पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-11
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
अगर मैं ईमानदारी से कहूं, तो ये सिचुएशन बिल्कुल भी नॉर्मल नहीं थी। मतलब सोचो… तुम्हें अपनी बड़ी बहन सुधा दीदी पकड़ लें, और वो भी तब जब तुम किसी लड़की के साथ हो। ये कोई छोटी बात नहीं है। ये सच है कि वो लड़की कोई अजनबी नहीं थी… वो साक्षी दीदी थी। लेकिन इससे सिचुएशन आसान नहीं होती, उल्टा और ज़्यादा अजीब हो जाती है। क्योंकि अब ये सिर्फ पकड़े जाने की बात नहीं रही। बल्कि दो ऐसे लोगों के बीच की बात बन गई थी, जिन्हें सुधा दीदी अच्छे से जानती थी।
साक्षी दीदी जल्दी-जल्दी अपने कपड़े ठीक करने लगी। उनका चेहरा बिल्कुल बिगड़ा हुआ लग रहा था। घबराहट साफ दिख रही थी, जैसे उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा हो कि इस हालत को कैसे संभालें। मैंने भी तुरंत अपने कपड़े ठीक किए। फिर हम दोनों धीरे-धीरे बाथरूम से बाहर आए।
सुधा दीदी वहीं खड़ी थी। मैंने हिम्मत जुटाई और उनके पास जाने की कोशिश की… दिल जोर से धड़क रहा था।
“दीदी… सुनो—”
मैंने बस इतना ही कहा था कि उन्होंने तुरंत मेरी बात काट दी। “अपने कमरे में जाओ, गोलू।” फिर उन्होंने साक्षी दीदी की तरफ देखा “और साक्षी… तुम मेरे साथ आओ। इस बारे में सुबह बात करेंगे।”
मैं अपने कमरे में गया और बिस्तर पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा। लेकिन नींद जैसे मुझसे दूर भाग रही थी। आँखें बंद करता तो दिमाग और तेज़ चलने लगता। हर एक बात बार-बार याद आने लगती। रात किसी तरह बीत गई, पर चैन नहीं मिला।
सुबह हुई तो दिल में एक अजीब सी घबराहट थी। सुधा दीदी का सामना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर भी खुद को संभाल कर नीचे चला गया। नीचे जाकर देखा तो साक्षी दीदी किचन में माँ की मदद कर रही थी, जैसे सब कुछ बिल्कुल आम हो। और सुधा दीदी पास वाली टेबल के पास कुर्सी पर बैठी थी, अपने मोबाइल में ध्यान लगाए हुए। मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। कुछ बोलने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मेरी तरफ देखा तक नहीं, जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।
तभी साक्षी दीदी ने हम दोनों के लिए खाना परोसा और फिर अपने लिए भी प्लेट लगा ली। हम तीनों चुप-चाप खाने लगे। पहले जब भी हम साथ बैठ कर खाते थे, तो हँसी-मज़ाक, बातें और छोटी-छोटी चीज़ों पर भी मज़ा आता था। लेकिन आज सब कुछ अलग था। ना कोई बात, ना कोई हँसी। बस चम्मच की हल्की आवाज़ और अजीब सी खामोशी।
खाना खत्म होने के बाद हम सब अपने-अपने कमरे में चले गए। कपड़े बदलने और कॉलेज जाने के लिए तैयार होने। मैं जल्दी से तैयार होकर बाहर आया। लेकिन जैसे ही घर के बाहर नज़र पड़ी, मैं एक पल के लिए रुक गया।
सामने सुधा दीदी और साक्षी दीदी खड़ी थी। दोनों जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रही हों। ये थोड़ा अजीब था, क्योंकि वो दोनों हमेशा बस से कॉलेज जाती थी और मैं अपनी बाइक से।
मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और बोलने की कोशिश की, “क्या हुआ दीदी?” लेकिन अंदर ही अंदर मुझे पहले से पता था कि ये सब किस वजह से हो रहा था। कल रात जो हुआ था, वही अब हमारे बीच खामोशी बन कर खड़ा था।
सुधा दीदी ने आखिरकार मेरी तरफ देखा और शांत लेकिन सख्त आवाज़ में बोली, “मुझे तुम दोनों से बात करनी है, इसलिए आज हम तीनों साथ में ही कॉलेज जाएंगे।”
हम तीनों बाइक के पास आए। पहले सुधा दीदी मेरे पीछे बैठी, फिर उनके पीछे साक्षी दीदी बैठ गई। सीट थोड़ी छोटी थी, इसलिए बैठते ही दूरी अपने आप कम हो गई।
मैंने बाइक स्टार्ट की और हम कॉलेज की तरफ चल पड़े। रास्ते भर हवा चल रही थी, लेकिन मेरे मन में जो चल रहा था, वो उससे कहीं ज्यादा भारी था।
सुधा दीदी मेरे बहुत करीब बैठी थी। जैसे ही बाइक आगे बढ़ी, उनका पूरा शरीर मेरी पीठ से सट गया। उनके स्तनों का दबाव धीरे-धीरे साफ महसूस होने लगा। नरम, भरे हुए और हर छोटे झटके के साथ हल्का सा हिलते हुए मेरी पीठ पर दबते जा रहे थे। कपड़ों के बीच होने के बावजूद उनका आकार और गर्माहट इतनी साफ थी कि ऐसा लग रहा था जैसे हर मूवमेंट सीधे मेरी पीठ पर लिखा जा रहा हो।
जब भी बाइक किसी गड्ढे या स्पीड ब्रेकर से गुजरती, उनका शरीर थोड़ा और आगे खिसकता और उनके स्तन मेरी पीठ पर और मजबूती से दब जाते। एक पल के लिए दबाव बढ़ता। फिर हल्का सा ढीला पड़ता, फिर दोबारा वहीं एहसास। उनकी साँसों की गर्माहट भी कभी-कभी मेरी गर्दन के पास महसूस होती, और इन सब के बीच मैं बस बाइक चलाते हुए सामने देखने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मेरा ध्यान बार-बार उसी एहसास की तरफ खिंच जा रहा था। उनके स्तनों का मेरी पीठ से सटा हुआ रहना, हर झटके के साथ उनका हल्का दबना और फिर वापस अपनी जगह आ जाना, जैसे वो दूरी अब पूरी तरह खत्म हो चुकी हो।
कुछ ही देर में हम कॉलेज के गेट पर पहुँच गए। लेकिन अंदर जाने के बजाय सुधा दीदी ने मुझे इशारे से बाइक मोड़ने को कहा। हम सीधे कॉलेज की कैंटीन की तरफ चले गए। क्लास का समय चल रहा था, इसलिए कैंटीन लगभग खाली थी। कुछ ही लोग दूर बैठे हुए थे, बाकी जगह शांत पड़ी थी। हम तीनों अंदर गए और एक टेबल के पास जाकर कुर्सियों पर बैठ गए।
माहौल पहले से भी ज्यादा भारी लग रहा था, जैसे अब वो बात होने ही वाली थी जिससे हम सुबह से बचते आ रहे थे। कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर अचानक सुधा दीदी ने साक्षी दीदी की तरफ देखा और धीमी लेकिन साफ आवाज़ में कहा, “साक्षी… क्या तुम बता सकती हो कि तुम दोनों कल रात बाथरूम में क्या करने की कोशिश कर रहे थे?”
साक्षी दीदी एक पल के लिए बिल्कुल चुप रह गई। उनकी आँखें झुक गई, जैसे वो नज़र मिलाने की हिम्मत ही नहीं कर पा रही हों। टूटती हुई आवाज़ में उन्होंने कहा, “मैं… मैं सॉरी सुधा दीदी…”
सुधा दीदी का गुस्सा बढ़ गया। उन्होंने तेज़ आवाज़ में कहा, “साक्षी, तुम अपने आप को कैसे समझा रही थी कि ये सब ठीक है? तुम अपने ही भाई के साथ ये सब करने के बारे में सोच भी कैसे सकती हो?”
वो और गुस्से में बोली, “अगर मैं वहाँ नहीं आती तो? क्या तुम सच में उसे सही मान लेती? क्या तुम अपने भाई से चुदना तक मान लेती?”
