पिछला भाग पढ़े:- दिशा दीदी के साथ जंगल का सफर-1
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
दो दिन घर पर रुकने के बाद दिशा दीदी पूरी तरह तैयार हो गई थी। अब हमें जंगल के लिए निकलना था। वह जंगली जानवरों की फोटो लेने जा रही थी, लेकिन इस बार मैं भी उनके साथ जा रहा था।
मेरा ब्रेकअप हुए कुछ ही समय हुआ था और मैं अभी भी अंदर से बहुत दुखी था। दिशा दीदी चाहती थी कि मैं कुछ दिन सब कुछ भूल जाऊँ। उन्होंने कहा था कि जंगल में जाकर मेरा मन बदल जाएगा और मुझे अच्छा लगेगा।
हम दोनों नामदाफा नेशनल पार्क जाने वाले थे, जो अरुणाचल प्रदेश में है। यह बहुत बड़ा जंगल है। वहाँ ऊँचे-ऊँचे पेड़, पहाड़ और कई तरह के जंगली जानवर मिलते हैं। दिशा दीदी पहले बहुत सारे जंगलों में जा चुकी थी, लेकिन नामदाफा नेशनल पार्क वह पहली बार जा रही थी। मेरे लिए भी यह पहली बार था।
हमें रात में ही निकलना था, इसलिए हम दोनों आधी रात को उठ गए। जल्दी से नहाकर तैयार हुए और सामान बाहर लाने लगे। पिछले दो दिनों में हमने इस सफर के लिए बहुत सारी चीजें खरीदी थी। मेरे लिए नया टेंट लिया गया था। कुछ दवाइयाँ रखी गई थी। दिशा दीदी ने अपने कैमरे के लिए नए मेमोरी कार्ड खरीदे थे। उन्होंने कुछ नए कपड़े भी लिए थे। इसके अलावा खाने का सामान, टॉर्च, बैटरियाँ और बाकी जरूरी चीजें भी साथ रखी गई थी।
घर से निकलने से पहले हमने मम्मी-पापा के पैर छुए। इसके बाद हमने सारा सामान जीप में रखा और निकल पड़े। दिशा दीदी की जीप बहुत मजबूत थी। आगे दो सीटें थी। ड्राइविंग सीट पर मैं बैठा और मेरे बगल में दिशा दीदी बैठ गई। जीप का पीछे वाला हिस्सा खुला था, जहाँ हमारे बैग, टेंट और बाकी बड़ा सामान रखा हुआ था। जैसे ही मैंने जीप स्टार्ट की और रात के अंधेरे में आगे बढ़ना शुरू किया, मैंने बाहर देखा और सोचा कि शायद यह सफर मेरे लिए बहुत खास होने वाला है।
धीरे-धीरे सुबह होने लगी। आसमान का काला रंग हल्का नीला होने लगा था। सड़क अब साफ दिखने लगी थी। ठंडी हवा जीप के अंदर आ रही थी और बहुत दिनों बाद मुझे सच में अच्छा लग रहा था। इतने दिनों से मैं अपने ब्रेकअप की वजह से परेशान था, लेकिन इस समय मैं सिर्फ अपनी बड़ी बहन दिशा दीदी के साथ था। बहुत समय बाद मुझे अपनी बड़ी बहन के साथ अकेले इतना लंबा समय बिताने का मौका मिला था।
दिशा दीदी मेरे बगल में बैठी लगातार बातें कर रही थी। वह मुझे बता रही थी कि जंगल में कौन-कौन से जानवर मिल सकते हैं, किस जानवर से कितनी दूरी रखनी चाहिए, अगर किसी कीड़े ने काट लिया तो क्या करना है, और अगर मुझे किसी चीज़ से एलर्जी हो जाए तो मेडिकल किट कैसे इस्तेमाल करनी है। वह यह भी बता रही थी कि कपड़ों को कीचड़ से कैसे बचाना है और बारिश में सामान को कैसे सुरक्षित रखना है।
मैं उनकी बातें ध्यान से सुनने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सच यह था कि मेरा ध्यान बार-बार उनकी तरफ जा रहा था। उन्होंने सफेद रंग की बहुत फिट टी-शर्ट पहनी थी और नीले रंग का छोटा शॉर्ट्स। सुबह की हल्की रोशनी में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी।
जब जीप ऊबड़-खाबड़ सड़क से गुजरती, तो उनका शरीर हल्के से हिलता और मेरी नजर अनजाने में उनके स्तनों पर चली जाती। उनकी टी-शर्ट इतनी फिट थी कि उनके स्तनों का उभार साफ दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने ब्रा नहीं पहनी थी, क्योंकि उनके निप्पल टी-शर्ट के ऊपर हल्के से उभरे हुए नजर आ रहे थे।
