पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-13
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
अगली सुबह खाना खाने के बाद दोपहर में मैं और सुधा दीदी बस में बैठ कर साक्षी दीदी के गाँव के लिए निकल पड़े। पूरे रास्ते सुधा दीदी खिड़की के बाहर देखती रही। उनके चेहरे पर अब पहले जैसा गुस्सा नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे उनके दिल की सख्ती धीरे-धीरे खत्म हो रही हो। अब वह मुझसे नाराज़ नहीं थी। वह बस यही सोच रही थी कि आखिर हमारे बीच सब कुछ इतना आगे कैसे बढ़ गया।
पहले वह मेरे करीब आई, फिर साक्षी दीदी भी मेरे साथ जुड़ गई। अब यह सिर्फ दो लोगों की बात नहीं रही थी। अब हम तीनों भाई-बहनों के बीच ऐसा रिश्ता बन चुका था जिसमें हर किसी के मन में दूसरे के लिए चाहत थी। यह एक अजीब सा लव ट्रायंगल बन चुका था, जहाँ हम तीनों ही एक-दूसरे को चोदना चाहते थे।
पूरा दिन सफर करने के बाद हम शाम के समय साक्षी दीदी के गाँव पहुँचे। गाँव बहुत छोटा और शांत था। गाँव के पास एक बड़ी नदी बहती थी और घरों तक जाने के लिए कच्चे मिट्टी के रास्ते थे।
जैसे ही हम गाँव में पहुँचे, तेज बारिश शुरू हो गई। जब तक हम साक्षी दीदी के घर तक पहुँचे, हमारे कपड़े हल्के-हल्के भीग चुके थे। दरवाज़ा साक्षी दीदी की माँ ने खोला। हमें देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने हमें अंदर बुलाया और फिर ज़ोर से आवाज लगाई, “साक्षी! देख कौन आया है।”
कुछ ही पल बाद साक्षी दीदी अपने कमरे से बाहर आई। जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर और सुधा दीदी पर पड़ी, उनके चेहरे पर साफ हैरानी दिखाई देने लगी। शायद उन्हें हमारी अचानक आने की उम्मीद नहीं थी। उनकी आँखें कुछ पल के लिए बड़ी रह गई, फिर उनके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
साक्षी दीदी का घर छोटा लेकिन आरामदायक था। घर में दो कमरे और एक रसोई थी। टीन की छत पर गिरती बारिश की बूंदों की आवाज पूरे घर में गूँज रही थी। बाहर मौसम ठंडा हो चुका था, इसलिए सुधा दीदी ने अपने भीगे कपड़े बदलने का फैसला किया। वह साक्षी दीदी के साथ उनके कमरे में चली गई।
कुछ देर बाद जब सुधा दीदी कमरे से बाहर आई, तो उन्होंने साक्षी दीदी के कपड़े पहन रखे थे। साक्षी दीदी का शरीर पतला था, जबकि सुधा दीदी का बदन ज्यादा भरा हुआ था। इसी वजह से कपड़े उनके शरीर पर काफी कस कर फिट हो रहे थे। उनकी टी-शर्ट छाती के पास इतनी तंग थी कि उनके भरे हुए स्तनों की गोलाई साफ उभरकर दिखाई दे रही थी। कपड़ा उनके स्तनों पर तन गया था, मानो थोड़ा और खिंचाव पड़ते ही सिलाई खुल जाएगी। तंग कपड़े की वजह से उनके उभरे हुए निप्पल भी टी-शर्ट के ऊपर से साफ नज़र आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उनके स्तन कपड़े को पूरी तरह भर चुके हों और उनका हर आकार खुल कर सामने आ रही हो।
साक्षी दीदी की माँ कुछ देर तक हमसे बातें करती रही। लेकिन मैं और सुधा दीदी जानते थे कि साक्षी दीदी के अचानक गाँव लौटने के पीछे की असली वजह उनके माता-पिता नहीं जानते थे। साक्षी दीदी भी उनके सामने इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहती थी। इसीलिए हमने तय किया कि हम तीनों उनके कमरे में जाकर आराम से बात करेंगे, जहाँ कोई हमें सुन ना सके।
हम धीरे-धीरे साक्षी दीदी के कमरे की ओर बढ़े। तभी अचानक बारिश की वजह से बिजली चली गई और पूरा घर अँधेरे में डूब गया। साक्षी दीदी ने तुरंत एक लालटेन उठाया, उसमें बाती जलाई और उसे हाथ में लेकर कमरे में आ गई। हम तीनों कमरे के अंदर बैठ गए। लालटेन की हल्की पीली रोशनी कमरे में फैल गई। उस मंद रोशनी में हमारे चेहरे अलग ही दिखाई दे रहे थे।
कुछ पल तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। फिर सुधा दीदी ने गहरी साँस ली और साक्षी दीदी की तरफ देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “साक्षी, मैं मानती हूँ कि पहले मैं तुमसे बहुत नाराज़ थी। लेकिन अब मैं सिर्फ एक बात जानना चाहती हूँ… तुम अचानक सब कुछ छोड़ कर वापस यहाँ क्यों आ गई?”
