पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-6
भाई-बहन सेक्स कहानी का अगला पार्ट-
अगले कुछ दिन मैं सुधा दीदी की सोच को समझ नहीं पा रहा था। उन्होंने मेरा लंड चूस कर मुझे खुश तो कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद जब भी मैं उनके करीब जाने की कोशिश करता, वह अक्सर मना करती। शायद इसकी वजह मैं ही था। क्योंकि पिछली बार जब मैं उनके पिछवाड़े से खुद को खुश कर रहा था, तब मैं पूरी तरह बेकाबू हो गया था। वह मुझे रुकने को कहती रही, लेकिन मैं रुका नहीं।
मुझे लग रहा था कि उन्हें सचमुच तकलीफ़ नहीं होगी अगर मैं अपना लंड उनके पिछवाड़े में डालूं। खैर, उस दिन के बाद उन्हें लगने लगा कि मैं अपनी हदें भूल गया हूं। वह चाहने लगी कि हमारा रिश्ता फिर एक बार पहले जैसा हो। फिर एक बार मैं उनको सिर्फ बड़ी दीदी की नज़र से देखूं।
कुछ दिन बीत गए और मैं समझ गया कि अगर मुझे फिर से उनके करीब जाना था, तो सब्र दिखाना पड़ेगा। मैं रोज़ उनकी छोटी-छोटी मदद करता जैसे कपड़े सुखाना, पानी भरना, सब्ज़ी काटना बिना कुछ कहे। धीरे-धीरे दीदी के चेहरे पर फिर वहीं नरमी लौटने लगी। एक शाम जब वह छत पर अकेली खड़ी थी, बाल खुले थे और रात की हवा में हल्का झोंका आया, तो मैंने हिम्मत करके उनके पास जाकर पूछा, “दीदी, क्या अब भी आप मुझसे नाराज़ हैं?”
उन्होंने मेरे चेहरे को देखा, एक लंबी सांस ली और बोली, “गोलू, मैं नाराज़ नहीं हूं… बस डर गई थी।” उनकी आवाज़ में ग़म कम और अपनापन ज़्यादा था। उसी पल मुझे महसूस हुआ कि शायद दरवाज़ा फिर से खुलने लगा था।
एक दिन मैं अपने कमरे में पढ़ाई कर रहा था। किताब खुली थी लेकिन दिमाग कहीं और ही घूम रहा था। तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। मैंने सिर उठाया तो देखा सुधा दीदी कमरे में झाँक रही थी।
उनके चेहरे पर पहले वाली झिझक नहीं थी, बस हल्की सी मुस्कान थी। “गोलू,” उन्होंने धीरे से कहा, “मुझे तुम्हारी थोड़ी मदद चाहिए।”
मैं तुरंत खड़ा हो गया, “हाँ दीदी, बोलो ना।”
वह कमरे में आई, पलंग के कोने पर बैठ गई और बोली, “मुझे प्रोजेक्ट पूरा करना है… लेकिन कॉलेज की लाइब्रेरी जाना पड़ेगा। मेरे पास जरूरी किताबें नहीं हैं।”
मैंने हैरानी से पूछा, “तो मैं क्या करूँ?”
दीदी ने मेरी आँखों में देखा और बोली, “तुम मेरे साथ चलोगे ना? अकेले जाने का मन नहीं कर रहा।”
मैंने बिना ज्यादा सोचे कार निकाली और कॉलेज की तरफ चल पड़े। रविवार का दिन था, रास्ते शांत और हवा ठंडी थी। दीदी साइड में बैठी थी, कभी खिड़की से बाहर देखती, कभी मुझे। कैंपस पहुँचते ही साफ दिख गया कि अंदर कोई नहीं था। पूरी लाइब्रेरी लगभग खाली थी। लंबी मेजें, सीधी लाइन में लगी कुर्सियाँ, और कोनों में रखी मोटी-मोटी किताबें।
दीदी ने रैक से अपने प्रोजेक्ट की जरूरत वाली किताबें चुनी, फिर एक शांत कोने में जाकर बैठ गई। उन्होंने एक कुर्सी ली और मैं उनके बिल्कुल पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। उस सुनसान लाइब्रेरी में हमारी साँसों की आवाजें तक सुनाई दे रही थी। कुछ देर बाद उन्होंने किताब खोली और लिखना शुरू किया। उनकी नीली छोटी शॉर्ट्स में से उनकी गोरी जांघें साफ दिख रही थी। ऊपर सफ़ेद पतली टी शर्ट थी, इतनी पतली कि हल्की सी झलक में उनकी गुलाबी ब्रा अंदर से साफ दिख रही थी।
