पिछला भाग पढ़े:- साक्षी दीदी और मेरी सेक्स कहानी-4
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
मम्मी-पापा अगले दिन सुबह शादी से वापस आने वाले थे, यानी मेरे पास साक्षी दीदी के साथ पूरा एक और दिन था। यह सोच कर ही मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। सच कहूँ तो उनकी देख-भाल करना मुझे किसी जिम्मेदारी या बोझ की तरह बिल्कुल नहीं लग रहा था। उल्टा, ऐसा लग रहा था जैसे मुझे वह समय मिल गया हो जिसकी मैंने हमेशा मन ही मन इच्छा की थी।
उनका एक हाथ प्लास्टर में बंधा हुआ था। चोट की वजह से उन्हें हर छोटे काम के लिए मेरी मदद की जरूरत पड़ रही थी। लेकिन मुझे इसमें ज़रा भी थकान नहीं होती थी। उनके पास रहना, उनसे बातें करना, उनके लिए कुछ करना—यह सब मेरे लिए किसी खास तोहफे से कम नहीं था।
उस दिन सुबह से ही मैंने सोच लिया था कि उनके लिए सांभर-चावल बनाऊँगा। यह उनकी पसंदीदा डिश थी, और मैं चाहता था कि उन्हें यह खाकर खुशी हो। दोपहर के समय मैं रसोई में खड़ा सब्जियाँ काट रहा था और कुकर में चावल चढ़ा चुका था। सांभर की खुशबू धीरे-धीरे पूरे घर में फैलने लगी थी। मैं पूरी कोशिश कर रहा था कि सब कुछ अच्छा बने, क्योंकि यह सिर्फ खाना नहीं था; इसमें मेरे मन का प्यार और अपनापन भी शामिल था।
कुछ देर बाद साक्षी दीदी भी धीरे-धीरे चलते हुए रसोई में आ गई। चोट की वजह से वे ज्यादा मदद तो नहीं कर सकती थी, लेकिन फिर भी मेरे पास खड़ी होकर मुझे बताती रहीं कि क्या करना है। कभी कहती कितना नमक डालना है, कभी कहती कि अब सांभर को थोड़ा और पकने दो।
जब भी मैं कोई छोटी सी गलती करता, वे अपने ठीक हाथ से हल्के से मेरे सिर पर चपत मार देती। फिर खिलखिला कर हँस पड़ती। उनकी हँसी सुनते ही मेरा दिल खुश हो जाता था।
उस दिन उन्होंने छोटे आरामदायक शॉर्ट्स और ढीली-सी टी-शर्ट पहन रखी थी। चोट की वजह से उनके लिए ब्रा पहनना आसान नहीं था, इसलिए टी-शर्ट के भीतर उनके स्तनों का उभार साफ दिखाई दे रहा था। कपड़ा ढीला था, लेकिन फिर भी उनके स्तनों की भरी हुई गोलाई आसानी से नज़र आ रही थी। जब वे मेरे बिल्कुल पास आकर बर्तन में झाँकती या मसालों की ओर इशारा करती, तो टी-शर्ट के ऊपर से उनके स्तन मेरी बाँह या कंधे से हल्के से छू जाते।
कभी-कभी जब वे मेरे कंधे के ऊपर से झुक कर देखती कि मैं क्या कर रहा हूँ, तो उनके उभरे हुए निप्पल कपड़े के ऊपर से मेरी पीठ या बाँह को छू जाते। वह छूना बस एक पल का होता, लेकिन मेरे भीतर जैसे बिजली-सी दौड़ जाती। मैं खुद को संभालने की कोशिश करता, लेकिन दिल की धड़कन अपने आप तेज हो जाती।
उनके खुले बालों से शैम्पू की हल्की खुशबू आ रही थी। चेहरे पर बिना मेकअप के भी एक अलग ही चमक थी। चोट के बावजूद उनकी आँखों में वही शरारत थी और होंठों पर लगातार मुस्कान। उस पल मुझे लगा कि किसी अपने के साथ इस तरह रसोई में खड़े होकर हँसते-बोलते समय बिताना भी कितना खूबसूरत हो सकता है।
मैं कुछ पल तक चुप-चाप उन्हें देखता रहा। वे चम्मच से सांभर को हिलाते हुए उसकी खुशबू सूँघ रही थी। मेरे मन में काफी देर से एक सवाल घूम रहा था। लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि उनसे पूछूँ या नहीं। आखिर मैंने हिम्मत जुटाई और धीमी आवाज में कहा, “दीदी, क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूँ?”