सुधा दीदी की बात सुनते ही साक्षी दीदी की आँखें भर आई। उन्होंने होंठ भींच लिए और उनकी आवाज काँपने लगी।
“क्योंकि, सुधा दीदी… मुझे लगने लगा है कि मैं बहुत गंदी लड़की हूँ।”
यह कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, फिर शर्म से नज़रें झुका ली।
“गोलू मेरा भाई है। मैं जानती हूँ कि हमारा खून का रिश्ता नहीं है, लेकिन बचपन से मैंने उसे अपने भाई की तरह ही देखा है। और फिर भी…” वह कुछ पल के लिए रुक गई। उनकी आवाज भर्रा गई।” और फिर भी मैं उसके लंड का स्वाद लेना चाहती हूँ। जब भी यह ख्याल आता, मुझे खुद से घिन होने लगती थी।”
उन्होंने अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छिपा लिया। “मैं समझ नहीं पा रही थी कि मेरे साथ क्या हो रहा है। इसलिए मैं यहाँ वापस आ गई। मुझे लगा शायद तुम सब से दूर रह कर मैं अपने मन को शांत कर पाऊँगी।”
साक्षी दीदी की बात पूरी होते ही वह फूट-फूट कर रोने लगी। उनके कंधे काँप रहे थे और आँसू लगातार उनकी आँखों से बह रहे थे।
सुधा दीदी तुरंत उनके पास सरक आई और नरम आवाज़ में बोली, “नहीं साक्षी, तुम गंदी नहीं हो।”
लेकिन साक्षी दीदी जैसे उनकी बात सुन ही नहीं रही थी। वह बस सिर झुकाए लगातार रोती जा रही थी। सुधा दीदी ने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक गहरी गंभीरता थी।
फिर उन्होंने साक्षी दीदी का हाथ अपने हाथ में लिया और धीमी आवाज़ में कहा, “सुनो साक्षी… आज मैं तुम्हें मेरा और गोलू का एक ऐसा राज बताने जा रही हूँ, जो हमने आज तक किसी को नहीं बताया।”
उनकी यह बात सुनते ही साक्षी दीदी ने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया। उनकी आँखों में आँसू अब भी थे, लेकिन उनमें हैरानी भी साफ दिखाई दे रही थी।
सुधा दीदी ने धीरे-धीरे सब कुछ बताना शुरू किया। जैसे मुझे यह तक नहीं मालूम था कि लड़के अपना लंड कैसे हिलाते हैं। तब उन्होंने ही मुझे पहली बार इन सब बातों के बारे में समझाया।
उन्होंने साक्षी दीदी को बताया कि कैसे उन्होंने मुझे प्यार, चाहत और लड़का-लड़की के बीच होने वाली बातों के बारे में सिखाया। फिर धीरे-धीरे हम दोनों एक-दूसरे के इतने करीब आ गए कि हमारे बीच सिर्फ बातें ही नहीं रही। हम कई बार एक-दूसरे के साथ सोए और कई बार एक-दूसरे को चोदा भी।
सुधा दीदी ने बिना कुछ छिपाए सब कुछ बता दिया—कैसे यह सब शुरू हुआ, कैसे हम दोनों की झिझक खत्म हुई, और कैसे हम कई बार एक-दूसरे को चोदते रहे। उन्होंने यह भी कहा कि अब यह सब हमारे लिए कोई नई बात नहीं रही थी। हम दोनों कई बार एक-दूसरे के साथ रह चुके थे।
