पिछला भाग पढ़े:- काजल दीदी और मेरा प्यार-4
भाई बहन सेक्स कहानी अब आगे-
उस रात मुझे पहली बार समझ आया कि इस दुनिया में उससे ज़्यादा खतरनाक कुछ नहीं होता, जब तुम अपनी सौतेली बहन के स्तनों को होंठों से छू रहे हो और उसी पल उसकी माँ तुम्हें रंगे हाथों पकड़ ले।
मैं और काजल दीदी बारिश से भीगी छत पर एक-दूसरे में पूरी तरह खोए हुए थे। मेरी साँसें तेज़ चल रही थी और मैं उनके नंगे स्तनों को चूमते हुए बाकी दुनिया को भूल चुका था। तभी पीछे से तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी। इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, माँ हमारे सामने खड़ी थी।
हम दोनों तुरंत एक-दूसरे से अलग हो गए। काजल दीदी ने घबरा कर अपने हाथों से खुद को ढकने की कोशिश की, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। माँ की आँखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने बिना कुछ कहे काजल दीदी के गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा। काजल दीदी का चेहरा एक-दम दूसरी तरफ मुड़ गया। अगले ही पल माँ ने मुझे भी थप्पड़ मारा।
उन्होंने दबी हुई लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “सुबह इस बारे में बात करेंगे।” इतना कह कर माँ काजल दीदी को साथ लेकर नीचे चली गई।
मैं कुछ पल तक वहीं बारिश में खड़ा रह गया। मेरे कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे और दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि ऐसा लग रहा था जैसे सीने से बाहर निकल आएगा। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था—अब सुबह क्या होने वाला है?
कुछ मिनट बाद मैं भी नीचे अपने कमरे में आ गया। मैंने भीगे हुए कपड़े उतारे और बिस्तर पर लेट गया। सुबह होने तक मैं लगभग जागता ही रहा। जब घर में रिश्तेदारों की आवाज़ें सुनाई देने लगी, तो मैंने जान-बूझ कर सोने का नाटक किया। मुझे पता था कि जब तक घर में इतने लोग मौजूद हैं, माँ इस बारे में कुछ नहीं कहेंगी। लेकिन यह सोच कर ही मेरा दिल काँप रहा था कि जैसे ही हमें अकेले में बात करने का मौका मिलेगा, मेरी ज़िंदगी बदल सकती थी।
करीब ग्यारह बजे मैं आखिरकार अपने कमरे से बाहर निकला। मेरे कदम भारी थे और दिल अब भी घबराहट से भरा हुआ था। जैसे ही मैं डाइनिंग रूम में पहुँचा, मेरी नज़र सबसे पहले काजल दीदी पर पड़ी। वह माँ के पास चुप-चाप बैठी थी और प्लेट में रखे बटर टोस्ट को धीरे-धीरे खा रही थी।
उसी पल माँ की नज़र मुझ पर पड़ी। उन्होंने बिना कुछ कहे गुस्से से मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में वही सख्ती थी जो रात को छत पर मैंने देखी थी। मेरा मन किया कि तुरंत वहाँ से वापस लौट जाऊँ, लेकिन तभी कुछ रिश्तेदारों ने मुझे रोक लिया।
“अरे, कहाँ जा रहे हो? आओ, हमारे साथ नाश्ता करो,” उनमें से एक ने हँसते हुए कहा।
मैं चाह कर भी मना नहीं कर सका। मजबूर होकर मैं काजल दीदी के ठीक सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैं उनकी तरफ देखना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मैंने प्लेट से टोस्ट उठाया, उस पर मक्खन लगाया और चुप-चाप खाने लगा।
पूरे समय डाइनिंग टेबल पर आम बात-चीत चलती रही। रिश्तेदार हँसते-बोलते रहे, जैसे सब कुछ बिल्कुल आम हो। लेकिन मेरे लिए हर सेकंड किसी सज़ा से कम नहीं था। मैं बार-बार महसूस कर रहा था कि माँ की नज़रें मुझ पर टिकी हुई हैं।
काजल दीदी ने अपना टोस्ट जल्दी-जल्दी खत्म किया। एक बार भी मेरी तरफ देखे बिना वह कुर्सी से उठी और चुप-चाप बाहर चली गई। धीरे-धीरे सभी रिश्तेदारों ने भी अपना नाश्ता खत्म किया और घर के दूसरे कामों में लग गए। कुछ बाहर चले गए, कुछ हॉल में बैठ कर बातें करने लगे।
आखिरकार डाइनिंग रूम में सिर्फ मैं और माँ रह गए। कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। मैं कुर्सी पर चुप-चाप बैठा था और सिर झुकाए अपनी उंगलियों को देख रहा था। कुछ पलों तक माँ मुझे घूरती रही। फिर उन्होंने धीमी लेकिन कड़ी आवाज़ में कहा, “कल रात तुम क्या कर रहे थे मेरी बेटी के साथ? वह तुम्हारी बहन है। फिर तुम उसके साथ ऐसा कैसे कर सकते हो?”
