पिछला भाग पढ़े:- काजल दीदी और मेरा प्यार-3
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
घर में काजल दीदी के साथ रहना मेरे लिए धीरे-धीरे मुश्किल होता जा रहा था। यह कोई एक बड़ा पल नहीं था, बल्कि रोज़ की छोटी-छोटी बातें थी जो मेरे अंदर कुछ बदल रही थी। हर दिन कुछ ऐसा हो जाता कि मैं चाह कर भी उनसे नज़रें नहीं हटा पाता था।
सुबह जब वह बालकनी में पौधों में पानी देती, हल्की धूप उनके चेहरे और शरीर पर पड़ती। उनका दुपट्टा कभी थोड़ा खिसक जाता, और मेरी नज़र अनजाने में उनके स्तनों पर टिक जाती। मैं तुरंत नज़र हटाने की कोशिश करता, लेकिन कुछ सेकंड के लिए मैं वहीं अटक जाता था। दिल तेज़ धड़कने लगता, जैसे मैंने कुछ गलत देख लिया हो। कभी वह किचन में काम करती, थोड़ा झुक कर कुछ उठाती या रखती। उस वक्त मेरी नज़र खुद-ब-खुद उनके शरीर पर चली जाती। मैं खुद को रोकने की कोशिश करता, इधर-उधर देखने लगता। लेकिन फिर भी बार-बार वही ख्याल और वही नज़र वापस चली जाती।
एक दिन वह अलमारी से कुछ निकाल रही थी, हाथ ऊपर करके खड़ी थी। उनके कपड़े हल्के से खिंच गए थे, और उनके शरीर की बनावट साफ दिख रही थी। मैं पीछे खड़ा था, बस देखता रह गया। मुझे खुद पर गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन उस पल मैं कुछ कर नहीं पा रहा था।
शाम को जब वह छत पर जाती, हवा से उनके कपड़े हल्के-हल्के हिलते रहते। मैं उनके पास खड़ा होता, पर मेरी नज़र बार-बार उनके स्तनों और शरीर की तरफ चली जाती। मैं उनसे बात करने की कोशिश करता, ताकि ध्यान हट जाए, लेकिन अंदर ही अंदर मैं खुद से लड़ रहा था।
हम दोनों बहुत आगे आ चुके थे। अब हम सिर्फ नाम के लिए सौतेले भाई-बहन थे। हमारे बीच की दूरी खत्म हो चुकी थी, और उसकी जगह एक खामोश समझ ने ले ली थी। अब नज़रें चुराने की जरूरत नहीं रही थी… क्योंकि जो हो रहा था, वह दोनों को समझ आ रहा था। अब जब भी मैं उन्हें देखता, वह नज़रें नहीं फेरती थी। कभी-कभी तो ऐसा लगता था जैसे वह खुद चाहती हों कि मैं उन्हें देखूँ। और यही बात मेरे अंदर की बेचैनी को और बढ़ा देती थी… क्योंकि अब यह सिर्फ मेरी तरफ से नहीं था, इसमें वह भी शामिल थी।
फिर एक दिन घर में थोड़ा अलग माहौल बन गया। त्योहार के कारण मम्मी के रिश्तेदार घर आए थे। यह पहली बार था जब शादी के बाद उनकी तरफ के लोग घर आए थे, इसलिए सब उनके साथ समय बिताना चाहते थे। मेरे लिए यह थोड़ा अजीब था, क्योंकि मैं उनमें से किसी को ठीक से जानता नहीं था।
सब लोग हॉल में बैठे थे और आपस में बातें कर रहे थे। मम्मी ने मुझे सब से मिलवाया—कौन मामा है, कौन मौसी, कौन नानी। नाम से तो अब वह मेरे भी रिश्तेदार थे, लेकिन अंदर से मुझे कोई अपनापन महसूस नहीं हो रहा था। मैं बस वहीं बैठ गया, चुप-चाप उनकी बातें सुनता रहा। उठ कर जाना भी अजीब लगता, जैसे मैं बदतमीज़ी कर रहा हूँ।
तभी काजल दीदी आकर मेरे पास बैठ गई। वह बिल्कुल मेरे करीब थी, और धीरे-धीरे मेरे कान के पास आकर फुसफुसाने लगी—कौन अच्छा है, किससे ज्यादा बात नहीं करनी, कौन उनका मामा है, कौन उनकी नानी। उनका इतना पास बैठना ही मेरे लिए काफी था। जब वह बोलती, उनकी सांस हल्की-सी मेरे कान को छूती, और मैं एक-दम चुप हो जाता। ऊपर से मैं सामने बैठे लोगों को देख रहा था, लेकिन मेरा ध्यान पूरी तरह उनकी तरफ था।
