना लंड मेरे अंदर डाल दो।”
उनकी हालत देख कर मेरे चेहरे पर हल्की-सी शरारती मुस्कान आ गई। मुझे पता था कि वह पूरी तरह तैयार थी और उनकी चूत उनके अपने रस से पूरी तरह भीग चुकी थी, लेकिन फिर भी मैं कोई जल्द-बाज़ी नहीं करना चाहता था। यह हम दोनों के लिए पहली बार था और मैं चाहता था कि सब कुछ धीरे-धीरे हो, ताकि उन्हें ज़्यादा तकलीफ ना हो।
मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और थोड़ा-सा थूक उनकी चूत के मुँह पर लगा दिया, ताकि वहाँ और ज़्यादा गीलापन हो जाए और अंदर जाते समय उन्हें कम तकलीफ हो।
इसके बाद मैंने अपनी कमर धीरे-धीरे आगे बढ़ाई और अपने लंड को उनकी चूत के मुँह पर रख कर बहुत सावधानी से अंदर धकेलना शुरू किया। जैसे ही मेरे लंड की नोक उनके अंदर गई, अचानक हुए खिंचाव से उनके मुँह से हल्की-सी चीख निकल गई।
उनके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दे रहा था। उनके माथे पर हल्की लकीरें पड़ गई और उन्होंने अपनी आँखें कस कर बंद कर ली। उन्हें तकलीफ में देख कर मैं तुरंत वहीं रुक गया और आगे नहीं बढ़ा।
मेरा लंड अभी थोड़ा-सा ही उनके अंदर गया था, लेकिन फिर भी मैं उनकी चूत की कसावट को अपने चारों तरफ साफ महसूस कर पा रहा था। वह इतनी ज़्यादा तंग थी कि ऐसा लग रहा था जैसे अंदर की नरम दीवारों ने मेरे लंड को चारों तरफ से कस कर पकड़ लिया हो।
मैं बिना हिले वहीं रुका रहा और उनकी तरफ देखने लगा। वह अपनी आँखें बंद किए धीरे-धीरे गहरी साँसें ले रही थी, जैसे अपने दर्द को कम करने और इस नए एहसास की आदत डालने की कोशिश कर रही हों।
उन्होंने तेज़ साँसें लेते हुए कहा, “गोलू… दर्द तो हो रहा है, लेकिन रुकना मत। बस अपना पूरा लंड मेरे अंदर डाल दो।”
उनकी बात सुनते ही मेरा लंड उनकी तंग चूत के अंदर और भी ज़्यादा अकड़ गया। वह दर्द सहने की कोशिश कर रही थी, लेकिन फिर भी मुझे रुकने नहीं देना चाहती थी। यह सोच कर ही मेरे अंदर एक अलग-सा जोश भर गया। मैंने एक गहरी साँस ली, अपनी कमर पर पूरा ज़ोर लगाया और एक ही तेज़ झटके में अपना पूरा लंड उनकी चूत के अंदर धकेल दिया।
यह सब इतनी जल्दी और अचानक हुआ कि उनके मुँह से एक तेज़ चीख निकल गई और उनका पूरा शरीर बिस्तर पर तन गया। उनकी आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था और वह ज़ोर-ज़ोर से हाँफने लगी।
उनकी हालत देख कर मैं तुरंत वहीं रुक गया और घबराते हुए पूछा, “दीदी… बहुत ज़्यादा दर्द हो रहा है? क्या मैं रुक जाऊँ?”
उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोली और मेरी तरफ देखा। उनका चेहरा लाल था और उनकी साँसें अब भी बहुत तेज़ चल रही थी। उन्होंने दर्द को सहते हुए कहा, “नहीं गोलू, बिल्कुल मत रुकना… आज हमारी सुहागरात है। मैं इसे अधूरा नहीं छोड़ना चाहती। मुझे तुम्हारा पूरा लंड अपने अंदर महसूस करना है। इसे पूरा करो… मैं इसे और भी ज़्यादा चाहती हूँ।”
उनकी ये बात सुन कर मैं अब खुद को रोक नहीं पाया। मेरे लिए अपने आप पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था। मैंने अपनी कमर आगे-पीछे करना शुरू कर दिया। हर बार जब मेरा लंड उनकी चूत के अंदर पूरी तरह जाता और फिर बाहर आता, तो गीली और चिपचिपी आवाज़ पूरे कमरे की चुप्पी में साफ सुनाई दे रही थी।
दीपिका दीदी के चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दे रहा था। उनकी आँखों से आँसू निकल कर गालों पर बह रहे थे और वह अपने होंठों को दाँतों के बीच कस कर दबाए हुए थी, जैसे अपनी चीखों को बाहर आने से रोकने की कोशिश कर रही हों। उन्हें देख कर मुझे साफ समझ आ रहा था कि उन्हें बहुत तकलीफ हो रही है, लेकिन फिर भी उन्होंने एक बार भी मुझे रुकने के लिए नहीं कहा।
वह दर्द सहने की कोशिश करते हुए अपनी टाँगों को थोड़ा और फैला रही थी, ताकि मैं उनके अंदर और गहराई तक जा सकूँ। हर बार जब मैं अपनी कमर आगे करता, उनका पूरा शरीर बिस्तर पर हिल जाता और उनके भारी स्तन तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगते।
मेरा लंड उनकी तंग चूत की अंदर की नरम दीवारों से रगड़ खा रहा था और वहाँ की गर्मी और गीलापन मुझे साफ महसूस हो रहा था। जैसे-जैसे मैं अपनी कमर आगे-पीछे कर रहा था, उनकी साँसें और भी तेज़ होती जा रही थी। कभी वह अपनी आँखें कस कर बंद कर लेती, तो कभी दर्द सहते हुए लंबी साँस लेने की कोशिश करती।
उनके चेहरे पर अब भी दर्द था और उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन फिर भी वह मुझे रोक नहीं रही थी। वह अपनी तेज़ साँसों को काबू करने और दर्द सहने की कोशिश कर रही थी, जैसे वह आज की इस सुहागरात के हर पल को पूरी तरह महसूस करना चाहती हों।
जैसे-जैसे मैं अपनी रफ़्तार बढ़ाता गया, कमरे में बस हम दोनों की तेज़ साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मेरा लंड उनकी तंग चूत के अंदर बार-बार रगड़ खा कर बहुत गर्म हो चुका था। हर बार जब मैं अपनी कमर आगे करता, वह भी अपनी कमर ऊपर उठा कर मेरा साथ देने की कोशिश करती।
दीपिका दीदी अपने निचले होंठ को दाँतों के बीच दबाए हुए थी। अब वह भी मेरे साथ अपनी कमर हिला रही थी, ताकि मेरा लंड उनके अंदर और गहराई तक जा सके। हर बार जब मैं उनके अंदर पूरा जाता, उनके मुँह से तेज़ आह निकल जाती और उनकी साँसें कुछ पल के लिए और भी तेज़ हो जाती।
उनका पूरा शरीर हल्का-हल्का काँप रहा था। मेरे हर तेज़ झटके के साथ वह बिस्तर पर थोड़ा पीछे खिसक जाती। उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे कंधों को कस कर पकड़ रखा था। उनकी पकड़ इतनी तेज़ थी कि उनकी उँगलियाँ मेरी त्वचा में धँस रही थी।
अब उनकी आँखों में पहले जैसा दर्द नहीं था। उसकी जगह एक अलग-सी बेचैनी और चाहत दिखाई दे रही थी। वह जिस तरह मेरी तरफ देख रही थी, उससे मेरे लिए खुद को रोकना और भी मुश्किल होता जा रहा था और मैं अपनी रफ़्तार और बढ़ाता जा रहा था।
अचानक उन्होंने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दीं और मुझे खींच कर अपने और करीब कर लिया। फिर मेरे कान के पास धीमी आवाज़ में बोली, “गोलू, आज मुझे बस तुम्हें महसूस करना है… अपनी पूरी ताकत लगा दो।”
उनकी बात सुनते ही मेरे अंदर का जोश और बढ़ गया। मैंने उन्हें अपने और करीब पकड़ लिया और पहले से भी तेज़ अपनी कमर आगे-पीछे करने लगा। अब हम दोनों एक साथ अपनी कमर हिला रहे थे। कमरे में बस हमारी तेज़ साँसें और आवाज़ें सुनाई दे रही थी। उस समय हम दोनों को अपने आस-पास की किसी भी चीज़ का ध्यान नहीं था। हम बस एक-दूसरे में पूरी तरह खो चुके थे।
अब हम दोनों के शरीर पसीने से पूरी तरह भीग चुके थे और एक-दूसरे से चिपके हुए थे। हमारी रफ़्तार इतनी तेज़ हो गई थी कि पूरे कमरे में बस हमारी तेज़ साँसें और शरीर के आपस में टकराने की गीली आवाज़ें सुनाई दे रही थी। दीपिका दीदी अब पूरी तरह मेरे साथ खो चुकी थी। मेरे हर तेज़ झटके के साथ उनका शरीर बिस्तर पर हिल रहा था और उनके मुँह से टूटी-टूटी आहें निकल रही थी।
उन्होंने अपने नाखून मेरी पीठ में और ज़्यादा गड़ा दिए। उनकी वजह से मेरी पीठ पर हल्की जलन हो रही थी, लेकिन उस समय मुझे वह भी अच्छा लग रहा था। अब वह बिल्कुल मेरे साथ अपनी कमर हिला रही थी। उनके होंठ काँप रहे थे और उनके मुँह से बार-बार दबी हुई आहें निकल रही थी। मुझे साफ महसूस हो रहा था कि वह भी अब खुद को ज़्यादा देर तक रोक नहीं पाएँगी।
मुझे अपने लंड के चारों तरफ उनकी चूत की कसावट साफ महसूस हो रही थी। अंदर की नरम दीवारें बार-बार मेरे लंड को कस कर पकड़ रही थी, जिससे मेरे लिए खुद पर काबू रखना और भी मुश्किल होता जा रहा था।
जब मुझे महसूस हुआ कि अब मैं ज़्यादा देर तक खुद को नहीं रोक पाऊँगा, तो मैं उनके कान के पास झुका और तेज़ साँसें लेते हुए बोला, “दीदी… मैं अब आने वाला हूँ!”
