पिछला भाग पढ़े:- साक्षी दीदी और मेरी सेक्स कहानी-2
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
अगर तुम्हारा छोटा भाई तुम्हारे बिना कपड़ों के स्तन देख ले, तो उस पल के बाद नॉर्मल रहना बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन साक्षी दीदी के लिए ऐसा नहीं था, क्योंकि वो बहुत समझदार थी और दुनिया से अलग तरह की लड़की थी। उस दिन के बाद वो मेरे सामने ऐसे रह रही थी जैसे हमारे बीच कुछ हुआ ही नहीं। जैसे उनके लिए ये बिल्कुल सामान्य था कि मैंने उनके स्तन देखे।
अगले ही दिन सुबह का सीन ऐसा था जैसे कुछ बदला ही नहीं हो। वो किचन में चाय बना रही थी, और मैं जान-बूझ कर वहाँ गया। दिल तेज़ धड़क रहा था, आँखें बार-बार उनकी तरफ जा रही थी। लेकिन वो पूरी तरह सामान्य थी। उन्होंने बस एक नज़र मेरी तरफ देखा और बोली, “उठ गए? चाय लोगे?” उनकी आवाज़ में ना कोई झिझक थी, ना कोई शर्म। जैसे उन्हें फर्क ही नहीं पड़ा।
मैं कुर्सी पर बैठ गया, लेकिन मैं नज़रें छुपाने की कोशिश कर रहा था। वो आराम से मेरे सामने घूम रही थी, कभी चाय कप में डालतीं, कभी कुछ ढूंढतीं… और हर बार जब वो झुकती या पास आती, मेरा दिमाग उसी चीज़ में अटक जाता। लेकिन उनके चेहरे पर एक भी पल के लिए अजीब-पन नहीं आया।
वक़्त ऐसे ही आगे बढ़ता रहा। दिन हफ्तों में बदल गए और हफ्ते महीनों में। लेकिन साक्षी दीदी का तरीका बिल्कुल वैसा ही रहा, बिना किसी झिझक के, बिना कुछ बदले। वो मेरे पास वैसे ही बैठती जैसे पहले बैठती थी। टीवी देखते समय बिल्कुल पास आकर बैठ जाना, डाइनिंग टेबल पर मेरे सामने बैठ कर खाना खाना, और घर में वैसे ही आना-जाना जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
कभी-कभी तो ऐसा लगता था जैसे मैं ही ज़्यादा सोच रहा था। जैसे उनके लिए वो पल कोई मायने ही नहीं रखता। वो मुझे उसी तरह ट्रीट करती रहीं थी, जैसे मैं उनका छोटा और थोड़ा भोला भाई था, जिसके सामने कुछ भी छुपाने की ज़रूरत नहीं।
एक दिन, कई महीने बाद, मैंने हिम्मत जुटाई। हम दोनों हॉल में बैठे थे, टीवी चल रहा था लेकिन मेरा ध्यान कहीं और था। दिल फिर से तेज़ धड़क रहा था, जैसे उस दिन धड़क रहा था। मैंने धीरे से कहा, “दीदी… उस दिन…” मेरी आवाज़ खुद ही धीमी पड़ गई।
उन्होंने मेरी तरफ देखा, लेकिन उनके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी। बस एक हल्की सी नज़र। उन्होंने तुरंत बात को मोड़ दिया, “अरे ये सीरियल देखो, कितना अजीब हो गया है अब,” और फिर वापस टीवी में लग गई।
मैं कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रह गया। उन्होंने जैसे कुछ सुना ही नहीं, जैसे मैंने कुछ कहा ही नहीं। लेकिन उनके इस अंदाज़ में एक बात साफ़ थी। वो उस बात को दोबारा ज़िंदगी में आने ही नहीं देना चाहती थी।
लेकिन महीनों बाद मेरी किस्मत बदली। वह भी एक छोटे से हादसे की वजह से।
