पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-14
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
सुधा दीदी और साक्षी दीदी एक-दूसरे के पास बिल्कुल नंगी बैठी थी और मैं उस कमरे के कोने में चुप-चाप बैठा उन्हें देख रहा था। कमरे में हल्की पीली रोशनी थी जिससे पूरा माहौल शांत और थोड़ा अजीब सा लग रहा था। दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी जैसे वो एक-दूसरे के साथ बहुत आराम महसूस कर रही हो।
साक्षी दीदी के कुछ बाल बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहे थे। तभी सुधा दीदी धीरे-धीरे उसके और करीब गई। उसने बहुत आराम से अपना हाथ उठाया और प्यार से साक्षी दीदी के बाल उसके कान के पीछे कर दिए ताकि उसका चेहरा साफ दिखाई दे। उस पल साक्षी दीदी ने उसकी तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुरा दी। दोनों कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखती रही जैसे बिना कुछ बोले भी सब समझ रही हो।
कुछ देर की खामोशी के बाद सुधा दीदी ने धीरे से साक्षी दीदी का हाथ पकड़ा। उसकी आवाज बहुत धीमी थी लेकिन कमरे में साफ सुनाई दे रही थी। उसने साक्षी दीदी की आँखों में देखते हुए कहा, “साक्षी… क्या तुम सच में यह करना चाहती हो?”
यह सुनते ही साक्षी दीदी ने बिना जल्दी किए धीरे से सिर हिलाया। उसकी साँसें थोड़ी तेज चल रही थी लेकिन उसकी आँखों में डर नहीं था। उसने सुधा दीदी का हाथ थोड़ा और कस कर पकड़ा और धीमी आवाज में बोली, “हाँ सुधा दीदी… मैं सच में यह करना चाहती हूँ।”
अगले ही पल सुधा दीदी ने अपने होंठ साक्षी दीदी के होंठों पर रख दिए। दोनों ने धीरे से एक-दूसरे को बाहों में पकड़ लिया। उनके नंगे बदन पूरी तरह एक-दूसरे से लगे हुए थे। जैसे ही दोनों और करीब आई, उनके स्तन भी आपस में दबने लगे। दोनों की साँसें तेज हो रही थी और वह एक दूसरे को और कस कर पकड़ रही थी।
साक्षी दीदी के हाथ धीरे से सुधा दीदी की पीठ पर चले गए जबकि सुधा दीदी ने उसे अपनी बाहों में और करीब खींच लिया। उनके शरीर के बीच अब लगभग कोई दूरी नहीं बची थी और उनके स्तन हर साँस के साथ हल्के-हल्के एक-दूसरे से रगड़ खा रहे थे।
साक्षी दीदी ने आँखें बंद कर ली थी और उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे वह पूरी तरह उस पल में खो चुकी हो। सुधा दीदी भी बहुत धीरे और प्यार से उसे पकड़े हुई थी। दोनों बिना कुछ बोले बस एक-दूसरे को महसूस कर रही थी।
मैं वहीं बैठा यह सब देख रहा था। मेरी जिंदगी में यह पहली बार था जब मैं किसी लड़की को दूसरी लड़की को इस तरह किस्स करते हुए देख रहा था, वह भी पूरी तरह नंगी हालत में। कमरे का माहौल अब पहले से भी ज्यादा गहरा और भावुक लगने लगा था।
लेकिन दोनों वहीं नहीं रुकी। कुछ देर बाद वह एक-दूसरे के और करीब आ गई। सुधा दीदी कभी साक्षी दीदी के कंधे पर हल्का सा किस्स कर देती तो कभी उसके स्तनों के पास अपना चेहरा ले जाकर उसे अपने करीब महसूस करती। साक्षी दीदी भी उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए आँखें बंद कर लेती और हल्की मुस्कान देने लगती।
सुधा दीदी धीरे-धीरे साक्षी दीदी के और करीब आई। उसने प्यार से उसे अपनी बाहों में लिया और उसके सीने के पास चेहरा रख कर कुछ पल तक उसे महसूस करती रही। फिर वह धीरे से उसके स्तनों को चूमने और चूसने लगी। साक्षी दीदी की सांसें तेज हो रही थी और वह आँखें बंद करके उस पल में खोती जा रही थी।
कुछ पल बाद साक्षी दीदी ने धीरे से अपना हाथ सुधा दीदी के गाल पर रखा और उसे अपनी तरफ खींच लिया। वह उसके गले और कंधों के पास हल्के किस्स करने लगी। सुधा दीदी भी उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसे अपने और करीब खींच रही थी।
कुछ देर तक दोनों बस एक-दूसरे के बेहद करीब रह कर उस पल को महसूस करती रही। फिर सुधा दीदी ने धीरे से साक्षी दीदी की आँखों में देखा और हल्की मुस्कान के साथ धीमी आवाज में पूछा, “साक्षी… क्या तुम इसे और ज्यादा महसूस करना चाहती हो?”