माँ की बात सुनते ही मेरे गले में अटका टोस्ट जैसे और भी भारी हो गया। मुझे लगा कि साँस लेना मुश्किल हो रहा है। मैंने धीरे से सिर उठाया और उनकी आँखों में देखा, लेकिन मेरे पास कहने के लिए एक भी शब्द नहीं था।
माँ ने मेरी चुप्पी को देखा और आगे बोली, “काजल ने मुझे सब कुछ बता दिया है।” माँ ने सख्त आवाज़ में कहा, “उसने बताया कि कल रात तुमने शराब पी रखी थी। तुम उसे जबरदस्ती छत पर ले गए। और फिर तुमने उससे कहा कि सौतेले भाई-बहन के बीच यह सब करना आम बात है।”
उनके मुँह से ये शब्द सुन कर मेरे हाथ काँपने लगे। मैं समझ गया कि काजल दीदी ने खुद को बचाने के लिए सारी बात मेरे सिर पर डाल दी थी। लेकिन उस पल मेरे भीतर इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं तुरंत कुछ कह पाता। मैं बस माँ के सामने बैठा रहा, गले में अटका हुआ टोस्ट निगलने की कोशिश करता हुआ।
आखिरकार मैंने काँपती हुई आवाज़ में कहा, “प्लीज़ माँ… इस बारे में पापा को मत बताइए।”
मेरी बात सुनते ही माँ गुस्से से अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। अगले ही पल उनका हाथ मेरे गाल पर पड़ा। थप्पड़ इतना तेज़ था कि मेरा चेहरा एक तरफ मुड़ गया।
उन्होंने दाँत भींच कर कहा, “मुझे अच्छी तरह पता है कि मुझे क्या करना है।”
उनकी आँखों में आँसू भी थे और गुस्सा भी। फिर उन्होंने भारी आवाज़ में कहा, “मैं तुम्हारे पापा से दिल से प्यार करती हूँ। मैं उनके कमीनें बेटे की वजह से उनका दिल नहीं तोड़ना चाहती।”
माँ कुछ पल के लिए रुकी, फिर मेरी तरफ उंगली दिखा कर बोली, “लेकिन आज के बाद अगर तुम मेरी बेटी के पास भी गए, तो मैं तुम्हारे हाथ तोड़ दूँगी। इस बात को हमेशा याद रखना।”
इतना कहकर माँ मुड़ी और तेज़ कदमों से डाइनिंग रूम से बाहर चली गई। मैं वहीं कुर्सी पर बैठा रह गया। मेरा गाल जल रहा था। अब मुझे समझ आ गया था कि एक ही रात में सब कुछ बदल चुका था।
उस दिन का बाकी समय मैंने या तो घर से बाहर बिताया या अपने कमरे में बंद रह कर। मेरे अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं काजल दीदी या माँ की आँखों में देख सकूँ। घर में रिश्तेदारों की चहल-पहल जारी थी। शाम के समय पापा ने सब को सलाह दी कि अगले दिन हम सब मिल कर खेत देखने चलेंगे। शाम काफी हो चुकी थी, इसलिए सभी रिश्तेदारों ने तय किया कि खेत पर जाना अगले दिन ही ठीक रहेगा।
घर के सामने आँगन में सब लोग कुर्सियों पर बैठ कर बातें कर रहे थे। तभी कुछ और रिश्तेदार आ गए। लोगों की गिनती बढ़ने पर पापा ने मेरी तरफ देख कर कहा, “स्टोररूम से कुछ और कुर्सियाँ ले आओ।”