उस दिन मैं कॉलेज से घर लौटा। जैसे ही दरवाज़ा खोला, घर का माहौल अलग सा लगा। हॉल में सब लोग इकट्ठा थे। मम्मी और पापा कुर्सियों पर बैठे थे, उनके चेहरे पर चिंता साफ दिख रही थी।
मेरी नज़र सामने गई… और मैं वहीं रुक गया। सोफे पर साक्षी दीदी बैठी थी। उनका बायां हाथ सफेद प्लास्टर में ढका हुआ था। वो हल्का सा टेक लगा कर बैठी थी, जैसे उठना भी मुश्किल हो रहा हो। उनके पास दवाइयों की स्ट्रिप और पानी का गिलास रखा था। मुझे एक पल के लिए समझ ही नहीं आया क्या हुआ है। दिल अचानक घबरा गया। मैं जल्दी से आगे बढ़ा और बस उन्हें देखने लगा।
तभी मम्मी की नज़र मुझ पर पड़ी। उन्होंने मुझे पास आने का इशारा किया और थोड़ा परेशान लहजे में बोली, “साक्षी बाथरूम में फिसल गई थी… नहाते वक्त।” उनकी आवाज़ में साफ डर और चिंता थी।
मैंने फिर से दीदी की तरफ देखा। वो सोफे पर बैठी थी, लेकिन अब ध्यान से देखने पर समझ आ रहा था कि वो दर्द को दबाने की कोशिश कर रही थी। उनकी आँखें हल्की लाल थी… जैसे वो थोड़ी देर पहले रोई हों, या रोने से खुद को रोक रही हों।
उस समय कुछ खास नहीं हुआ। मम्मी और पापा ही उनका ध्यान रख रहे थे—दवाई देना, खाना खिलाना, उन्हें उठने-बैठने में मदद करना… सब कुछ वहीं संभाल रहे थे। मैं बस दूर से देखता रहता था।
लेकिन दो दिन बाद हालात बदल गए। एक ऐसा मोड़ आया जहाँ सब कुछ मेरे ऊपर आने वाला था। असल में मम्मी-पापा को रिश्तेदारी में एक घर के फंक्शन में जाना था, जो लखनऊ में था। पहले प्लान यही था कि हम सब साथ जाएंगे। लेकिन अब साक्षी दीदी के हाथ में प्लास्टर था, वो कहीं जा नहीं सकती थी। घर में इस बात को लेकर काफी देर तक बात होती रही। मम्मी बार-बार कह रही थी कि वो यहीं रुक जाएंगी, साक्षी को अकेला छोड़ कर नहीं जाएंगी। लेकिन वो जिस रिश्तेदार के यहाँ जाना था, वो उनके अपने भाई थे… जाना ज़रूरी था।
फिर बात मुझ पर आई। मैंने कहा कि मैं घर पर रुक जाऊंगा और दीदी का ध्यान रख लूंगा। पहले मम्मी मान नहीं रही थी, उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था कि मैं सब संभाल पाऊंगा। लेकिन हम सबने मिल कर उन्हें समझाया। पापा ने भी कहा कि मैं अब छोटा बच्चा नहीं हूं।
आखिरकार मम्मी मान गई। अगले दिन उन्होंने और पापा ने जाने की तैयारी की… और फिर वो दोनों लखनऊ के लिए निकल गए। घर में अब सिर्फ मैं और साक्षी दीदी रह गए थे… पहली बार, इतने लंबे समय के लिए।
अगली सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैं अपने कमरे में था, और कुछ पल तक बस ऐसे ही छत को देखता रहा। फिर मुझे याद आया कि साक्षी दीदी दूसरे कमरे में सो रही हैं। हल्का सा मन हुआ देखने का, तो मैं उठ कर दरवाजे तक गया और धीरे से झांक कर देखा।