टी-शर्ट का गला थोड़ा गहरा था। जब भी वह मेरी तरफ मुड़ कर कुछ समझाती, मुझे उनके स्तनों की हल्की झलक दिखाई दे जाती। मैं जानता था कि अपनी बड़ी बहन के स्तनों को इस तरह देखना अच्छी बात नहीं है, लेकिन मैं क्या करता, उनकी तरफ से नज़र हटाना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था।
दोपहर तक हम काफी दूर निकल चुके थे। कई घंटे से लगातार ड्राइव करने के बाद मुझे भी भूख लग रही थी। सड़क के किनारे एक शांत जगह देखकर मैंने जीप रोक दी। हम दोनों नीचे उतरे, थोड़ा हाथ-मुँह धोया और साथ बैठ कर खाना खाने लगे। सफर की थकान के बीच दिशा दीदी मेरे साथ बैठ कर हँसते हुए बातें कर रही थी।
खाना खत्म करने के बाद हम फिर से जीप में बैठ गए। मौसम थोड़ा गर्म था और पेट भरने के बाद दिशा दीदी की आँखों में नींद उतरने लगी। उन्होंने एक लंबी जम्हाई ली, हल्की मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा और धीरे-धीरे मेरी ओर सरक आई। कुछ ही पल बाद उन्होंने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस चुप-चाप जीप चलाता रहा। बहुत समय बाद मेरी बड़ी बहन मेरे इतने करीब थी। उनके बालों की हल्की खुशबू मेरे चेहरे तक आ रही थी। उनके सिर का वजन मेरे कंधे पर महसूस हो रहा था और मेरे दिल की धड़कन थोड़ी तेज हो गई थी।
करीब आधे घंटे बाद दिशा दीदी पूरी तरह सो चुकी थी। उनका शरीर बिल्कुल ढीला पड़ गया था। उनकी साँसें धीमी और बराबर चल रही थी।
जब भी मैं हल्का सा उनकी तरफ देखता, उनकी सफेद टी-शर्ट का गला थोड़ा और खुल जाता। मुझे उनके स्तनों के बीच की साफ लकीर दिखाई दे रही थी। टी-शर्ट इतनी फिट थी कि उनके स्तनों का उभार साफ नज़र आ रहा था। सड़क पर जैसे ही कोई स्पीड ब्रेकर आता, जीप हल्की सी उछलती और उनके स्तन ऐसे हिलते जैसे दूध से भरे दो नरम गुब्बारे हों। वह पल देख कर मेरी नज़र कुछ पल के लिए वहीं ठहर जाती। दिशा दीदी गहरी नींद में थी। उन्हें बिल्कुल भी पता नहीं था कि उनका सिर मेरे कंधे पर है और मैं बार-बार उनकी तरफ देख रहा हूँ।
करीब एक घंटा बीत गया। अब तक मैं कई बार खुद को समझा चुका था कि मुझे अपनी बड़ी बहन की तरफ इस नज़र से नहीं देखना चाहिए। लेकिन जितना समय बीत रहा था, उतना ही मेरे लिए अपने मन को काबू में रखना मुश्किल होता जा रहा था। दिशा दीदी बेफिक्र होकर सो रही थी। उनका सिर अब भी मेरे कंधे पर टिका था और जीप के हर हल्के झटके के साथ उनका शरीर धीरे से मेरी तरफ हिल जाता।
आखिरकार मैंने अपने मन के आगे हार मान ली। जब भी रास्ते में कोई गड्ढा आता या जीप किसी स्पीड ब्रेकर से गुजरती, मैं पहले से ही अपना हाथ उनके सामने ले जाता। जैसे ही जीप हल्की सी उछलती, उनका शरीर आगे की तरफ झुकता और मेरी हथेली उनके स्तनों से छू जाती। शायद अगर उसी समय उनकी नींद खुल जाती, तो उन्हें यही लगता कि मैं सिर्फ उन्हें आगे गिरने से बचाने के लिए हाथ बढ़ा रहा था।
लेकिन सच यह था कि मैं उन्हीं छोटे-छोटे पलों का इंतजार कर रहा था। उन एक-दो सेकंड के स्पर्श में मुझे उनके स्तनों की नरमी और गर्माहट साफ महसूस होती। उनकी टी-शर्ट के ऊपर से भी उनके निप्पल मेरी हथेली से हल्के से टकराते, और मेरे पूरे शरीर में एक तेज सिहरन दौड़ जाती।
फिर एक बड़ा स्पीड ब्रेकर आया। इस बार जीप थोड़ा ज्यादा उछली और दिशा दीदी का शरीर अचानक पूरी तरह मेरी तरफ आ गया। उन्हें संभालने के लिए मैंने जल्दी से हाथ आगे किया, लेकिन इस बार मेरी हथेली सीधे उनके एक स्तन पर जा पड़ी और मेरी उंगलियों के बीच उनका निप्पल दब गया। उसी पल उनकी आँख खुल गई।
उन्होंने तुरंत मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज में कहा, “क्या कर रहे हो गोलू?”
