ये मेरी असली कहानी है जो कई साल पहले हुई थी। बहुत समय से मैं सोच रहा था कि इस कहानी को लिखूं, लेकिन हर बार रुक जाता था क्योंकि मुझे समझ नहीं आता था कि उन पुरानी यादों को सही तरीके से कैसे लिखूं। लेकिन आज मैंने सोचा कि जो भी हुआ था उसे वैसे ही लिखता हूं जैसे वो मेरी जिंदगी में हुआ था।
मेरा नाम गोलू है और उस समय मैं पुणे के पास एक छोटे से गांव में रहता था। वो कोई बड़ा शहर नहीं था जहां लोग अपने काम में बिजी रहते हैं। हमारा इलाका बहुत छोटा था और वहां लगभग हर आदमी एक-दूसरे को जानता था। अगर सुबह किसी के घर कुछ नया आता था तो शाम तक पूरे गांव को पता चल जाता था। बच्चे साथ में खेलते थे, लोग रोज एक-दूसरे से बात करते थे और त्योहारों में पूरा गांव एक परिवार जैसा लगता था।
मेरे स्कूल के दिनों में मेरे कुछ ही अच्छे दोस्त थे लेकिन उनमें सबसे ज्यादा करीब मेरे दिल के जो था उसका नाम समाधान मोरे था। मैं और समाधान लगभग हर दिन साथ रहते थे। हम एक ही स्कूल में पढ़ते थे, साथ में क्रिकेट खेलते थे, गांव में घूमते थे और कभी-कभी त्योहार या छुट्टियों में एक-दूसरे के घर भी रुक जाते थे। इसी वजह से धीरे-धीरे मैं उसके पूरे परिवार के बहुत करीब हो गया था।
असल में समाधान के घर में उसकी मां, वो खुद और उसकी तीन बहनें थी। उसकी तीनों बहनें मुझसे उम्र में बड़ी थी और बचपन से ही मुझे छोटे भाई जैसा मानती थी। सबसे छोटी बहन का नाम काजल था। वो मुझसे कुछ साल बड़ी थी और हमेशा मजाक करने वाली थी। जब भी मैं उनके घर जाता था तो सबसे ज्यादा वही मुझे छेड़ती थी। कभी मेरे बाल खींच देती थी, कभी हंस कर मुझे छोटू बोलती थी और कभी मेरे साथ बैठ कर गांव की बातें करती रहती थी।
उसके बाद बीच वाली बहन थी आरती। वो काजल से थोड़ी ज्यादा शांत थी। वो ज्यादा मजाक नहीं करती थी लेकिन हमेशा अच्छे से बात करती थी। अगर मैं उनके घर जाता था तो कई बार वो पूछती थी कि खाना खाया या नहीं। पढ़ाई कैसी चल रही है ये भी पूछती रहती थी। उसकी बात करने की आदत बहुत आराम वाली थी इसलिए उसके सामने मुझे हमेशा अच्छा लगता था।
सबसे बड़ी बहन का नाम संजना था। वो तीनों में सबसे ज्यादा समझदार लगती थी। जब मैं छोटा था तब मैं उससे थोड़ा डरता भी था क्योंकि वो हमेशा बड़े लोगों की तरह बात करती थी। लेकिन फिर भी वो मेरे साथ कभी बुरा व्यवहार नहीं करती थी। अगर घर में कोई काम होता था तो वो सब संभालती थी और बाकी दोनों बहनों को भी समझाती रहती थी।
समाधान के पिता नहीं थे इसलिए बचपन से ही उसकी मां ने अकेले अपने बच्चों को संभाला था। जब मैं छोटा था तब मैं ज्यादा कुछ सोचता नहीं था। मैं बिना शर्म के उनके घर चला जाता था, उनके साथ खाना खाता था, बातें करता था, हंसता था और कभी कभी घर के छोटे मोटे कामों में भी मदद कर देता था।