वह अभी भी गहरी नींद में थी। उन्होंने नीले रंग के शॉर्ट्स और आधी बाहों वाली नीली टी-शर्ट पहनी हुई थी। उनकी आँखें बंद थी और चेहरे पर एक सुकून सा दिख रहा था, जैसे उन्हें किसी बात की परवाह ही ना हो।
नींद में करवट लेते हुए उनके शॉर्ट्स थोड़ा ऊपर खिसक गए थे, जिससे उनकी जांघों की नरम त्वचा हल्की-सी दिख रही थी। टीशर्ट उनके शरीर से हल्के से चिपकी हुई थी, और उनके स्तन उनकी सांसों के साथ धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहे थे। कपड़े के अंदर उनका उभार साफ दिख रहा था, जैसे हर सांस के साथ उनका आकार हल्का सा बदल रहा हो।
टी-शर्ट का निचला हिस्सा थोड़ा सा ऊपर उठा हुआ था, जिससे उनके पेट की मुलायम त्वचा की झलक मिल रही थी, और नीचे शॉर्ट्स के अंदर छुपा उनका नाज़ुक हिस्सा पूरी तरह ढका हुआ होते हुए भी उनकी मौजूदगी का एहसास दे रहा था।
अचानक वो हल्का सा हिली… और फिर उनकी आँखें धीरे-धीरे खुल गई। उनकी नज़र सीधा मुझ पर पड़ी। एक पल के लिए वो समझ ही नहीं पाई कि मैं कब से वहाँ खड़ा था। फिर जैसे ही उन्हें एहसास हुआ कि मैं उन्हें देख रहा था, उनके चेहरे पर हल्की घबराहट आ गई।
उन्होंने तुरंत अपने शरीर को संभालने की कोशिश की, जैसे खुद को ढकना चाहती हों। लेकिन उनका हाथ प्लास्टर में था। वो पूरी तरह से खुद को ठीक से संभाल नहीं पा रही थी।
उन्होंने थोड़ा सा पीछे खिसकने की कोशिश की और हल्की सी आवाज़ में बोलीं, “क्या कर रहे हो यहाँ गोलू?”
मैं एक पल के लिए चुप रह गया। फिर जल्दी से नज़रें हटाई और थोड़ा संभल कर बोला, “मैं… वो… चाय बनाने जा रहा था दीदी… आपको चाहिए क्या?”
उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया, अपनी नज़रें मुझसे हटाते हुए बोली, “नहीं… मुझे चाय नहीं चाहिए।”
थोड़ी देर बाद मैं अपने कमरे में वापस आ गया और सीधे किचन में चला गया। मैंने अपने लिए चाय बनाई और उनके लिए ऑमलेट तैयार किया। चाय बना कर मैं शांति से बैठ कर उसे पीने लगा, बस मन में वहीं ख्याल चल रहा था।
जब मेरी चाय खत्म हो गई, तो मैं प्लेट में ऑमलेट लेकर उनके कमरे में गया। मैंने उन्हें धीरे से उठाया और प्लेट उनके सामने रख दी। लेकिन वह एक हाथ से ठीक से खा नहीं पा रही थी, तो मैं उनके पास बैठ गया और उन्हें अपने हाथ से खिलाने लगा।
मैं उनके काफी करीब बैठा था। हर बार जब वह एक बाइट लेने के लिए आगे झुकती, तो मेरी नज़र अनजाने में उनके स्तन की तरफ चली जाती। टी-शर्ट के अंदर उनका गुलाबी रंग का ब्रा हल्का सा दिख रहा था, और उनके स्तन का उभार साफ नज़र आ रहा था।
उनके इतने पास बैठ कर उन्हें खिलाते हुए मेरे अंदर अजीब सा एहसास हो रहा था। एक पल के लिए मन हुआ कि बस उन्हें छू लूं, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया और ध्यान वापस उन्हें खिलाने पर लगाने की कोशिश की।