मैंने घबरा कर तुरंत हाथ पीछे खींच लिया और कहा, “मैं आपको गिरने से बचा रहा था दीदी।”
उन्होंने बिना कुछ कहे अपनी टी-शर्ट ठीक की और थोड़ा सा खिसक कर मुझसे दूर बैठ गई। अब वह जाग चुकी थी और खिड़की के बाहर देखने लगी। मैं भी चुप-चाप गाड़ी चलाता रहा।
रात करीब 11 बजे हम मियाओ पहुँचे। यह आखिरी बड़ा गाँव था। इसके बाद हमारा असली जंगल वाला सफर शुरू होने वाला था। जंगल के अंदर जाने से पहले यहाँ चेकिंग होती थी। हमने अपना आधार कार्ड दिखाया। दिशा दीदी ने रजिस्टर में अपना नाम लिखा और बताया कि वह जंगली जानवरों की फोटो लेने आई हैं।
मियाओ एक छोटा सा गाँव था। यहाँ कुछ ही लॉज थे। काफी देर तक पूछने के बाद हमें रहने के लिए सिर्फ एक ही लॉज में जगह मिली। वहाँ भी केवल एक कमरा बचा था। लॉज का मालिक उस कमरे के लिए ज्यादा पैसे माँग रहा था। दिशा दीदी ने थोड़ी बहस की, लेकिन आखिर में मान गई। वह अगले दिन जंगल में जाने से पहले आराम से एक अच्छे बिस्तर पर सोना चाहती थी।
कमरा छोटा सा था। अंदर एक ही छोटा बिस्तर था, एक पंखा और कोने में एक छोटी सी टेबल। मैं अपना बैग नीचे रख कर फर्श पर चादर बिछाने लगा। तभी दिशा दीदी ने मेरी तरफ देखा और पूछा, “क्या कर रहे हो गोलू?”
मैंने उनकी तरफ देख कर कहा, “सोने के लिए बिस्तर बना रहा हूँ दीदी।”
उन्होंने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “गोलू, मैं तुम्हारी बहन हूँ, कोई अनजान लड़की नहीं। हम दोनों एक ही बिस्तर पर साथ सो सकते हैं।”
उनकी बात सुन कर मैं कुछ पल के लिए चुप रह गया। फिर मैंने फर्श पर बिछाई हुई चादर समेटी और हम दोनों उस छोटे से बिस्तर पर लेट गए। बिस्तर इतना छोटा था कि हमारे बीच मुश्किल से कुछ इंच की दूरी थी। अगर हममें से कोई भी थोड़ा सा हिलता, तो दूसरे के शरीर से छू जाता।
सोने से पहले दिशा दीदी ने अपने बैग से एक गोली निकाली और पानी के साथ खा ली। शायद पूरे दिन की थकान की वजह से वह जल्दी सोना चाहती थी। उन्होंने लाइट बंद की, मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई और धीरे से बोली, “गुड नाइट गोलू।”
कुछ ही मिनटों में उनकी साँसें गहरी होने लगी। मुझे समझ आ गया कि उन्हें नींद आ चुकी है। लेकिन मेरी आँखों में नींद का नाम नहीं था। मैं चुप-चाप छत की तरफ देख रहा था। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज थी और बाहर कहीं दूर से झींगुरों की आवाज आ रही थी।
शुरुआत में हम दोनों अपनी-अपनी जगह पर सीधे लेटे हुए थे। फिर नींद में दिशा दीदी धीरे-धीरे मेरी तरफ खिसकने लगी। पहले उनकी उंगलियाँ मेरे हाथ से छुई। फिर उनका कंधा मेरे कंधे से आ लगा।
कुछ देर बाद उन्होंने हल्की सी करवट ली और उनका एक स्तन मेरी बाँह से लग गया। टी-शर्ट के ऊपर से भी उसकी नरमी साफ महसूस हो रही थी। नींद में उन्हें बिल्कुल पता नहीं था कि वह कितनी करीब आ चुकी हैं। कभी उनका स्तन मेरी छाती से छू जाता। कभी उनकी कमर मेरी कमर से सट जाती। कभी उनका हाथ मेरे सीने पर आ टिकता और कुछ सेकंड बाद फिर ढीला होकर नीचे गिर जाता।
हर बार जब वह गहरी साँस लेती, उनका शरीर हल्का सा ऊपर-नीचे होता और उनका स्पर्श मुझे और बेचैन कर देता।