मेरी बात सुनते ही उन्होंने अपनी बाँहें मेरे चारों तरफ और कस कर लपेट ली और मुझे अपने शरीर के और करीब खींच लिया। फिर हाँफते हुए बोली, “हाँ गोलू… मुझे सब कुछ चाहिए। सब कुछ मेरे अंदर ही निकाल दो।”
उनकी बात सुनते ही मैंने आखिरी बार अपनी पूरी ताकत लगाई और अपनी कमर आगे करते हुए एक गहरा और तेज़ झटका दिया। अगले ही पल मैं खुद को रोक नहीं पाया और उनके अंदर ही मेरा सफेद पानी निकलने लगा।
मैंने उन्हें कस कर पकड़े रखा और अपना पूरा सफेद पानी उनके अंदर ही निकाल दिया। अंदर की गर्मी और कसावट के बीच मेरा पूरा शरीर काँप रहा था। उसी समय दीपिका दीदी का शरीर भी तेज़ी से काँपने लगा। उन्होंने अपनी आँखें कस कर बंद कर ली और मुझे अपनी बाँहों में और ज़्यादा कस लिया।
कुछ देर बाद हम दोनों बिना हिले वैसे ही एक-दूसरे से लिपटे रहे। हमारी साँसें अब भी बहुत तेज़ चल रही थी और पसीने से भीगे हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे। दीदी ने अपनी आँखें बंद रखीं और चुप-चाप अपना चेहरा मेरे सीने से लगा लिया।
कुछ देर तक हम दोनों थके हुए एक-दूसरे की बाँहों में पड़े रहे। ऐसा लग रहा था जैसे उस समय हमारे आस-पास की पूरी दुनिया रुक गई हो। जब हमारी साँसें और धड़कनें धीरे-धीरे शांत हुई, तो हम बिस्तर से उठ गए।
उस दिन हमने कपड़े पहनने की ज़रूरत ही नहीं समझी। पूरा दिन सिर्फ हम दोनों का था और हमें परेशान करने वाला कोई नहीं था। हम दोनों पूरी तरह नंगे थे और बिना किसी शर्म के पूरे घर में घूम रहे थे।
कुछ देर बाद हम हॉल में गए, जहाँ दीपिका दीदी कुछ दिन पहले ताज़े फल खरीद कर लाई थी। हम वहीं बैठ गए और साथ में फल खाने लगे। उस समय सब कुछ कितना अलग लग रहा था। हम दोनों बिना कपड़ों के एक-दूसरे के इतने करीब बैठे थे, लेकिन अब हमारे बीच पहले जैसी कोई शर्म नहीं बची थी।
हम अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे। कभी मोबाइल देखते, कभी इंस्टाग्राम पर रील्स स्क्रॉल करते और बीच-बीच में पानी पीते हुए एक-दूसरे से बातें करते। ऐसा लग रहा था जैसे यह हमारे लिए बिल्कुल आम बात हो।
तभी फल खाते समय मेरी नज़र दीपिका दीदी पर पड़ी। वह एक रसीला फल खा रही थी कि उसका थोड़ा-सा रस उनकी ठुड्डी से नीचे बहने लगा। वह धीरे-धीरे उनकी गर्दन से होता हुआ उनके भरे हुए स्तनों की तरफ चला गया और उनकी त्वचा पर चमकने लगा।
उन्होंने देखा कि मैं उन्हें ही देख रहा हूँ। उन्होंने मेरी तरफ देखा और हल्की-सी शरारती मुस्कान दी। उनकी मुस्कान देख कर ऐसा लगा जैसे उन्हें अच्छी तरह पता था कि इस तरह बिना कपड़ों के मेरे सामने बैठना और उनका मेरे साथ इतना खुल कर रहना मुझे कितना अच्छा लग रहा था।
उस समय हम दोनों जैसे भूल ही चुके थे कि पहले हमारा रिश्ता क्या था और लोग हमारे बारे में क्या सोचते। हमारे लिए अब उन बातों का कोई मतलब नहीं रह गया था। हमने एक-दूसरे को पति-पत्नी की तरह अपना लिया था और उस समय हमारे लिए बस एक-दूसरे का साथ ही मायने रखता था।
हॉल में कुछ देर साथ बैठने के बाद हमारे बीच अचानक चुप्पी छा गई। तभी दीपिका दीदी ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में पूछा, “गोलू… क्या तुम मेरे साथ दोबारा करना चाहते हो?”