जब उन्होंने खाना खत्म कर लिया, तो मैंने उन्हें पानी दिया और उनकी दवा भी निकाल कर दी। मैंने धीरे से कहा कि अब थोड़ा आराम कर लें और फिर से लेट जाएं। वह हल्का सा सिर हिला कर मान गई, और मैं उन्हें आराम से तकिये पर टिकाकर बैठा दिया, ताकि वह आराम से थोड़ी देर के लिए सो सकें।
कुछ ही देर में वह फिर से सो गई। मैं धीरे से कमरे से बाहर आया और लिविंग रूम में जाकर टीवी ऑन कर लिया। मैं सोफे पर बैठकर चैनल बदलता रहा और करीब दो घंटे वहीं बैठा रहा, लेकिन धीरे-धीरे बोर होने लगा।
मन में आया कि साक्षी दीदी से बात कर लूं, शायद थोड़ा अच्छा लगे। यही सोच कर मैं फिर से उनके कमरे की तरफ गया। लेकिन जब मैं अंदर गया तो देखा कि वह फिर से गहरी नींद में थी। इस बार उनकी नींद और भी गहरी लग रही थी, क्योंकि डॉक्टर ने उन्हें ऐसी दवा दी थी जिससे उन्हें आराम मिल सके और दर्द की वजह से उनकी नींद बार-बार ना टूटे।
मैं वहीं दरवाजे के पास खड़ा होकर उन्हें देखने लगा। इस बार उनके शॉर्ट्स पहले से थोड़े और ऊपर खिसक गए थे, लेकिन वह फिर भी नहीं जागी। उनका शरीर बिल्कुल ढीला था, जैसे गहरी नींद में पूरी तरह खो गई हों।
मैंने धीरे से आवाज लगाई, “साक्षी दीदी… आप जाग रही हैं क्या?” लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और उनके बेड के किनारे बैठ गया। उनके पास बैठते ही मुझे उनके शरीर से दवा की हल्की सी खुशबू महसूस हुई, लेकिन वो अजीब तरह से अच्छी लग रही थी, जैसे किसी महंगे परफ्यूम से भी ज्यादा अलग और खास हो।
मैंने एक बार फिर धीरे से उन्हें पुकारा, “साक्षी दीदी…” लेकिन वह वैसे ही गहरी नींद में थी, बिना किसी हलचल के, जैसे उन्हें मेरी मौजूदगी का एहसास भी ना हो।
मैं थोड़ा और करीब झुका और धीरे से उनके गाल को छुआ। उनकी त्वचा नरम और गरम सी लगी, लेकिन वह फिर भी गहरी नींद में ही थी, जैसे कुछ महसूस ही ना हुआ हो। कुछ पल तक मैं वहीं बैठा रहा, फिर जाने क्यों मेरी नज़र उनके होंठों पर टिक गई। दिल की धड़कन तेज होने लगी। मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और पहली बार उनके होंठों को छुआ।
यह मेरे लिए पहली बार था। बचपन में वह कई बार मेरे गालों पर किस्स करती थी, लेकिन आज उनके होंठों को छूना कुछ अलग ही एहसास दे रहा था। जैसे पूरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ गई हो, नसें तेज चलने लगी हों।
मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ थोड़ा नीचे किया और बहुत हल्के से उनकी टी-शर्ट को नीचे से पकड़ कर थोड़ा सा ऊपर उठाया। मैंने टीशर्ट पूरी तरह नहीं हटाई, बस इतना उठाया कि अंदर की ब्रा दिखने लगे। उनकी गुलाबी रंग की ब्रा उनके स्तन को पकड़े हुए थी, उनका आकार साफ दिख रहा था। कपड़े के अंदर भी उनका भरा हुआ उभार नज़र आ रहा था।
मैं कुछ पल तक वैसे ही देखता रहा, फिर मैंने बहुत धीरे से हाथ बढ़ा कर ब्रा के हुक की तरफ हाथ ले गया और उसे ढीला करने की कोशिश की। दिल बहुत तेज धड़क रहा था। धीरे-धीरे मैंने ब्रा को थोड़ा सा ऊपर किया।
