पिछला भाग पढ़े:- नेहा दीदी और मेरा सिक्रेट अफेयर-9
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
मैं लगातार नेहा दीदी को कॉल करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह मेरा एक भी कॉल नहीं उठा रही थी। मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि आखिर उनके मन में क्या चल रहा था। कुछ ही दिन पहले वही नेहा दीदी थी जो वीडियो कॉल पर अपने स्तन दिखा कर मुझे पागल कर देती थी। उनकी आँखों में मेरे लिए चाहत साफ दिखती थी। लेकिन अब अचानक ऐसा लग रहा था जैसे मैं उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखता। ना वह मेरे कॉल उठाती थी, ना मेरे मैसेज का जवाब देती थी।
होस्टल में रहते हुए उनसे दूर रहना मेरे लिए हर दिन और मुश्किल होता जा रहा था। रात को जब भी मैं अकेला होता, मेरे दिमाग में वही पल घूमने लगते जब मैंने पहली बार उन्हें उस तरह देखा था। उनका चेहरा, उनकी मुस्कान, और वीडियो कॉल पर दिखाए गए उनके स्तन—सब कुछ मेरी आँखों के सामने बार-बार आ जाता।
मैंने तय कर लिया था कि अब मुझे उनसे मिल कर ही समझना होगा कि वह मुझसे दूरी क्यों बना रही थी। लेकिन होस्टल से बाहर निकलना इतना आसान नहीं था। मैंने कई बार वॉर्डन से कहा कि घर में फैमिली इमरजेंसी है और मुझे जाना बहुत ज़रूरी है। लेकिन हर बार वह यही कहते कि जब तक मेरे मम्मी-पापा उनसे बात नहीं करेंगे, वह छुट्टी नहीं देंगे।
मेरी सारी कोशिशें बेकार जा रही थी। मैं हर दिन बेचैनी के साथ नेहा दीदी के बारे में सोचता रहता। मन में बार-बार यही सवाल उठता कि क्या उन्होंने अपना मन बदल लिया है, या फिर कोई ऐसी बात हो गई है जो मुझे नहीं पता।
फिर एक दिन पापा का कॉल आया। उन्होंने बताया कि मेरे कज़िन की सगाई इस रविवार को तय हुई है। यह सुनते ही मेरे अंदर एक उम्मीद जागी। मैंने तुरंत वॉर्डन को बताया कि मुझे घर जाना है। इस बार मेरे पास सही वजह थी। वॉर्डन ने पापा से फोन पर बात की और आखिरकार मेरी छुट्टी मंज़ूर कर दी।
रविवार नज़दीक आते ही मेरी बेचैनी और बढ़ने लगी। मैंने मम्मी से फोन पर पूछा कि घर में कौन-कौन आ चुका है। उन्होंने बताया कि नेहा दीदी पहले ही कज़िन के घर पहुँच चुकी थी। यह सुनते ही मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
अगले दिन मैंने अपना बैग पैक किया और दिल्ली के लिए निकल पड़ा क्योंकि सगाई दिल्ली में होने वाली थी। पूरे सफर के दौरान मेरे दिमाग में सिर्फ नेहा दीदी थी। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि जब मैं उनके सामने जाऊँगा, तो क्या वह पहले की तरह मुस्कुराएँगी… या फिर मेरी तरफ देखना भी पसंद नहीं करेंगी।
शाम तक मैं अपने अंकल के घर पहुँच गया। बाहर से ही घर रोशनी से जगमगा रहा था। अंकल का घर काफी बड़ा था, इसलिए आँगन और कमरों में बहुत सारे लोग आराम से घूम रहे थे। अंदर जाते ही मुझे हँसी-मज़ाक और बातचीत की आवाज़ें सुनाई देने लगी। रिश्तेदारों की भीड़ लगी हुई थी और हर तरफ सगाई की तैयारी का माहौल था।
जैसे ही मैं अंदर गया, मेरे दूसरे कज़िन मुझसे मिलने लगे। कोई हाथ मिला रहा था, कोई गले लग रहा था, कोई होस्टल की बातें पूछ रहा था। मैं सबसे मुस्कुरा कर बात तो कर रहा था, लेकिन मेरी नज़र लगातार सिर्फ एक चेहरे को ढूँढ़ रही थी। मैं नेहा दीदी को देखना चाहता था।
कुछ मिनट बीत गए, लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दी। मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। तभी मेरी नज़र मम्मी पर पड़ी। मैं तुरंत उनके पास गया और धीरे से पूछा, “मम्मी, नेहा दीदी कहाँ हैं?”