जब सुधा दीदी ने अपनी बात खत्म की, तो कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। बाहर बारिश की आवाज अब भी लगातार आ रही थी और लालटेन की पीली रोशनी साक्षी दीदी के चेहरे पर पड़ रही थी। मैंने देखा कि साक्षी दीदी के चेहरे पर हैरानी धीरे-धीरे उलझन में बदल गई। उनकी आँखें बड़ी हो गई थी, जैसे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा हो कि उन्होंने अभी जो कुछ सुना, वह सच है। वह कभी सुधा दीदी की तरफ देखती, कभी मेरी तरफ।
मैंने धीरे से साक्षी दीदी की तरफ देखा और कहा, “हाँ साक्षी दीदी, सुधा दीदी जो कुछ कह रही है, वह बिल्कुल सच है। उन्होंने तुमसे एक भी बात झूठ नहीं कही।”
मेरी बात सुन कर साक्षी दीदी ने कुछ पल तक हमें चुप-चाप देखा। फिर उन्होंने हैरानी भरी आवाज़ में कहा, “लेकिन यह कैसे हो सकता है? तुम और सुधा दीदी तो सगे भाई-बहन हो। फिर तुम दोनों एक-दूसरे को कैसे चोद सकते हो?”
सुधा दीदी ने बिना झिझक साक्षी दीदी की आँखों में देखते हुए कहा, “साक्षी, अभी कोई सवाल मत पूछो। बस मुझे इतना बताओ कि क्या तुम हमारे साथ वापस चलोगी?”
साक्षी दीदी चुप-चाप उनकी बात सुनती रही। सुधा दीदी ने आगे कहा, “अगर तुम हमारे साथ वापस चलती हो, तो मैं गोलू को सिखाऊँगी कि तुम्हें कैसे खुश करना है। फिर तुम्हें अपने एक्स बॉयफ्रेंड के पास वापस जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, और तुम्हें वह सब मिलेगा जो तुम चाहती हो।”
सुधा दीदी की बात सुन कर साक्षी दीदी कुछ पल तक बिल्कुल चुप बैठी रही। उन्होंने होंठ भींचे, फिर धीमी आवाज़ में कहा, “लेकिन… यह सब बहुत अजीब लगेगा।”
साक्षी दीदी की बात सुन कर सुधा दीदी हल्का सा मुस्कुराई। उन्होंने धीरे से अपने दोनों हाथ बढ़ा कर साक्षी दीदी को अपनी बाँहों में भर लिया। साक्षी दीदी पहले तो बिल्कुल शांत बैठी रही, जैसे समझ ही नहीं पा रही हों कि सुधा दीदी क्या करने वाली थी।
अगले ही पल सुधा दीदी ने झुक कर अपने होंठ साक्षी दीदी के होंठों पर रख दिए। यह सब इतना अचानक हुआ कि साक्षी दीदी चौंक गई। उन्होंने तुरंत थोड़ा पीछे हट कर अपने होंठ अलग कर लिए। लेकिन सुधा दीदी पीछे नहीं हटी। उन्होंने साक्षी दीदी के चेहरे को अपने हाथों में थामा और एक बार फिर धीरे से आगे बढ़ी। इस बार उन्होंने फिर से अपने होंठ साक्षी दीदी के होंठों से लगा दिए।