ब्रा ढीली होते ही उनके स्तन नज़र आने लगे। उनका गोल आकार साफ दिख रहा था, ना ज्यादा ढीले और ना ही कसे हुए, बल्कि जैसे होते हैं वैसे ही। त्वचा साफ थी, कहीं कोई दाग नहीं, बस मुलायम। ऊपर का हिस्सा थोड़ा उभरा हुआ और नीचे की तरफ हल्का सा भारी लग रहा था, जिससे उनका शेप और साफ दिख रहा था।
मैं ध्यान से देख रहा था कि उनकी सांसों के साथ दोनों स्तन धीरे-धीरे ऊपर उठते और फिर नीचे आते। यह मूवमेंट लगातार चल रही थी, जिससे उनका फॉर्म और भी साफ समझ आ रहा था। बीच का हिस्सा साफ दिख रहा था, दोनों के बीच हल्का सा गैप था, और पूरा शेप बराबर लग रहा था। मैं कुछ सेकंड तक बस उसी को देखता रह गया, जैसे दिमाग वहीं रुक गया हो।
मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ नीचे किया और अपने दोनों हाथ उनके दोनों स्तन पर रख दिए। मैं उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगा। दबाते समय ऐसा लग रहा था जैसे पानी से भरे गुब्बारे को दबा रहा था, लेकिन उससे भी ज्यादा मुलायम।
चार महीने पहले मुझे सिर्फ उन्हें देखने का मौका मिला था, लेकिन आज जब मैं उन्हें दबा रहा था तो एहसास बिल्कुल अलग था। मेरे हाथों के नीचे उनका नरम-पन साफ महसूस हो रहा था, हर दबाव के साथ उनका शेप बदलता और फिर वापस आ जाता।
मैं धीरे-धीरे दबाता रहा, कभी हल्का, कभी थोड़ा ज्यादा, और हर बार वही मुलायम एहसास हाथों में रह जाता। उस पल में मुझे इतना अच्छा लग रहा था कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मेरे अंदर एक गर्म सा एहसास फैल रहा था और मेरा लंड भी मेरे पैंट के अंदर खड़ा होने लगा था।
मैं खुद को कंट्रोल नहीं कर पाया और धीरे-धीरे मैंने अपनी पैंट नीचे खिसका दी। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा था और धड़क रहा था। मैं थोड़ा झुका और बहुत धीरे से उसके टिप को उनके स्तन के ऊपर ले गया। पहले मैंने बस हल्का सा छुआ, फिर धीरे-धीरे उसे उनके निप्पल के पास ले जाकर टच किया। जैसे ही मेरा लंड उनके स्तन और निप्पल से टच हुआ, मेरे शरीर में एक झटका सा महसूस हुआ।
मैं बहुत धीरे-धीरे उसे उनके निप्पल पर रगड़ने लगा। हर हल्की मूवमेंट के साथ मेरे अंदर का एहसास और तेज होता जा रहा था। उनकी त्वचा की गर्मी और मेरे लंड की सेंसिटिविटी एक साथ महसूस हो रही थी।
मैं बार-बार धीरे-धीरे वही करता रहा, कभी हल्का टच, कभी थोड़ा रगड़ना, और हर बार वही तेज एहसास मेरे पूरे शरीर में फैल जाता। वह अभी भी गहरी नींद में थी, उन्हें कुछ भी पता नहीं था, और मैं उसी में खोया हुआ था, बस अपने एहसास में डूबा हुआ।
जब मेरा लंड पूरी तरह सख्त हो गया, तो मैं धीरे-धीरे उठ कर उनके चेहरे के पास गया। हर कदम बहुत संभल कर रख रहा था, जैसे खुद को भी समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करने जा रहा था।