उन्होंने तुरंत मेरी ओर देखा। बिना एक पल गंवाए उन्होंने कहा, “ऑफकोर्स, गोलू। पूछो, क्या बात है?”
मैं कुछ सेकंड तक चुप रहा। मेरे हाथ में पकड़ा चम्मच धीरे-धीरे सांभर में घूम रहा था, लेकिन मेरा पूरा ध्यान सिर्फ उन पर था। मैंने हल्का-सा गला साफ किया और झिझकते हुए कहा, “दीदी… आज सुबह जब हम साथ में नहा रहे थें… तब आपने मेरे… उस हिस्से को छुआ था…”
मेरी बात सुनते ही उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान आ गई। उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए शरारत भरे अंदाज़ में कहा, “तुम्हारे लंड की बात कर रहे हो?”
उनके मुँह से यह शब्द सुनते ही मेरी धड़कन और तेज हो गई। मैंने धीरे से सिर हिलाया और कहा, “हाँ दीदी… मेरे लंड की। जब आपने उसे छुआ था, तब आपके मन में क्या चल रहा था?”
मैंने एक गहरी साँस ली और आगे कहा, “आप मेरी बड़ी बहन हो, लेकिन आज सुबह जो हुआ, उसने मुझे पूरी तरह उलझा दिया है। आपने मेरे लंड को छुआ… और मैंने भी आपके बूब्स को छुआ। उस पल मुझे लगा कि हमारे बीच कुछ बदल गया है।”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि मुझे शर्म महसूस करनी चाहिए या नहीं। क्योंकि जो हुआ, उसे मैं भूल नहीं पा रहा। लेकिन आप ऐसे जता रही हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जैसे सुबह बाथरूम में जो हुआ, उसका आपके लिए कोई मतलब ही नहीं था।”
मेरी बात सुन कर साक्षी दीदी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। उन्होंने अपने ठीक हाथ से मेरे गाल को छुआ और शांत आवाज में बोली, “पागल मत बनो, गोलू। ऐसी बेकार बातें अपने दिमाग में मत लाया करो।”
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए आगे कहा, “हम बस साथ में नहा रहे थे, उससे ज़्यादा कुछ नहीं। जब तुम छोटे थे, तब मैं ही तुम्हें नहलाती थी। तब भी मैं तुम्हारा लंड धोती थी। आज भी वही हुआ है। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसके बारे में तुम्हें इतना सोचने की ज़रूरत हो।”
वे थोड़ा और गंभीर हो गई। “हम भाई-बहन हैं, और हमेशा यही रहेंगे। इससे आगे कुछ भी नहीं। इसलिए अपने मन में जो भी उलझन है, उसे यहीं खत्म कर दो।”
फिर उन्होंने उंगली उठा कर मुझे चेतावनी देते हुए कहा, “और अगर तुमने दोबारा इस तरह की हरकत करने की कोशिश की या मेरे बूब्स को छूने की कोशिश की, तो मैं सच में तुम्हारा मुँह तोड़ दूँगी। समझे?”