मैं चुप-चाप उठ कर घर के पिछवाड़े की तरफ चला गया। स्टोररूम मकान के एक सुनसान कोने में था। वहाँ हमेशा हल्का अँधेरा रहता था। मैंने दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया। कमरे में धूल की गंध फैली हुई थी। चारों तरफ पुराने सामान, टूटे हुए औज़ार और कपड़ों के ढेर रखे थे। नीचे बने छोटे तहखाने जैसी जगह तक जाने के लिए कुछ सीढ़ियाँ थी। मैं संभाल कर नीचे उतरा और अँधेरे में कुर्सियाँ ढूँढ़ने लगा। रोशनी बहुत कम थी, इसलिए कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी ऊपर दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। मेरा दिल एक पल के लिए रुक सा गया। मैंने पीछे मुड़ कर देखा। तो सीढ़ियों से नीचे उतरती हुई काजल दीदी थी। वह धीरे-धीरे मेरे पास आई और अँधेरे में मेरे सामने आकर रुक गई। हमारे बीच कुछ ही इंच की दूरी थी। धुंधली रोशनी में उनकी आँखें चमक रही थी, और मैं महसूस कर सकता था कि वह मुझे लगातार देख रही थी।
मैंने धीमी आवाज़ में कहा, “आप यहाँ क्या कर रही हैं, दीदी? अगर माँ ने हमें यहाँ साथ देख लिया, तो वह आप पर और ज़्यादा गुस्सा होंगी।”
काजल दीदी ने कुछ पल तक मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “गोलू, मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ।”
उनकी आवाज़ में पछतावा साफ सुनाई दे रहा था। उन्होंने हल्का सा सिर झुकाया और बोली, “कल रात मैंने माँ से झूठ कहा था… और उसके लिए मुझे सच में बहुत बुरा लग रहा है।”
मैं चुप-चाप उनकी बात सुनता रहा।
उन्होंने गहरी साँस ली और आगे कहा, “अगर मैं माँ को सच बता देती कि जो हुआ उसमें मेरी भी मर्ज़ी थी… कि मैंने खुद तुम्हें अपने बूब्स को चूसने दिया था… तो मेरे लिए मां का सामना करना बहुत मुश्किल हो जाता। वह मुझे कभी उसी नज़र से नहीं देख पाती।”
उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि ऊपर से किसी की आवाज़ सुनाई दी।
“काजल… काजल!”
यह माँ की आवाज़ थी। मेरे और काजल दीदी के चेहरे का रंग उड़ गया। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। अगर माँ नीचे आ जाती और हमें इस हालत में साथ देख लेती, तो सब कुछ फिर से बिगड़ सकता था।
बिना एक शब्द बोले काजल दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे स्टोररूम के सबसे अँधेरे कोने की तरफ खींच लिया। वहाँ पुराने कपड़ों और चादरों का बड़ा सा ढेर पड़ा था। हम दोनों जल्दी से उसके पीछे छिप गए और ऊपर से कुछ कपड़े अपने ऊपर खींच लिए।
अँधेरे और तंग जगह की वजह से हम लगभग एक-दूसरे से सटे हुए थे। काजल दीदी की साँसें तेज़ चल रही थी। उनका शरीर मेरे बिल्कुल पास था, और उनके बूब्स मेरी छाती से दब रहे थे। मैं उनकी धड़कन तक महसूस कर सकता था।
ऊपर से माँ की आवाज़ फिर सुनाई दी, “काजल, तुम यहाँ हो क्या?”
