पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-12
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
सुधा दीदी अभी भी मुझसे नाराज़ थी। मैं और साक्षी दीदी समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें कैसे खुश करें। हमने उन्हें मनाने की कोशिश की, उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन वो हमसे बात ही नहीं कर रही थी।
कुछ दिनों बाद साक्षी दीदी ने भी मुझसे बात करना कम कर दिया। उसने मुझसे कहा कि अगर वो मुझसे बात करेगी तो सुधा दीदी को बुरा लगेगा। इसलिए उसने भी दूरी बना ली। अब घर का माहौल ऐसा हो गया था कि कोई किसी से ठीक से बात नहीं करता था। बस माँ-पापा के सामने ही हम थोड़ा बहुत बात कर लेते थे ताकि उन्हें लगे कि सब ठीक है। लेकिन अंदर से हमें पता था कि कुछ भी ठीक नहीं है। मुझे अंदर से बहुत बुरा लग रहा था। मुझे लग रहा था कि ये सब मेरी ही गलती थी। अगर मैं उनके साथ इतना करीब नहीं गया होता तो शायद आज ऐसा नहीं होता।
घर में रहते हुए भी सब अजीब लगने लगा था। किसी से बात नहीं, बस खामोशी। ये सब सोच कर मुझे और ज्यादा बुरा लगता था। फिर एक दिन मैंने सोचा कि मुझे कुछ करना पड़ेगा। अगर मैं कुछ नहीं करूंगा तो ये सब ऐसे ही चलता रहेगा। उस दिन मैंने तय किया कि मैं सब कुछ ठीक करने की कोशिश करूंगा।
मैं सब कुछ ठीक करना चाहता था सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे बुरा लग रहा था, बल्कि इसलिए भी कि मेरे घर में दो खूबसूरत बहनें हैं और मैं उन्हें छू भी नहीं सकता। वो वही बहनें थी जिन्होंने खुद कहा था कि मैं उन्हें चोद सकता हूँ। मैंने सुधा दीदी के स्तन चूसे थे, अपना लंड उनके मुँह में दिया था। और साक्षी दीदी ने भी मेरा लंड चूसा था और मैंने उसे भी चोदा था। लेकिन जैसे ही सुधा दीदी को मेरे और साक्षी दीदी के बारे में पता चला, मैं अब उनमें से किसी को छू भी नहीं सकता था।
फिर एक दिन मुझे अचानक मौका मिल गया। सुधा दीदी शॉपिंग के लिए अकेले जाने वाली थी। उन्हें रात में मॉल जाना पसंद था, क्योंकि उस समय वहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं होती और वो आराम से अपने पसंद के कपड़े ट्राई कर पाती थी। उस दिन भी उन्होंने अकेले जाने का ही प्लान बनाया।
मुझे जैसे ही पता चला कि वो मॉल गई हैं, मैं भी चुप-चाप उनके पीछे निकल पड़ा। मेरा इरादा साफ था—मैं उन्हें ढूंढना चाहता था और देखना चाहता था कि वो क्या कर रही थी। जब मैं मॉल पहुँचा, तो वहाँ सच में बहुत शांति थी। इधर-उधर कुछ ही लोग दिख रहे थे। मैंने अंदर जाकर सबसे पहले चारों तरफ नज़र दौड़ाई, लेकिन वो कहीं दिखाई नहीं दीं।
फिर मैं कपड़ों वाले सेक्शन में गया। वहाँ बहुत सारे रैक लगे हुए थे, हर तरफ अलग-अलग तरह के कपड़े टंगे हुए थे। मैं धीरे-धीरे हर रैक के बीच से गुजरते हुए उन्हें ढूंढने लगा। कई बार मुझे लगा कि शायद वो आगे होंगी, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी।
कुछ देर बाद मुझे लगा कि शायद वो ट्रायल रूम में हों। क्योंकि वो हमेशा कपड़े ट्राई किए बिना नहीं खरीदती थी। मैं ट्रायल रूम की तरफ गया। वहाँ कई दरवाजे थे, सब बंद। मैंने धीरे-धीरे एक-एक दरवाजे पर नॉक करना शुरू किया। हर बार मैं उम्मीद करता कि अंदर से उनकी आवाज़ आएगी, लेकिन पहले तीन दरवाजों पर कोई जवाब नहीं मिला।