शाम तक सब लोग वहीं थे, और फिर रात को सब ने साथ में खाना खाया। घर में सिर्फ तीन कमरे थे, इसलिए सोने की जगह थोड़ी अलग करनी पड़ी। कुछ रिश्तेदारों ने खुद ही कहा कि वह हॉल में सो जाएंगे। जो बुजुर्ग थे, उन्हें आराम की जरूरत थी, इसलिए तय हुआ कि वे काजल दीदी के कमरे में सोएंगे।
किसी ने मेरे कमरे के बारे में कुछ नहीं कहा। शायद उन्हें पहले से ही पता था कि मेरा उनसे ज्यादा रिश्ता नहीं था, या फिर बस किसी ने सोचा ही नहीं। मैं चुप-चाप अपने कमरे में चला गया। कमरे में आकर मैंने सोने की कोशिश की, लेकिन बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। खिड़की पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें टकरा रही थी, और हल्की-सी आवाज़ कमरे में गूंज रही थी।
तभी अचानक लाइट चली गई। मैंने टॉर्च जला कर थोड़ी देर इधर-उधर देखा, फिर वापस बिस्तर पर लेट गया। कमरा गर्म लग रहा था, हवा बिल्कुल कम थी। ऊपर से मच्छर लगातार परेशान कर रहे थे। मैं बार-बार करवट बदल रहा था, लेकिन नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
मैं सोना चाहता था, लेकिन हर कुछ मिनट में आंख खुल जाती। कभी बारिश की आवाज़, कभी मच्छरों की भनभनाहट… और बीच-बीच में दिमाग में वही ख्याल घूमते रहते। लगभग पूरी रात ऐसे ही निकल गई। मैं ठीक से सो ही नहीं पाया। फिर करीब एक बजे के आस-पास… मेरे दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
मैंने धीरे से पूछा, “कौन है?”
बाहर से हल्की आवाज़ आई, “मैं हूँ… काजल।”
यह सुनते ही मैं तुरंत बिस्तर से उठ गया। दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा। कुछ सेकंड के लिए मैं दरवाज़े के पास खड़ा रहा, जैसे समझ नहीं पा रहा था कि इस वक्त वह यहाँ क्यों आई थी। फिर मैंने धीरे से कुंडी खोली… और दरवाज़ा खोल दिया।
दरवाज़ा खुलते ही वह सामने खड़ी थी। उन्होंने एक ढीली टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहनी हुई थी। उनके बाल थोड़े बिखरे हुए थे, जैसे अभी-अभी उठ कर आई हों। उनकी टी-शर्ट हल्की थी और कपड़ा बहुत पतला लग रहा था, जिससे अंदर का आकार साफ महसूस हो रहा था। उनके स्तन कपड़े के अंदर हल्के-हल्के उभरे हुए दिख रहे थे, जैसे टी-शर्ट उन पर टिक कर उनकी बनावट को और साफ कर रही हो। जब वह सांस ले रही थी, तो कपड़ा थोड़ा ऊपर-नीचे हो रहा था, और उस हल्की-सी हरकत से उनका आकार और साफ दिखने लगता।
ढीली टी-शर्ट होने के बावजूद, जहां कपड़ा उनके स्तनों पर पड़ता था, वहां हल्का खिंचाव बन रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कपड़ा पूरी तरह सीधा नहीं रह पा रहा, बल्कि उनके शरीर के हिसाब से खुद को ढाल रहा हो। मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन मेरी नज़र बार-बार वहीं जाकर अटक रही थी। ऐसा नहीं था कि मैं खुल कर देख रहा था, लेकिन फिर भी हर कुछ सेकंड में मेरी नज़र वहीं चली जाती।
मैंने हल्की आवाज़ में पूछा, “क्या हुआ दीदी?”