साक्षी दीदी ने बिना देर किए धीरे से सिर हिलाया। उसकी सांसें अब भी तेज चल रही थी। “हाँ सुधा दीदी… मैं इस पल को पूरी तरह महसूस करना चाहती हूँ।”
यह सुन कर सुधा दीदी हल्का सा मुस्कुराई। उसने प्यार से साक्षी दीदी के चेहरे को छुआ और धीमी आवाज में कहा, “तो फिर आराम से लेट जाओ… और अपने पैर थोड़ा फैला लो।”
साक्षी दीदी ने हल्की शर्म के साथ सुधा दीदी की तरफ देखा। वह धीरे से बिस्तर पर लेट गई और जैसा सुधा दीदी ने कहा था वैसे ही अपने पैर थोड़ा फैला लिए। उसका नाजुक हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था। उसकी जांघों के बीच की त्वचा बेहद मुलायम और हल्की गुलाबी सी लग रही थी। ऊपर की तरफ छोटे और नरम बालों की पतली परत थी, जबकि अंदर की नमी उसकी त्वचा पर हल्की चमक पैदा कर रही थी। उसका शरीर हल्का कांप रहा था और वह बार बार शर्म से अपनी नज़रें झुका रही थी।
सुधा दीदी साक्षी दीदी की टांगों के बीच अपने घुटनों के बल बैठ गई। साक्षी दीदी आंखें बंद किए लेटी हुई थी और उसकी सांसें तेज हो रही थी। उसके सीने का उठना गिरना साफ दिखाई दे रहा था और उसकी उंगलियां बेचैनी में चादर को हल्के हल्के दबा रही थी। सुधा दीदी ने उसकी जांघों पर अपने हाथ रखे और धीरे-धीरे अपना चेहरा साक्षी दीदी के नाज़ुक हिस्से के बेहद करीब ले आई।
उसकी गर्म सांसें साक्षी दीदी की त्वचा से टकरा रही थी, जिससे साक्षी दीदी का बदन हल्के-हल्के कांपने लगा। अब सुधा दीदी के होंठ और साक्षी दीदी के नाज़ुक हिस्से के बीच में सिर्फ एक इंच की जगह बची थी। वह कुछ पल उसी तरह रुकी रही, मानो उस पल को और लंबा करना चाहती हो। उसकी उंगलियां धीरे-धीरे साक्षी दीदी की जांघों को सहला रही थी जबकि साक्षी दीदी अपनी आंखें बंद किए हर एहसास को महसूस कर रही थी।
सुधा दीदी ने कुछ देर इंतजार किया मानो वह साक्षी दीदी के नाज़ुक हिस्से के अंदर से आती हुई महक को महसूस कर रही हो और फिर एक-दम से उसने अपने होंठ साक्षी दीदी के नाज़ुक हिस्से के ऊपर रख दिए। जैसे ही उसके होंठ छुए, साक्षी दीदी ने अपने दोनों हाथों से चादर को भींच लिया और अपनी कमर ऊपर की तरफ उठा ली।
उसके होंठों से धीमी सी सिसकारी निकली और उसकी सांसें पहले से भी ज्यादा तेज़ हो गई। सुधा दीदी के होंठ साक्षी दीदी के बेहद नाज़ुक हिस्से के ऊपर टिके हुए थे और वह अपनी जीभ से उसे धीरे-धीरे चाट रही थी। हर बार उसकी जीभ का स्पर्श साक्षी दीदी के बदन में एक नई सिहरन दौड़ा देता। साक्षी दीदी की उंगलियां चादर को कस कर पकड़े हुई थी और उसकी टांगें हल्के-हल्के कांप रही थी। सुधा दीदी बिना जल्द-बाज़ी किए उसे महसूस कर रही थी, कभी अपने होंठों से दबाव बनाती तो कभी अपनी जीभ को धीरे-धीरे घुमाती, और हर एहसास के साथ साक्षी दीदी की बेचैनी और बढ़ती जा रही थी।