मैंने चुप-चाप सिर हिला दिया। उनकी बात सुन कर मेरे मन की सारी उलझन पूरी तरह खत्म तो नहीं हुई, लेकिन इतना ज़रूर समझ आ गया कि वे इस बात को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहती थी। मैंने बात वहीं खत्म कर दी और वापस खाना बनाने में लग गया। कुछ ही देर में सांभर-चावल तैयार हो गया।
हम दोनों ने साथ बैठ कर खाना खाया। मैं हर कुछ मिनट बाद उनसे पूछता कि स्वाद कैसा है, और वे हर बार मुस्कुरा कर कहती कि मैंने उम्मीद से भी अच्छा बनाया है। उनके मुँह से अपनी तारीफ सुन कर मुझे भीतर ही भीतर बहुत खुशी हो रही थी।
खाना खाने के बाद हमने ड्राइंग रूम में वीडियो गेम खेलने का फैसला किया। वह पुराना शूटिंग गेम था जिसमें प्लास्टिक की टॉय गन से स्क्रीन पर निशाना लगाना होता था। साक्षी दीदी सिर्फ अपने ठीक हाथ से गन पकड़ रही थी, क्योंकि दूसरा हाथ प्लास्टर में था।
हर बार जब मैं उनसे ज्यादा नंबर बना लेता, वे नाराज़ होने का नाटक करती। “चीटिंग कर रहा है तू,” कह कर वे हँस पड़ती। जब उन्हें लगता कि वे हारने वाली हैं, तो अचानक मेरे बिल्कुल पास आ जाती और मेरी गन को पकड़ने की कोशिश करती।
एक बार जैसे ही मैंने स्क्रीन पर निशाना साधा, वे तेजी से मेरी ओर झुकी। उनका शरीर मेरे इतने करीब आ गया कि उनकी टी-शर्ट के भीतर भरे हुए स्तन सीधे मेरी छाती से दब गए। वह स्पर्श बहुत हल्का था, लेकिन इतना करीब कि मेरे शरीर में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई। वे मेरी गन को नीचे करने की कोशिश कर रही थी और साथ ही हँस भी रही थी।
मैंने खुद को संभालते हुए कहा, “दीदी, ऐसे करोगी तो मैं कैसे जीतूँगा?”
वे मुस्कुराई और और भी करीब आ गई। उनके स्तनों की नरमी मेरी छाती पर साफ महसूस हो रही थी। “बस यही तो चाहिए,” उन्होंने शरारत से कहा और मेरी गन का रुख दूसरी ओर मोड़ दिया।
कुछ देर बाद फिर वही हुआ। जैसे ही मैं जीतने के करीब पहुँचा, वे सोफे पर सरक कर मेरे बिल्कुल साथ सट गई। इस बार उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और गन छीनने की कोशिश करने लगी। उनकी साँसें मेरे चेहरे से टकरा रही थी और उनके स्तन मेरी बाँह और सीने पर दब रहे थे।
मैं खेल पर ध्यान लगाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उनका इतना करीब होना मेरे लिए आसान नहीं था। वे पूरी तरह बेफिक्र होकर हँस रही थी, जैसे उन्हें मेरे मन की हालत का अंदाज़ ही ना हो।
एक बार तो वे लगभग मेरी गोद में आ बैठी। अपने ठीक हाथ से मेरी कलाई पकड़ कर उन्होंने गन ऊपर उठा दी और खिलखिला कर बोली, “अब देख, कौन जीतता है।” उस दौरान उनका पूरा ऊपरी बदन मुझसे सटा हुआ था और उनके स्तनों का दबाव मेरी छाती पर साफ महसूस हो रहा था।
मैंने उनकी ओर देखा। उनके चेहरे पर बच्चे जैसी खुशी थी। वे बस खेल का मज़ा ले रही थी, लेकिन मेरे लिए हर बार उनका यूँ पास आना उस दोपहर को और भी खास बना रहा था।