उन्होंने थोड़ा सा अंदर कदम रखते हुए धीरे से कहा, ” मेरे कमरे में सब बुड्ढ़े लोग सो रहे हैं… और इतने जोर से खर्राटे ले रहे हैं कि मुझे बिल्कुल नींद नहीं आ रही।” वह एक सेकंड के लिए रुकी, फिर मेरी तरफ देखते हुए बोली, “क्या मैं आज यहाँ… तुम्हारे कमरे में सो सकती हूँ?”
मैंने बस हल्का सा सिर हिलाया और एक कदम साइड में हो गया, ताकि वह अंदर आ सकें। उन्होंने बिना कुछ कहे कमरे में कदम रखा। मैंने दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया। वह सीधे जाकर बिस्तर पर लेट गई, और मैं उनके पास ही थोड़ा दूरी बना कर लेट गया। यह पहली बार था जब मैं और काजल दीदी एक ही बिस्तर पर थे। शुरुआत में सब कुछ अजीब और थोड़ा असहज लग रहा था… जैसे समझ नहीं आ रहा हो कि कैसे नॉर्मल रहना है। लेकिन अंदर कहीं एक अलग सा एहसास भी था… जो अजीब होने के बावजूद अच्छा लग रहा था।
उन्होंने आंखें बंद कर ली, जैसे सोने की कोशिश कर रही हों। मैं भी करवट लेकर लेट गया, और आंखें बंद करने की कोशिश की। लेकिन वही गर्मी, वही मच्छर… और अब उनके इतने पास होने का एहसास—इन सब की वजह से नींद आना और मुश्किल हो गया था। मैं बार-बार करवट बदल रहा था, और ऐसा लग रहा था कि वह भी पूरी तरह से सो नहीं पा रही थी। कमरे में खामोशी थी, लेकिन वह खामोशी भी बता रही थी कि हम दोनों जाग रहे हैं… बस चुप हैं।
करीब एक घंटे बाद, खामोशी के बीच उन्होंने धीरे से कहा, “गोलू… सो रहे हो क्या?”
मैंने आंखें खोली और हल्की आवाज़ में कहा, “क्या हुआ दीदी?”
उन्होंने करवट बदलते हुए थोड़ा ऊपर देखा, फिर धीमे से बोली, “बहुत गर्मी हो रही है… मुझ नींद नहीं आ रही।” फिर उन्होंने अपनी टी-शर्ट को सामने से हल्का सा पकड़ कर खींचा, ताकि अंदर हवा जा सके। उन्होंने एक सेकंड के लिए मेरी तरफ देखा, जैसे कुछ सोच रही हों… फिर धीरे से बोली, “अगर तुम्हें ठीक लगे… तो क्या मैं अपनी टी-शर्ट उतार दूँ?”
मैं एक-दम चौंक गया और धीरे से बोल पड़ा, “टी-शर्ट उतारना… दीदी?”
वह हल्का सा मुस्कुराई। उनकी आंखों में एक अलग ही भरोसा था। उन्होंने धीरे से कहा, “इतना चौंक क्यों रहे हो गोलू… तुम पहले ही मेरे नंगे बूब्स देख चुके हो… फिर अब इतना हैरान होने की क्या बात है?”