थोड़ी देर बाद उन्होंने करवट बदली और उनकी पीठ मेरी तरफ हो गई। छोटे बिस्तर की वजह से उनका पिछवाड़ा सीधे मेरे जांघों से लग गया। उसी पल मुझे महसूस हुआ कि मेरा लंड पूरी तरह सख्त हो चुका है। मैंने खुद को बिल्कुल शांत रखा। लेकिन नींद में वह कभी थोड़ा पीछे खिसकती, कभी आगे। जब भी उनका पिछवाड़ा मेरे लंड से छूता, मेरे पूरे शरीर में एक तेज सिहरन दौड़ जाती।
अब मेरे लिए खुद को रोकना मुश्किल होता जा रहा था। मेरा दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि मुझे लगा उसकी आवाज कमरे में साफ सुनाई दे रही होगी। दिशा दीदी गहरी नींद में थी और उन्हें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उनकी हर छोटी हरकत मुझ पर कितना असर डाल रही थी।
मैंने धीरे से उनकी तरफ देखा। फिर मैंने बहुत धीमी आवाज में उनका नाम लिया, “दिशा दीदी…”
मैं धीरे से उठ कर बिस्तर पर बैठ गया। कुछ सेकंड तक मैं उन्हें देखता रहा। फिर मैंने बहुत हल्के से उनके कंधे को छुआ और उन्हें थोड़ा सा हिलाया।
“दिशा दीदी…” मैंने फिर से फुसफुसा कर कहा। लेकीन वह पूरी तरह से गहरी नींद में सो रही थी।
मैं घुटनों के बल बैठ कर कुछ देर तक उन्हें देखता रहा। उनके बाल तकिए पर बिखरे हुए थे। उनका चेहरा बिल्कुल मासूम लग रहा था। कभी उनकी साँसों के साथ उनके होंठ हल्के से हिलते, तो कभी उनका हाथ नींद में थोड़ा सा सरक जाता।
मेरा लंड मेरी पैंट के अंदर पहले से ही पूरी तरह सख्त हो चुका था। अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो रहा था। मैंने बिना ज्यादा सोचे धीरे से अपनी पैंट घुटनों तक नीचे खींच दी। उसके बाद मैंने अपना अंडरवियर भी नीचे कर दिया।अब मेरा सख्त लंड पूरी तरह बाहर था और दिशा दीदी के चेहरे के बिल्कुल पास था। वह अभी भी गहरी नींद में सो रही थी। उनकी साँसें शांत थी और उन्हें बिल्कुल भी पता नहीं था कि मैं उनके इतना करीब बैठा हुआ था।
मैं धीरे-धीरे थोड़ा और आगे झुक गया। अब मेरे और दिशा दीदी के चेहरे के बीच बस कुछ इंच का ही फासला रह गया था। उनकी गर्म साँसें मेरे लंड के सिरे से टकरा रही थी, जिससे मेरे पूरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी।
मैंने बहुत धीरे से अपने शरीर को आगे बढ़ाया। अगले ही पल मेरे लंड का नरम लेकिन सख्त सिरा उनके चेहरे को हल्के से छू गया। जैसे ही उनका गर्म और मुलायम चेहरा मेरे लंड से लगा, मेरे पूरे शरीर में एक तेज लहर सी दौड़ गई। यह पहली बार था जब मैं उनके साथ ऐसा कुछ कर रहा था।
मुझे लगा था कि शायद मुझे अजीब लगेगा, लेकिन उस पल मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा। उल्टा मुझे यह सब इतना अच्छा लग रहा था कि मैं उस एहसास में पूरी तरह खोता जा रहा था।
मैंने अपने लंड को बहुत धीरे-धीरे उनके माथे पर फिराया। उनका माथा गर्म और मुलायम था। फिर मैं थोड़ा नीचे आया और उनके गालों को छूने लगा। उनके नरम गालों को महसूस करते हुए मेरे अंदर की चाहत और बढ़ती जा रही थी। मैं इस पल के हर सेकंड को धीरे-धीरे महसूस करना चाहता था।
कुछ सेकंड बाद मैंने अपने लंड का सिरा उनके होंठों तक ले गया। उनके होंठ हल्के से खुले हुए थे और उनकी गर्म साँसें लगातार मेरे लंड से टकरा रही थी। मैंने बहुत धीरे से उनके ऊपरी होंठ को छुआ, फिर निचले होंठ को। उस स्पर्श ने मुझे अंदर तक हिला दिया। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मुझे लग रहा था जैसे मैं कोई सपना जी रहा हूँ, और हर गुजरते सेकंड के साथ यह एहसास और भी गहरा होता जा रहा था।