हम लगभग पूरे दिन ऐसे ही खेलते, हँसते और बातें करते रहे। कब शाम ढल कर रात में बदल गई, पता ही नहीं चला। रात को मैं उन्हें उनके कमरे तक छोड़ने गया। मैंने समय पर उनकी दवा दी और पानी का गिलास पकड़ाया। वे बिस्तर पर टिक कर बैठ गई और मैं उनके पास कुर्सी खींच कर बैठ गया।
हम दोनों धीरे-धीरे बातें करने लगे। कभी बचपन की बातें, कभी स्कूल की यादें, कभी मम्मी-पापा की आदतों पर हँसी। समय कब बीतता गया, हमें पता ही नहीं चला। लेकिन कुछ देर बाद मैंने देखा कि उनके चेहरे का रंग बदलने लगा है। उनकी गोरी त्वचा लाल पड़ती जा रही थी। पहले मुझे लगा कि उन्हें नींद आ रही होगी या शायद दवा असर कर रही होगी।
फिर उन्होंने हल्की काँपती आवाज में कहा, “गोलू… मुझे बहुत ठंड लग रही है।”
मैं तुरंत उठा और उन्हें अच्छी तरह कंबल ओढ़ा दिया। मैंने उनके पैरों तक कंबल दबा दिया, लेकिन फिर भी उनका शरीर काँप रहा था। जब मैंने उनके माथे और हाथ को छुआ, तो मैं चौंक गया। उनका शरीर ठंडा पड़ता जा रहा था।
उनके होंठ हल्के-हल्के काँप रहे थे। वे कंबल के अंदर सिमट गई, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल रही थी। मैं घबरा गया। मैंने तुरंत डॉक्टर को फोन किया, लेकिन क्लिनिक बंद हो चुका था। काफी कोशिश के बाद डॉक्टर ने फोन उठाया। मैंने जल्दी-जल्दी सारी बात बताई।
डॉक्टर ने कहा कि शायद दवा का रिएक्शन या एलर्जी हो सकती है। उन्होंने कहा, “उन्हें गर्म रखो। अगर शरीर का तापमान नहीं बढ़ा, तो हालत गंभीर हो सकती है।”
मैंने फोन रखते ही कमरे का पंखा बंद किया, खिड़कियाँ बंद की और एक और मोटा कंबल ला कर उनके ऊपर डाल दिया। फिर भी उनकी कंपकंपी कम नहीं हुई।
रात काफी हो चुकी थी। कमरे में हल्की पीली रोशनी जल रही थी। साक्षी दीदी बिस्तर पर सिकुड़ी हुई थी और दाँत किटकिटा रहे थे। आधी रात के करीब उन्होंने कांपती आवाज में मुझे पुकारा, “गोलू… मुझे बहुत ठंड लग रही है… प्लीज़ कुछ करो।”
मैं घबरा कर इधर-उधर सोचने लगा। एक पल के लिए मेरे मन में आया कि उन्हें सहारा देकर रसोई तक ले जाऊँ और गैस जलाकर कमरे को थोड़ा गर्म कर दूँ। लेकिन अगले ही पल मुझे एहसास हुआ कि यह ठीक नहीं होगा। उनका एक हाथ प्लास्टर में था, शरीर पूरी तरह कमजोर हो चुका था, और वे मुश्किल से बिस्तर पर सीधी लेटी हुई थी। ऐसी हालत में उन्हें चलाना खतरनाक हो सकता था।
मैं अभी यही सोच रहा था कि साक्षी दीदी ने कांपते हुए अपना ठीक हाथ मेरी ओर बढ़ाया।
“गोलू… मेरे पास आ जाओ।”
मैं तुरंत बिस्तर के करीब गया। उन्होंने कंबल को थोड़ा उठाया और धीमे से कहा, “अंदर आ जाओ… मुझे अपनी बाँहों में ले लो। शायद इससे मुझे थोड़ा गर्म लगे।”