मैं कुछ सेकंड तक चुप रहा, फिर धीरे से कहा, “ठीक है दीदी…”
उन्होंने मुझे एक हल्की और शांत मुस्कान दी। फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी टी-शर्ट को नीचे से पकड़ कर ऊपर उठाना शुरू किया। कमरे में टॉर्च की हल्की रोशनी थी, इसलिए हर हरकत साफ नहीं, बल्कि हल्की-सी छाया में दिख रही थी। जैसे ही टी-शर्ट ऊपर गई, उनका चेहरा कुछ सेकंड के लिए उसी कपड़े में छिप गया, और फिर उन्होंने उसे निकाल कर साइड में रख दिया।
अब वह सिर्फ ब्रा में थी। हल्की रोशनी में उनका शरीर और साफ दिख रहा था, और मैं बस चुप-चाप उन्हें देख रहा था। उन्होंने एक सेकंड के लिए मेरी तरफ देखा, जैसे यह समझना चाहती हों कि मैं क्या सोच रहा हूँ। फिर उन्होंने बिना जल्दी किए, बहुत धीरे से अपने हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया। फिर उन्होंने ब्रा को ढीला किया और धीरे से उसे उतार कर साइड में रख दिया।
अब मेरे सामने उनका ऊपरी शरीर पूरी तरह खुला था। हल्की रोशनी में उनके स्तन ऐसे लग रहे थे जैसे किसी नरम, भरे हुए गुब्बारे की तरह हों—भरे-भरे, गोल और हर सांस के साथ बहुत हल्के से ऊपर-नीचे होते हुए। जब वो गहरी सांस लेती, तो उनकी छाती धीरे से उठती और फिर वापस गिरती, और उसी के साथ उनके स्तन में एक हलचल दिखाई देती थी। उनकी त्वचा गोरी और मुलायम दिख रही थी, जैसे उस पर हल्की सी रोशनी फिसल रही हो। उनके निप्पल उभरे हुए थे, और उस हल्की गर्म और माहौल के कारण और भी साफ दिख रहे थे।
मैंने धीमे से कहा, “अब कैसा लग रहा है दीदी?”
उन्होंने एक गहरी सांस ली और हल्की आवाज़ में बोली, “अभी भी गर्मी है गोलू…”
बाहर बारिश तेज़ हो चुकी थी। खिड़की पर गिरती बूंदों की आवाज़ कमरे की खामोशी को और गहरा बना रही थी। उसी बीच उनके गले के पास पसीने की हल्की-हल्की बूंदें चमकने लगी। एक बूंद धीरे-धीरे उनके गर्दन से नीचे फिसलती हुई उनके सीने की तरफ आई, और फिर उनके स्तनों के बीच की हल्की सी जगह में खो गई। कुछ और छोटी बूंदें भी उनके शरीर पर बन रही थी—कुछ उनके कॉलरबोन के पास, कुछ उनके कंधों पर।
उन्होंने अचानक मेरी तरफ देखा और धीरे से कहा, “गोलू… मेरे साथ आओ, मेरे पास एक प्लान है।”
मैं थोड़ा चौंक गया, “क्या प्लान दीदी?”