वो मेरी जिंदगी के बहुत मासूम दिन थे। उस उम्र में मेरा दिमाग बहुत सीधा था। मैं उन्हें सिर्फ अपनी बड़ी बहनों की तरह देखता था और वो भी मुझे छोटे बच्चे की तरह ही मानती थी जो हमेशा समाधान के पीछे घूमता रहता था। हर त्योहार में वो मुझे अपने घर जरूर बुलाती थी। खास कर रक्षा बंधन के दिन वो मुझे राखी बांधती थी और मुझे भी अंदर से अच्छा लगता था क्योंकि मेरे घर में मेरी कोई सगी बहन नहीं थी।
दीवाली हो, होली हो, गांव का मेला हो या स्कूल का कोई कार्यक्रम, मैं अक्सर समाधान के परिवार के साथ ही समय बिताता था। धीरे-धीरे उनका घर मुझे अपने घर जैसा लगने लगा था जहां मैं बिना सोचे कभी भी जा सकता था।
लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जैसे-जैसे मैं बड़ा होने लगा वैसे-वैसे मेरे अंदर भी धीरे-धीरे बदलाव आने लगे। अब मैं वो छोटा बच्चा नहीं रहा था जिसे सिर्फ क्रिकेट और स्कूल की चिंता रहती थी। मेरी सोच बदलने लगी थी और मैं आस-पास की चीजों को पहले से अलग नज़र से देखने लगा था।
पहले मैं समाधान की बहनों के सामने बिना शर्म के बैठता था लेकिन अब उनके सामने आते ही मेरे अंदर अजीब सी घबराहट होने लगी थी। मैं अब छोटी-छोटी चीजों को नोटिस करने लगा था जो पहले कभी ध्यान में नहीं आती थी। जब वो घर में काम करती थी, रसोई में इधर-उधर जाती थी, बाहर कपड़े सुखाने जाती थी या हंसते हुए चलती थी तो मेरी नज़र खुद ही उनकी तरफ चली जाती थी।
काजल दीदी पहले से ही मेरी सबसे पसंदीदा थी क्योंकि वो हमेशा मेरे साथ सबसे ज्यादा खुल कर रहती थी। लेकिन अब जब मैं बड़ा हो रहा था तब मैं उसके बारे में अलग तरीके से चीजें नोटिस करने लगा था। उसके स्तन तीनों बहनों में सबसे ज्यादा बड़े थे और उसके शरीर पर कपड़े बहुत फिट लगते थे।
जब वो सूट पहन कर घर में घूमती थी तो उसका शरीर साफ नज़र आता था। चलते समय उसके स्तन हल्के-हल्के हिलते थे और कई बार मैं चाह कर भी नज़र नहीं हटा पाता था। मुझे कई बार ऐसा लगता था जैसे उसके कपड़ों में उसका शरीर पूरी तरह भरा हुआ हो।
आरती दीदी का शरीर काजल दीदी जितना भारी नहीं था लेकिन वो बहुत सलीके से रहती थी। वो ज्यादातर साड़ी या सिंपल सूट पहनती थी और उसके स्तन उतने बड़े नहीं थे लेकिन बहुत अच्छे आकार में लगते थे। जब वो झुक कर रसोई में काम करती थी या बाल ठीक करती थी तो मेरी नज़र अचानक उसकी तरफ चली जाती थी। उसके कपड़े हमेशा साफ और ठीक से पहने हुए होते थे इसलिए वो देखने में बहुत अलग लगती थी।