मैं बस उनकी तरफ देखे जा रहा था। वह पन्नों पर झुक कर लिखती, और हर बार नीचे झुकते ही उनकी लंबी, गहरी क्लीवेज सामने चमक उठती। टी-शर्ट की ढीली गर्दन के अंदर से उनकी गोल-मटोल छातियाँ हिलती, कपड़े जितना छुपाते उससे ज्यादा दिखाने लगते।
जब वह थोड़ा आगे झुकी तो मैं साफ-साफ देख पाया, उनकी ब्रा के अंदर उनकी नरम गोलाई कपड़े को धक्का देती हुई उभर रही थी। हल्की रोशनी में उनकी दोनों छातियाँ धीमे-धीमे सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी।
वह लिखने में मशगूल थी… और मैं वहीं बगल में बैठा उनका बदन पीते हुए अपनी नज़रें रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन नज़रें मान ही नहीं रही थी।
आखीरकार मैंने हार मान कर अपना एक हाथ सुधा दीदी के जांघों पर रख दिया। उन्होंने मेरे हाथ को अनदेखा कर दिया और लगातार लिखती रही। उनकी इस हरकत से मुझे थोड़ी ज्यादा हिम्मत मिल गई और मैंने अपने हाथ को ऊपर की तरफ सरकाना शुरु कर दिया।
उनकी जांघों की गर्माहट से मेरा हाथ पिघलने लगा था। मैं धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा, और जब मेरी उंगलियाँ उनकी शॉर्ट्स के बिलकुल नज़दीक पहुँची, दीदी ने एक पल के लिए कलम रोक दी। लेकिन सिर्फ एक पल। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बस दोबारा लिखने लगी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
मेरे अंदर आग तेज़ हो चुकी थी। मैंने हिम्मत करके उंगलियों को और ऊपर सरकाया और अब मेरा हाथ उनकी शॉर्ट्स के ठीक बीचो-बीच था। वहाँ से उनकी गर्म साँसों की लय के साथ उनके नाजुक हिस्से की नरमी मेरी हथेली में महसूस होने लगी।
फिर मैंने थोड़ा और बढ़ कर, बेहद धीरे, शॉर्ट्स के कमरबंध के अंदर हाथ डाल दिया। दीदी का हाथ एक सेकंड के लिए रुक गया, शायद उन्होंने मेरी उंगलियों को भीतर जाते महसूस किया। लेकिन फिर उन्होंने कलम चलाना जारी रखा… मानो मुझे इजाज़त दे रही हों, बस बिना बोले।
अंदर जाते ही पहले मुझे उनकी मुलायम पैंटी का कपड़ा मिला। गर्म, रेशमी, और हल्का गीला सा। मैंने उस पर हल्के से दबाव दिया और दीदी की साँस थोड़ी भारी हो गई। मैंने फिर और आगे बढ़ कर अपने हाथ को उनकी पैंटी के अंदर सरका दिया।
अब मेरा हाथ उनकी खुली गरमाई को छू रहा था। वो पूरी तरह गीली थी। उनकी नरम, फिसलती गरमी मेरे हाथ को थामने लगी थी। उन्होंने अब भी कुछ नहीं कहा, ना ज़बान से, लेकिन उनका जिस्म सब बोल चुका था।
मैंने धीरे-धीरे हाथ वापस खींचा और अब सीधे उनके कमर तक पहुँचा। इस बार हिम्मत करके मैंने उनकी शॉर्ट्स का बटन खोल दिया। धप्प की छोटी आवाज़ आई, लेकिन दीदी ने सिर्फ होंठ भींचे, कुछ बोली नहीं।
मैंने उनकी शॉर्ट्स को पकड़ कर नीचे खींचा, धीरे, बहुत धीरे। कपड़ा उनकी जांघों पर फिसल कर घुटनों तक आ गया। अब उनकी नरम पैंटी साफ दिखाई दे रही थी, सफेद कपड़ा जो हल्की नमी से चिपक रहा था।
मैंने उसे भी खींचने की कोशिश की। जैसे ही मेरी उंगलियाँ अंदर पहुँची, दीदी ने लिखना रोक दिया। उन्होंने गर्दन मोड़ कर मेरी तरफ देखा।
धीरे से उन्होंने फुसफुसा कर कहा, “तू मुझे पढ़ने नहीं देगा, है ना?”