उन्होंने बिना कुछ जवाब दिए दरवाज़े की तरफ बढ़ कर उसे खोल दिया। मैं तुरंत बोला, “आप क्या कर रही हो दीदी… आप ऐसे ही बाहर जा रही हो?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा, हल्की मुस्कान के साथ बोली, “डर मत गोलू… सब सो रहे हैं। और बाहर तो ठंडा भी है… अच्छा लगेगा।”
वह आगे चलने लगी और मैं उनके पीछे-पीछे चलने लगा। घर के अंदर अंधेरा था, सिर्फ बाहर की हल्की बिजली की चमक कभी-कभी रास्ता दिखा रही थी। वह सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सीधे छत पर पहुंच गई। जैसे ही हम ऊपर पहुंचे, ठंडी बारिश की बूंदें हमारे ऊपर गिरने लगी। आसमान पूरी तरह काला था, और बिजली ना होने की वजह से चारों तरफ हल्का-सा अंधेरा फैला हुआ था।
वह बारिश में खड़ी हो गई। उन्होंने आंखें बंद कर ली और चेहरा हल्का सा ऊपर उठा लिया। बारिश की बूंदें उनके चेहरे, होंठों और पूरे शरीर पर गिर रही थी। हर गिरती हुई बूंद उनके स्तनों से टकरा कर हल्के-हल्के बिखर रही थी। पानी की छोटी-छोटी बूंदें उनके स्तनों की गोलाई के साथ फिसलती हुई नीचे की ओर बह रही थी।
उनके होंठों पर भी बूंदें टिकती—एक पल के लिए ठहरती, फिर नीचे गिर जाती। उनके बाल पूरी तरह भीग चुके थे, और पानी उनके चेहरे से होते हुए नीचे बह रहा था।
कुछ पल बाद उन्होंने आंखें खोली और हल्की मुस्कान के साथ मेरी तरफ देखा, “अब थोड़ा ठंडा लग रहा है…” फिर धीरे से पूछा, ” गोलू… तुम्हें कैसा लग रहा है?”
मैंने हल्की सांस लेते हुए कहा, “पानी मेरे कपड़ों को पूरा भिगो रहा है… ऐसे में तो सोना भी मुश्किल हो जाएगा दीदी…”
वह धीरे-धीरे मेरे बिल्कुल करीब आ गई। उनके भीगे हुए शरीर की हल्की गर्माहट ठंडी हवा के बीच साफ महसूस हो रही थी। उन्होंने मेरी आंखों में देखते हुए बहुत साफ और धीमी आवाज़ में कहा, “तो सोने की कोशिश मत करो गोलू… बस यहीं मेरे साथ रहो…” फिर उन्होंने मेरी आंखों में देखते हुए धीरे से कहा, ” बस यही मेरे साथ रहो और… जितना चाहो… मेरे बूब्स को देखते रहो…”
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उंगलियों की पकड़ नरम थी, लेकिन उसमें एक भरोसा था। उन्होंने मेरा हाथ ऊपर उठाया और इस बार उसे रोका नहीं…
धीरे-धीरे मेरी हथेली को अपने एक स्तन पर रख दिया। जैसे ही मेरी हथेली उनकी त्वचा को छुई, एक पल के लिए सब कुछ थम सा गया। उनकी त्वचा गर्म थी—बारिश की ठंड के बीच अलग ही महसूस होने वाली गर्माहट। उनकी त्वचा मुलायम थी, इतनी कि मेरी उंगलियां हल्का सा दबते ही उसमें धँसती हुई महसूस हो रही थी।
मेरी हथेली के नीचे उनका स्तन हल्के-हल्के हिल रहा था—शायद उनकी सांसों की वजह से, या शायद उस पल की वजह से। बारिश की बूंदें अभी भी उस पर गिर रही थी, और कुछ बूंदें मेरी हथेली से टकरा कर फिसल रही थी। मैंने अनजाने में अपनी उंगलियां थोड़ी सा हिलाई—बस इतना कि उस मुलायम एहसास को समझ सकूं।
उन्होंने मेरी तरफ देखा, उनकी आंखों में हल्की सी मुस्कान थी… और बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “अगर तुम चाहो… तो छू सकते हो…”
मैं कहने ही वाला था, “पर आप मेरी—”