हम दोनों ने अपनी साँसें रोकने की कोशिश की। लेकिन डर की वजह से मेरी साँसें और तेज़ होती जा रही थी। मेरी छाती इतनी तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी कि मुझे खुद लग रहा था जैसे अँधेरे में भी कोई हमें देख लेगा।
काजल दीदी ने मेरे कान के पास होंठ लाकर धीरे से कहा, “गोलू… अपनी साँसों पर काबू रखो।”
लेकिन मेरे लिए यह लगभग नामुमकिन था। मैं जितना खुद को संभालने की कोशिश करता, उतनी ही लंबी और भारी साँसें लेने लगता।
उसी समय ऊपर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। माँ अब स्टोररूम के अंदर आ चुकी थी।
काजल दीदी ने एक पल के लिए मेरी आँखों में देखा। शायद उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि मुझे कैसे चुप कराएँ। अगले ही पल उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में कस कर पकड़ लिया।
उनका पूरा शरीर मेरे साथ इस तरह लग गया कि हमारे बीच ज़रा भी जगह नहीं बची। उनके बूब्स मेरी छाती पर पूरी तरह दब गए थे। डर की वजह से उनकी साँसें भी तेज़ चल रही थी, और हर साँस के साथ मुझे उनकी नरमी और गर्माहट और साफ महसूस हो रही थी। जब उन्होंने मुझे और कसकर पकड़ा, तो उनके बूब्स मेरी छाती पर और ज़्यादा दब गए।
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि मेरी साँसें एक पल के लिए रुक गई। उनके होंठ मेरे होंठों पर मजबूती से टिके थे। कुछ ही सेकंड बाद उनकी जीभ मेरे मुँह के अंदर आ गई। मैं उनकी गर्माहट और उनकी लार का हल्का नमकीन स्वाद साफ महसूस कर सकता था।
कुछ पल बाद मैंने भी अपनी बाँहें उनकी कमर के पीछे ले जाकर उन्हें कस कर पकड़ लिया। अब मैं भी उसी गहराई से उन्हें किस्स करने लगा। मेरे होंठ उनके होंठों का जवाब दे रहे थे।
उन्होंने हल्का सा अपने होंठ पीछे किए और बहुत धीमी आवाज़ में फुसफुसाई, “क्या कर रहे हो, गोलू? माँ यहीं ऊपर हैं…”
लेकिन उस वक्त मैं जैसे अपने होश में नहीं था। मैंने उनकी बात पूरी होने से पहले ही फिर से अपने होंठ उनके होंठों पर रख दिए। इस बार मेरा किस्स पहले से भी ज़्यादा गहरा था। कभी मैं उनके निचले होंठ को धीरे से दाँतों के बीच दबा लेता, कभी उनके ऊपरी होंठ को हल्के से काटता।
उनके होंठ इतने मुलायम थे कि मुझे सच में ऐसा लग रहा था जैसे मैं गुलाब की पंखुड़ियों को अपने होंठों से छू रहा हूँ। मैं उनके होंठों का स्वाद बार-बार महसूस करना चाहता था। हर बार जब मैं उन्हें चूमता, वह हल्का सा काँप जाती।
करीब दो मिनट तक हम दोनों उसी तरह एक-दूसरे से लिपटे रहे। फिर ऊपर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। माँ शायद यह देख कर वापस चली गई थी कि स्टोररूम में कोई नहीं है। आवाज़ सुनते ही काजल दीदी ने तुरंत अपने होंठ मेरे होंठों से अलग किए और हल्के से मुझे पीछे धकेल दिया। उनकी साँसें अब भी तेज़ चल रही थी। उन्होंने घबराई हुई आँखों से मेरी तरफ देखा और धीमी लेकिन नाराज़ आवाज़ में कहा, “तुम पागल हो गए हो क्या, गोलू? अगर माँ ने हमें देख लिया होता तो?”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “तो मैं माँ को सच बता देता… कि हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। और हम यह सब इसलिए कर रहे हैं।”
