पिछला भाग पढ़े:- मामा जी के साथ मेरी मस्त रंगरलियां-4
हिंदी चुदाई कहानी अब आगे-
“कुछ भी कह लो बात तो असल में यही थी – मामा जी का लंड था ही ऐसा।”
“जैसे ही मैं सोफे पर उल्टी चूतड़ पीछे करके लेटी, मामा जी नीचे बैठे और चूतड़ फैला दिए और मेरे चूतड़ों का छेद चाटने लगे। जन्नत जैसा मज़ा मिल रहा था मुझे।”
“पांच मिनट के इस चुसाई के बाद मामा जी उठे, लंड फुद्दी पर रखा और एक झटका लगाया और मामा जी का लंड टट्टों तक मेरी फुद्दी में बैठ गया। सच में ही मामा जी का लम्बा लंड मेरी फुद्दी के आख़री सिरे को छू सा रहा था। मोटे लंड के कारण मेरी फुद्दी फ़ैल तो पहले ही चुकी थी।
“मामा जी बोले, “किरण आज दिन में चुदवा ले चार-पांच बार, आज की रात तेरी कुलभूषण के नाम है। आज मैं उसे ज्यादा नहीं पीने दूंगा। बेचारे ने कई दिनों से ढंग से तेरी फुद्दी नहीं मारी।”
मैंने कहा, “ठीक है मामा जी जैसे आपकी मर्जी। मेरी फुद्दी आपके सामने है, पांच बजे तक रगड़ो दो इसे, जैसे चाहो, जितना चाहो।”
“इसके बाद मामा जी ने मुझे पूरे चार घंटे तक चोदा। हर चुदाई के बाद हम सोफे पर बैठ जाते। उस दौरान भी मैं मामा जी का लंड चूसती रहती, और मुझे मजा कितनी बार आया, इसकी तो कोइ गिनती ही नहीं रही।”
“शाम के चार बज चुके थे। मैं तब भी चूतड़ पीछे करके चुदाई करवा रही थी। इतना चोदने के बाद भी मामा जी के लंड का पानी नहीं निकला था।”
“तभी मामा जी ने ही मुझसे पूछा, “किरण तसल्ली हो गई हो तो निकाल दूं लंड का पानी तुम्हारी फुद्दी में?”
“मैंने कहा, “मामा जी आपके मोटे लंड ने तो मेरी तसल्ली तो कब की कर दी, मैं तो बस आपको चुदाई का मजा दे रही थी।”
“मामा जी ना कहा, “तो फिर ठीक है, इस बार लंड का गरम शहद तेरी फुद्दी में।”
“उस वक़्त तक मामा जी पीछे से चोद रहे थे। मामा जी बोले, “किरण अब सीधी लेट जा बिस्तर पर। लंड का पानी सीधा फुद्दी की अंदर जाएगा। मामा जी ने मुझे बिस्तर पर सीधा लिटा दिया, मेरी टांगें उठा दी और चोदने के लिए मेरे ऊपर आ गये।”
“मामा जी ने एक झटके के साथ लंड मेरी फुद्दी में डाला, मुझे बाहों में जकड़ लिया और मेरे होंठ अपने होठों में ले लिए। मेरे मम्मे मामा जी की छाती पर दबे हुए थे। सच पूछो तो ऐसी चुदाई का भी अपना ही मजा है।”
“मामा जी ने फुद्दी में लंड के धक्के लगाने शुरू कर दिए। मैं और मामा जी आपस में जुड़े पड़े थे – गुत्थमगुत्था हुए पड़े थे। लंड के हर धक्के पर मामा जी के मुंहे से हूं हूं हूं की आवाजें निकल रही थी।”
“तभी मामा जी ने मेरे होंठ छोड़े और एक जोर की आवाज निकाली, “ले मेरी जान, गया मेरे लंड का गर्म शहद तेरी फुद्दी में।”
“और जैसे ही मामा जी के लंड से आधा कप गरम गरम पानी निकला और मेरी फुद्दी में गया मुझे भी मजा आ गया। इस पल का मजा तो जैसे जन्नत का मजा था बिल्कुल अलग ही तरह का।”
“शाम पांच बजे तक मेरी और मामा जी की ये चुदाई चली। हम दोनों बाथरूम गये। मामा जी ने अपना लंड धोया और मैंने अपनी फुद्दी।”
“आ कर हम डाइनिंग टेबल पर बैठ गये। मैंने चाय बनाई, बाहर दरवाजे की कुंडी खोली और हम कुलभूषण का वेट करने लगे।”
“कोई छह बजे कुलभूषण आया – मच्छी ले कर आया था। कुलभूषण ने आते ही पूछा, “मामा जी हो गया आपका काम?”