उन्होंने तुरंत मेरी बात काट दी और हल्के से मुस्कुराते हुए बोली, “हाँ-हाँ, मुझे पता है… मैं तुम्हारी बहन हूँ…” वह एक पल के लिए रुकी, मेरी आंखों में देखते हुए, फिर धीरे से बोली, “लेकिन अभी… इतना मत सोचो… हम दोनों यहां पर अकेले है…अगर तुम चाहो तो मेरे बूब्स दबा सकते हो और किसी को कभी पता नहीं लगेगा कि हमारे बीच क्या हुआ था।”
बारिश के उस पानी में मेरा गला सूखने लगा क्योंकि मुझे पता था कि वो सच कह रही थी। मेरा एक हाथ अभी भी उनके स्तन पर था। मैंने धीरे से कहा, “ओके दीदी… लेकिन मैं तुम्हारे बूब्स चूसना चाहता हूँ। उन्हें दबाना नहीं चाहता।”
वो मेरे चेहरे को देख कर मुस्कुराई और धीरे से बोली, “ओके गोलू… फिर बदले में जब तुम पूरा कर लोगे, मैं भी तुम्हारा लंड चूसना चाहती हूँ। अगर तुम्हें कुछ चाहिए, तो मुझे भी तुमसे कुछ चाहिए।”
उस पल मेरी दीदी के मुँह से वो शब्द सुनना मेरे लिए किसी सपने जैसा लग रहा था। हम दोनों रात के बीच बारिश में आमने-सामने खड़े थे, लेकिन सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था। अंदर ही अंदर मुझे पता था कि उनके भी मेरे लिए कुछ एहसास हैं, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि वो इसे इतनी आसानी से कह देंगी।
मैंने धीरे से कहा, “ओके दीदी…”
वो हल्का सा पास आई, मेरी आँखों में देखते हुए बोली, “आओ गोलू… मेरे पास आओ…”
मैं धीरे-धीरे उनके करीब गया। मेरा दिल तेज़ धड़क रहा था और साँसें भारी हो रही थी। मैंने बिना कुछ बोले अपना चेहरा उनके सीने के पास ले आया। कुछ पल के लिए मैं बस वहीं रुका रहा, जैसे खुद को तैयार कर रहा हूँ। फिर मैंने धीरे से अपने होंठ उनके स्तनों पर रख दिए। पहला स्पर्श होते ही मेरे अंदर एक अजीब सा झटका सा महसूस हुआ। मैंने अपने होंठों को थोड़ा और दबाया और धीरे-धीरे उन्हें अपने मुँह में लेने लगा, बिल्कुल वैसे जैसे कोई बच्चा दूध पीने के लिए पकड़ता है।
उनके स्तनों की नर्मी मेरे मुँह में साफ महसूस हो रही थी। वो इतने नरम थे कि मेरी जीभ उन पर चलते ही मुझे उनका हर छोटा सा एहसास महसूस होने लगा। मैंने धीरे-धीरे उन्हें चूसना शुरू किया। मेरी जीभ कभी हल्के से घूमती, कभी मैं उन्हें थोड़ा दबा देता। कभी-कभी मैं अपने दाँतों से हल्का सा काटता, फिर तुरंत अपने होंठों से उस जगह को दबा कर शांत करता। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था, बस उसी एहसास में खोता जा रहा था।
वो कुछ नहीं बोली लेकिन उनके हाथ धीरे-धीरे मेरे बालों में चलने लगे। उनकी उंगलियाँ मेरे सिर पर फिर रही थी।
मैं लगातार उनके स्तनों को अपने मुँह से महसूस करता रहा, कभी धीरे, कभी थोड़ा ज़्यादा दबाव के साथ। बारिश की बूंदें हमारे ऊपर गिर रही थी, लेकिन उस वक्त मुझे सिर्फ उनका शरीर और उनका स्पर्श ही महसूस हो रहा था।
तभी अचानक पीछे से एक तेज़ आवाज आई, “तुम दोनों क्या कर रहे हो?”
मैं तुरंत वहीं जम सा गया। मेरा पूरा शरीर जैसे एक-दम सख्त हो गया। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा और साँस अटक गई। मैंने घबरा कर पीछे मुड़ कर देखा। मेरी नज़र सीधे टेरेस के दरवाज़े पर जाकर रुकी। दरवाज़े के पास एक साया खड़ा था। जब मैंने ध्यान से देखा, तो समझ आया कि वो माँ थी, और वो हमें घूर रही थी।