उनकी आँखों में एक अलग-सी चाहत दिखाई दे रही थी। उनकी बात सुन कर मैंने बिना देर किए कहा, “हाँ दीदी, बिल्कुल।”
मेरी बात सुनते ही उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। उस समय उनके इतने करीब होने और पूरे माहौल की वजह से मेरा लंड एक बार फिर पूरी तरह सख्त हो चुका था। जब उनकी नज़र उस पर पड़ी, तो उनके चेहरे की मुस्कान और भी बढ़ गई।
हमने एक पल भी बर्बाद नहीं किया और वापस बेडरूम की तरफ चले गए। लेकिन इस बार सब कुछ पहले से अलग था। अब हमारे बीच पहले जैसी शर्म या घबराहट नहीं थी।
बेडरूम में पहुँच कर मैं सीधा बिस्तर पर लेट गया। दीपिका दीदी धीरे-धीरे मेरे ऊपर आई और मेरे लंड के ऊपर बैठ गई। उन्होंने अपने हाथों से मुझे पकड़ा और धीरे-धीरे अपने अंदर लेना शुरू किया।
वह मेरे ऊपर बैठ कर धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाने लगी। इस बार हम दोनों एक-दूसरे के साथ अलग-अलग तरीके आज़मा रहे थे, जो हमने पहले कभी नहीं किए थे। पहले वह अपने घुटनों के बल मेरे ऊपर बैठी और धीरे-धीरे अपनी कमर गोल-गोल घुमाने लगी। उनकी हर हलचल के साथ मेरा लंड उनके अंदर रगड़ खा रहा था और हम दोनों की साँसें तेज़ होती जा रही थी।
मैंने नीचे से उनकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ रखा था और उन्हें अपने करीब खींच रहा था, ताकि मैं उनके अंदर गहराई तक बना रहूँ। वह कभी धीरे-धीरे अपनी कमर घुमाती, तो कभी ऊपर-नीचे होने लगती। हम दोनों बिना किसी शर्म के एक-दूसरे के साथ अलग-अलग तरीके आज़मा रहे थे और देख रहे थे कि हमें किस तरह सबसे ज़्यादा अच्छा लग रहा है।
कुछ देर बाद हमने डॉगी स्टाइल करने का फैसला किया। वह बिस्तर पर घुटनों के बल बैठ कर आगे की तरफ झुक गई और मैं उनके पीछे आ गया। मैंने पीछे से अपना लंड उनकी चूत के अंदर डाल दिया।
इस तरह मेरा लंड उनके अंदर पहले से भी ज़्यादा गहराई तक जा रहा था। मेरे हर तेज़ झटके के साथ उनका शरीर आगे-पीछे हिल रहा था और वह भी अपनी कमर पीछे लाकर मेरा साथ दे रही थी।
उस बार जब मैं उनके अंदर अपना गाढ़ा सफेद पानी निकाल चुका था, तो उसके बाद हम दोनों को एक अजीब-सा एहसास हुआ। दीपिका दीदी थोड़ी घबरा गई थी, क्योंकि अब हम भाई-बहन के अपने पुराने रिश्ते से बहुत आगे निकल चुके थे और पूरी तरह एक-दूसरे के साथी बन गए थे। मन में थोड़ा डर भी था और एक अलग तरह की खुशी भी, लेकिन उस दिन हमने खुद को रोकने की कोशिश नहीं की। वह पूरा दिन और उसका हर पल बस हमारी इच्छाओं और हमारे बदलते रिश्ते का हो गया था।
जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ता गया, हमारे बीच की शर्म और दूरी पूरी तरह खत्म होती गई। जब हम हॉल में बैठ कर पॉर्न फिल्म देख रहे थे, तो मेरा सख्त लंड देख कर वह तुरंत मेरे सामने नीचे झुक गई। उन्होंने उसे अपने हाथ में लिया और बड़े प्यार से सहलाने लगी। फिर उन्होंने अपने गर्म होंठों से उसे चूसना शुरू कर दिया।