जब मैंने चौथे दरवाजे पर नॉक किया, तो वो दरवाजा हल्का सा अंदर की तरफ खुल गया। वो लॉक नहीं था। उसी समय अंदर से आवाज़ आई—”एक मिनट, मैं यहाँ हूँ।”
जैसे ही मैंने वो आवाज़ सुनी, मैं समझ गया कि वो सुधा दीदी ही हैं। उनकी आवाज़ मैं अच्छी तरह पहचानता था। मैंने बिना ज़्यादा सोचे दरवाजे को हल्का सा और धक्का दिया। दरवाजा धीरे से खुल गया।
जैसे ही मैंने उन्हें देखा, मैं एक पल के लिए सांस लेना भूल गया। उस समय वो अपना नया चॉकलेट रंग का ब्रा पहनने की कोशिश कर रही थी। ब्रा अभी पूरी तरह से नहीं पहना था, वो उनके कोहनी के पास अटका हुआ था। उनके स्तन पूरी तरह से खुले हुए थे। मैं उन्हें देख कर बस रुक गया। उनके स्तन साफ और गोल दिख रहे थे, जैसे वो पूरी तरह नेचुरल हों। उनकी स्किन हल्की चमक रही थी, क्योंकि ट्रायल रूम की लाइट सीधे उन पर पड़ रही थी।
उनके स्तन ना बहुत बड़े लग रहे थे ना छोटे, बस सही शेप में थे। जब वो ब्रा को ऊपर खींचने की कोशिश कर रही थी, तब उनके स्तन हल्का-सा हिल रहे थे और साफ दिखाई दे रहे थे। उस समय मैं बस उनके स्तनों को ही देख रहा था, क्योंकि वो पूरी तरह सामने थे और कुछ भी उन्हें छिपा नहीं रहा था।
तभी उन्होंने अपने हाथों से अपने स्तन ढक लिए और कहा, “क्या कर रहे हो गोलू? मैं यहाँ कपड़े बदल रही हूँ।”
मुझे समझ नहीं आया कि वो अपने स्तनों क्यों छुपा रही थी, क्योंकि मैं उनके स्तन पहले भी कई बार देख चुका था, यहाँ तक कि मैंने उन्हें चूसा भी था।
मैंने कहा, “मुझे आपसे बात करनी है सुधा दीदी।”
उन्होंने तुरंत कहा, “लेकिन मैं अभी तुमसे बात नहीं करना चाहती, तुम जाओ यहाँ से।”
मैं चेंजिंग रूम के अंदर गया और दरवाजा लॉक कर दिया। क्योंकि मैं उनसे बात करने के लिए बहुत ज्यादा डेस्परेट था। वो बस वहीं खड़ी होकर मुझे देख रही थी। फिर उन्होंने कहा, “तुम ये क्या कर रहे हो गोलू? जाओ साक्षी को चोद, मुझसे बात मत करो।”
मैंने उनके कोहनी को पकड़ लिया और कहा, “आप ऐसा क्यों बर्ताव कर रही हैं सुधा दीदी?”
उन्होंने तुरंत अपनी कोहनी छुड़ाने की कोशिश की—पहले हल्का झटका दिया, फिर ज़्यादा ज़ोर लगाया। उनका पूरा शरीर उस पकड़ से निकलने के लिए मुड़ा, कंधे पीछे खिंचे, और हाथ बार-बार मेरी पकड़ से छूटने की कोशिश करता रहा। “छोड़ो मुझे…” उन्होंने गुस्से में कहा और और ज़ोर से हाथ खींचा।
जैसे ही उन्होंने अपनी कोहनी छुड़ाने के लिए पूरी ताकत लगाई, उसी पल मैंने उन्हें अपनी तरफ खींचते हुए अपनी बाँहों के बीच कस कर पकड़ लिया। वो तुरंत छूटने के लिए तड़प रही थी—कभी पीछे हट रही थी, कभी अपने कंधे मोड़ रही थी, कभी अपनी कोहनी को घुमा कर निकालने की कोशिश कर रही थी लेकिन मेरी पकड़ ढीली नहीं हुई।
उनका शरीर बार-बार मेरे सीने से टकरा रहा था। जितना वो पीछे हटने की कोशिश कर रही थी, उतना ही मैं उन्हें अपनी तरफ खींच लेता। उनके स्तन सीधे मेरे सीने से टकरा रहे थे। हर बार जब वो खुद को छुड़ाने के लिए झटका दे रही थी, उनके स्तन मेरे सीने पर आकर दब रहे थे। हर झटके के साथ वही हो रहा था—वो छूटने की कोशिश कर रही थी, और उसी कोशिश में उनके स्तन मेरे सीने से दब रहे थे।
उनकी सांसें तेज़ हो रही थी, लेकिन वो फिर भी छूटने की कोशिश कर रही थी और हर कोशिश में उनके स्तन मेरे सीने पर और ज़्यादा दब रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा, “गोलू… तुम ये क्यों कर रहे हो?”