उनकी बात सुन कर मैंने बिना एक पल गंवाए कंबल के अंदर जगह बनाई और उनके पास लेट गया। जैसे ही मैंने उन्हें अपनी बाँहों में लिया, मैं चौंक गया। उनका शरीर बर्फ की तरह ठंडा था। उनकी पीठ और कंधे ठिठुर रहे थे, और वे लगातार काँप रही थी।
मैंने उन्हें सावधानी से अपने सीने से लगा लिया। उनके सिर को अपने कंधे के पास टिकाया और दूसरी बाँह उनकी कमर के चारों ओर रख दी ताकि उन्हें पूरी गर्माहट मिल सके।
उन्होंने हल्की-सी आवाज में कहा, “तुम्हारी बाँहों में थोड़ा बेहतर लग रहा है, गोलू।”
उनकी बात सुन कर मेरे भीतर राहत की एक लहर दौड़ गई। मैं उन्हें और कस कर अपने करीब ले आया ताकि मेरे शरीर की गर्मी पूरी तरह उन्हें मिल सके।
कुछ मिनट तक हम दोनों उसी तरह चुप-चाप लेटे रहे। उनकी कंपकंपी पहले से थोड़ी कम हो गई थी, लेकिन मैं अब भी महसूस कर सकता था कि उनका शरीर पूरी तरह गर्म नहीं हुआ था। कंबल के अंदर हमारे शरीर एक-दूसरे से सटे हुए थे, फिर भी कपड़ों की परतें मेरे शरीर की गर्माहट को सीधे उन तक पहुँचने से रोक रही थी।
मैंने हिचकिचाते हुए धीमी आवाज में कहा, “दीदी… मुझे लगता है हमारे कपड़े शरीर की ज़्यादातर गर्मी सोख ले रहे हैं। अगर आप ठीक समझें, तो हम कुछ कपड़े हटा सकते हैं ताकि मेरे शरीर की गर्माहट सीधे आपको मिल सके।”
मेरी बात सुन कर उन्होंने अपना चेहरा मेरे सीने से थोड़ा ऊपर उठाया और मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा, “अगर इससे मुझे जल्दी आराम मिलेगा… तो ठीक है, गोलू।”
उनके जवाब के बाद मैंने पहले अपने कपड़े उतार दिए ताकि मेरे शरीर की गर्मी सीधे उन्हें मिल सके। फिर मैंने बहुत सावधानी से उनकी टी-शर्ट को ऊपर की ओर सरकाया। जैसे ही कपड़ा हट कर एक तरफ हुआ, उनके स्तन मेरे सामने आ गए। कमरे की हल्की रोशनी में उनकी त्वचा दूध जैसी उजली लग रही थी। उनके स्तन भरे हुए और गोल थे, और ठंड की वजह से उनके निप्पल हल्के से सख्त हो गए थे। वे बेहद खूबसूरत लग रही थी।
मैंने अपनी नज़रें कुछ पल के लिए झुका ली ताकि उन्हें असहज महसूस ना हो। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। उनकी साँसें अब भी हल्की-हल्की काँप रही थी और वे मेरी ओर भरोसे से देख रही थी।
इसके बाद मैंने धीरे से उनके शॉर्ट्स नीचे खिसकाए। वे अंदर कुछ नहीं पहने थी। उनका नाजुक हिस्सा भी अब मेरी नज़रों के सामने था। मैंने बस एक पल के लिए उन्हें देखा और फिर तुरंत कंबल को ऊपर खींच दिया ताकि उनके शरीर में ठंडी हवा ना लगे।
अब हम दोनों बिना कपड़ों के एक ही कंबल के नीचे थे। मैंने उन्हें फिर से अपनी बाँहों में भर लिया। उनकी त्वचा की ठंडक सीधे मेरे शरीर से महसूस हो रही थी, लेकिन अब मेरी गर्माहट भी बिना किसी रुकावट के उन तक पहुँच रही थी।
उन्होंने एक लंबी साँस ली और अपना चेहरा मेरे सीने में छिपा लिया। उनके स्तन मेरी छाती से लगे हुए थे, और उनका पूरा शरीर धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा। उनकी कंपकंपी पहले से काफी कम हो चुकी थी।