मैंने उतनी ही धीमी आवाज़ में जवाब दिया, “आप पढ़ती रहो दीदी… मैं कुछ ज़्यादा नहीं करूँगा।”
वह हल्का सा हँसीं और वापस अपनी नोटबुक पर झुक गई। उनका ध्यान दोबारा शब्दों में चला गया और मेरा ध्यान उनके बदन में।
मैंने अब उनकी पैंटी को पकड़ा, उंगलियों से उसकी किनारी को खींचा, और धीरे-धीरे उसे भी नीचे सरकाया। वह बिना आवाज़ के उनकी जांघों से उतरती हुई घुटनों तक आ गई। अब वह कुर्सी पर बैठी थी, पूरी खुली, पूरी गर्म, मगर अब भी कलम चलाती हुई।
उनकी जांघें थोड़ी और फैली, मानो मुझे और जगह दे रही हो। मेरी धड़कनें तेज हो गई। मैंने हड़बड़ी में अपनी पैंट के बटन खोले, फिर अंडरवियर खींच कर नीचे किया। हवा लगी तो बदन में बिजली दौड़ गई।
उस लाइब्रेरी के कोने में सुधा दीदी और मैं दोनों बिना पैंट के अपनी कुर्सी पर बैठे हुए थे। मैंने हल्का आगे बढ़ कर सुधा दीदी को उनकी कुर्सी से उठा कर मेरे जांघों के उपर रख दिया। उनका खुला मुलायम पिछवाड़ा मेरे लंड के बिल्कुल करीब था। मेरा सख्त लंड अब उनके खुले पिछवाड़े को छू रहा था और वह बेहद आराम से मेरे जांघों के उपर बैठ कर कुछ लिखने का दिखावा कर रही थी।
मैंने दोनों हाथ उनकी कमर पर रखे, और धीरे से उन्हें और नीचे दबाया। जैसे-जैसे उनका गरम बदन मेरे करीब आता गया, मेरा लंड उनकी खुली गीली जगह से छूने लगा। वह अब भी नोटबुक पर लिखने की कोशिश कर रही थी, पर कलम का आकार बिगड़ चुका था।
उनकी साँसें भारी हो गई और मैं महसूस कर सकता था कि उनकी कमर खुद बा खुद हल्की-हल्की हरकत कर रही थी। जैसे उनका बदन खुद मेरे लंड को ढूँढ रहा हो।
तभी बहुत धीमी, शर्मीली आवाज़ में वह बड़बड़ाई — “गोलू… तुम क्या कर रहे हो? पढ़ने दो ना… प्लीज़ फोकस करने दो।”
मैंने उनकी कान के पास फुसफुसा कर कहा, “मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं कर रहा दीदी… बस थोड़ा सा पास हूँ।”
मैंने फिर से उन्हें उठाया और इस बार अपने लंड के उपर बिठाने की कोशिश करने लगा। इस बार मैंने थोड़ी सावधानी से किया, पर जैसे ही उनका वजन नीचे आया, मेरा पूरा लंड सीधा एक झटके में उनके अंदर घुस गया।
दीदी ने अचानक सिर पीछे फेंक दिया “आह्ह—गोलू..!”
उनकी आवाज़ में दर्द भी था और गर्म कराह भी।
उनकी उँगलियाँ मेरी जांघों में धँस गई और उनका बदन एक पल के लिए तन गया, फिर ढीला पड़ते ही उन्होंने धीमे से सिसकार भरी “ओह… ये तो पूरा अंदर चला गया…”
यह पहली बार था जब मेरा लंड असल में सुधा दीदी के नाज़ुक हिस्से के अंदर था। इससे पहले कई बार मेरा लंड उनके पिछवाड़े, मुँह या फिर स्तनों का स्वाद ले चुका था, लेकिन उनका नाज़ुक हिस्सा कुछ अलग ही और बेहद अच्छा लग रहा था।
मैंने धीरे-धीरे कमर ऊपर-नीचे चलानी शुरू की। हर धक्के पर दीदी का बदन हिलता और उनकी साँसें फटाफट चलने लगती। वह अब नोटबुक पकड़े नहीं रह पाई, किताब उनके हाथ से फिसल कर नीचे गिर गई।
उनकी दोनों बाहें मेरे कंधों पर आकर टिक गई और उन्होंने मेरे कान में गर्म साँस फेंकते हुए कहा, “अपनी बड़ी बहन को इस तरह चोदने में मज़ा आ रहा है…?”
