पिछला भाग पढ़े:- दीपिका दीदी और मेरा राज-3
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
उस रात मैं इंतजार करता रहा, लेकिन दीपिका दीदी मेरे कमरे में नहीं आई। जब अगले दिन सुबह मैं कमरे से बाहर आया तो मुझे उसकी वजह पता चली। असल में मैं भूल गया था कि दिवाली खत्म हो गई थी और सारे रिश्तेदारों को उनके घर जाना था। इसलिए जल्दी से ही पूरे घर में भागदौड़ शुरू हो चुकी थी।
मैं ड्रॉइंग रूम की तरफ गया तो माँ ने मुझे देखते ही कहा, “जल्दी तैयार हो जा, तुम्हें रिश्तेदारों को स्टेशन छोड़ने जाना है। देर हो जाएगी तो ट्रेन निकल जाएगी।”
मैं तुरंत नहा कर तैयार हो गया क्योंकि आज घर में इतने सारे रिश्तेदार थे कि सबको कार में बैठा कर ले जाना आसान नहीं था। मुझे भी उनके साथ ही जाना था। जब मैं बाहर कार की तरफ बढ़ा, तो सामान लोड किया जा रहा था, बैग, गिफ्ट्स, बड़े ट्रॉली बैग सब एक के ऊपर एक रखे थे।
मैं जैसे ही कैरियर के पास पहुँचा, दीपिका दीदी भी वहाँ आ गई। वह मुझसे हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मुझे स्टेशन पर थोड़ा काम है… क्या मैं तुम्हारे साथ आ जाऊं?”
फिर मैं ड्राइविंग सीट पर जाकर बैठ गया। पीछे वाली सीट पर बाकी रिश्तेदारों के साथ दीपिका दीदी भी बैठ गई। जैसे ही मैंने कार स्टार्ट की और आगे बढ़ाई, मुझे रियर-व्यू मिरर में उसका चेहरा साफ दिखाई देने लगा। वह भी कभी-कभी मेरी तरफ देखने लगी, जैसे उसे भी पता था कि मेरी नज़र उसी पर टिक जाती है।
कुछ देर बाद हम स्टेशन पहुँच गए। मैंने कार रोक कर सारे रिश्तेदारों का सामान उतरवाया। टिकट चेक करवाने, सीट ढूँढने और सभी को उनके कोच तक पहुँचाने में लगभग पंद्रह मिनट लग गए। आखिरकार सब ट्रेन में बैठ गए और रवाना हो गए।
अब मैं और दीपिका दीदी स्टेशन के बाहर फुटपाथ की तरफ चल रहे थे। भीड़ थोड़ी कम थी, हल्की हवा चल रही थी और वह मेरे बिल्कुल पास-पास चल रही थी।
मैंने उसके चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा, “दीदी… आपका काम क्या था यहाँ?”
वह मेरी आँखों में देखते हुए धीमे से बोली, “क्या हम ड्राइव करते हुए बात कर सकते हैं?”
हम दोनों वापस कार की तरफ लौटे और अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए। मैंने कार स्टार्ट की और धीरे-धीरे स्टेशन की भीड़ से बाहर निकालने लगा। शहर का हिस्सा पीछे छूटने लगा, ट्रैफिक कम हो रहा था, सड़कें खुलती जा रही थी।
जैसे ही हम मेन सड़क पर आए और कार थोड़ी रफ्तार पकड़ने लगी, दीपिका दीदी ने चुपचाप अपना हाथ बढ़ाया… और मेरे उस हाथ पर रख दिया जो गियर पकड़े हुए था।
उसका गर्म, मुलायम स्पर्श अचानक मेरे पूरे शरीर में बिजली की तरह फैल गया। मैं एक सेकंड को साँस लेना भी भूल गया, लेकिन हाथ वहीं रखा रहने दिया।
कुछ पल ऐसे ही बीत गए। फिर वह हल्के से बोली, उसकी आवाज़ में शर्म और थोड़ी बेबसी दोनों थी, “गोलू… मुझे माफ़ कर देना। कल रात इतने सारे रिश्तेदार थे… सब लोग बहुत देर तक बातें कर रहे थे… और मुझे लगा कि अगर मैं तुम्हारे कमरे में आती… तो कहीं कुछ गलत ना हो जाए।”
मैंने तुरंत शांत स्वर में कहा, “कोई बात नहीं दीदी… मैं समझता हूँ।”
थोड़ी देर तक कार में हल्की सी चुप्पी पसरी रही। बाहर का शहर अब लगभग खत्म हो चुका था और आगे लंबी, शांत सड़कें शुरू हो गई थी। पेड़ों की कतारें दोनों तरफ फैली थी और ट्रैफिक लगभग न के बराबर था।
तभी दीपिका दीदी ने मेरी तरफ हलके से झुक कर धीमी आवाज़ में कहा, “गोलू… क्या तुम गाड़ी थोड़ी देर रोक सकते हो…?”