मैं उनके बिल्कुल करीब आ गया। उनका चेहरा शांत था, होंठ हल्के खुले हुए थे और लाल दिख रहे थे। उन पर हल्की सी नमी थी, जो मेरी नज़र को वहीं रोक रही थी। मैंने नीचे देखा, फिर उनकी तरफ। मेरे अंदर की बेचैनी अब साफ महसूस हो रही थी। मैं थोड़ा और झुका और बहुत धीरे से अपने लंड को उनके होंठों के पास ले गया।
पहले बस पास रखा, बिना छुए। कुछ सेकंड तक वहीं रुका रहा, जैसे उस पल को महसूस कर रहा हूं। मेरी सांसें तेज थी और दिल की धड़कन कानों तक सुनाई दे रही थी। फिर मैंने बहुत हल्के से अपने लंड को उनके लाल होंठों से छुआ। वह स्पर्श बहुत धीमा था, लेकिन मेरे अंदर एक झटका सा लगा। जैसे ही टच हुआ, मैं कुछ सेकंड के लिए वहीं रुक गया।
मैंने फिर से हल्का सा मूव किया, बहुत धीरे-धीरे, जैसे उस एहसास को लंबा खींचना चाहता हूं। उनके होंठ वैसे ही थे—नरम, हल्के खुले हुए, और हर स्पर्श के साथ मेरा कंट्रोल और कमजोर होता जा रहा था।
उस पल मुझे सच में ऐसा लग रहा था जैसे कोई सपना चल रहा हो। साक्षी दीदी के होंठों को अपने लंड से छूना मेरे लिए किसी ख्वाब जैसा था। मैं चाहता था कि मैं अपना लंड उनके मुँह के अंदर डाल दूं, लेकिन उनके होंठ बंद थे, इसलिए मैं रुक गया।
मैंने अपना लंड अपने हाथ में पकड़ा और धीरे धीरे उसे हिलाने लगा, और मेरी नज़र लगातार उनके खुले स्तन और उनके होंठों पर ही टिकी हुई थी। वह गहरी नींद में थी, और मैं बस उन्हें देखते हुए वहीं करता रहा।
उस पल मेरा दिमाग जैसे पूरी तरह खाली हो गया था। मैं बस साक्षी दीदी के ऊपर झुका हुआ था, और अगले ही पल मेरे लंड से सफेद पानी की पहली बूंद उनके चेहरे पर गिरने लगी।
पहली बूंद उनके गाल पर गिरी, गर्म और गाढ़ी, जो धीरे-धीरे उनकी त्वचा पर फैलने लगी। फिर दूसरी, तीसरी… कुछ ही सेकंड में उनका चेहरा उस सफेद पानी से भरने लगा।
कुछ बूंदें सीधे उनके माथे पर गिरी, फिर वहां से बहती हुई नीचे आने लगी। एक पतली सी लकीर बनती हुई उनके भौंहों के बीच से गुजरती हुई नाक की तरफ बढ़ी। जैसे-जैसे वो नीचे आई, उसकी चमक हल्की रोशनी में साफ दिख रही थी।
उनके गालों पर गिरा सफेद पानी धीरे-धीरे नीचे फिसलने लगा। एक बूंद उनके गाल के किनारे से होती हुई उनके होंठों के पास तक आ गई। दूसरी बूंद ठुड्डी तक पहुंची और वहां से टपकने लगी।
मैं बस खड़ा ये सब देख रहा था, कैसे हर बूंद उनके चेहरे पर फैल रही थी, कैसे वो धीरे-धीरे नीचे बहती जा रही थी। उनका चेहरा उस सफेद पानी से भीग चुका था, और हर लकीर साफ दिख रही थी।माथे से लेकर गालों तक, और फिर नीचे गिरती हुई। कुछ बूंदें एक साथ मिल कर थोड़ी मोटी धार बन गई, जो उनके चेहरे से फिसलती हुई नीचे गिर रही थी। कमरे की हल्की रोशनी में वो सब और भी साफ नज़र आ रहा था, जैसे हर चीज स्लो मोशन में हो रही हो।
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