पिछला भाग पढ़े:- काजल दीदी और मेरा प्यार-1
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
अपनी पूरी जिंदगी में पहली बार किसी लड़की के स्तन इतने करीब से देख रहा था। काजल दीदी के खुले स्तन बिल्कुल किसी मक्खन जैसे लग रहे थे। उनके गाल शर्म की वजह से लाल पड़ गए थे। मेरा मन तो कर रहा था कि उनके स्तनों को जोर से अपने हाथों में पकड़ कर मसल डालू। लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। बाथरुम में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
वो मेरी झिझक देख कर हल्का सा मुस्कुराई और बोली, “क्या हुआ गोलू… ऐसे क्यों देख रहे हो?” उनकी आवाज़ में छेड़ने वाला अपनापन था। फिर थोड़ा झुक कर मेरी आँखों में देखते हुए उन्होंने धीरे से कहा, “अगर मन है… तो छू सकते हो।”
मैंने तुरंत नज़रें झुका ली और हकलाते हुए कहा, “नहीं काजल दीदी… मैं आपके स्तनों को नहीं छूना चाहता।” मेरी आवाज़ में झिझक साफ थी, जैसे मैं खुद ही अपनी बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था।
मेरी बात सुनते ही वो थोड़ी सी चौंक गई। उनके चेहरे पर हल्का सा झटका साफ दिख रहा था, जैसे उन्हें मेरी बात पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ हो। उनकी आँखें कुछ पल के लिए मुझ पर टिक गई, जैसे वो समझने की कोशिश कर रही हों कि मैं सच बोल रहा हूँ या बस खुद को रोक रहा हूँ।
असल में सच्चाई कुछ और ही थी। अंदर से मैं सच में उन्हें छूना चाहता था। उनके स्तन इतने नरम लग रहे थे, जैसे अगर मैं उन्हें छू लूँ तो वो गर्म आइसक्रीम की तरह पिघलने लगेंगे। मेरा मन बार-बार उसी ख्याल में खो जा रहा था।
लेकिन उसी वक्त मेरे दिमाग में अपने मम्मी-पापा का ख्याल आ गया। एक डर सा बैठ गया अंदर। क्या होगा अगर उन्हें कभी पता चल गया कि मैंने काजल दीदी को छुआ था? यही सोच कर मेरा दिल घबरा गया। मैंने खुद को रोका… और डर की वजह से ही मैंने मना कर दिया।
कुछ पल तक वो मुझे देखती रही, फिर हल्की सी साँस लेकर मुस्कुराई और बोली, “जैसा तुम चाहो गोलू…”
इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने कपड़े पहनने शुरू कर दिए। उनका चेहरा अब पहले जैसा नहीं था। उसमें एक अजीब सी खामोशी आ गई थी। बिना कुछ और कहे वो मुड़ी और बाथरूम से बाहर चली गई, मुझे वहीं अकेला छोड़ कर। मैं वहीं खड़ा रह गया… अपने ही फैसले के बारे में सोचता हुआ, और उस खामोशी को महसूस करता हुआ जो अब पहले से भी भारी लग रही थी।
उस दिन के बाद सब कुछ ऊपर से तो सामान्य हो गया… लेकिन अंदर से नहीं। जब भी काजल दीदी मेरे सामने आती, वो ऐसे बर्ताव करती जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। वहीं हल्की मुस्कान, वहीं सामान्य बातें — “खाना खाया?”, “कॉलेज कैसा था?” — सब कुछ पहले जैसा। लेकिन उनकी आँखों में कहीं ना कहीं एक झिझक छिपी रहती थी, और शायद मेरी आँखों में भी।
हम दोनों कोशिश करते थे कि बात बिल्कुल सामान्य रहे। घर में बाकी लोगों के सामने तो सब ठीक लगता था, लेकिन जैसे ही हम अकेले होते… एक अजीब सा सन्नाटा फिर से हमारे बीच आकर खड़ा हो जाता था।
और ऐसे ही पलों में मैं खुद को रोक नहीं पाता था। मेरी नज़र बार-बार उनकी तरफ खिंच जाती थी। खास कर उनके सीने की तरफ… जैसे मेरी आँखें खुद-ब-खुद वहीं जाकर ठहर जाती हो।