कुछ देर बाद सुधा दीदी ने अपने हाथों से साक्षी दीदी की टांगों को थोड़ा और फैला दिया ताकि वह उसे और करीब से महसूस कर सके। वह बीच-बीच में साक्षी दीदी की त्वचा को अपने होंठों से छूती। एक पल के लिए उसने हल्के से थूक अपने होंठों पर लगाया और फिर साक्षी दीदी के नाज़ुक हिस्से के आस-पास अपनी जीभ फेरते हुए उसे फिर से महसूस करने लगी। साक्षी दीदी की सांसें लगातार भारी होती जा रही थी और वह आंखें बंद किए हर स्पर्श में खोती चली जा रही थी।
अब साक्षी दीदी की हालत ऐसी हो चुकी थी कि उसके लिए अपनी बेचैनी को संभाल पाना मुश्किल हो रहा था। उसकी सांसें बेकाबू हो चुकी थी और उसका बदन हल्के-हल्के कांप रहा था। अचानक उसकी पकड़ चादर पर और कस गई और पेशाब की कुछ बूंदें नीचे की तरफ बह गई। सुधा दीदी ने जैसे ही वह एहसास महसूस किया, उसने तुरंत अपना चेहरा थोड़ा पीछे कर लिया और साक्षी दीदी की तरफ देखने लगी।
साक्षी दीदी ने कहा, “सुधा दीदी, वापस मत जाओ प्लीज़ मेरा पेशाब पियो।”
सुधा दीदी ने कहा, “मैं तुम्हारा पेशाब नहीं पीने वाली साक्षी।”
साक्षी दीदी के नाज़ुक हिस्से से कुछ और बूंदें गिरने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे अब वह खुद को बिल्कुल भी रोक नहीं पाएगी। साक्षी दीदी ने कहा, “प्लीज़ दीदी… मेरी हमेशा से ये डार्क फैंटेसी रही है… प्लीज़ मेरा पेशाब पी लो।”
साक्षी दीदी अब खुद को बिल्कुल भी रोक नहीं पा रही थी। उनके चेहरे पर शर्म, घबराहट और अंदर दबा हुआ तनाव साफ दिखाई दे रहा था। उनकी सांसें तेज हो चुकी थी और उनका पूरा शरीर हल्का कांप रहा था। अगले ही पल उनके नाजुक हिस्से से पेशाब की एक गर्म और तेज धार बाहर निकलने लगी। वह धार अचानक इतनी तेज थी कि कमरे में मौजूद हर इंसान कुछ पल के लिए हैरान रह गया।
लेकिन सुधा दीदी ने बिना एक पल गंवाए तुरंत अपना चेहरा फिर से साक्षी दीदी की टांगों के बीच झुका दिया। उन्होंने अपना मुंह धीरे से खोला और बहती हुई धार को सीधे अपने मुंह के अंदर लेने लगी। गर्म पेशाब लगातार उनके होंठों और जीभ से होकर गले के अंदर उतर रहा था।
साक्षी दीदी अब पूरी तरह खुद पर से कंट्रोल खो चुकी थी। उन्होंने अपने शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दिया। पेशाब की धार अब और ज्यादा तेज हो गई थी और लगातार सुधा दीदी के मुंह के अंदर जा रही थी। उनका पूरा मुंह उस गर्म पेशाब से भर चुका था। कुछ बूंदें उनके होंठों के किनारों से नीचे बहने लगी थी, लेकिन वह फिर भी उसे लगातार निगलने की कोशिश कर रही थी।
सुधा दीदी की आंखें आधी बंद थी, जैसे वह उस पल को पूरी तरह महसूस करना चाहती हों। दूसरी तरफ साक्षी दीदी की हालत भी अलग थी। उनके चेहरे पर गहरी शर्म साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन उसी के साथ उनके अंदर एक अजीब सा सुकून भी महसूस हो रहा था।