संजना दीदी सबसे बड़ी थी इसलिए उसके अंदर एक अलग ही समझदारी दिखती थी। वो ज्यादा सजती नहीं थी लेकिन फिर भी उसके अंदर एक अलग आकर्षण था। उसके स्तन बाकी दोनों से थोड़े कम उभरे हुए लगते थे क्योंकि वो हमेशा ढीले कपड़े पहनती थी, लेकिन कई बार जब वो जल्दी में काम करती थी या पल्लू ठीक करती थी तब मुझे उसके शरीर की तरफ देखने का मन करता था। उसके सामने मैं सबसे ज्यादा सीधा बनने की कोशिश करता था क्योंकि मुझे लगता था कि अगर उसने मेरी नजरें पकड़ लीं, तो वो तुरंत समझ जाएगी कि मेरे दिमाग में क्या चल रहा था।
उस समय मैं खुद भी समझ नहीं पाता था कि मेरे अंदर ऐसा क्यों हो रहा था। एक तरफ मैं उन्हें बचपन की तरह अपनी बड़ी बहन मानता था लेकिन दूसरी तरफ अब मेरा दिमाग पहले जैसा नहीं रहा था। मैं उनसे दूर भी नहीं रहना चाहता था। लेकिन उनके सामने ज्यादा देर खड़ा रहने पर मुझे अजीब सी शर्म महसूस होने लगती थी।
फिर भी उन्होंने कभी अपना बर्ताव नहीं बदला। वो हमेशा पहले की तरह मुझसे अच्छे से बात करती थी और मुझे अपने छोटे भाई जैसा ही मानती थी। जब भी मैं उनके घर जाता था, वो मेरी पढ़ाई के बारे में पूछती थी, मुझसे मजाक करती थी और पहले की तरह हंसती थी।
फिर धीरे-धीरे उनकी तीनों बहनों की शादी हो गई और वो अपने अपने घर में बस गई। शादी के बाद वो गांव में हमेशा नहीं रहती थी। कई-कई महीने निकल जाते थे और उनसे मुलाकात नहीं होती थी। कभी किसी त्योहार, शादी या परिवार के काम से वो गांव वापस आती थी और उन्हीं दिनों मुझे उनसे फिर बात करने का मौका मिलता था।
उस समय मेरे पास उनका कोई नंबर भी नहीं था क्योंकि वो समय आज जैसा नहीं था। हमारे गांव में स्मार्टफोन इतने आम नहीं थे और मैं भी ऐसा लड़का नहीं था जो लड़कियों को फोन करे। इसलिए हमारी बातें सिर्फ तब होती थी जब वो गांव आती थी।
शायद इसी वजह से जब भी वो कई महीनों बाद गांव वापस आती थी तो अंदर से मुझे बहुत अलग सा महसूस होता था। आज भी मुझे याद है कि कभी-कभी गांव के लोगों से अचानक पता चलता था कि समाधान की कोई बहन घर आई है और ये सुनते ही मेरे मन में उनसे मिलने का ख्याल आने लगता था।
धीरे-धीरे वो छोटी-छोटी बातें मेरे दिल में खास जगह बनाने लगी। हालांकि मैंने कभी किसी को कुछ नहीं बताया। उस समय मैं खुद भी पूरी तरह नहीं समझता था कि मेरे अंदर क्या चल रहा था। मुझे बस इतना पता था कि जब भी वो गांव आती थी तो मेरे अंदर एक अलग ही खुशी महसूस होती थी, जिसे मैं सही तरीके से समझा नहीं सकता था।
एक दिन मैं और समाधान गांव के बाहर चाय की दुकान पर बैठे थे। उस दिन वो आम दिनों जैसा नहीं लग रहा था। वो काफी चुप था और बार-बार नीचे देख रहा था। मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ है तो वो कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर धीरे से बोला, “गोलू… संजना दीदी वापस गांव आने वाली है।”