शायद वो भी ये सब महसूस करती थी।क्योंकि कई बार ऐसा होता कि वो जान-बूझ कर अपने टी-शर्ट का ऊपर वाला बटन खोल देती। और फिर ऐसे दिखाती जैसे गर्मी की वजह से ऐसा किया हो। हाथ से हल्का सा कॉलर पकड़ कर हवा करना, या गर्दन के पास पसीना पोंछने का बहाना।
लेकिन उन पलों में जो दिखता था… वो मेरे लिए किसी झटके से कम नहीं होता था। उनके सीने के बीच की लंबी लकीर, और उसके अंदर छिपी हुई झलक — बस एक पल के लिए ही सही। लेकिन इतनी काफी होती थी कि मेरा ध्यान कहीं और जा ही नहीं पाता।
मैं कोशिश करता था नज़रें हटा लूँ… लेकिन हर बार हार जाता था। और सबसे अजीब बात ये थी कि वो भी जानती थी कि मैं क्या देख रहा हूँ। कभी-कभी उनकी आँखें मेरी आँखों से टकराती, और एक हल्की सी मुस्कान उनके होंठों पर आ जाती जैसे बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ समझा दिया हो।
अब ये सब सिर्फ एक-दो बार की बात नहीं रह गई थी… ये धीरे-धीरे एक आदत बनती जा रही थी। कई बार ऐसा होता कि वो मेरे सामने ही अपने बाल सुखाने लगती। सिर झुका कर जब वो तौलिये से बाल रगड़ती, तो उनका टी-शर्ट थोड़ा ढीला हो जाता… और मेरी नज़र अनजाने में फिर वहीं अटक जाती।
वो एक पल के लिए रुकती, जैसे महसूस कर रही हों कि मैं देख रहा हूँ… लेकिन फिर भी खुद को नहीं संभालती।
एक दिन वो किचन में थी। गैस के सामने खड़ी होकर जब वो आगे झुकी, तो उनका दुपट्टा हल्का सा सरक गया। मैं दरवाज़े पर खड़ा था… और मेरी नज़र फिर से वहीं टिक गई। इस बार उन्होंने तुरंत दुपट्टा ठीक नहीं किया। कुछ सेकंड तक वैसे ही रही… फिर धीरे से बिना मेरी तरफ देखे दुपट्टा वापस खींच लिया। लेकिन उनके चेहरे पर आई हल्की सी मुस्कान ने साफ बता दिया कि वो सब समझ रही थी।
कभी-कभी वो जान-बूझ कर मेरे पास आकर बैठ जाती। इतनी पास कि उनकी गर्माहट मुझे महसूस होने लगती। बात करते-करते वो थोड़ा सा झुकती… और मेरी नज़र फिर खुद-ब-खुद नीचे चली जाती। वो बात जारी रखती, जैसे कुछ हुआ ही नहीं… लेकिन उनकी आवाज़ में एक हल्का सा बदलाव आ जाता, जैसे वो उस पल को खींचना चाहती हो।
एक बार तो ऐसा भी हुआ कि उन्होंने मुझे कुछ दिखाने के लिए फोन पकड़ा। वो मेरे बिल्कुल करीब आकर खड़ी हो गई। उनका कंधा मेरे कंधे से छू रहा था… और जैसे ही उन्होंने स्क्रीन दिखाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, उनका शरीर थोड़ा सा मेरी तरफ झुका। उस पल मेरी साँसें खुद-ब-खुद तेज हो गई। मैं स्क्रीन देख रहा था… लेकिन सच में मेरा ध्यान कहीं और था।
और वो… वो ये सब जानती थी। फिर भी कभी कुछ नहीं कहती थी। बस कभी-कभी, जब हमारी नज़रें मिलती… तो उनकी आँखों में एक ऐसा इशारा होता, जो शब्दों से कहीं ज्यादा साफ था जैसे वो खुद ही मुझे ये मौका दे रही हों… और देखना चाहती हों कि मैं कब तक खुद को रोक पाता हूँ।
फिर एक दिन कुछ अलग हुआ…
उस दिन मैं कॉलेज से वापस आ रहा था। आसमान पूरा काला हो चुका था और तेज बारिश हो रही थी। सड़कें भीग चुकी थी, हर तरफ पानी ही पानी था। मैं अपनी बाइक लेकर गेट से बाहर निकल ही रहा था कि अचानक किसी ने पीछे से आवाज़ दी “गोलू!”