उसके स्वर में एक अलग तरह की घबराहट और इंतज़ार था। मैंने तुरंत कार को किनारे लिया और सड़क के बाहर हल्के कच्चे हिस्से में रोक दिया। चारों तरफ घने पेड़ थे, हवा तेज़ थी, और जगह थोड़ी डरावनी सी लग रही थी जैसे यह सड़क अक्सर कोई इस्तेमाल नहीं करता हो।
मैंने इंजन बंद किया और उसकी तरफ देखा, “दीदी… यहाँ? सब ठीक है ना?”
वह कुछ पल मेरे चेहरे को देखती रही, फिर अचानक गहरी साँस लेते हुए, थोड़ी शर्म और भारी सांसों के साथ बोली “सब ठीक है गोलू… लेकिन…” उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
फिर उसने धीमी, काँपती आवाज़ में कहा “गोलू… क्या तुम मुझे प्यार करते हो? या सिर्फ… मुझे चोदना चाहते हो?”
मैं एक पल के लिए उसकी आँखों को देखता रहा, फिर धीरे-धीरे, बिना झिझक के बोला “दीदी… बेशक मैं आपको पसंद करता हूँ। सच्चाई ये है कि… मेरे दिल में सिर्फ आप ही है। और… हाँ… जिस लड़की के साथ मैं सेक्स करना चाहता हूँ… वो सिर्फ आप हो।”
इसके बाद दीपिका दीदी की सांसें और तेज़ हो गई। एक पल के लिए उसने अपनी आँखें बंद की, मानो हिम्मत जुटा रही हो। फिर धीरे-धीरे उसने अपना हाथ बढ़ाया… और मेरा हाथ पकड़ कर ऊपर उठाया। फिर बिना कुछ बोले, काँपते हुए उसने मेरा हाथ अपने सीने पर ले जाकर… अपने भारी, नरम स्तनों पर रख दिया। उसके गर्म, धड़कते स्तनों की गर्मी मेरे हाथ में उतरती चली गई… और वह हल्की सी सिसकारी लेकर मेरे और करीब खिसक आई।
फिर उसकी आवाज़ और भी धीमी, शर्म से काँपती हुई निकलती है “गोलू… ठीक… अपनी पैंट खोल दो… मैं तुम्हें खुश करना चाहती हूँ।”
मैंने उसके सामने बिना एक शब्द बोले अपनी पैंट का बटन खोला और उसे नीचे सरका दिया। फिर मैंने अपनी पैंट उठा कर पीछे की सीट पर फेंक दी। उसके बाद मैंने अपना अंडरवियर भी उतार दिया। कार की फ्रंट सीट इतनी छोटी थी कि वहाँ लेटना या पीछे की तरफ खिसकना मुश्किल हो रहा था, लेकिन फिर भी मैं थोड़ा पीछे सरक कर सीट पर आधा लेट सा गया, ताकि दीदी को जगह मिल सके।
मेरी हालत देख कर दीपिका दीदी हल्का सा मुस्कुरा दी। उसकी वह शर्मीली मुस्कान और आँखों में जलती प्यास ने मुझे और पागल कर दिया। वह धीरे-धीरे मेरी तरफ खिसकी… इतनी करीब कि उसकी गर्म साँसें सीधे मेरे तने हुए लंड पर लगने लगी। मेरी कमर एक झटके में काँप गई। मैंने महसूस किया… दीदी का चेहरा अब मेरे बिल्कुल पास था… और उसकी हल्की हल्की साँसें मेरे लंड की नोक को गर्म कर रही थी।
फिर अगले ही पल… दीपिका दीदी ने अपना नरम गर्म हाथ मेरे लंड के चारों तरफ लपेट लिया। उसने मेरी नसों पर धीरे-धीरे पकड़ बनाते हुए उसे ऊपर-नीचे करना शुरू किया, जैसे वह उसे और ज़्यादा सख्त, ज़्यादा बड़ा बनाना चाहती हो। कुछ ही सेकंड में मेरा लंड उसके हाथों की गर्मी से और तना, और भारी हो गया।
वह मेरी तरफ देखते हुए हल्की सी मुस्कुराई… फिर अपनी गर्दन को थोड़ा झुका कर… धीरे-धीरे अपना मुँह मेरे लंड की नोक पर ले गई।