मैं भी खुद को रोक नहीं पा रहा था। उनकी कसावट ने मेरे होश उड़ा दिए थे। मैं हर धक्का और गहरा करता गया, और दीदी की कराहें धीमी-धीमी होती हुई ऊँची बनने लगी।
लेकिन कुछ ही पलों में मेरे पैरों में थकान उतरने लगी, मैं कुर्सी में बैठा था, उनका पूरा वजन मेरे ऊपर था। मैंने कोशिश की कि कमर ऊपर उठाऊँ और उन्हें और जोर से चोदूँ, पर बदन भारी हो चुका था। मेरी साँसें अटक गई और कमर बीच में ही रुक गई।
शायद उन्हें समझ आ गया। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और धीरे से मुस्कुरा दी, फिर अपनी कमर उठाई। मेरा लंड उनके अंदर से आधा बाहर निकल गया। अगली ही धड़कन में वह वापस नीचे आई, ज़ोर से, सीधा मेरे लंड पर।
“ओह्ह दीदी…!” मेरे मुँह से अपने आप निकला।
अब वह ऊपर उठती… रुकती… फिर तेजी से नीचे आती। पूरा भार, पूरी गर्मी, पूरा जोर मेरे लंड पर।
मैं कुर्सी पर बस बैठा रह गया, हाथ उनकी जांघों पर टिके हुए और वह खुद मुझपे चढ़ रही थी। हर बार उतरते हुए उनका बदन मेरे साथ टकराता और अंदर तक बिजली दौड़ जाती।
उन्होंने तुरंत हरकत रोक दी। वह एक पल के लिए मेरी जाँघों पर बैठी रही। फिर मेरी जांघों से उठकर घूमी और फिर से मेरे ऊपर आ बैठी। अब उनका चेहरा बिल्कुल मेरे चेहरे के करीब था। इस बार जब वह मेरी गोद में मेरे लंड के उपर बैठ गई तो उनके मासूम चेहरे पर होने वाली हर हरकत मैं देख सकता था।
उन्होंने मेरी गर्दन के पीछे दोनों बाहें डाल दी। उनके बाल मेरे गाल से छूते हुए सरक रहे थे और उनका गरम बदन मेरी गोद में पिघल रहा था।
उन्होंने धीरे-धीरे कमर ऊपर उठाई, मेरे लंड से पूरी तरह अलग होती हुई। फिर एक भरी साँस लेकर ज़ोर से नीचे बैठी।
“उह… गोलू…” उनकी आवाज़ मेरे चेहरे पर ही गिर गई।
अब वह हर बार ऊपर उठती तो उनकी आँखें मेरी आँखों में अटक जाती, जज्बातों से भरी, काँपती, पिघलती हुई, और जैसे ही वह नीचे आती, उनका मुँह आधा खुल जाता, गहरी कराह गले में अटक कर बाहर आती।
उन्होंने मेरे कान के पास मुँह ले जाकर टूटी साँसों में कहा, “देख ले गोलू…अपनी बड़ी बहन को चोदते हुए उसका चेहरा देख ले।”
फिर वह और तेज़ हो गई। ऊपर उठने में उनकी जांघें काँप रही थी, नीचे आते ही पूरा भार मेरे लंड पर टूट पड़ता था। उनके नाखून मेरी गर्दन में धँसते चले गए। मैंने उनके कूल्हों को पकड़ा और उन्हें और नीचे धकेला जिससे मेरा लंड और गहराई तक चला गया।
वह आँखें बंद करके पूरी तरह पीछे झुक गई, चार सेकंड की लंबी कराह के साथ।फिर मेरा चेहरा पकड़ कर वापस मेरी आँखों में देखती हुई बोली, “मुझे मत रोकना… मैं टूटने वाली हूँ…”
उनकी कमर अब बिना रुके चल रही थी—पूरी रफ़्तार, पूरा जोश, जैसे उनका बदन खुद को मेरे ऊपर गिरा रहा हो। मैं नीचे से बस कस कर पकड़ पाया, उनकी जांघें, उनकी कमर, उनका गरम, पसीने से भरा बदन।
हर बार नीचे आते हुए उनकी साँस मेरे गाल से टकराती। उनकी आँखें कभी मेरी आँखों में धँस जाती, कभी झटके से बंद हो जाती, मानो वह खुद को थामने की कोशिश कर रही हों और रुक ही ना पा रही हों।
उन्होंने दाँत भींच कर फुसफुसाया, “गोलू… ये… ये तो और भी तेज़ चाहिए…” और फिर बिना रुके झटके मारने लगी। अब वह खुद अपने वजन से मेरी गोद में धँस रही थी, और मेरा लंड हर बार उनके अंदर गहराई तक खो जाता था।
उनकी साँसें टूट-टूट कर फट रही थी। “मैं… मैं गिरने वाली हूँ… रुकना मत…” उन्होंने गर्दन मेरे कंधे में दबा दी।
मैंने कमर उठा कर उनके हर धक्के का साथ दिया, और एक पल में उनका पूरा बदन मेरी बाहों में झटके मारते हुए थरथराने लगा। वह अपनी कमर पकड़ कर पूरी ताकत से नीचे बैठ गई और वहीं जम गई… उनके होंठ मेरे कान पर काँपते हुए फुसफुसाए “मैं… निकल रही हूँ… गोलू… ओह्ह!”