मैंने मुड़ कर देखा… काजल दीदी खड़ी थी। उनके बाल हल्के-हल्के भीग चुके थे, कपड़े भी बारिश की बूंदों से गीले हो रहे थे। वो जल्दी-जल्दी मेरे पास आई।
“आज बस नहीं जाएगी,” उन्होंने थोड़ा सा पास आकर कहा, “बारिश की वजह से सब लेट हो रहा है… मुझे घर जाना है।”
मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही वो और करीब आ गई। इतनी करीब कि मुझे उनकी सांसों की गर्माहट तक महसूस होने लगी।
“लिफ्ट दोगे?” उन्होंने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।
मैं कुछ सेकंड तक बस उन्हें देखता ही रह गया। ये पहली बार था जब वो खुद मेरे इतने करीब आई थी… और खुद मुझसे कुछ मांग रही थी।
“हां… हां बैठो,” मैंने जल्दी से कहा।
वो पीछे बैठ गई। जैसे ही बाइक स्टार्ट की, उनका हाथ धीरे से मेरे कंधे पर आकर टिक गया। बारिश अब और तेज हो चुकी थी। कुछ ही सेकंड में हम दोनों पूरी तरह भीग गए।चलते-चलते अचानक उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे से सरका कर मेरी कमर पकड़ ली। उनकी पकड़ मजबूत थी… जैसे वो जान-बूझ कर और करीब आना चाहती हो।
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। बारिश की ठंडी बूंदें और उनके शरीर की गर्माहट दोनों एक साथ महसूस हो रही थी। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपना सिर हल्का सा मेरी पीठ पर टिका दिया। मैं कुछ बोल नहीं पाया… बस चुप-चाप बाइक चलाता रहा। लेकिन उस पल में जो महसूस हो रहा था… वो पहले कभी नहीं हुआ था।
उनकी उंगलियों की पकड़, उनका इतना करीब होना… और वो बारिश, सब कुछ मिलकर जैसे उस दूरी को धीरे-धीरे खत्म कर रहा था, जो हम दोनों के बीच अब तक बनी हुई थी।
बारिश अचानक और तेज हो गई। इतनी तेज कि सामने कुछ भी साफ दिखाई देना मुश्किल हो गया। मुझे मजबूर होकर बाइक रोकनी पड़ी। सड़क पूरी तरह खाली थी… दूर-दूर तक कोई नहीं था। मैंने जल्दी से बाइक एक बड़े पेड़ के नीचे खड़ी कर दी।
हम दोनों उतर कर पेड़ के नीचे आकर खड़े हो गए। फिर भी बारिश की बूंदें हवा के साथ अंदर तक आ रही थी, जिससे हम पूरी तरह भीग चुके थे।
मैंने जैसे ही उनकी तरफ देखा… मैं कुछ पल के लिए वहीं ठहर गया। उनका सफेद, पतला शर्ट पूरी तरह भीग चुका था। कपड़ा उनके शरीर से इस तरह चिपक गया था जैसे वो उनकी त्वचा का हिस्सा बन गया हो। अंदर पहनी हुई लाल ब्रा की झलक साफ दिखाई दे रही थी, और भीगे हुए कपड़े की वजह से उसकी बनावट और उभर कर सामने आ रही थी।
बारिश की हर बूंद उनके कंधों से फिसल कर नीचे आ रही थी, और उनके कपड़ों पर छोटी-छोटी चमकती लकीरों की तरह रुक कर फिर नीचे गिर जाती थी। उनकी हर सांस के साथ उनका सीना हल्का-हल्का उठ रहा था… और वो हर हरकत भीगे कपड़े के कारण साफ महसूस हो रही थी।
मैंने अपनी नजरें हटाने की कोशिश की… लेकिन जैसे आंखें मान ही नहीं रही थी।
वो अपने बालों को पीछे करने लगी। दोनों हाथों से बालों को पकड़ कर उन्होंने हल्का सा झटका दिया, जिससे पानी की बूंदें चारों तरफ बिखर गई। कुछ बूंदें मेरे चेहरे पर भी आकर गिरी।
फिर उन्होंने अपने बालों को उंगलियों से सुलझाना शुरू किया। कभी वो सिर झुकाती, कभी हल्का सा ऊपर उठाती… और हर बार उनके बालों से पानी टपक कर नीचे गिरता रहता। उनकी गर्दन पर फिसलती हुई पानी की पतली धारियां साफ दिखाई दे रही थी, जो धीरे-धीरे नीचे जाकर उनके कपड़ों में खो जाती थी।
वो पूरी तरह अपने बाल सुखाने में लगी हुई थी… लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि उन्हें पता है मैं उन्हें देख रहा हूँ। एक पल के लिए उन्होंने मेरी तरफ देखा… और फिर हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, “क्या देख रहे हो गोलू?”