इतना सुनते ही साक्षी दीदी ने धीरे से मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों से आँसू अब रुक नहीं रहे थे, सीधे गालों पर बहते जा रहे थे। वो कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस मेरी तरफ देख रही थी जैसे सब कुछ कह देना चाहती हों लेकिन शब्द नहीं मिल रहे हों।
मैं बीच में बोल पड़ा, “सुधा दीदी… ये सब मेरी गलती थी। साक्षी दीदी ने मना किया था, लेकिन मैंने ही ज़बरदस्ती की। क्योंकि मैं उसे चोदना चाहता था।”
सुधा दीदी ने मेरा चेहरा देखा। वो अभी भी गुस्से में थी। वो अचानक कुर्सी से खड़ी हो गई और बोली, “ठीक है गोलू… जो करना है करो… तुम्हें साक्षी को चोदना है तो चोद लो। मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता।”
यह कह कर वो तेज़ कदमों से वहाँ से उठी और कैंटीन से बाहर निकल कर सीधे कॉलेज कैंपस की तरफ चलने लगी। उनके चलने में गुस्सा साफ दिख रहा था, जैसे वो एक सेकंड भी वहाँ रुकना नहीं चाहती थी। साक्षी दीदी वहीं कुर्सी पर बैठी रह गई। वो अभी भी रो रही थी, उनके आँसू लगातार गिर रहे थे और वो सिर झुकाए बस चुप बैठी थी। मैं वहीं खड़ा रह गया, समझ नहीं आ रहा था अब क्या करूँ। दिमाग में सिर्फ यही चल रहा था कि सुधा दीदी को कैसे मनाऊँ? कैसे उनसे बात करूँ? क्योंकि अगर अभी कुछ नहीं किया, तो शायद सब कुछ और बिगड़ जाएगा।
तभी साक्षी दीदी ने धीरे से सिर उठाया और मेरी तरफ देखा। उनकी आँखें लाल हो चुकी थी, आँसू अभी भी रुक नहीं रहे थे। उन्होंने टूटी हुई आवाज़ में कहा, “जाओ गोलू… सुधा दीदी के पीछे जाओ। अगर उन्होंने मम्मी-पापा को बता दिया ना, तो सब और खराब हो जाएगा।”
मैंने एक पल भी और नहीं सोचा और तुरंत वहाँ से निकल कर सुधा दीदी के पीछे चल पड़ा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मन कर रहा था कि दौड़ कर उनके पास पहुँच जाऊँ, लेकिन मैंने खुद को रोका। अगर मैं भागते हुए जाता तो सबकी नज़र हम पर पड़ जाती, जैसे कोई फिल्म का सीन चल रहा हो। इसलिए मैं थोड़ी दूरी बना कर उनके पीछे-पीछे चलता रहा। वो बहुत तेज चल रही थी, बिना पीछे देखे। कुछ ही देर में वो कॉलेज बिल्डिंग के अंदर गई और सीढ़ियाँ चढ़ कर तीसरी मंजिल की तरफ बढ़ गई।
मैं भी चुप-चाप उनके पीछे था। उन्हें पता भी नहीं था कि मैं पीछे आ रहा हूँ, क्योंकि वो गुस्से में बस आगे ही देख रही थी। हम दोनों कॉरिडोर में आगे बढ़े, और अचानक वो मुड़ कर लड़कियों के वॉशरूम में चली गई। मैं दरवाज़े के बाहर रुक गया। ऊपर लगा साइन साफ बता रहा था कि ये गर्ल्स वॉशरूम है। मैं एक सेकंड के लिए रुका, दिल और तेज धड़कने लगा। अंदर पूरी तरह सन्नाटा था, शायद इसलिए क्योंकि क्लास चल रही थी और ज़्यादातर स्टूडेंट्स लेक्चर में थे।
मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला और अंदर कदम रखा। ये रिस्की था, लेकिन उस वक्त मेरे दिमाग में सिर्फ सुधा दीदी थी। अंदर पाँच दरवाज़े थे। मैं एक-एक करके दरवाज़े खोलने लगा। पहला खाली… दूसरा भी खाली… जैसे ही मैंने तीसरा दरवाज़ा खोला, सामने सुधा दीदी थी।
उनकी पैंटी घुटनों तक नीचे थी और वो पेशाब कर रही थी। उनका नाजुक हिस्सा साफ दिख रहा था, हल्का सा खुला हुआ, और वहाँ से पेशाब की पतली धारा नीचे गिर रही थी। उनकी जाँघें थोड़ी फैली हुई थी और पूरा सीन इतना अचानक था कि मैं कुछ सेकंड के लिए वहीं जड़ हो गया।
उन्होंने जैसे ही मेरी तरफ देखा, वो एक-दम चौंक गई। उनके चेहरे पर गुस्सा और शर्म दोनों एक साथ आ गए।
उन्होंने तुरंत सख्त आवाज़ में कहा, “तुम यहाँ क्या कर रहे हो, गोलू?”