मैं अपनी आँखें स्क्रीन पर टिकाए हुए उनकी जीभ और मुँह की हर हरकत को महसूस कर रहा था। वह बिना रुके मेरे लंड को अपने मुँह में अंदर-बाहर करती रही, जब तक कि मैं खुद को रोक नहीं पाया और उनके मुँह में ही मेरा गाढ़ा सफेद पानी निकल गया। उन्होंने उसे निगल लिया और फिर मेरी आँखों में देखते हुए मुस्कुरा दी।
यहाँ तक कि उसी दिन रसोई में खाना बनाते समय भी हम दोनों खुद को एक-दूसरे से दूर नहीं रख पाए।
जब वह गैस के सामने खड़ी होकर खाना बना रही थी, तो मैं पीछे से गया और उनके नंगे शरीर को अपनी बाँहों में भर लिया। मैंने उनके नितंबों को कस कर पकड़ा और पीछे से उनकी गांड में अपना लंड डाल दिया।
उन्होंने अपने हाथों से रसोई का स्लैब पकड़ लिया और अपनी कमर पीछे की तरफ लाकर मेरा साथ देने लगी। मेरी हर तेज़ हरकत के साथ उनके मुँह से आहें निकल रही थी, जो पूरी रसोई में साफ सुनाई दे रही थी। वह भी अपनी कमर मेरे साथ हिला रही थी और मैं उनके अंदर की कसावट और गर्मी में पूरी तरह खो गया था।
उस दिन बाथरूम में भी हमारे बीच की शर्म पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। जब मुझे तेज़ पेशाब लगी, तो मैं कमोड के सामने खड़ा हो गया और दीपिका दीदी मेरे सामने कमोड पर बैठ गई। उन्होंने ऊपर मेरी तरफ देखा, अपना मुँह खोला और बोली, “गोलू, अपना पेशाब मेरे मुँह में करो… मुझे सब कुछ चाहिए।”
मैंने बिना हिचकिचाए उनके मुँह में पेशाब करना शुरू कर दिया। थोड़ा पेशाब उनके मुँह से निकलकर उनकी ठुड्डी से नीचे बहता हुआ उनके स्तनों और नंगे शरीर पर फैल गया। इसके बाद हम दोनों साथ में नहाने लगे।
मैं साबुन के झाग से उनके स्तनों और शरीर को साफ कर रहा था, जबकि वह अपने नरम हाथों से मेरे लंड पर साबुन लगा कर उसे सहला रही थी। उस दिन हमारे बीच पहले जैसी कोई शर्म या दूरी नहीं बची थी। हम दोनों अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे, जहाँ हमारे लिए बस एक-दूसरे का साथ और अपनी इच्छाएँ मायने रखती थी।
अगले दिन मैं दीपिका दीदी को मुंबई में छोड़ कर वापस अपने घर आ गया। लेकिन यह सब रूका नहीं। अगले दो सालों तक हमारा रिश्ता चलता रहा।
उन दो सालों में हमने एक-दूसरे को इतना ज़्यादा शारीरिक रूप से एक्सप्लोर किया था कि उसका असर साफ दिखाई देने लगा था। मेरा लंड उनके अंदर इतनी बार और इतनी गहराई तक गया था कि उनकी तंग चूत अब पहले जैसी नहीं रही थी और काफी ढीली हो गई थी। मेरे हाथ भी हमेशा उनके स्तनों पर ही रहते थे। उन्हें घंटों तक मरोड़ना, दबाना और सहलाना मेरी आदत बन गई थी, जिससे उनके स्तन और भी ज़्यादा बड़े, भारी और सुडौल हो गए थे।
उन दो सालों में हमने एक-दूसरे के शरीर की हर भूख मिटाई थी। हमने एक-दूसरे को जी भर कर इस्तेमाल किया और अपनी हर इच्छा पूरी की। यह सब तब तक चलता रहा, जब तक आखिर वह दिन नहीं आ गया, जब हमें हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग होना पड़ा। दो साल बाद दीपिका दीदी की शादी किसी और आदमी से हो गई। उन्हें किसी और के साथ शादी के जोड़े में देखना मेरे लिए बहुत दर्दनाक था। मेरा दिल अंदर ही अंदर टूट रहा था, लेकिन हम दोनों कुछ नहीं कर सकते थे।
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