साक्षी दीदी कुछ पल बाद धीरे-धीरे शांत होने लगी। कमरे में भारी खामोशी फैल गई थी और दोनों की सांसें अभी भी तेज चल रही थी। सुधा दीदी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और अचानक जोर से खांसने लगी। उनके गले में जलन सी महसूस हो रही थी, जैसे वह उस पल पेशाब के असर से खुद को संभाल नहीं पा रही हों।
उन्होंने जल्दी से अपने होंठ पोंछे और कुछ सेकंड तक लगातार खांसती रही। उनके चेहरे पर हैरानी साफ दिखाई दे रही थी। साक्षी दीदी उन्हें घबराकर देखने लगी, लेकिन सुधा दीदी ने हाथ उठा कर उन्हें रोक दिया।
खांसी के बीच उन्होंने भारी आवाज में कहा, “बस साक्षी… यह पहली और आखिरी बार था। मैं दोबारा कभी ऐसा नहीं करूंगी।”
इसके बाद सुधा दीदी ने धीरे-धीरे अपने कपड़े उठाए और उन्हें पहनना शुरू कर दिया। उनके हाथों में अब भी हल्की घबराहट महसूस हो रही थी। साक्षी दीदी भी चुप-चाप अपने कपड़े पहनने लगी। कमरे में कोई कुछ नहीं बोल रहा था। कुछ मिनट बाद हम तीनों अपने-अपने जगह पर लेट गए। कमरे की लाइट बंद हो चुकी थी। हर कोई अपनी सोच में खोया हुआ था, जैसे अभी जो हुआ उसे भूलने की कोशिश कर रहा हो।
अगली सुबह हमारी आंख काफी देर बाद खुली। रात की बारिश के बाद गांव की हवा में मिट्टी की भीनी खुशबू फैली हुई थी। बाहर हल्की धूप निकल चुकी थी और दूर-दूर से पक्षियों की आवाजें सुनाई दे रही थी। हम तीनों धीरे-धीरे उठे और ताजा होने लगे।
सुधा दीदी ब्रश करने में बाकी सब से थोड़ा ज्यादा समय ले रही थी। वह चुप-चाप बाहर बने छोटे से नल के पास खड़ी थी और बार-बार पानी से कुल्ला कर रही थी। उनके चेहरे पर हल्की झिझक अब भी दिखाई दे रही थी, जैसे पिछली रात की बात उनके दिमाग से निकल नहीं रही हो। साक्षी दीदी बीच-बीच में उनकी तरफ देख रही थी, लेकिन दोनों में ज्यादा बात नहीं हो रही थी।
हमारी रात में गांव से शहर जाने वाली बस थी, इसलिए हमने तय किया कि दिन भर गांव घूम लिया जाए। नाश्ता करने के बाद साक्षी दीदी हमें अपने गांव की गलियों में लेकर निकल पड़ी। रात की बारिश की वजह से जगह-जगह कीचड़ जमा था। संकरी मिट्टी वाली सड़कें गीली थी और चलते समय चप्पलों में मिट्टी चिपक रही थी।
दोपहर की धूप काफी तेज हो चुकी थी। साक्षी दीदी हम दोनों से थोड़ा आगे चल रही थी और रास्ते में अपने गांव के बारे में मजेदार बातें बता रही थी। कभी वह पुराने मंदिर की कहानी सुनाती, तो कभी बचपन में नदी के किनारे खेली गई शरारतों के बारे में बताने लगती। मैं और सुधा दीदी चुप-चाप उनके पीछे चलते हुए सब सुन रहे थे।
कुछ देर बाद गांव का रास्ता धीरे-धीरे नदी की तरफ जाने लगा। दूर से बहते पानी की आवाज सुनाई देने लगी थी। तभी साक्षी दीदी ने पीछे मुड़ कर मुस्कुराते हुए कहा, “चलो, आज तुम्हें गांव वाली असली फिशिंग करके दिखाती हूं।”
नदी के पास पहुंचने से पहले हम एक छोटी सी दुकान पर रुके। वहां पुराने लकड़ी के तख्त पर फिशिंग के छोटे-छोटे कांटे, धागे और कुछ जरूरी सामान रखा हुआ था। साक्षी दीदी ने दुकानदार से कुछ फिशिंग हुक और मजबूत धागे लिए।