मेरी बात सुन कर काजल दीदी कुछ सेकंड तक चुप रहीं। उन्होंने मेरे चेहरे को ध्यान से देखा, जैसे यह समझने की कोशिश कर रही हों कि मैं सच कह रहा हूँ या नहीं। फिर उन्होंने बहुत धीरे से सिर हिलाया।
उनकी आँखों में हल्की उदासी उतर आई। उन्होंने नजरें झुका ली और धीमी आवाज़ में कहा, “मैं तुमसे प्यार नहीं करती, गोलू। मैं बस तुम्हारे साथ थोड़ा मज़ा करना चाहती थी… बस इतना ही।”
उनकी बात सुन कर मेरे भीतर जैसे सब कुछ खाली हो गया। लेकिन उस समय हमारे पास इस बारे में और बात करने का मौका नहीं था। हम दोनों ने जल्दी-जल्दी स्टोररूम के कोने में रखी कुछ कुर्सियाँ उठाई और ऊपर आ गए।
जब हम घर के सामने पहुँचे, तो वहाँ पहले की तरह रिश्तेदार बैठे बातें कर रहे थे। माँ अब भी काजल दीदी को ढूँढ़ रही थी। जैसे ही उनकी नज़र काजल दीदी पर पड़ी, जो बाकी लोगों के बीच जाकर चुप-चाप बैठ गई थी, माँ ने तुरंत पूछा, “कहाँ थी तुम इतने देर से?”
काजल दीदी ने बिना घबराहट दिखाए बिल्कुल आम आवाज़ में जवाब दिया, “बस… बाथरूम में जाकर मुँह धो रही थी।”
माँ ने कुछ पल तक उन्हें देखा, फिर बिना कुछ कहे दूसरी तरफ देखने लगी।
अगली सुबह जैसा पहले से तय था, सभी रिश्तेदार हमारे खेत देखने के लिए तैयार हो गए। खेत घर से करीब दो घंटे की दूरी पर था, इसलिए हमने दो गाड़ियों में जाने का फैसला किया। पापा ने मुझसे एक गाड़ी चलाने को कहा। मैं ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।
एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद माँ अब सब कुछ ऐसे दिखाने की कोशिश करेंगी जैसे कुछ हुआ ही नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने साफ मना कर दिया कि वह मेरी गाड़ी में नहीं बैठेंगी।
काजल दीदी ने मेरी गाड़ी की तरफ कदम बढ़ाए, जैसे वह मेरे साथ बैठना चाहती हों। लेकिन माँ ने तुरंत उन्हें रोक दिया और सख्त आवाज़ में कहा, “तुम मेरे साथ दूसरी गाड़ी में बैठो।”
काजल दीदी ने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे माँ के साथ दूसरी गाड़ी में जाकर बैठ गई। मेरी गाड़ी में कुछ दूसरे रिश्तेदार बैठ गए। पूरे रास्ते मैं चुप-चाप गाड़ी चलाता रहा। कार के स्पीकर पर धीमा संगीत बज रहा था। रिश्तेदार आपस में बातें कर रहे थे, लेकिन मेरा किसी से बात करने का मन नहीं था।
करीब दो घंटे बाद हम खेत पहुँच गए। जैसे ही गाड़ियाँ रुकी, पापा सबसे आगे चलने लगे और सभी रिश्तेदार उनके पीछे-पीछे। हमारे पास लगभग बीस एकड़ जमीन है। चारों तरफ अलग-अलग तरह के फलों के पेड़ लगे थे—आम, अमरूद, संतरे और कई दूसरी फसलें। कुछ हिस्सों में सब्जियाँ भी उगाई जाती थी। खेत के बीचों-बीच एक छोटा सा फार्महाउस बना हुआ था।
पूरा खेत देखने के बाद हम सब उसी फार्महाउस के पास इकट्ठा हो गए। माहौल किसी पिकनिक जैसा लग रहा था। पापा घर से खाने-पीने का सामान, कुछ शराब की बोतलें और बाकी ज़रूरी चीजें साथ लाए थे ताकि हम पूरा दिन वहीं बिता सकें।