मैंने उनकी बात सुनी ज़रूर, मगर उसे नजरअंदाज कर दिया। मैंने अपने होंठ उनके स्तनों पर रख दिए। जैसे ही मेरे होंठ उनके स्तनों को छू गए, उनका पूरा बदन हल्का सा कांप गया। उसी समय मैंने उन्हें और पास खींच लिया और उनके स्तनों को चूसना शुरू कर दिया—धीरे, लेकिन लगातार।
कभी-कभी मैं हल्का सा काट लेता, फिर अपनी जीभ से उनके स्तनों को छूता रहता। हर बार जब मैं ऐसा करता, उनके अंदर अलग-अलग असर दिखता। कभी हल्का झटका सा, कभी लंबी सांस।
उन्होंने तुरंत मुझे पीछे धकेलने की कोशिश की। उनके हाथ मेरे कंधों पर आ गए थे, और वो मुझे दूर करने की पूरी कोशिश करने लगी। लेकिन मैं नहीं रुका। मैं उसी तरह उनके स्तन चुसता रहा, बिना पीछे हटे। वो लगातार मुझे पिछे धकेलती रही, बार-बार, मगर धीरे-धीरे उनकी ताकत कम होने लगी। पहले जितना जोर था, वो अब वैसा नहीं रहा।
उनकी पकड़ ढीली पड़ने लगी। उनके हाथ अब भी मेरे कंधों पर थे, लेकिन उनमें पहले जैसा जोर नहीं था। उन्होंने एक-दो बार फिर कोशिश की मुझे पीछे करने की, लेकिन अब वो पहले जैसी नहीं थी। धीरे-धीरे उन्होंने मुझे धकेलना कम कर दिया। उनके हाथों की हरकत धीमी होती गई… फिर लगभग रुक गई। उनकी कोशिश कमजोर पड़ चुकी थी।
मैं थोड़ा पीछे हटा और उनकी तरफ देखा। उनकी सांसें तेज़ थी, और वो बस मुझे देख रही थी, बिना कुछ कहे। मैंने धीरे से कहा, “देखो सुधा दीदी… आप मेरे छूने को रोक नहीं पा रहीं, क्योंकि आपको भी मेरी ज़रूरत है… तो अब हम बात कर सकते हैं? मुझे आपसे कुछ कहना है।”
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहां, “ठीक है गोलू, लेकिन अब मेरे निप्पल मत चूसो”
कुछ पल हम दोनों चुप रहे। फिर उन्होंने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े पहनने शुरू किए। वो थोड़ी संभल कर खड़ी हुई, अपने बाल ठीक किए और बिना कुछ बोले दरवाज़े की तरफ बढ़ गई। मैं भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। हम दोनों वापस मॉल के अंदर आ गए। बाहर की भीड़ और रोशनी में सब कुछ फिर से नॉर्मल लग रहा था, लेकिन हमारे बीच अभी भी वो खामोशी बनी हुई थी।
थोड़ा आगे चल कर हमने एक कैफ़े ढूंढा। हम अंदर गए और एक कोने वाली सीट पर बैठ गए। वेटर आया, हमने कुछ ऑर्डर किया, लेकिन असल में हम दोनों का ध्यान कहीं और ही था। वो मेरी तरफ देखती रहीं, जैसे इंतज़ार कर रही हों कि मैं क्या कहूँगा।
मैंने गहरी सांस ली और उनकी तरफ झुक कर कहा, “अब बात करते हैं…”
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा, “ठीक है गोलू, लेकिन पहले बताओ तुम साक्षी दीदी को क्यों चोदना चाहते हो?”
मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उनका हाथ पकड़ लिया, जो टेबल पर रखा हुआ था। उनकी उंगलियाँ हल्की सी काँपी, लेकिन उन्होंने अपना हाथ नहीं हटाया। मैं थोड़ा और पास झुका और धीमी आवाज़ में कहा, “दीदी मैं साक्षी दीदी को चोदना नहीं चाहता, जैसा आपने कहा था कि आप मेरी सगी बहन है और मैं सिर्फ आपको ही चोदना चाहता हूँ।”
इसके बाद मैं सारा कुछ सुधा दीदी को समझाने लगा, जैसे कि साक्षी दीदी अपने ब्रेकअप की वजह से अंदर ही अंदर कितना परेशान थी, और उसके अंदर जिस्मानी जरूरतें भी बनी हुई थी। वो सिर्फ अपनी उन जरूरतों की वजह से अपने एक्स बॉयफ्रेंड के पास वापस जाना चाहती थी ताकि वो उसे जोर से चोद सके, और इसी वजह से मैं उसकी मदद कर रहा था। लेकिन मैं इसमें कामयाब नहीं हो पाया, और सुधा दीदी बस वहीं बैठी रही और मेरी हर बात को ध्यान से सुनती रही।
सुधा दीदी ने मेरी सारी बात ध्यान से सुनी, फिर कुछ पल चुप रही और धीरे से बोली, “तो तुम ये कह रहे हो कि तुम साक्षी दीदी की मदद कर रहे थे उसे चोद कर?”
मैंने धीरे से कहा, “हाँ दीदी, सुनने में अजीब लगता है लेकिन मैं साक्षी दीदी की मदद कर रहा था उसे चोद कर।”
उन्होंने एक लंबी गहरी सांस ली और धीरे से कहा, “गोलू मैं समझती हूँ कि तुम साक्षी की मदद करना चाहते हो। लेकिन तुम्हें हम दोनों में से एक को चुनना होगा। तुम या तो उसे चोदो या मुझे क्योंकि मैं ये मान नहीं सकती कि तुम हम दोनों को एक साथ चोदो।”
हम दोनों चुप-चाप कैफ़े से उठे और बाहर आकर एक कैब ली। पूरे रास्ते हम साथ बैठे रहे, लेकिन हमारे बीच वही भारी खामोशी बनी रही। घर पहुँचने तक सुधा दीदी ने मेरी बात को समझने से जैसे मना ही कर दिया था। मैं उन्हें कभी भी चोट नहीं पहुँचाना चाहता था, लेकिन फिर भी मेरे मन में साक्षी दीदी की मदद करने की बात भी थी, और मुझे खुद समझ नहीं आ रहा था कि मैं ये सब कैसे संभालूँ।
जब हम घर पहुँचे तो मम्मी और पापा पहले से ही लिविंग रूम में बैठे हमारा इंतज़ार कर रहे थे। हमें देखते ही मम्मी की आँखों में आँसू आ गए और वो लगभग रोने लगी। मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो रहा है। तभी पापा ने कहा, “साक्षी अपने घर वापस चली गई है, उसने साफ कह दिया कि वो अब यहाँ नहीं रहना चाहती।”
मुझे उनके शब्दों पर यकीन ही नहीं हुआ, क्योंकि इतना सब होने के बाद साक्षी दीदी मुझे ऐसे कैसे छोड़ सकती थी। मेरे अंदर इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि मैं कुछ पूछ सकूँ। मैं चुप-चाप अपने कमरे में चला गया और बिस्तर पर लेट गया। मेरे दिमाग में बस यही चल रहा था कि आखिर मेरे साथ हो क्या रहा है। कुछ ही मिनट बाद दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई, और फिर सुधा दीदी अंदर आई और मेरे कमरे में आकर खड़ी हो गई।
उन्होंने धीरे से कहा, “साक्षी दीदी ये चिट्ठी तुम्हारे लिए छोड़ गई है,” और वो कागज़ मेरे हाथ में थमा दिया, जिस पर साक्षी दीदी ने अपनी ही लिखावट में कुछ लिखा हुआ था।
मेरे हाथ अपने आप काँप गए। नाम सुनते ही दिल और तेज़ धड़कने लगा। मैंने चिट्ठी खोली… और ज़ोर से पढ़ना शुरू किया—
“गोलू… मुझे नहीं पता ये चिट्ठी पढ़ते वक्त तुम मुझसे कितना नाराज़ होगे… या शायद मुझे समझने की कोशिश करोगे। लेकिन जो भी है, मैं ये सब अपने अंदर रख कर नहीं जा सकती थी। मैं मानती हूँ… जो हुआ, वो गलत था। लेकिन मैं झूठ नहीं बोलूँगी—वो सिर्फ एक गलती नहीं थी। उस पल में जो एहसास थे… वो सच्चे थे। तुम्हारे पास होना, तुम्हारी नज़दीकियाँ… वो सब मुझे अंदर तक छू गए थे।