सामान लेने के बाद हम तीनों नदी की तरफ बढ़ गए। वह एक खुली नदी थी जहां दूर-दूर तक कोई बड़ी छांव नहीं थी। तेज धूप सीधे हमारे शरीर पर पड़ रही थी। नदी का पानी धूप में चमक रहा था और उसके ऊपर हल्की हवा चल रही थी।
हम धीरे-धीरे किनारे के पास चलते हुए फिशिंग के लिए सही जगह ढूंढने लगे। धूप इतनी तेज थी कि कुछ ही देर में हमारे चेहरे गर्म होने लगे। जब भी मेरी नज़र सुधा दीदी और साक्षी दीदी पर जाती, उनके चेहरे सूरज की रोशनी से हल्के लाल दिखाई देते। उनके माथे और गर्दन पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थी।
साक्षी दीदी बार-बार अपने हाथ से माथे का पसीना पोंछ रही थी जबकि सुधा दीदी अपने दुपट्टे से गर्दन साफ कर रही थी। हम तीनों आखिरकार नदी के किनारे बैठ गए और फिशिंग शुरू करने की तैयारी करने लगे।
करीब एक घंटे तक कोशिश करने के बाद भी हमारे हाथ एक भी मछली नहीं लगी। तेज धूप और गर्म हवा की वजह से हम सब बुरी तरह थक चुके थे। नदी किनारे बैठना अब मुश्किल लगने लगा था। मैं बार-बार पानी में धागा डाल रहा था, लेकिन हर बार खाली हुक ही बाहर आ रहा था।
सुधा दीदी आखिरकार परेशान होकर उठी और साक्षी दीदी के पास जाकर बैठ गई। साक्षी दीदी अभी भी नदी की तरफ ध्यान लगाए बैठी थी, तभी अचानक सुधा दीदी ने शरारती मुस्कान के साथ उन्हें हल्का सा धक्का दे दिया। अगले ही पल साक्षी दीदी सीधे नदी के पानी में जा गिरी।
पानी ज्यादा गहरा नहीं था, लेकिन उनके कपड़े पूरी तरह भीग गए। कुछ सेकंड तक वह हैरानी से हमें देखती रही और फिर खुद भी हंसने लगी। मैं और सुधा दीदी जोर से हंस पड़े।
अचानक सुधा दीदी भी खुद को रोक नहीं पाई और पानी में कूद गई। उनके कपड़ों पर पानी के छींटे पड़ते ही वह भी पूरी तरह भीग गई। यह देख कर मैं भी नदी में उतर गया और हम तीनों पानी में बच्चों की तरह खेलने लगे।
हम एक-दूसरे पर पानी उछाल रहे थे। तेज धूप अब भी हमारे ऊपर पड़ रही थी, लेकिन नदी का ठंडा पानी सारी थकान दूर कर रहा था। भीगने की वजह से सुधा दीदी और साक्षी दीदी के कपड़े उनके शरीर से चिपक गए थे। उनके कपड़ों पर पानी की चमक साफ दिखाई दे रही थी और धूप में भीगा हुआ कपड़ा और ज्यादा गहरा दिखने लगा था।
गीले कपड़े उनके शरीर के आकार के साथ पूरी तरह चिपक गए थे। उनके स्तन भी कपड़ों के अंदर साफ उभर कर दिखाई दे रहे थे। पानी की वजह से कपड़ा इतना चिपक गया था कि उनके शरीर की हल्की बनावट तक नज़र आने लगी थी। जब धूप सीधे उन पर पड़ती, तो भीगे हुए कपड़ों पर चमक दिखाई देती और उनके स्तनों का आकार और ज्यादा साफ नज़र आता।
सुधा दीदी बार-बार अपने भीगे बाल पीछे कर रही थी जबकि साक्षी दीदी हंसते हुए अपने चेहरे से पानी हटाने की कोशिश कर रही थी।