“मामा जी ने एक नज़र मुझ पर डाली और बोले, “हां कुलभूषण आज सारा का अच्छे से हो गया।”
“कुलभूषण बाथरूम गया, फ्रेश हो कर आया और दोनों पीने बैठ गए, मगर वायदे के मुताबिक उस रात मामा जी ने कुलभूषण को ज्यादा नहीं पीने दी।”
“दो घंटे ये महफ़िल जमी और फिर मामा जी बोले, “चलो कुलभूषण चलता हूं, सुबह जल्दी निकलूंगा।” ये कह कर मामा जी उठे और अपने कमरे में चले गए।”
“मैं और कुलभूषण भी कमरे में आ गए। कुलभूषण हल्के सुरूर में था। अंदर आते ही कुलभूषण ने अपने कपड़े उतार दिए और बोला, “आओ किरण आज मस्त मजा दे दो।”
“मैंने भी अपने कपड़े उतारे और कुलभूषण से पूछा, “कुलभूषण कैसे करना है, कैसे चोदनी है?”
“कुलभूषण हमेशा मुझे लिटा कर मेरे ऊपर लेट कर ही मुझे चोदता था। उस दिन भी वैसे ही कुलभूषण ने मुझे चोदा। उस रात को कुलभूषण ने मेरी फुद्दी दो ढाई घंटे रगड़ी, मजा ही आ गया।”
“अगले दिन सुबह सुबह मामा जी निकल गये।”
“मेरी और कुलभूषण की चुदाई पहले की ही तरह शरू हो गयी। मुझे कुलभूषण भी चुदाई का मस्त मजा देता था – दो-दो बार मेरी फुद्दी का पानी छुड़ा देता था, मगर मामा जी का लंड? कुलभूषण का लंड मामा जी के लंड के सामने कहीं नहीं ठहरता था। मामा जी का लंड और मामा जी की चुदाई मैं भूल ही नहीं पा रही थी।”
“मामा जी को गए महीना बीतने को था। मामा जी कभी भी आ सकते थे। महीने मैं एक चक्कर तो उनका लगता ही लगता था। मैं तो ये सोच-सोच कर ही खुश थी की मामा जी इस बार ज्यादा दिनों के लिए आएंगे।”
“जिस तरीके से मामा जी का मोटा लंड फुद्दी में जाते ही फुद्दी को चौड़ी कर देता था और मामा जी के लंड से चुदाई करवाने का जैसा मस्त आता था, वो अपने आप में ही कमाल था। मामा जी की चुदाई का मजा तो मैं भूल ही नहीं पा रही थी। मामा जी के लंड का ख्याल भर से मेरी फुद्दी गीली होने लग जाती थी।”
इस बीच एक डेवेलपमेंट और हुई। अप्रैल का महीना चल रहा था। अगले महीने यानि मई के महीने में कुलभूषण को कुछ दिनों के लिए – शायद बाईस या पच्चीस दिनों के लिए विदेश जाना था। इस में दो हफ्ते कुलभूषण को ताईवान में रहना था जहां से तीन नई मशीनें आनी थी – उनकी ट्रेनिंग के लिए दो हफ्ते ताईवान में रहना था।
उसके बाद कुलभूषण को जर्मनी और इटली जाना था जहां उसे उसकी फैक्ट्री के दो लोग और मिलने वाले थे। जर्मनी और फ्रांस में कुलभूषण की कम्पनी का ऑटोमोबाइल का बड़ा हिस्सा निर्यात होता था।
कुलभूषण ने ये सारा प्रोग्राम मुझे बताया और बोला, बोला, “किरण इन दिनों में जब में यहां नहीं होऊंगा, तुम कहां जाओगी? अमृतसर या फरीदकोट?”