मैंने बस एक लंबा, काँपता हुआ साँस लिया… और अगले ही पल…उसने अपना गर्म, गीलापन भरा मुँह खोल कर… मेरा पूरा लंड अंदर ले लिया।
उसके होंठों की गर्मी… उसकी जीभ की नमी… और उसके मुँह के अंदर का कसाव… इतने तीखे थे कि मेरी कमर खुद ही ऊपर उठ गई।
दीदी ने मेरा लंड मुँह में लेकर अपना सिर आगे-पीछे चलाना शुरू कर दिया। हर बार जब उसका मुँह मेरे लंड से नीचे तक जाता, मेरे शरीर में सिहरन दौड़ जाती। वह धीरे-धीरे, लय में, पूरे आनंद के साथ मेरा लंड चूस रही थी।
कार के अंदर सिर्फ उसकी गहरी साँसों और मेरे दबी हुई कराहों की आवाजें गूँज रही थी…और दीदी लगातार अपना सिर आगे-पीछे करती जा रही थी, मेरे लंड को अपने गीले गर्म मुँह में लेकर… जैसे वह मुझे पूरी तरह पिघला देना चाहती हो।
कुछ मिनट बाद वह थोड़ी देर के लिए रुकी, मेरे लंड को मुँह से निकाल कर मेरे ऊपर देखती रही और धीमी आवाज़ में पूछा, “गोलू… अच्छा लग रहा है ना?”
उसके होंठ अभी भी गीले थे, उसकी साँसें तेज़ थी। वह मेरा चेहरा देख रही थी जैसे जवाब सुनने से पहले ही उसे पता हो कि मैं किस हाल में हूँ।
मैंने जोर से साँस छोड़ते हुए काँपती आवाज़ में कहा, “दीदी… प्लीज़… मत रुको… मैं आने वाला हूँ… बस मत रुको।”
मेरी बात सुन कर उसके होंठों पर एक हल्की, गहरी मुस्कान फैल गई… जैसे यही सुनने का इंतजार था।
अगले ही पल उसने बिना समय गँवाए फिर से अपना मुँह खोला और मेरा लंड पूरी गर्मी के साथ अंदर ले लिया। इस बार उसकी चाल पहले से भी तेज़, गहरी और प्यास से भरी थी।
उसकी जीभ हर स्ट्रोक में मेरे लंड के नीचे की नस पर दबाव बना रही थी, और उसका मुँह कस कर मुझे पकड़ रहा था… जैसे वह जानती हो कि अब मैं रुकने वाला नहीं हूँ।
वह अपना सिर इतनी तेजी से आगे-पीछे करने लगी कि मेरी कमर खुद ही ऊपर उठने लगी। उसके मुँह की गर्मी, उसके गीले होंठ, उसकी जीभ का स्पर्श सब कुछ मिल कर मुझे पूरी तरह काबू से बाहर कर रहा था।
मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर तनने लगा है… साँसें टूट-टूट रही थी… और मेरी उंगलियाँ सीट को पकड़ कर खिंच गई थी।
मैंने हाँफते हुए कहा, “दीदी… बस… बस… मैं… मैं आ रहा हूँ…” लेकिन उसने रुकने की कोशिश भी नहीं की।
उल्टा, उसने अपना मुँह और गहरा कर दिया… और सिर की चाल और तेज़ कर दी जैसे वह चाहती हो कि मैं उसके मुँह में ही फट जाऊँ।
और अगले ही पल…मेरी कमर पूरी ताकत से ऊपर उठी… एक गर्म लहर मेरे अंदर से निकलकर उसके मुँह में फट पड़ी… और मैं जोर से कराह कर उसके मुँह में ही झड़ गया।
दीदी मेरा पूरा गर्म सफेद पानी अपने मुँह में भर कर उसे रोक कर रखती रही… उसका सिर अभी भी हल्का-हल्का हिल रहा था, जैसे मेरे आखिरी बूंद तक मुझे खाली करना चाहती हो। मेरी साँसें टूट रही थी… शरीर ढीला पड़ चुका था… और दीपिका दीदी मेरे लंड को मुँह में रखे हुए धीरे-धीरे उसे चाट रही थी, मानो अभी भी उसका स्वाद छोड़ना नहीं चाहती हो।
जब उसने मेरा लंड मुँह से छोड़ा, उसके होंठ अभी भी गीले थे। उसने जीभ से अपने होंठ चाटे… और धीमी, सेक्सी आवाज़ में फुसफुसाई, “गोलू… तुम… बहुत टेस्टी हो।”