मुझे पता है कि यह पढ़ कर कुछ लोग सोचेंगे कि मैं बहुत गंदा और बुरा इंसान था, जो रात के अंधेरे में अपनी बड़ी बहन के सोते हुए चेहरे को अपने लंड से छू रहा था। शायद उनकी सोच अपने जगह सही भी हो। लेकिन मेरे लिए दिशा दीदी हमेशा वही लड़की थी जिसे मैं शुरू से दिल से चाहता था। मैं उनसे सच्चा प्यार करता था।
जब से वह मेरी जिंदगी में आई थी, तभी से मेरे मन में एक ही चाहत थी कि एक दिन वह पूरी तरह मेरी हो जाएँ। उस रात जब मेरा लंड उनके चेहरे को छू रहा था, तो मुझे पहली बार ऐसा महसूस हो रहा था कि शायद मैं धीरे-धीरे उस चीज़ के करीब पहुँच रहा हूँ जिसकी मुझे शुरू से चाहत थी। मेरे मन में एक अजीब सा सुकून था। ऐसा लग रहा था जैसे इतने समय से जो सपना मैं अपने अंदर लेकर घूम रहा था, वह अब सच होने लगा है।
मैंने अपना लंड हाथ में पकड़ा और बहुत धीरे-धीरे हाथ चलाने लगा। मेरी नज़र लगातार दिशा दीदी के चेहरे पर टिकी हुई थी। वह अब भी गहरी नींद में थी। उनके चेहरे पर वही मासूम शांति थी, जैसे उन्हें दुनिया की किसी बात की खबर ही ना हो।
हर बार जब मेरा हाथ ऊपर-नीचे होता, मेरी साँसें और तेज हो जाती। मैं उनके चेहरे को देखता और मुझे लगता जैसे मैं पूरी तरह उनके असर में आ चुका हूँ।
उनका शांत चेहरा, हल्के खुले होंठ और गहरी नींद में डूबी हुई हालत मुझे और भी बेकाबू कर रही थी। मेरा लंड इतना सख्त हो चुका था कि मुझे साफ महसूस हो रहा था कि अब मैं ज्यादा देर खुद को रोक नहीं पाऊँगा।
कुछ और स्ट्रोक के बाद मेरे शरीर में एक तेज झटका सा उठा। मैंने अपने हाथ की पकड़ थोड़ी मजबूत कर ली। अगले ही पल मेरा सफेद पानी धीरे-धीरे निकलना शुरू हुआ। पहली कुछ बूंदें सीधे उनके होंठों पर गिरीं। उनके नरम होंठों पर सफेद पानी की चमकती बूंदें साफ दिखाई दे रही थी।
उसके बाद लगातार और बूंदें उनके चेहरे पर गिरने लगी। कुछ बूंदें उनके ऊपरी होंठ से फिसल कर नीचे आई, जबकि कुछ उनके गालों पर फैल गई। देखते ही देखते उनका चेहरा जगह-जगह सफेद पानी से गीला होने लगा।
एक पतली धार उनके दाएँ गाल पर बनी और बहुत धीरे-धीरे नीचे की तरफ सरकने लगी। दूसरी तरफ कुछ बूंदें उनके होंठों के किनारे पर ठहर गई थी। मैं वहीं बैठा उन्हें देखता रहा। मेरी साँसें बहुत तेज चल रही थी और मेरा हाथ अब भी हल्का काँप रहा था। लेकिन दिशा दीदी अब भी गहरी नींद में थी।
कुछ मिनट बाद जब मेरी साँसें आम हुई, तो मुझे एहसास हुआ कि अब मुझे सब कुछ साफ करना होगा। मैंने धीरे से अपना अंडरवियर ऊपर किया और फिर पैंट पहन ली। उसके बाद बैग से एक टिश्यू निकाला और बहुत सावधानी से दिशा दीदी के चेहरे से सफेद पानी साफ करने लगा। पहले मैंने उनके होंठ पोंछे, फिर गाल, और फिर माथे के पास की बची हुई बूंदें भी साफ कर दी। जब मुझे पूरा यकीन हो गया कि उनके चेहरे पर कुछ भी नहीं बचा है, तो मैंने इस्तेमाल किया हुआ टिश्यू कूड़ेदान में फेंक दिया।
मैं वापस आकर उनके पास लेट गया। शरीर पूरी तरह थक चुका था। जैसे ही मैंने आँखें बंद की, मुझे कब नींद आ गई, इसका मुझे पता ही नहीं चला। मैं इतनी गहरी नींद में सोया जैसे किसी ने मुझे बेहोश कर दिया हो।
सुबह दिशा दीदी ने मुझे हिला कर उठाया। मैंने उनींदी आँखों से उनकी तरफ देखा और पूछा, “क्या हुआ दीदी?”
उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, “हमें निकलना है। आज हमें टेंट लगाने के लिए सही जगह ढूँढनी है।”
मैं तुरंत उठ गया। जल्दी से नहाया, कपड़े बदले और नीचे आया। दिशा दीदी पहले से ही जीप के पास खड़ी थी। आज वह खुद ड्राइव करने वाली थी। मैं जाकर उनके बगल वाली सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद हमने सफर शुरू किया। आखरी बैरियर पार करते ही हम जंगल के असली हिस्से में दाखिल हो गए। रास्ता कीचड़ से भरा हुआ था। कई जगह जीप फिसलती, उछलती और गड्ढों से गुजरती हुई आगे बढ़ रही थी।
कुछ देर बाद दिशा दीदी ने एक नज़र मेरी तरफ देखा और बोली, “कल रात मुझे लगा जैसे मेरे चेहरे को कुछ छू रहा था। तुम कुछ कर रहे थे क्या?”
उनकी बात सुनते ही मेरे दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई। लेकिन मैंने खुद को संभालते हुए कहा, “नहीं दीदी, मैं तो पूरी रात सो रहा था।”
उन्होंने कुछ सेकंड तक मुझे देखा, फिर हल्का सा मुस्कुराई और दोबारा सड़क पर ध्यान देने लगी। लगभग चार घंटे की लंबी ड्राइव के बाद हम जंगल के उस हिस्से में पहुँच गए जहाँ चारों तरफ सिर्फ बड़े पेड़ थे। दूर-दूर तक ना कोई इंसान, ना कोई आवाज़—बस पक्षियों की चहचहाहट, बहते पानी की आवाज़ और जंगल की गहरी खामोशी थी। ऐसा लग रहा था जैसे हम पूरी तरह इंसानी दुनिया से अलग हो चुके हों।
कुछ देर बाद हमें नदी के किनारे एक खुली जगह दिखाई दी। दिशा दीदी ने जीप रोक दी और सामने देखते हुए कहा, “यही सही जगह है। यहीं हम अपना कैंप लगाएंगे।”
हम दोनों तुरंत काम में लग गए। मैंने जीप से टेंट, बैग और बाकी सामान नीचे उतारना शुरू किया। दिशा दीदी जगह साफ करने लगी ताकि टेंट आराम से लगाया जा सके। कभी मैं रस्सियाँ पकड़ता, कभी वह खूंटे गाड़ती। हम दोनों बिना ज्यादा बात किए तेजी से काम कर रहे थे।
लेकिन सच कहूँ तो मेरा ध्यान पूरी तरह काम पर नहीं था। बाहर से मैं टेंट लगाने में उनकी मदद कर रहा था, लेकिन मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि अब हम दोनों इस घने जंगल में बिल्कुल अकेले हैं। कई किलोमीटर तक हमारे आस-पास कोई इंसान नहीं था। बस मैं, दिशा दीदी और यह शांत जंगल।
यह सोचकर मेरे अंदर एक अलग ही एहसास उठ रहा था। मुझे लग रहा था कि शायद इस सफर के दौरान मुझे उनके और करीब आने का मौका मिल सकता है। अब ना कोई घर था, ना कोई रोकने वाला, ना कोई ऐसा जो हमारे बीच आ सके। जितना मैं इस बारे में सोचता, उतना ही मेरे मन में उम्मीद बढ़ती जाती