दोपहर में जब सभी लोग खाना खाने की तैयारी कर रहे थे, तभी कुछ छोटे बच्चे आम खाने की ज़िद करने लगे। आम के पेड़ फार्महाउस से थोड़ी दूर थे। पहले तो सभी ने उन्हें मना किया, लेकिन जब बच्चे रोने लगे, तो पापा ने मेरी तरफ देखा और कहा, “जाकर कुछ आम तोड़ लाओ।” फिर उन्होंने काजल दीदी की तरफ देख कर कहा, “तुम भी इसके साथ चली जाओ।”
माँ ने तुरंत कुछ कहना चाहा। उनके चेहरे पर साफ नाराज़गी दिखाई दे रही थी। लेकिन जब पापा ने पूछा, “क्यों? इसमें क्या दिक्कत है?” तो माँ के पास कोई जवाब नहीं था।
उन्होंने बस सख्त आवाज़ में कहा, “जल्दी वापस आना।”
मैंने काजल दीदी की तरफ देखा। उन्होंने भी मेरी तरफ एक छोटी सी नज़र डाली। फिर हम दोनों बिना कुछ कहे आम के पेड़ों की तरफ चल पड़े।
खेत की मिट्टी रात की बारिश की वजह से अभी भी गीली थी। चलते समय काजल दीदी अपनी सैंडल को कीचड़ से बचाने की कोशिश कर रही थी। हर बार जब उनका पैर मिट्टी में धँसने लगता, वह हल्का सा उछल कर आगे बढ़ती। उन्होंने हल्के रंग की कुर्ती और फिट जीन्स पहन रखी थी। जीन्स उनकी जाँघों से पूरी तरह चिपकी हुई थी। जब वह उछल कर कदम रखती, तो उनकी छाती भी कपड़ों के अंदर हल्के से हिलती। मैं चाह कर भी अपनी नज़रें पूरी तरह हटा नहीं पा रहा था।
कुछ मिनट बाद हम आम के पेड़ों तक पहुँच गए। नीचे घास पर कई पके हुए आम पहले से गिरे पड़े थे। हमने झुक-झुक कर अच्छे आम चुनने शुरू किए और एक थैले में भरने लगे।
काजल दीदी ने एक पका हुआ आम उठाया, उसे हाथ से दबा कर थोड़ा सा खोला और सीधे उसका रस चूसने लगी। सुनहरे आम का मीठा रस उनके होंठों के किनारों तक आ गया। वह मुस्कुराई, लेकिन तभी आम का एक नरम टुकड़ा उनकी कुर्ती पर गिर गया और सामने पीले रंग का दाग बन गया।
उन्होंने नीचे देख कर झुंझला कर कहा, “ओह शिट… मैं तो दूसरे कपड़े भी नहीं लाई।”
मैंने अपने बैग से पानी की बोतल निकाली और उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “ये लो दीदी, इसे धो लो।”
उन्होंने बोतल मेरे हाथ से ली, फिर अपनी कुर्ती पर पड़े दाग को देखते हुए हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “अगर मैं ऐसे पानी डालूँगी ना, तो पूरी कुर्ती गीली हो जाएगी, गोलू।”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए आधी मुस्कान के साथ कहा, “तो फिर कुर्ती उतार दीजिए, दीदी।”
मेरी बात सुन कर उन्होंने कुछ पल तक मुझे देखा। उनकी आँखों में वही शरारती चमक लौट आई। फिर बिना कुछ कहे उन्होंने अपनी कुर्ती का किनारा पकड़ा और धीरे-धीरे उसे सिर के ऊपर से उतार दिया।
अब उनके बदन पर लाल रंग की ब्रा थी। हरे पेड़ों और खुले आसमान के बीच वह लाल रंग और भी उभर कर दिखाई दे रहा था। ब्रा के कपड़े के पीछे उनके भरे हुए स्तन साफ उभर रहे थे। कपड़ा उन्हें कस कर थामे हुए था, जिससे उनकी गोलाई और भी साफ नजर आ रही थी।
एक पल के लिए मेरी साँस जैसे थम गई। काजल दीदी ने मेरी आँखों में देखा और हल्की मुस्कान के साथ बोली, “इतना क्या देख रहे हो?”