उसकी यह बात सुन कर मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। दीदी ने जल्दी से सीट सीधी की, अपना दुपट्टा सँवारा और जैसे वह अभी-अभी किसी पाप से बाहर निकली हो शर्माते हुए बोली, “चलो… घर चलते हैं।”
मैंने धीरे से अंडरवियर और पैंट पहनी, कार स्टार्ट की और हम चुप-चाप वापस घर की ओर चल पड़े। रास्ते भर उसने मेरी तरफ एक बार भी नहीं देखा। उसकी साँसें अभी भी तेज़ थी, और गाल लाल।
जब हम घर पहुँचे, मैंने कार रोकी ही थी कि…दीदी फौरन दरवाज़ा खोल कर उतर गई।
वह सिर झुकाए, बिना मेरी तरफ देखे, तेज़ कदमों से घर में गई… और सीधे अपने कमरे में चली गई जैसे मुझसे नज़र मिलाने में भी उसे अब शर्म आ रही हो।
मैं भी कार से उतरा, दरवाज़ा बंद किया और अपने कमरे की तरफ चला गया। अंदर आते ही देखा कि पापा ड्रॉइंग रूम में अखबार पढ़ते बैठे थे और मम्मी किचन में रात का खाना बना रही थी। माहौल बिल्कुल आम था जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
मैं अपने कमरे में जाकर लेट गया। मन में अभी भी दीदी का चेहरा, उसका मुँह, उसकी आवाज़ घूम रही थी। शाम तक मैं कमरे से बाहर ही नहीं निकला।
रात को जब खाने का समय हुआ, मैं बाहर आया तो देखा दीपिका दीदी डाइनिंग टेबल पर बैठी खाना खा रही थी। उसके चेहरे पर हल्की शर्म थी, नजरें नीचे। मैं भी चुपचाप उसके सामने बैठ कर खाना खाने लगा। पूरे समय उसने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा… ना मुस्कुराई… ना कुछ कहा।
खाना खत्म होते ही वह बिना कुछ बोले उठी… और सीधा अपने कमरे में चली गई वैसे ही तेज़ कदमों से जैसे शाम को गई थी।
डिनर के बाद मैं भी अपने कमरे में गया और बिस्तर पर लेटने की कोशिश की, लेकिन नींद आँखों से दूर थी। दिमाग में बस एक ही चीज़ घूम रही थी, उसका मुँह।
मैंने कई बार आँखें बंद की, करवटें बदलीं, लेकिन नींद आई ही नहीं। बाहर पूरा घर शांत था, पापा-मम्मी अपने कमरे में जा चुके थे। दीवार घड़ी की टिक-टिक और मेरी तेज़ धड़कन ही सुनाई दे रही थी।
थोड़ी देर बाद जब बिल्कुल सन्नाटा छा गया… मेरे अंदर एक खिंचाव सा उठा। मैं उठ कर बैठ गया।
उसकी याद बार-बार दिमाग में घुस कर दिल की धड़कन बढ़ा रही थी। जितना खुद को रोकने की कोशिश करता, उतना ही उसकी साँसों का एहसास, उसकी आँखें, उसका चेहरा मेरे सामने साफ होने लगता।
आख़िरकार मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं धीरे से बिस्तर से उतरा, दरवाज़ा खोला और बिना आवाज़ किए बाहर निकला। पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ था, बस कहीं दूर से पंखे की हल्की आवाज़ आ रही थी। मेरे कदम अपने आप उसकी तरफ बढ़ने लगे… जैसे शरीर मेरे बस में ही नहीं रहा हो। मैं दरवाज़े के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया।
मैंने गहरी साँस ली… और धीरे से दरवाज़े पर नॉक किया। एक पल… दो पल… तीन पल…