मैं एक-दम चुप हो गया। दिल में जो चल रहा था, वो बहुत साफ था… लेकिन उसे शब्दों में कहना मेरे बस की बात नहीं थी। मेरी नजरें फिर एक पल के लिए उनके स्तन पर चली गई… और इस बार मैं खुद को रोक भी नहीं पाया।
मैं कहना चाहता था कि मैं उनके स्तन देख रहा हूँ… कि मैं उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रहा… कि मेरा मन कर रहा है उन्हें छू लूँ… लेकिन मेरे होंठ जैसे साथ ही नहीं दे रहे थे।
“मैं… वो… कुछ नहीं दीदी…” मैं बस इतना ही कह पाया।
वो मुझे देखती रही… और फिर उनके होंठों पर एक हल्की, धीमी मुस्कान आ गई। वो एक कदम और करीब आ गई। बारिश अब भी गिर रही थी, लेकिन उस पल में मुझे सिर्फ उनकी मौजूदगी महसूस हो रही थी।
इतनी बारिश के बावजूद उनकी लिपस्टिक बिल्कुल भी नहीं फैली थी— हल्की गुलाबी रंगत, जैसे ताज़ा स्ट्रॉबेरी की चमक हो।
भीगे हुए चेहरे पर वो रंग और भी ज्यादा उभर कर दिख रहा था। उनसे एक हल्की खुशबू आ रही थी… भीगी हुई मिट्टी और उनके परफ्यूम का मिला-जुला एहसास, जो धीरे-धीरे मेरी सांसों में बसता जा रहा था। वो मेरे बहुत पास खड़ी थी। इतनी पास कि मैं उनकी हर सांस, हर हलचल महसूस कर पा रहा था। ठंडी हवा चल रही थी… लेकिन मेरे अंदर एक अलग ही गर्माहट फैल रही थी।
उन्होंने हल्का सा झुक कर अपना चेहरा मेरे करीब कर लिया। हमारे होंठों के बीच बस एक बेहद छोटा सा फासला रह गया था। मेरी सांसें तेज हो गई…
फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए कहा “मुझे पता है गोलू… तुम क्या देख रहे हो…”
मैं सन्न रह गया। वो हल्का सा मुस्कुराई, उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति और शरारत दोनों साथ थी। “तुम बार-बार मेरे बूब्स देख रहे हो ना…” उन्होंने धीमे से कहा।
मेरे पास अब भी कोई जवाब नहीं था।
वो और भी पास आ गई… उनकी सांसें अब सीधे मेरे चेहरे से टकरा रही थी। “अगर… कुछ कहना है… तो साफ-साफ कहो,” उन्होंने बहुत नरम आवाज़ में कहा, “चुप रहने से कुछ नहीं होता…”
मेरे होंठ कांपने लगे। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आखिर मैंने हिम्मत जुटाई… “काजल दीदी…” मेरी आवाज़ धीमी और डर से भरी थी, “आपके बूब्स… बहुत खूबसूरत हैं… मैं… मैं उन्हें बार-बार देखता हूँ…” मैंने एक पल रुक कर सांस ली। “मेरा मन करता है… उन्हें छूने का… लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता… क्योंकि आप… मेरी बड़ी बहन हैं…”
मेरे ये शब्द जैसे मुश्किल से बाहर आए थे। कुछ पल के लिए खामोशी छा गई। फिर वो हल्का सा मुस्कुराई… उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए बहुत शांत आवाज़ में कहा “लेकिन गोलू… मैं तुम्हारी सगी बहन नहीं हूं..”