और उसी पल हम दोनों एक साथ फट पड़े। मेरा सारा सफेद पानी सुधा दीदी के नाज़ुक हिस्से में भरता जा रहा था और उनका गीलापन मेरे लंड को पूरी तरह भिगो चुका था। वह मेरे ऊपर बैठी थरथरा रही थी और मैं कुर्सी पर जकड़ा उनका हर कंपन महसूस कर रहा था।
थोड़ी देर कांपते रहने के बाद दीदी धीरे-धीरे मेरे सीने पर हाथ रख कर उठी। उनका गर्म रस मेरे लंड से लिपट कर नीचे टपक रहा था, जैसे उनका बदन अब भी मुझसे अलग नहीं होना चाहता हो।
उन्होंने लगभग हांफते हुए फुसफुसाया, “गोलू, पढ़ाई के समय अपनी बड़ी बहन को ऐसे चोदना बहुत गलत बात है…”
मुस्कान उनके होठों पर फैल गई, जैसे वो खुद ही इस गलती चाहती हो।
लगभग एक घंटे बाद हम दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकल गए। सुधा दीदी का प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया था और शायद इससे उनके ग्रेड पर असर होने वाला था। लेकिन इसकी परवाह उन्हें बिल्कुल नहीं थी। क्योंकि पहली बार उनके नाज़ुक हिस्से ने मेरे लंड का स्वाद चखा था और यही असर मुझ पर भी था। मुझे कोई परवाह नहीं थी कि आगे क्या होगा, लेकिन सुधा दीदी को सच-मुच चोदने के बाद मैं बेहद खुश था।
हम दोनों कार में बैठे और घर की तरफ चल पड़े। दीदी ने मुझ को रास्ते में दवा की दुकान की तरफ मोड़ने को कहा। कार मेडिकल स्टोर के सामने रुकी। दीदी बिना कुछ बोले उतर गई और दुकान के भीतर चली गई। मैं शीशे से झांक कर देख रहा था, सोच रहा था वो क्या लेने आई थी, और क्यों।
कुछ मिनट बाद वो वापस आई। उनके हाथ में एक छोटा सा सफेद पारदर्शी दवा का पैकेट था। उन्होंने उसे सीट पर रखा और जैसे ही कार ने फिर चलना शुरू किया, मैंने पैकेट की तरफ देखा।
मैं खुद को रोक नहीं पाया और धीरे से पूछा, “दीदी… ये दवा क्यों ली आपने?”
दीदी ने मेरी तरफ नज़र घुमाई, चेहरे पर वहीं शरारती मुस्कान। उन्होंने पैकेट उठाया और बोली, “हमेशा याद रखना गोलू… जब भी तुम किसी लड़की को बिना कंडोम के चोदते हो ना… तो उसे दवा लेनी पड़ती है। नहीं तो पेट में बच्चा आ सकता है।”
मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। मैंने धीरे से थूक निगल कर कहा, “सच्ची?”
उन्होंने सिर हिलाया, फिर पैकेट फाड़ा। भीतर से छोटी गोल सी सफेद गोली निकालकर बोली, “हाँ। इसलिए समझदार लड़का बनने का टाइम आ गया है।”
उन्होंने बोतल से पानी पिया, गोली मुंह में डालकर निगल ली, फिर लंबी सांस खींचते हुए सिर पीछे टिकाया।
एक सेकंड रुक कर वो मुस्कुराई, “अब घर चलो… अगली बार संभल कर। लेकिन अगर तुम चाहो… मुझे कोई दिक्कत नहीं।”
मैंने कार में गियर डाला और सड़क पर गाड़ी बढ़ा दी। पर मेरा दिमाग कहीं और था। मैं स्टीयरिंग पकड़े-पकड़े यही सोच रहा था कि किस्मत ने मुझे कितना बड़ा तोहफ़ा दिया है। हर लड़के को ऐसी बड़ी बहन कहाँ मिलती है, जो ना सिर्फ चुदवाए… बल्कि सेक्स की सबसे ज़रूरी बातें खुद सिखाए। पल भर के लिए मैं मुस्कुराया और मन ही मन बोला “भगवान, शुक्रिया… सुधा दीदी जैसी बड़ी बहन तो किसी को नहीं मिलती।”
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