पहले तो मुझे लगा शायद वो किसी त्योहार के लिए आ रही होगी, लेकिन उसके चेहरे को देख कर समझ आ रहा था कि बात कुछ और थी। थोड़ी देर बाद उसने बताया कि संजना दीदी का अपने पति के साथ बहुत बड़ा झगड़ा चल रहा था क्योंकि उसका बाहर किसी दूसरी औरत के साथ चक्कर था। ये बात सुन कर मैं कुछ देर शांत हो गया।
समाधान ने धीरे से कहा, “अब बात तलाक तक पहुंच गई है।” उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था कि वो अंदर से कितना परेशान था। मैं बस चुप-चाप उसकी बातें सुन रहा था। मेरे दिमाग में बार-बार संजना दीदी का चेहरा आ रहा था।
उस दिन के बाद गांव में धीरे-धीरे ये बात फैलने लगी कि संजना दीदी अब कुछ समय के लिए अपने मायके में रहने वाली थी। कुछ दिनों बाद वो सच में वापस गांव आ गई। लेकिन उसके वापस आने के बाद भी मैं उससे मिलने नहीं गया। पता नहीं क्यों लेकिन अब उसके सामने जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पहले मैं बिना सोचे उनके घर चला जाता था लेकिन अब मेरे अंदर अजीब सी झिझक आ गई थी।
कई बार मैं उनके घर के सामने से निकलता था लेकिन अंदर नहीं जाता था। दूर से ही देख कर वापस चला जाता था। लगभग छह महीने ऐसे ही निकल गए। मैं खुद को बहाने देता रहा कि अभी जाने का सही समय नहीं था। कभी सोचता वो दुखी होगी इसलिए परेशान नहीं करना चाहिए। कभी सोचता कि इतने दिनों बाद अचानक जाऊंगा तो अजीब लगेगा। लेकिन सच ये था कि मैं खुद उससे मिलने से डर रहा था।
फिर रक्षा बंधन आ गया। उस दिन मेरे पास और कोई बहाना नहीं बचा था। हर साल की तरह अगर मैं उस दिन नहीं जाता तो सबको अजीब लगता। इसलिए बहुत सोचने के बाद मैं आखिरकार समाधान के घर चला गया।
जब मैं घर के अंदर गया तो संजना दीदी ने सबसे पहले मुझे देखा। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने तुरंत कहा, “अरे गोलू… तू इतने दिनों बाद आया।”
मैं बस हल्का सा मुस्कुरा दिया। उसके बाद उसने मुझे अपने पास बैठाया और राखी बांधने लगी। इतने महीनों बाद भी वो मेरे साथ पहले जैसी ही थी। राखी बांधने के बाद मैंने जेब से छोटा सा गिफ्ट निकाला लेकिन उसने लेने से मना कर दिया। उसने कहा कि मुझे कुछ देने की ज़रूरत नहीं है।
उस समय घर के अंदर सिर्फ मैं, समाधान और संजना दीदी बैठे थे। हम लोग आम बातें कर रहे थे। तभी लगभग पंद्रह मिनट बाद समाधान का फोन बजा। उसने फोन उठाया तो पता चला कि काजल दीदी बस स्टॉप पर खड़ी थी। वो भी रक्षाबंधन के लिए गांव आई थी। समाधान जल्दी से उठ गया और बोला कि वो उसे लेने जा रहा था। उसके बाहर जाते ही घर के अंदर अचानक शांति हो गई। अब घर में सिर्फ मैं और संजना दीदी अकेले बैठे थे।
कुछ मिनट तक हम दोनों बिना कुछ बोले बैठे रहे। मैं बार-बार इधर-उधर देखने लगा क्योंकि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलूं। तभी संजना दीदी ने धीरे से मेरी तरफ देखा और पूछा, “गोलू… तू पहले मुझसे मिलने क्यों नहीं आया?”