मैंने एक पल भी कुछ नहीं सोचा और सीधे अंदर उस छोटे से केबिन में घुस गया। जगह इतनी कम थी कि मुश्किल से दो लोग खड़े हो सकते थे। जैसे ही मैं अंदर गया, वो तुरंत टॉयलेट से खड़ी हो गई। उनकी पैंटी अभी भी घुटनों तक ही थी, और हम दोनों एक-दम आमने-सामने खड़े थे। जगह इतनी तंग थी कि हमारे बीच कोई दूरी ही नहीं बची थी। उनकी आँखें अभी भी गुस्से से भरी हुई थी, और मेरा दिल जोर से धड़क रहा था। उस छोटे से केबिन में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ थी और वो खामोशी जो सब कुछ और भारी बना रही थी।
उन्होंने दाँत भींच कर गुस्से में कहा, “तुम यहाँ क्यों आए हो? जाओ… अपनी साक्षी दीदी के पास जाओ… और जो करना है वही करो… मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, “आप ओवरएक्ट क्यों कर रही हो दीदी? आप मेरी सगी बहन हो। फिर भी आपने ही मुझे सिखाया था कि लड़कियों को कैसे चोदते हैं। तो अब मैं साक्षी दीदी को क्यों नहीं चोद सकता?”
उन्होंने काँपती हुई आवाज़ में कहा, “क्योंकि, सिर्फ मैं ही हूँ जिसे तुम्हारे लंड पर बैठने का हक है। साक्षी को नहीं।”
उनकी आवाज़ में दर्द और पागलपन दोनों मिला हुआ था। “मैं तुम्हारी सगी बहन हूँ… और मुझे हक है अपने भाई के साथ ये सब करने का। साक्षी को नहीं। वो तुम्हारी सगी नहीं है।”
मैं कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक बाहर से मेन दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। कुछ लड़कियाँ हँसते-बोलते हुए अंदर आ रही थी। उनकी आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। मैं तुरंत चुप हो गया। दिल और तेज़ धड़कने लगा। हम दोनों उस छोटे से केबिन में एक-दम पास खड़े थे, और बाहर लड़कियों की बातें और हँसी गूंज रही थी। सुधा दीदी भी एक-दम शांत हो गई। वो मेरे बहुत करीब खड़ी थी, लेकिन अब उनका पूरा ध्यान बाहर की आवाज़ों पर था।
कुछ सेकंड तक हम दोनों बिना हिले खड़े रहे। फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “मैं अभी पेशाब कर रही थी। वह पूरी नहीं हुई। ”
मैं समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ। बाहर जाना मुमकिन नहीं था, और अंदर जगह इतनी कम थी कि वो बैठ भी नहीं पा रही थी। हम दोनों बस खड़े थे, एक-दूसरे के बहुत करीब।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “मैं अब कंट्रोल नहीं कर पा रही।”
अगले ही पल उन्होंने खुद को रोकना छोड़ दिया। वो खड़ी-खड़ी ही पेशाब करने लगी। पेशाब की धारा सीधी नीचे गिरने लगी, लेकिन जगह तंग होने की वजह से वो सीधे नीचे नहीं जा पा रही थी। वो उनकी जाँघों से टकरा कर फैलने लगी। पहले एक पतली लाइन की तरह नीचे आई, फिर धीरे-धीरे उनकी टांगों के किनारों से बहने लगी।
उनकी त्वचा पर वो चमक साफ दिख रही थी, जैसे हल्की नमी फैलती जा रही हो। कुछ बूंदें घुटनों की तरफ फिसलती हुई नीचे जा रही थी और कुछ सीधे फर्श पर गिर रही थी। बाहर लड़कियों की हँसी चल रही थी, और अंदर ये सब हो रहा था।
कुछ मिनट ऐसे ही बीत गए। धीरे-धीरे पेशाब की धारा रुक गई। उनकी पैंटी अभी भी घुटनों तक थी, और अब वो गीली हो चुकी थी। कपड़ा त्वचा से चिपक गया था।