बहुत धीमी आवाज में उन्होंने कहा, “अब सच में थोड़ा अच्छा लग रहा है, गोलू।”
उनकी बात सुन कर मैं कुछ पल तक बिल्कुल शांत पड़ा रहा। यह एहसास मेरे लिए बहुत अजीब था। यह वही साक्षी दीदी थी—वही दीदी जो बचपन में मेरी गलतियों पर मुझे डाँटती थी, कभी-कभी हल्की-सी चपत भी मार देती थी। और आज वे मेरी बाँहों में पूरी तरह नंगी थी।
उनके स्तनों की नरमी मेरी छाती पर साफ महसूस हो रही थी। उनका चेहरा मेरे कंधे के पास था और उनकी साँसों की गर्माहट मेरी त्वचा को छू रही थी। मेरा शरीर भी इस एहसास पर अपना जवाब दे रहा था। धीरे-धीरे मेरा लंड सख्त होने लगा।
मैंने घबरा कर साँस रोकी। कंबल के नीचे हम इतने करीब थे कि मुझे महसूस हुआ कि मेरा लंड उनकी जाँघों के पास आकर टिक गया है, उनके नाजुक हिस्से के बेहद करीब। उस एहसास से मेरी धड़कन और तेज हो गई।
शायद मेरी साँसों की रफ्तार और शरीर की हलचल से उन्हें भी कुछ महसूस हुआ। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोली। उनकी पलकों पर अभी भी नींद और थकान साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने हल्का-सा सिर उठाकर मेरी ओर देखा, फिर बहुत धीमी आवाज में बोली, “गोलू… तुम्हारा लंड सख्त हो रहा है।”
मैंने नज़रें झुका कर धीमी आवाज में कहा, “सॉरी दीदी… मेरा ऐसा करने का इरादा नहीं था। मैं बस आपको गर्म रखने की कोशिश कर रहा था।”
उन्होंने मेरे गाल पर हाथ फेरते हुए फुसफुसा कर कहा, “गोलू… अगर तुम्हारा लंड इतना सख्त हो गया है और तुम्हें अजीब महसूस हो रहा है… तो तुम उसे मेरी चूत के अंदर रख सकते हो… लेकिन मुझे चोदना मत।”
मैंने काँपती आवाज में कहा, “दीदी… क्या आप सच में यह कह रही हो?”
उन्होंने बहुत हल्के से सिर हिलाया और फुसफुसा कर बोली, “हाँ, गोलू। मैं नहीं चाहती कि तुम अपने आप को रोकने की कोशिश में और बेचैन हो जाओ। बस धीरे से… और जैसा मैंने कहा है, मुझे चोदना मत।”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए धीमी आवाज में कहा, “हाँ दीदी… मैं सिर्फ अपना लंड आपकी चूत के अंदर रखूँगा। मैं आपको चोदने की कोशिश नहीं करूँगा। शायद इससे आपके शरीर को और गर्मी मिलेगी।”
उस पल मुझे खुद भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं और साक्षी दीदी यहाँ तक कैसे पहुँच गए। कुछ दिन पहले तक मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे बीच ऐसा कोई पल आएगा। लेकिन उस दिन जो कुछ हुआ, उसके लिए मैं दिल से शुक्रगुज़ार था। मेरे सामने साक्षी दीदी लेटी थी, उनकी साँसें तेज चल रही थी, और मैं अपने जीवन के सबसे बड़े और सबसे खुबसूरत पल के सामने खड़ा था। क्योंकि कुछ पलों में मैं अपना लंड अपनी बड़ी बहन के चूत के अंदर रखने वाला था।