उसका ये सवाल सुन कर मैं कुछ सेकंड तक चुप रह गया। उसी समय मैंने पहली बार उसे इतने ध्यान से देखा। पहले वो मुझे सिर्फ समाधान की बड़ी बहन लगती थी, लेकिन उस दिन वो मुझे एक पूरी औरत जैसी लग रही थी। उसने काले रंग की साड़ी पहनी हुई थी और उसी रंग का ब्लाउज पहन रखा था। उसकी साड़ी थोड़ी नीचे बंधी हुई थी जिसकी वजह से उसकी कमर साफ दिखाई दे रही थी।
उसका ब्लाउज उसके शरीर पर बहुत फिट था। उसके स्तन ब्लाउज के अंदर साफ उभरे हुए दिख रहे थे और जब वो हल्का सा सांस ले रही थी तब मेरी नज़र बार-बार वहीं चली जा रही थी। पहले मैंने उसे हमेशा ढीले कपड़ों में देखा था लेकिन उस दिन पहली बार मुझे महसूस हुआ कि वो कितनी बदल चुकी थी। उसकी साड़ी के अंदर उसका शरीर पहले से ज्यादा भरा हुआ लग रहा था।
उसके बाल खुले हुए थे और चेहरे पर हल्की थकान होने के बाद भी वो बहुत अलग लग रही थी। मैं उसकी आंखों में देखने की कोशिश करता लेकिन कुछ सेकंड बाद फिर मेरी नज़र नीचे चली जाती।
मैंने धीरे से कहा, “सॉरी दीदी… मैं पहले थोड़ा बिजी था।”
ये बोलते समय मुझे खुद पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूं। असली वजह बिजी होना नहीं था। असली वजह ये थी कि अब उसके सामने आते ही मेरे अंदर अजीब सी घबराहट होने लगती थी।
मेरी बात सुन कर वो कुछ सेकंड तक चुप रही। फिर उसने हल्की सी मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा और धीरे से पूछा, “तुझे पता है ना मेरा तलाक क्यों हो रहा है?”
मैंने धीरे से सिर हिलाया और कहा, “हां… समाधान ने बताया था। जीजू का बाहर किसी और के साथ चक्कर था।”
मेरी बात सुनते ही उसने धीरे से सिर हिलाया। थोड़ी देर बाद उसने धीमी आवाज में कहा, “वो सिर्फ एक वजह है जो मैंने सबको बताई है।” मैं उसकी बात सुन कर थोड़ा चौंक गया। उसने फिर मेरी तरफ देखा और बोली, “एक और वजह भी है… जो मैंने किसी को नहीं बताई। तुझे जानना है वो क्या है?”
मैं कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बाहर से बाइक रुकने की आवाज आई। अगले ही पल समाधान घर के अंदर आया और उसके पीछे काजल दीदी भी थी। लगभग दो साल बाद मैं उसे सामने देख रहा था। जैसे ही वो दरवाजे से अंदर आई मेरी नज़र कुछ सेकंड के लिए उसी पर टिक गई। वो पहले से ज्यादा मैच्योर लग रही थी।
उसने हल्के रंग का बहुत फिट सूट पहना हुआ था। कपड़े उसके शरीर पर इतने फिट थे कि उसकी पूरी बनावट साफ नज़र आ रही थी। चलते समय उसके स्तन हल्के हल्के हिल रहे थे और शायद इसी वजह से मैं चाह कर भी नज़रें तुरंत नहीं हटा पा रहा था। उसका दुपट्टा ढीला सा कंधे पर पड़ा था और बार-बार नीचे खिसक रहा था। जब वो अंदर आई तो हमेशा की तरह हंसते हुए बोली, “अरे गोलू… तू तो बिल्कुल गायब ही हो गया।” उसकी आवाज सुनते ही मैं अचानक अपनी सोच से बाहर आया।
मैंने बस हल्की सी मुस्कान दी लेकिन अंदर से मैं पूरी तरह घबराया हुआ था। इतने सालों में काजल दीदी पहले से काफी बदल चुकी थी। उसके चेहरे पर चमक थी, बाल पहले से लंबे हो गए थे और उसका शरीर भी पहले से ज्यादा भरा हुआ लग रहा था।
वो आकर संजना दीदी के पास बैठ गई और फिर दोनों बहनें आपस में बातें करने लगीं। मैं सामने बैठा था लेकिन मेरा ध्यान बार-बार काजल दीदी की तरफ चला जा रहा था। जब वो हंसती थी तो उसका दुपट्टा थोड़ा सा हिल जाता था और फिर वो उसे जल्दी से ठीक करती थी।
कुछ देर बाद मैंने सबको कहा कि अब मुझे घर जाना चाहिए। संजना दीदी ने बस हल्का सा सिर हिलाया और काजल दीदी फिर मजाक करने लगी कि मैं पहले जैसा नहीं रहा। मैं हल्का सा मुस्कुराया और फिर घर से बाहर निकल आया।
मैं अभी घर के बाहर थोड़ा आगे ही पहुंचा था कि पीछे से किसी ने धीरे से मेरा नाम लिया। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो संजना दीदी बाहर खड़ी थी।
वो धीरे-धीरे मेरे पास आई और धीमी आवाज में बोली, “गोलू… क्या तू रात को मुझसे मिल सकता है?”