मैंने तुरंत सिर हिलाया, जैसे खुद को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। “पर…” मेरी आवाज़ फिर से धीमी पड़ गई, “आप फिर भी मेरी बहन हो… बड़ी हो मुझसे… ये… ये गलत है…”
वो कुछ सेकंड मुझे देखती रही… फिर हल्का सा मुस्कुराई। “जैसा तुम चाहो गोलू…” उन्होंने धीरे से कहा।
फिर उन्होंने अपना चेहरा मेरे पास से थोड़ा दूर कर लिया।जैसे ही वो पीछे हटी… मुझे अचानक एक खालीपन सा महसूस हुआ। अभी कुछ सेकंड पहले जो उनकी खुशबू मेरे बहुत करीब थी… अब वो धीरे-धीरे दूर जा रही थी।
मैं बस वहीं खड़ा रह गया… जैसे कुछ छूट गया हो। कुछ देर बाद बारिश हल्की होने लगी। बूंदें अब पहले जैसी तेज नहीं थी।
“चलें?” उन्होंने आम आवाज़ में कहा।
मैंने सिर हिलाया। हम फिर से बाइक पर बैठ गए। इस बार वो पहले से ज्यादा करीब आकर बैठी। जैसे ही मैंने बाइक चलानी शुरू की… उन्होंने अपने दोनों हाथों से मुझे पीछे से पकड़ लिया। उनका शरीर पूरी तरह मेरे साथ सटा हुआ था।
उनके भीगे हुए कपड़ों की ठंडक और उनके शरीर की हल्की गर्माहट एक साथ महसूस हो रही थी। कुछ ही सेकंड में मुझे एहसास हुआ कि उनका सीना मेरी पीठ से लगा हुआ है। हर हलचल के साथ वो स्पर्श और साफ महसूस हो रहा था। वो मुझे कसकर पकड़े हुई थी, जैसे उन्हें गिरने का डर हो… या शायद वो खुद ही करीब रहना चाहती हों।
बारिश की हल्की बूंदें अब भी गिर रही थी, हवा ठंडी थी… लेकिन मेरे अंदर एक अजीब सी गर्मी फैलती जा रही थी। मैं चुपचाप बाइक चला रहा था… और पीछे से उनका वो स्पर्श मुझे बार-बार महसूस हो रहा था। और उस सफर में… हम दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे… लेकिन बहुत कुछ महसूस कर रहे थे।
हम चुपचाप घर पहुंच गए। उस रात सब कुछ आम लग रहा था… लेकिन अंदर से कुछ भी आम नहीं था। हमने साथ में खाना खाया। वो हमेशा की तरह थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। लेकिन एक फर्क था…आज उन्होंने मुझे “गुड नाइट” नहीं कहा। खाना खत्म करके वो सीधे अपने कमरे में चली गई।
मैं कुछ देर तक लिविंग रूम में बैठा टीवी देखता रहा… लेकिन मेरा ध्यान कहीं और था। मेरे दिमाग में बार-बार वही पल घूम रहा था— उनका इतना करीब आना… उनके होंठों का मेरे होंठों के पास रुक जाना… उनका भीगा हुआ शर्ट… और वो लाल ब्रा की झलक… मैंने सिर झटका… लेकिन कुछ भी नहीं बदला।
आखिर मैं भी अपने कमरे में चला गया। मैं बिस्तर पर लेट गया… आँखें बंद करने की कोशिश की… लेकिन नींद जैसे मुझसे दूर भाग रही थी। हर बार जब आँखें बंद करता… वही दृश्य सामने आ जाता। उनकी खुशबू… उनका स्पर्श… उनकी आवाज़… दिल और तेज धड़कने लगता। मैं करवट बदलता रहा… लेकिन सुकून नहीं मिला।
अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैं गहरी नींद में था, आँखें मलते हुए उठा और दीवार घड़ी की तरफ देखा— रात के ठीक बारह बजे थे। दिमाग अभी भी सुस्त था, समझ नहीं आ रहा था इतनी रात को कौन हो सकता है।
मैं धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ बढ़ा, कदम भारी लग रहे थे। जैसे ही कुंडी खोली और दरवाज़ा खोला, मेरी नींद एक ही पल में गायब हो गई।
दरवाज़े के सामने काजल दीदी खड़ी थी।
उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, लेकिन मेरी साँस जैसे रुक गई। कुछ सेकंड के लिए मैं बस उन्हें देखता ही रह गया। दिमाग में एक अजीब सा झटका लगा। वही लड़की जिसके बारे में मैं कई बार सोच चुका था, जिसके स्तन को छूने की इच्छा मेरे अंदर बार-बार उठती थी… वो इस समय मेरे सामने खड़ी थी, आधी रात को।
मेरे अंदर तुरंत एक अजीब सा एहसास आया कि ये सही नहीं है। हालात कुछ अलग थे, और मैं समझ नहीं पा रहा था कि वो यहाँ क्यों आई हैं।
उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए धीरे से कहा, “सो रहे थे क्या?”
मैंने बस सिर हिलाया, लेकिन मेरी नज़रें खुद-ब-खुद उनके शरीर पर चली जा रही थी। उनका ढीला सा कपड़ा हल्की रोशनी में उनके शरीर की बनावट को छुपा भी रहा था और दिखा भी रहा था। मैं खुद को बार-बार रोकने की कोशिश कर रहा था कि कहीं मेरी नज़रें ज़्यादा देर तक वहीं ना टिक जाएं।
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