इस बार साक्षी दीदी पीछे नहीं हटी। शुरुआत में उनके होंठों में हल्की झिझक थी। उनकी साँसें तेज चल रही थी और वह धीरे-धीरे खुद को इस पल के साथ आम करने की कोशिश कर रही थी। कुछ ही पलों बाद उनके होंठों का तनाव कम होने लगा। उन्होंने भी धीरे से अपने होंठों को सुधा दीदी के होंठों का जवाब देना शुरू कर दिया। उनके होंठ बार-बार एक-दूसरे से मिल रहे थे। कभी सुधा दीदी हल्के से साक्षी दीदी के निचले होंठ को अपने होंठों में दबा लेती, तो कभी साक्षी दीदी झिझकते हुए वही एहसास लौटाती।
साक्षी दीदी ने अपनी आँखें बंद कर ली और पूरी तरह उस पल में खो गई। तभी सुधा दीदी का दायां हाथ धीरे-धीरे साक्षी दीदी के कंधे से फिसलता हुआ उनके सीने तक पहुँचा। उन्होंने पहले बहुत नरमी से उनकी टी-शर्ट के ऊपर से हाथ रखा, जैसे यह देख रही हों कि साक्षी दीदी इस स्पर्श को स्वीकार कर रही हैं या नहीं।
जब साक्षी दीदी ने पीछे हटने की कोई कोशिश नहीं की, तो सुधा दीदी ने अपनी हथेली से उनके एक स्तन की गोलाई को धीरे-धीरे महसूस करना शुरू किया। उनकी उंगलियाँ कपड़े के ऊपर से बहुत नरमी से घूम रही थी। कभी वह हल्के से दबाव डालती, तो कभी अपनी हथेली से पूरे स्तन को सहलाती।
साक्षी दीदी की साँसें और गहरी होने लगी। उनके होंठ अब भी सुधा दीदी के होंठों से जुड़े हुए थे, लेकिन उनके शरीर की हरकतें बता रही थी कि यह छूअन उन्हें भीतर तक महसूस हो रही थी। सुधा दीदी ने धीरे-धीरे अपने अंगूठे से उनके स्तन के ऊपरी हिस्से पर गोल-गोल घुमाते हुए हाथ फेरा, जबकि बाकी उंगलियाँ नीचे की नरम गोलाई को हल्के दबाव के साथ थामे रही।
कुछ देर बाद उन्होंने दूसरे स्तन पर भी उतनी ही नरमी से हाथ फेरना शुरू किया। ऐसा लग रहा था जैसे वह साक्षी दीदी की झिझक को अपने स्पर्श से पिघला रही हो। साक्षी दीदी अब पूरी तरह शांत थी। उनके हाथ अपने आप सुधा दीदी की कमर पर टिक गए और उन्होंने किस का जवाब और भी गहराई से देना शुरू कर दिया।
कुछ मिनटों तक दोनों इसी तरह एक-दूसरे में खोई रही। फिर सुधा दीदी ने धीरे-धीरे अपने होंठ पीछे खींच लिए। दोनों की साँसें तेज चल रही थी। साक्षी दीदी की आँखें अब भी बंद थी, जैसे वह उस एहसास से बाहर आने की कोशिश कर रही हो।
सुधा दीदी ने उनके चेहरे को अपने हाथों में थामे रखा और हल्की मुस्कान के साथ धीमी आवाज़ में पूछा, “अब बताओ साक्षी… क्या यह तुम्हें अजीब लग रहा है?”