मैं उसकी बात सुन कर कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। फिर मैंने धीरे से पूछा, “कहां?”
उसने आस-पास देखा ताकि कोई सुन ना ले। फिर मेरे थोड़ा करीब आकर बोली, “स्कूल के पीछे… रात को ग्यारह बजे। मुझे तुझसे कुछ जरूरी बात करनी है।”
उसकी बात सुन कर मैं कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रह गया। फिर मैंने धीरे से सिर हिलाया और वहां से अपने घर की तरफ चलने लगा। रास्ते भर मेरे दिमाग में सिर्फ वही बात घूम रही थी कि आखिर वो मुझे रात को अकेले क्यों बुला रही थी।
हमारे गांव का पुराना स्कूल गांव से थोड़ा बाहर की तरफ था। वहां तक जाने के लिए कच्चा रास्ता पड़ता था और आस-पास ज्यादा घर भी नहीं थे। दिन में तो बच्चे वहां खेलते थे लेकिन रात को वो जगह लगभग खाली रहती थी। स्कूल के पीछे काफी झाड़ियां और खाली मैदान था। उस समय गांव में ज्यादातर घरों में टॉयलेट नहीं होते थे इसलिए कई लोग रात या सुबह उसी तरफ चले जाते थे। इसी वजह से वो जगह गांव वालों के लिए आम थी लेकिन रात में वहां ज्यादा कोई रुकता नहीं था।
मुझे वो जगह बचपन से अच्छी तरह याद थी। मैं और समाधान स्कूल के दिनों में वहीं क्रिकेट खेलते थे और कभी-कभी स्कूल खत्म होने के बाद पीछे वाले मैदान में बैठ जाते थे। लेकिन रात को वहां जाने का एहसास अलग था। खास कर तब जब मुझे खुद नहीं पता था कि संजना दीदी आखिर मुझसे क्या बात करना चाहती है।
रात को लगभग ग्यारह बजे मैं धीरे-धीरे उस तरफ जाने लगा। गांव की ज्यादातर लाइट बंद हो चुकी थी और रास्ते में सिर्फ कहीं-कहीं हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।
जब मैं स्कूल के पीछे पहुंचा तो वहां काफी अंधेरा था। दूर से ही मुझे किसी की परछाई दिखाई दी। जैसे ही मैं थोड़ा पास गया मुझे समझ आ गया कि वो संजना दीदी थी। वो शायद पहले से मेरा इंतजार कर रही थी।
मुझे देखते ही वो धीरे से मेरे पास आई और बिना कुछ बोले मेरा हाथ पकड़ लिया। उसके हाथ ठंडे थे और उस समय मैं पूरी तरह घबरा गया था। उसने कुछ नहीं कहा और बस मुझे अपने साथ स्कूल के पीछे वाली झाड़ियों की तरफ ले जाने लगी।
मैं चलते-चलते धीरे से बोला, “दीदी… इतनी रात को यहां क्यों बुलाया?”
वो कुछ पल चुप रही। फिर उसने मेरी तरफ देखा। उसकी सांसें तेज चल रही थी और वो जैसे खुद को रोकने की कोशिश कर रही थी। फिर उसने धीरे से कहा,“गोलू… क्या तू मुझे यहां चोदना चाहते हो?”