उन्होंने हल्का सा नीचे देखा, फिर तुरंत नज़र हटा ली, जैसे वो इस हालत को देखना भी नहीं चाहती हों।
उन्होंने मेरी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मुस्कुराना मत गोलू। अपनी बड़ी बहन को खुद पर पेशाब करते देख कर मज़ाक बनाना, ये कोई भाई नहीं करता।”
मैंने मन ही मन सोचा, मेरे अलावा शायद कोई और भाई नहीं होगा जो अपनी बड़ी बहन को चोदता होगा। तो फिर उसके सामने उसे ऐसे देखना मेरे लिए शायद नॉर्मल ही था। लेकिन मैंने ये बात नहीं बोली। मैं बस चुप रहा।
कुछ मिनट बाद बाहर की लड़कियाँ हँसते-बोलते हुए निकल गई, लेकिन हम दोनों फिर भी वहीं खड़े रहे। हमें पता था कि ब्रेक अभी खत्म नहीं हुआ था, कोई भी कभी भी वापस आ सकता था।
तभी मैंने देखा कि उनके पैर हल्के-हल्के काँप रहे थे। वो दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी, लेकिन लंबे समय तक ऐसे खड़े रहना उनके लिए मुश्किल हो रहा था।
मैंने धीरे से टॉयलेट पर बैठते हुए कहा, “दीदी… यहाँ बैठ जाओ… मेरे जांघों पर…”
वो एक सेकंड के लिए हिचकिचाई। उन्होंने मेरी तरफ देखा, फिर नीचे देखा, जैसे समझ नहीं पा रही हों कि क्या करें।
फिर धीरे से बोली, “ठीक है गोलू…”
वो धीरे-धीरे मेरे ऊपर बैठ गई। जगह बहुत कम थी, इसलिए उनका पूरा वजन हल्का सा मेरे ऊपर आ गया। उनकी पैंटी अभी भी नीचे ही थी, वो उसे ऊपर नहीं कर पाई थी। उनका पूरा वजन मेरे ऊपर आ गया। उनका पिछला हिस्सा मेरे जांघों पर दब गया, जैसे कोई नरम चीज़ धीरे से दबती है। जगह इतनी कम थी कि उनका शरीर पूरी तरह मेरे साथ चिपक गया था।
मैंने धीरे से अपना हाथ उनके पीछे रखा, बस इतना कि उनका वजन संभाल सकूँ। जगह तंग थी, इसलिए उन्हें गिरने से बचाने के लिए मुझे उन्हें थामना पड़ा।
मैंने हल्की आवाज़ में कहा, “तुम्हारी गांड बहुत अच्छी है, सुधा दीदी।”
उन्होंने तुरंत मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में अभी भी गुस्सा था, लेकिन आवाज़ धीमी थी। वो धीरे से बोली, “कुछ मत बोलो। मैं अभी भी तुमसे नाराज़ हूँ।”
हम दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे। समय धीरे-धीरे बीत रहा था। बाहर की आवाज़ें कम होती गई। फिर पूरी तरह शांत हो गई। करीब आधे घंटे बाद माहौल पूरी तरह शांत हो गया। अब ब्रेक खत्म हो चुका था।
मैंने धीरे से कहा, “लगता है अब कोई नहीं है।”
वो बिना कुछ बोले धीरे-धीरे मेरे ऊपर से उठीं। जैसे ही वो खड़ी हुई, उन्होंने जल्दी से अपनी पैंटी ऊपर खींची। कपड़ा अभी भी थोड़ा गीला था, इसलिए उन्हें उसे ठीक करने में थोड़ा वक्त लगा।
उनका चेहरा अब पहले जैसा गुस्से वाला नहीं था। लेकिन सख्त जरूर था। उन्होंने धीमी लेकिन साफ आवाज़ में कहा, “आज के बाद, हम कभी भी एक-दूसरे के इतना करीब नहीं आएँगे।”
मैं चुप रहा।
उन्होंने आगे कहा, “हम बस नॉर्मल भाई-बहन की तरह रहेंगे, जैसे बाकी सब रहते हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी तरफ देखता रहा।
उन्होंने नज़रें हटा ली, फिर दरवाज़ा खोला और बाहर चली गई। बाहर जाते हुए वो अपने कपड़े ठीक कर रही थी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। लेकिन उस छोटे से केबिन में जो हुआ था, वो दोनों के बीच अब हमेशा रहेगा।
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