मैंने खुद को बहुत रोका… बहुत समझाया… लेकिन दिल मान ही नहीं रहा था। और यही बात मुझे सबसे ज़्यादा डरा रही थी। क्योंकि हर बार जब मैं तुम्हारे बारे में सोचती थी… उसी पल सुधा दीदी का चेहरा सामने आ जाता था।
उन्होंने मुझ पर भरोसा किया। मुझे अपने घर का हिस्सा बनाया और मैं उसी भरोसे के बीच खड़ी होकर खुद को खोती जा रही थी।
गोलू, सच ये है कि अगर मैं यहाँ और रुकती, तो शायद खुद को रोक नहीं पाती। मैं फिर वही सब चाहती। वही करीबियाँ, वही एहसास। और ये सोच कर ही मुझे खुद से डर लगने लगा। तुम्हारे साथ बिताया हर पल मेरे अंदर कहीं बस गया है। मैं उसे भूलना नहीं चाहती। लेकिन उसे आगे बढ़ाना भी सही नहीं है।
मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रही। मैं खुद को रोकने के लिए जा रही हूँ। ताकि तुम्हारे और सुधा दीदी के बीच कुछ भी खराब ना हो। हो सके तो मुझे गलत मत समझना। क्योंकि मैं खुद को पहले ही बहुत गलत समझ चुकी हूँ। — साक्षी”
मैंने उसे बार-बार कॉल करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसका नंबर डायल करने पर यही आता था कि उसका फोन स्विच ऑफ था। हर बार कॉल कटने के बाद मैं कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखता रहता था, ये सोच कर कि शायद अचानक कॉल लग जाए, लेकिन कुछ भी नहीं बदला। थोड़ी देर बाद मैंने कॉल करना बंद कर दिया। क्योंकि मुझे समझ आ गया था कि उसका फोन अभी चालू नहीं होने वाला था।
मैं सोचने लगा कि वो कहाँ हो सकती थी। सबसे पहले मेरे दिमाग में यही आया कि शायद वो बस में बैठ चुकी थी और वापस जा रही थी। ये बात सही भी लग रही थी, क्योंकि अगर वो सफर कर रही थी तो उसका फोन बंद या नेटवर्क से बाहर हो सकता था।
मैं अभी भी वहीं उसी जगह बैठा हुआ था। मैं कहीं गया नहीं। मेरा कहीं जाने का मन भी नहीं कर रहा था। मेरा दिमाग पूरी तरह खाली लग रहा था। मैं ठीक से सोच नहीं पा रहा था।
तभी सुधा दीदी धीरे-धीरे मेरे पास आई। उन्होंने बिना कुछ कहे अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उन्होंने शांत आवाज में कहा, “गोलू, उदास मत हो।” मैं उनकी तरफ देखने लगा, वो थोड़ी देर तक मेरे पास ही खड़ी रहीं, फिर बोली, “कल हम उसके पास जाएंगे और उसे वापस लेकर आएंगे।”
मैंने उनकी आँखों में देखा और कहा, “हम ऐसा नहीं कर सकते दीदी, क्योंकि साक्षी दीदी को कोई ऐसा चाहिए जो उसे जोर से चोद सके। मैंने पहले ही कोशिश की थी और मैं फेल हो गया। और मैं आपको दोबारा धोखा भी नहीं दे सकता।”
ये सुन कर वो मेरे पास आकर बैठ गई और बोली, “तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे हो गोलू, क्योंकि इस बार मैं तुम्हें खुद परमिशन दे रही हूँ साक्षी दीदी को चोदने की। और सिर्फ इतना ही नहीं, मैं तुम्हें सिखा भी सकती हूँ कि उसे कैसे जोर से चोदना है ताकि उसे अच्छा लगे।”
मैंने कहा, “सच में दीदी?”
उन्होंने कहा, “ऑफकोर्स गोलू, तुम मेरे सगे भाई हो और मैं तुम्हें खुश करने के लिए कुछ भी करूँगी, इसलिए मैं तुम्हें सिखाऊँगी कि सेक्स कैसे करते हैं।”
मैंने हल्की सी मुस्कान दी। उस वक्त मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात चल रही थी—मैं कितना लकी हूँ कि मुझे सुधा दीदी जैसी बहन मिली, जो मुझे समझती हैं और मेरे लिए इतना सब करने को तैयार हैं। उसी दिन से मुझे लगा कि मेरी असली जर्नी शुरू हो गई है—एक ऐसी जर्नी जहाँ मेरी दीदी मुझे सिखाने वाली थी कि सेक्स कैसे किया जाता है, और अब आगे क्या होने वाला है, यही सोच कर मेरा मन और भी ज़्यादा उलझने लगा।
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