साक्षी दीदी ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोली। उनके गाल लाल हो चुके थे और साँसें अब भी तेज चल रही थी। उन्होंने कुछ पल तक सुधा दीदी की आँखों में देखा, फिर हल्की सी शर्मीली मुस्कान के साथ धीमी आवाज़ में कहा, “थोड़ा सा… लेकिन अब उतना नहीं।”
इतने में बाहर से साक्षी दीदी की माँ की आवाज़ आई, “साक्षी, खाना लग गया है! सब बाहर आ जाओ।”
हम तीनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर सुधा दीदी और साक्षी दीदी ने अपने कपड़े ठीक किए और हम कमरे से बाहर आ गए।
हम तीनों एक-दूसरे के पास बैठ कर खाना खाने लगे। बाहर बारिश अब भी हो रही थी और घर के अंदर एक आम माहौल था। साक्षी दीदी के माता-पिता बिल्कुल नहीं जानते थे कि कुछ देर पहले उनके ही घर के इस छोटे से कमरे में क्या-क्या बातें हुई थी और हमारे बीच क्या बदल चुका था।
खाना खत्म होने के बाद साक्षी दीदी के पिता ने सोने का इंतज़ाम तय किया। उन्होंने कहा कि वह और उनकी पत्नी दूसरे कमरे में साथ सोएँगे, और मैं, सुधा दीदी और साक्षी दीदी उनके कमरे में सो जाएँ। उनकी नज़र में हम तीनों बस मासूम भाई-बहन थे, जो बचपन से एक-दूसरे के साथ बड़े हुए थे। लेकिन सच सिर्फ हम तीनों जानते थे। अब हम सिर्फ आम भाई-बहन नहीं रह गए थे। हमारे बीच का रिश्ता बहुत आगे बढ़ चुका था।
कुछ देर बाद हम तीनों फिर से साक्षी दीदी के कमरे में लौट आए। इस बार हम वहाँ बात करने नहीं, बल्कि सोने के लिए आए थे। ताकि हम तीनों आराम से सो सकें, हमने बिस्तर की जगह फर्श पर चादर, तकिए और कंबल बिछा लिया।
बाहर बारिश अब भी लगातार हो रही थी। टीन की छत पर गिरती बूंदों की आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी। लालटेन की हल्की पीली रोशनी कमरे में फैल रही थी, जिससे माहौल और भी शांत लग रहा था।
हम तीनों कंबल पर एक-दूसरे के पास लेट गए। शुरुआत में कुछ देर तक हम आम बातें करते रहे। लेकिन धीरे-धीरे बात फिर उसी बात पर आ गई, जिसकी वजह से हम सबके बीच इतना कुछ बदल चुका था। ज़्यादातर समय मैं चुप-चाप लेटा उनकी बातें सुनता रहा। सुधा दीदी ही साक्षी दीदी से लगातार बात कर रही थी।
करीब एक घंटे तक बात करने के बाद कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई। बाहर बारिश की आवाज़ लगातार सुनाई दे रही थी और लालटेन की हल्की पीली रोशनी में साक्षी दीदी का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। वह कुछ देर तक चुप-चाप लेटी रही, जैसे अपने मन की बात कहने की हिम्मत जुटा रही हो।
फिर उन्होंने धीरे से करवट बदल कर सुधा दीदी की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “सुधा दीदी… आज पहली बार मैंने किसी लड़की को किस्स किया है।”
यह कहते हुए उनके चेहरे पर हल्की सी शर्म आ गई। उन्होंने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, फिर नज़रें झुका ली।
“मैं लड़कों का लंड चख चुकी हूं, लेकिन मैंने कभी किसी लड़की को इस तरह छुआ नहीं था। आज जो हुआ, वह मेरे लिए बिल्कुल नया था।” वह कुछ सेकंड चुप रही। उनकी साँसें थोड़ी तेज चल रही थी। फिर उन्होंने हिचकिचाते हुए कहा, “अब जब इतना कुछ हो ही चुका है… तो क्या हम आज इस एहसास को अधूरा छोड़ने के बजाय इसे पूरा कर सकते हैं?”
साक्षी दीदी की बात सुन कर सुधा दीदी ने कुछ पल तक उनकी आँखों में गहराई से देखा। उनके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। फिर उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा, “तो तुम कहना चाहती हो कि इस वक्त तुम गोलू की जगह मुझे चोदना चाहती हो?”