फिर अंदर हल्की सी आहट हुई। दरवाज़ा कुछ सेकंड तक बंद रहा, फिर क्लिक की आवाज़ आई और वह धीरे-धीरे खुला। वह सामने थी, नींद में नहीं, बल्कि जैसे जाग रही थी और सोच में डूबी हुई थी। वह नीले सिल्क का नाइटगाउन पहने हुई थी। पतला, मुलायम, हल्का चमकता हुआ कपड़ा… जो रोशनी पड़ते ही उसकी शरीर की लाइनें साफ दिखा देता था।
गाउन के नीचे उसकी छाती की गोलाई साफ दिखाई दे रही थी। कपड़ा इतना पतला था कि उसके भारी, भरे हुए स्तनों का आकार सीधा उभर कर सामने आ जाता था। नाइटगाउन का V कट उसके सीने को बीच तक खोलता था, जहाँ उसकी क्लीवेज गहरी, नरम छाया बना कर और ज़्यादा ध्यान खींच रही थी। उसकी साँस हल्की सी तेज थी, जिससे उसके स्तन अंदर बाहर हो रहे थे और पतला सिल्क कपड़ा हर मूवमेंट के साथ उसके बदन से चिपक कर उसकी गर्मी दिखा रहा था।
उसने मुझे दरवाज़े पर देख कर हल्का सा झटका खाया लेकिन उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया… बस एक कदम पीछे हट कर जगह दे दी।
मैं अंदर आ गया… और उसने मुझे रोका भी नहीं।
कमरे में हल्की चाँदनी आ रही थी। वह कुछ सेकंड मुझे देखती रही, जैसे समझ नहीं पा रही हो कि मैं इतनी रात को उसके कमरे में क्यों आया हूँ।
फिर उसने धीरे, बहुत धीरे अपनी साँस भरकर पूछा “क्या हुआ गोलू…?”
मैं उसका सवाल सुन कर कुछ पल चुप रहा, लेकिन उसकी आवाज़ में जो नरमी थी… उसने मेरे अंदर की सारी झिझक तोड़ दी। मैं एक कदम उसकी तरफ बढ़ा। वह पीछे नहीं हटी… बस मेरी तरफ देखती रही।
मैं उसके बिलकुल सामने खड़ा था, इतना पास कि उसकी साँसें मेरे सीने पर लग रही थी। मेरी आँखें खुद ब खुद उसके सीने पर चली गई, जहाँ उसका सिल्क गाउन हर साँस के साथ उठ गिर रहा था।
मेरे हाथ काँपे… लेकिन रुके नहीं। धीरे, बहुत धीरे… मैंने हाथ बढ़ाया… और अपना दायाँ हाथ उसके स्तन पर रख दिया। सिल्क का मुलायम कपड़ा मेरे हाथ के नीचे खिसका… और उसके गर्म, भरे हुए स्तन का वजन मेरी हथेली में महसूस हुआ।
मैंने थोड़ा और हिम्मत की, और फुसफुसाया “दीपिका दीदी… मैं पूरे दिन बस आपके बारे में सोचता रहा… आपके शरीर के बारे में… मैं रुक नहीं पा रहा…”
वह और करीब आई, इतनी करीब कि उसके होंठ मेरे गाल को हल्का सा छूते हुए रुके।फिर बहुत धीमे में बोली “गोलू… जो भी कहना है… साफ-साफ कहो। मैं सुन रही हूँ।”
उसकी यह बात सुन कर मेरे अंदर की आख़िरी हिचक भी खत्म हो गई। मैं उसके बिलकुल पास झुक कर बमुश्किल रोके हुए शब्दों में बोल गया, “दीपिका दीदी… मुझे आपकी चूत चोदनी है।”
यह सुनते ही उसने एक गहरी साँस ली… और फिर अचानक अपना हाथ मेरे गाल पर रख दिया। उसकी उँगलियों का स्पर्श इतना नरम था कि मेरा पूरा शरीर काँप गया।
वह मेरे चेहरे को हल्का सा पकड़ कर धीमे से बोली, “ठीक है गोलू… तुम मुझे चोद सकते हो… लेकिन एक शर्त पर।”
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए तुरंत पूछा, “कौन सी शर्त दीदी?”
वह मेरी ओर थोड़ी और झुकी, उसकी साँस सीधी मेरे होंठों से टकराती हुई, और फुसफुसाई, “तुम्हें पहले मुझसे शादी करनी होगी… तभी तुम मुझे चोद सकते हो।”