मैं कुछ नहीं बोला। मेरी नज़रें खुद-ब-खुद उन पर टिकी रह गई।
उन्होंने कुर्ती को दोनों हाथों में फैलाया और बोतल से थोड़ा पानी डाल कर दाग वाली जगह रगड़ने लगी। जैसे-जैसे वह कपड़ा साफ कर रही थी, उनके हाथों की हर हरकत के साथ उनके स्तन भी हल्के-हल्के हिल रहे थे। लाल ब्रा के भीतर उनकी भरी हुई गोलाई मेरे लिए नज़रें हटाना मुश्किल कर रही थी।
वह पूरी तरह जानती थी कि मैं उन्हें देख रहा हूँ। फिर भी उन्होंने मुझे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। उल्टा, उनके होंठों पर एक धीमी मुस्कान बनी रही, जैसे उन्हें मेरी बेचैनी साफ समझ आ रही हो।
उन्होंने दाग को रगड़ते हुए सिर उठाया और शरारत भरी आवाज़ में पूछा, “क्या हुआ, गोलू? आम चुनने आए थे या मुझे देखने?”
उनकी बात सुन कर मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया, लेकिन मेरे दिल की धड़कन पहले से कहीं तेज़ हो चुकी थी। आम के पेड़ों के उस सुनसान कोने में, हवा में पके आम की खुशबू थी और मेरे सामने खड़ी काजल दीदी अपनी गीली कुर्ती हाथ में लिए मुझे ऐसे देख रही थी जैसे उन्हें मेरे मन की हर बात पता हो।
उन्होंने कुर्ती से दाग साफ करते-करते अचानक अपनी नज़रें नीचे कर ली। उनके चेहरे पर पहली बार हल्की झिझक दिखाई दी। फिर उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “गोलू… तुम्हें याद है उस रात छत पर हमने क्या तय किया था? माँ के आने से पहले…”
मैंने कुछ सेकंड तक उनकी तरफ देखा। सच कहूँ तो उस वक्त मेरा दिमाग पूरी तरह उलझा हुआ था। मैं उनके सामने इस हालत में खड़ा था, उनकी लाल ब्रा में उभरते स्तनों को देख रहा था, और उस रात की इतनी सारी बातें मेरे दिमाग में एक साथ घूम रही थी।
मैंने हल्का सा सिर हिलाया और धीमी आवाज़ में कहा, “नहीं दीदी… मुझे याद नहीं आ रहा।”
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा, “तुम भूल गए? मैंने तुमसे कहा था कि अगर तुम मेरे स्तनों को चूसोगे… तो मैं भी तुम्हारा लंड अपने मुँह में लेकर चूसूँगी।”
फिर उन्होंने एक पल के लिए अपनी नज़रें नीचे कर ली। उनकी उंगलियाँ अब भी गीली कुर्ती को पकड़े हुए थी। कुछ सेकंड तक वह चुप रही, जैसे हिम्मत जुटा रही हों।
फिर धीरे से उन्होंने कहा, “उस रात तुमने मेरे बूब्स को चूसा था… लेकिन मुझे तुम्हारा लंड चूसने का मौका नहीं मिला।”
उन्होंने फिर मेरी तरफ देखा। उनकी आवाज़ और भी धीमी हो गई। “अगर तुम चाहो…” उन्होंने हल्की झिझक के साथ कहा, “तो क्या मैं यहाँ तुम्हारा लंड चूस सकती हूँ?”
मैंने घबरा कर चारों तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “लेकिन दीदी… अगर माँ हमें ढूँढ़ते हुए यहाँ आ गई तो?”
काजल दीदी के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। उन्होंने एक कदम और मेरे करीब आते हुए कहा, “मैं ज़्यादा समय नहीं लगाऊँगी।”
उनकी आवाज़ में ऐसा भरोसा था कि मेरा डर और बेचैनी एक साथ बढ़ गए। कुछ पल तक मैं उनकी आँखों में देखता रहा। फिर धीरे से सिर हिला कर कहा, “ठीक है, दीदी… आप मेरा लंड चूस सकती हैं।”