मैंने कहा, “देखूंगी कुलभूषण। कुछ दिन अमृतसर रह लूंगी कुछ दिन फरीदकोट।”
“बात वहीं खत्म हो गयी।”
“शनिवार के दिन मामा जी आ गए। मामा जी हमेशा कार से ही आते हैं, कभी ड्राइवर के साथ, कभी खुद कार चला कर।”
“मामा जी के आने से कुलभूषण बहुत खुश होता था।”
“उस दिन मामा जी चैल से आये और सीधा लुधियाना की थोक कपड़ा मार्किट में चले गए और सारे काम निबटा कर शाम पांच बजे हमारे पास आ गए।”
कुलभूषण की नाईट शिफ्ट – रात की पारी थी, वो जाने के लिए तैयार ही था।
नमस्ते नमस्ते की बाद कुलभूषण बोला, “मामा जी मेरी रात के पारी है, मेरा जाना आज जरूरी है। आप मुझे अपना प्रोग्राम जरा पहले बता देते तो मैं दिन की शिफ्ट करवा लेता।”
मामा जी भी बोले, “अरे यार कुलभूषण काम पहले। मैं भी तो मार्किट का काफी काम निबटा कर ही आया हूं। कल इतवार है, और मुझे कोई ज्यादा काम भी नहीं। कल करेंगे गपशप।”
“कुलभूषण बोला, तो ठीक है मामा जी में चलता हूं, कल इतवार की छुट्टी है, कल आराम से बैठेंगे।”
“मामा जी ने कुलभूषण से पूछा, “कुलभूषण अगले हफ्ते सोमवार से किस शिफ्ट में जाना है?”
“कुलभूषण बोला, “मामा जी अगले हफ्ते तो दिन की ही है। सुबह नौ से शाम छह बजे की – घर पहुंचते-पहुंचते सात बज जाते हैं।”
“फिर कुलभूषण ने चलते-चलते पूछा बोला, “मामा जी इस बार कितने दिनों का प्रोग्राम है आपका?”
मामा जी बोले, “चार दिन का है। आज का दिन सफर में ही निकल गया। कल इतवार है, ज्यादातर मार्किट बंद रहती है, सोमवार, मंगलवार, बुधवार – वीरवार सुबह-सुबह जल्दी निकलूंगा।”
“फिर मामा जी बोले, “इस बार मॉल ज्यादा जाना है। पहाड़ों में भी गर्मियां शुरू होने वाली हैं गर्मियों के नए डिज़ाइन के कपड़े इस बार ज्यादा जाने हैं।”
“कुलभूषण बोला, “ठीक है तो फिर में चलता हूं मामा जी लुधियाना में आज कल रश बहुत हो गया है। फैक्ट्री पहुंचते-पहुंचते टाइम हो जायेगा – पहले ही लेट हूं।”
“मामा जी बोले, “ठीक है मैं भी फ्रेश हो कर आराम करूंगा। सुबह से कार ड्राईव करते-करते थकान हो रही है।”
“मैं मन ही मन हिसाब लगाने लगी, “कितने दिन मेरी फुद्दी चुदेगी मामा जी के घोड़े जैसे लंड से, कितनी बार, मामा जी का लंड इस बार मेरी फुद्दी में जाएगा – कितनी बार चौड़ी करेगा मामा जी का लंड मेरी फुद्दी? आज रात, कल इतवार का पता नहीं फिर सोम, मंगल-बुध पूरी-पूरी रात। तीन-तीन दिन, तसल्ली हो जाएगी मेरी फुद्दी की।”
“मैं सोच रही थी कमाल ही है मामा जी का लंड एक बार किसी लड़की की फुद्दी में गया तो समझो बार-बार उस लड़की का मन मामा जी का लंड फुद्दी में लेने का करेगा।”
“मेरा अपना भी तो यही हाल था। एक बार ही तो मामा जीने चोदा था, उसके बाद तो मैं ही मामा जी के नीचे लेट रही थी बार-बार।”