उसकी बात सुनते ही मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया। मेरा गला पूरी तरह सूखने लगा और मैं कुछ सेकंड तक उसे बस देखता रह गया। मेरे हाथ अपने आप उसके हाथों से अलग हो गए। मैं एक कदम पीछे हट गया और घबराई हुई आवाज में बोला, “दीदी… ये क्या बोल रही हो तुम?”
मैंने सिर हिलाते हुए कहा, “मैं हमेशा समाधान को अपना भाई मानता हूं… और तुम्हें अपनी बड़ी बहन। फिर तुम ऐसी बात कैसे कह सकती हो?”
मेरी बात सुन कर उसका चेहरा अचानक बदल गया। उसने गुस्से में मेरी तरफ देखा और बोली, “उस लूज़र का नाम मत ले मेरे सामने। वह भाई कहने लायक नहीं। कभी कभी तो मुझे लगता है कि वह नामर्द है।”
फिर उसने थोड़ा शांत होकर कहा, “और जहां तक मेरे तलाक की बात है… उसके पीछे सिर्फ एक वजह नहीं थी।”
वो कुछ सेकंड चुप रही फिर धीरे से बोली, “तुझे पहले से पता है कि मेरे पति का बाहर अफेयर था। लेकिन एक और बात थी जो मैंने किसी को ठीक से नहीं बताई।”
उसने नीचे देखते हुए कहा, “मुझे हमेशा से सेक्स की तरफ बहुत ज्यादा खिंचाव महसूस होता था। शायद उसे सेक्स एडिक्शन कह सकते हैं। मैं अपने रिश्ते में अपनापन, पागलपन और हर बार कुछ नया महसूस करना चाहती थी… लेकिन मेरा पति हमेशा मुझसे दूर भागता रहा।”
उसने गुस्से में दांत भींचते हुए कहा, “हर बार मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरी चाहतें उसके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। धीरे-धीरे मुझे उससे नफरत होने लगी। मुझे लगने लगा कि मैं ऐसी जिंदगी में घुट रही हूं। इसलिए मैंने आखिर में तलाक ले लिया।”
उसकी बातें सुनने के बाद भी मेरा दिमाग पूरी तरह उलझ चुका था। मैंने धीरे से सिर हिलाया और कहा, “दीदी… मुझे समझ नहीं आ रहा तुम क्या बोल रही हो। लेकिन मैं यहां तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं कर सकता।”
मैं इतना बोल कर वहां से वापस जाने के लिए मुड़ा। मेरे कदम तेजी से चलने लगे क्योंकि मैं उस जगह से जितना जल्दी हो सके निकल जाना चाहता था।
लेकिन तभी पीछे से संजना दीदी की आवाज आई, “रुक गोलू… मुझे पता है तू काजल दीदी को पसंद करता है।” मेरे कदम अचानक रुक गए। मैं धीरे से पीछे मुड़ा और हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा।
वो मेरी आंखों में देखते हुए बोली, “मैंने हमेशा देखा है जिस तरह तू उसे देखता है। खास कर जब उसकी नज़र तुझ पर नहीं होती। जिस तरह तेरी नजर उसके स्तनों पर टिक जाती है… वो मुझसे कभी छुपा नहीं।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। वो मेरे थोड़ा और करीब आई और धीमी आवाज में बोली, “अगर तू मुझे वैसे चोद दे जैसा मैं चाहती हूं… तो मैं तेरी मदद कर सकती हूं। फिर शायद एक दिन तू काजल दीदी के भी करीब आ सके।”
मैंने धीरे से उसकी तरफ देखा और भारी आवाज में कहा, “अगर… अगर मैं तुम्हारी बात मान लूं… तो क्या तुम सच में मेरी मदद करोगी? क्या तुम वादा करती हो कि तुम मुझे काजल दीदी के करीब जाने में मदद करोगी?”
संजना दीदी ने बिना देर किए मेरी आंखों में देखते हुए कहा, “हां गोलू… मैं वादा करती हूं।” वो कुछ सेकंड तक मुझे देखती रही फिर धीरे से बोली, “अब डरना बंद कर… और अपना लंड बाहर निकाल।”