साक्षी दीदी ने शर्माते हुए हल्के से सिर हिलाया। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “हाँ, सुधा दीदी।”
सुधा दीदी ने उनके चेहरे को प्यार से देखा। उनके होंठों पर हल्की मुस्कान फैल गई। “ठिक है। तो फिर अपने कपड़े उतार दो, साक्षी।”
सुधा दीदी की बात सुनते ही साक्षी दीदी की साँसें और तेज हो गई। उन्होंने कुछ पल तक उनकी आँखों में देखा, फिर धीरे-धीरे अपने हाथ टी-शर्ट के किनारे तक ले गई। उनकी उंगलियाँ हल्का-सा काँप रही थी। उन्होंने टी-शर्ट को ऊपर उठाया और धीरे से अपने सिर के ऊपर से निकाल दिया।
लालटेन की नरम रोशनी में उनका ऊपरी बदन साफ दिखाई देने लगा। उनके गोरे, भरे हुए स्तन हल्की ठंडी हवा से सिहर उठे। उनके स्तन बड़े, गोल और कसे हुए थे। उनके गुलाबी निप्पल ठंडी हवा की वजह से उभर आए थे। उनकी साँसों के साथ उनका सीना धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था।
इसके बाद उन्होंने धीरे से अपना निचला कपड़ा उतार दिया। अब वह पूरी तरह सुधा दीदी के सामने थी। उनके दोनों पैरों के बीच उनका नाजुक हिस्सा लालटेन की पीली रोशनी में हल्का चमक रहा था। उनका नाजुक हिस्सा बहुत साफ-सुथरा और नरम दिख रहा था, जैसे पहली बार किसी के सामने खुद को पूरी तरह खोल रही हों।
सुधा दीदी कुछ पल तक उन्हें चुपचाप देखती रहीं। फिर उन्होंने भी बिना जल्द-बाज़ी के अपने कपड़े उतारने शुरू किए। पहले उन्होंने अपनी टी-शर्ट उतारी। उसके नीचे उनके भरे हुए स्तन पूरी गोलाई के साथ उभर आए।
साक्षी दीदी के स्तनों के मुकाबले सुधा दीदी के स्तन ज्यादा बड़े, भारी और ज्यादा भरे हुए थे। उनकी गोलाई ज्यादा उभरी हुई थी और उनका सीना और भी खूबसूरत लग रहा था। जहाँ साक्षी दीदी के स्तन नरम और एक-दम सही आकार के थे, वहीं सुधा दीदी के स्तन ज्यादा भरे हुए और पूरी तरह तैयार लग रहे थे। लालटेन की रोशनी में दोनों के शरीर का फर्क साफ दिखाई दे रहा था। फिर उन्होंने अपने बाकी कपड़े भी उतार दिए और साक्षी दीदी के सामने पूरी तरह नंगी हो गई। उनके पैरों के बीच उनका नाजुक हिस्सा भी साफ दिखाई दे रहा था।
साक्षी दीदी के नाजुक हिस्से के मुकाबले सुधा दीदी का नाजुक हिस्सा ज्यादा भरा हुआ और ज्यादा खुला हुआ दिख रहा था। जहाँ साक्षी दीदी का नाजुक हिस्सा नरम, छोटा और बहुत सीधा-सादा लग रहा था, वहीं सुधा दीदी का नाजुक हिस्सा ज्यादा खुला था और साफ दिख रहा था।
अब दोनों एक-दूसरे के सामने बिना किसी पर्दे के थी। साक्षी दीदी की आँखें धीरे-धीरे सुधा दीदी के पूरे शरीर पर घूम रही थी। शायद पहली बार वह किसी लड़की के बदन को इस तरह देख रही थी। उनकी नज़र खासकर सुधा दीदी के बड़े स्तनों और उनके नाजुक हिस्से पर बार-बार टिक जा रही थी, मानो वह हर फर्क को ध्यान से देखना चाहती हों।
दूसरी ओर सुधा दीदी की आँखों में सुकून था, जैसे उन्हें पता हो कि साक्षी दीदी अब पूरी तरह अपनी झिझक छोड़ चुकी थी।