बन गया चैल (हिमाचल) का प्रोग्राम।
“कुलभूषण जा चुका था। मामा जी बाथरूम में से हाथ मुंह धो कर निकले और मामा जी ने मेरी तरफ देखा और बोले, “कैसी है मेरे जान किरण? मामा जी की याद आती थी की नहीं?” ये कहते-कहते मामा जी ने लंड खुजला दिया।”
“मैंने कहा, “मामा जी आप याद की बात करते हो? आपके लंड की मस्त चुदाई को तो मैं कभी भूली ही नहीं – कभी भूल ही नहीं सकती। अब तो मेरी फुद्दी तो आपके आने के ख्याल भर से ही गीली हो जाती है।”
“तभी मामा जी बोले, “किरण दो पेग लगा लूं, सफर की थकान उतर जाएगी। आज मस्त मजा दूंगा तुझे चुदाई का। मामा जी लंड खुजलाते हुए बोले, “पिछले एक महीने से तेरी फुद्दी की सपने देख रहा हूं, आज तो रात भर चोदना है तुझे।”
“मैं हंसते हुए, “मामा जी”, बोलते हुए उठी और बोली, “ठीक है मामा जी जितना चाहो चोद लेना, मैं ही कहां चुदाई से पीछे हटने वाली हूं। आप बैठो, मैं आपके ड्रिंक का इंतजाम करती हूं।”
“मामा जी बोले, “नहीं किरण तुम बैठो, इस बार में इम्पोर्टेड व्हिस्की लाया हूं, इम्पोर्टेड वाली पिलाऊंगा कुलभूषण को।”
“मैंने मन ही मन सोचा, मामा जी इम्पोर्टेड पिला कर नशे मैं कर देना उस गधे को और चोदना उसकी बीवी को आगे से पीछे से दबा-दबा कर।”
“मामा जी बाहर गए और कार में से दो बोतलें शिवाज़ रीगल व्हिस्की की निकाल कर ले आये।”
मैं सोडा और गिलास ले आयी। मामा जी ने पहला पेग तो नीट ही चढ़ा लिया। दूसरा पेग सोडा मिला कर आराम-आराम से पीते हुए बोले, “सच में बहुत याद आती थी तेरी किरण। ये कह कर मामा जी ने अपने कपडे उतार दिए और बोले, “किरण जरा लंड मुंह में लो एक बार, चूसो ज़रा इसे।”
“मैं बोली, “मामा जी मैं बाहर के दरवाजे की अंदर से कुंडी लगा कर आती हूं, कहीं कुलभूषण आ ही ना जाए। उसके पास बाहर के दरवाजे की चाबी है।”
“मैं गयी और दरवाजे की कुंडी लगा कर आ गयी और अपने कपड़े उतार कर मामा जी के सामने बैठ गयी और मामा जी का लंड मुंह में लेकर चूसने लगी। पूरे एक महीने के बाद मामा जी का लंड मुंह में लिया था – बड़ा ही मजा आ रहा था।”
“मुंह में लेकर चूसते हुए मामा जी के लंड में से खट्टा-खट्टा कुछ लेसदार सा गाढ़ा-गाढ़ा कुछ निकलता था – ऐसा कुलभूषण के लंड में से भी निकलता था। लेकिन मुझे इसे चाटने में बड़ा मजा आता था। मैं जोर-जोर से मामा जी का लंड चूसने चाटने लगी।”
जल्दी ही मामा जी का लंड सख्त हो गया और मेरा मुंह मामा जी के लंड से भर गया। मामा जी का तीसरा पेग चल रहा था। मामा जी आह किरण आह किरण बोलते जा रहे थे और में जोर-जोर से मामा जी का लंड चूसती जा रही थी।”
“तभी मामा जी बोले, “बस किरण हो गया। आ जाओ अब, अब नहीं रहा जा रहा।”
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