मैं धीरे-धीरे पानी में चलते हुए सुधा दीदी के करीब पहुंचा। वह मुस्कुरा रही थी और उनके चेहरे पर पानी की बूंदें चमक रही थी। मैंने उन्हें अपने दोनों हाथों के बीच खींच लिया। वह हल्का सा हंस पड़ी और कुछ पल तक मेरी आंखों में देखती रही। फिर मैं धीरे-धीरे उनके और करीब गया और अपने होंठ उनके गीले होंठों पर रख दिए।
नदी का ठंडा पानी हमारे आस-पास बह रहा था जबकि तेज धूप हमारे ऊपर पड़ रही थी। सुधा दीदी ने पहले हल्की झिझक दिखाई, लेकिन फिर वह भी शांत होकर उसी पल में खो गई। उनके भीगे कपड़े मेरे शरीर से छू रहे थे और उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान दिखाई दे रही थी।
उसी समय साक्षी दीदी थोड़ी दूर खड़ी हमें देख रही थी। उनके चेहरे पर शरारती मुस्कान थी। मैंने उनकी तरफ देखा और हल्के से उन्हें पास आने का इशारा किया। कुछ पल बाद वह भी पानी में चलते हुए हमारे बिल्कुल करीब आ गई।
मैंने अपना एक हाथ सुधा दीदी के कंधे के आस-पास रखा और दूसरे हाथ से साक्षी दीदी को अपने करीब खींच लिया। हम तीनों नदी के बीच खड़े थे। कुछ देर बाद मैंने मुस्कुराते हुए साक्षी दीदी की तरफ देखा और उनके माथे के पास से भीगे बाल हटाए। फिर धीरे से उनके होंठों को चूम लिया। वह हल्का सा शर्मा गई और नीचे देखने लगी।
मैंने धीरे से उनकी तरफ देखते हुए कहा, “मैं अपनी पूरी जिंदगी तुम दोनों के साथ बिताना चाहता हूं।”
मेरी बात सुन कर दोनों कुछ सेकंड तक चुप रही। साक्षी दीदी के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे नरम पड़ गई जबकि सुधा दीदी मेरी तरफ ऐसे देखने लगी जैसे उन्हें समझ नहीं आ रहा हो क्या कहना चाहिए।
शाम होने तक हम नदी के किनारे बैठे बातें करते रहे। धीरे-धीरे सूरज नीचे जाने लगा और आसमान का रंग हल्का नारंगी दिखने लगा। हवा अब पहले से ठंडी महसूस हो रही थी। हम तीनों आखिरकार वापस गांव की तरफ लौट आए ताकि रात की बस पकड़ सकें।
घर पहुंच कर हमने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले और अपना सामान तैयार किया। बाहर अंधेरा बढ़ने लगा था। गांव की छोटी गलियों में जगह-जगह पीली लाइटें जल चुकी थी। थोड़ी देर बाद हम बस स्टैंड पहुंच गए।
कुछ मिनट बाद हमारी बस आ गई। बस ज्यादा भरी हुई नहीं थी, इसलिए हमें साथ में सीट मिल गई। मैं बीच में बैठा था जबकि एक तरफ सुधा दीदी और दूसरी तरफ साक्षी दीदी बैठी थी।
बस धीरे-धीरे गांव से बाहर निकलने लगी। खिड़की से ठंडी हवा अंदर आ रही थी। रास्ते में हम तीनों लगातार बातें और हंसी-मजाक कर रहे थे। कभी साक्षी दीदी गांव की कोई पुरानी बात याद करके हंसने लगती तो कभी सुधा दीदी मुझे छेड़ने लगती।
मैं बीच में बैठा उन दोनों को देख कर अंदर ही अंदर बहुत खुश महसूस कर रहा था। मुझे लग रहा था जैसे अब हमारे बीच कोई दूरी नहीं बची थी। उन दोनों के साथ बिताया हर पल मेरे दिमाग में घूम रहा था और बस की हल्की रोशनी में उनके मुस्कुराते चेहरे देख कर मेरे दिल में अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था