मम्मी मुस्कुराई और बोली, “वह ऊपर वाले कमरे में हैं।” फिर उन्होंने मुझे ध्यान से देखा और हल्की मुस्कान के साथ पूछा, “उसने तुम्हें खुशखबरी बताई या नहीं?”
मैं चौंक गया। “कौन सी खुशखबरी?”
मम्मी ने खुशी भरे अंदाज़ में कहा, “वह खुद तुम्हें बताना चाहती है। ऊपर जाओ, उसी से पूछ लो।”
मम्मी की बात सुन कर मेरा दिल और तेज़ धड़कने लगा। ऊपर पहुँच कर मैंने एक-एक करके कमरों के दरवाज़े देखना शुरू किया। कुछ कमरे खाली थे, कुछ में रिश्तेदारों का सामान रखा था। आख़िर में मैंने एक और दरवाज़ा हल्के से धक्का देकर खोला।
दरवाज़ा खुलते ही मेरी साँस जैसे थम गई। कमरे के अंदर नेहा दीदी अकेली थी और शायद कपड़े बदल रही थी। उन्होंने साड़ी कमर के चारों ओर लपेट रखी थी, लेकिन उसका पल्लू उनके कंधे पर नहीं था। वह अपने ब्लाउज़ के हुक बंद करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन जल्द-बाज़ी में उनके हाथ उलझ गए थे।
उनके भरे हुए स्तन ब्लाउज़ के सामने कस कर उभरे हुए थे, और उन्हें बंद करने में उन्हें परेशानी हो रही थी। जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, उनके चेहरे पर एक पल के लिए घबराहट आ गई। उन्होंने तुरंत अपने हाथों से खुद को ढकने की कोशिश की।
लेकिन उसी घबराहट में उनकी साड़ी थोड़ा और नीचे खिसक गई और उनकी सफेद पैंटी की झलक दिख गई। अब वह एक साथ सब कुछ सँभालने की कोशिश कर रही थी—एक हाथ से साड़ी ऊपर खींचना, दूसरे हाथ से ब्लाउज़ संभालना। इस हड़बड़ी में उनके स्तन पूरी तरह सामने आ गए।
मैं कुछ पल के लिए उन्हें देखता ही रह गया। उनके स्तन बड़े, गोल और पूरी तरह भरे हुए थे। उनकी गोरी त्वचा पर हल्की गुलाबी आभा थी, और कमरे की पीली रोशनी में उनका उभार और भी साफ दिखाई दे रहा था। दोनों स्तन इतने भरे हुए थे कि ऐसा लग रहा था जैसे ब्लाउज़ का कपड़ा उन्हें समेट ही नहीं पा रहा हो।
उनके बीच की गहरी रेखा साफ दिख रही थी, और जैसे ही वह घबराहट में हिलती, उनका नरम उभार हल्का-सा थरथरा उठता। उन्हें इस तरह अपने सामने देख कर मेरी साँसें तेज़ हो गई और मैं एक पल के लिए सब कुछ भूल गया।
किसी तरह नेहा दीदी ने खुद को संभाला। उन्होंने जल्दी से दोनों हाथ अपने स्तनों पर रख लिए। उनके हाथों ने बहुत कुछ छिपा लिया था, लेकिन उनके उभरे हुए निप्पल अब भी उनकी उंगलियों के बीच से साफ झलक रहे थे। उनके गाल शर्म से लाल हो चुके थे और उनकी साँसें तेज़ चल रही थी।
कुछ पल तक वह मुझे देखती रही, फिर हल्की झुंझलाहट भरी आवाज़ में बोली, “क्या कर रहे हो गोलू? बिना नॉक किए ऐसे कोई कमरे में आता है क्या?”
मैंने तुरंत नज़रें झुका ली और धीमे से कहा, “सॉरी दीदी… मेरा ऐसा करने का इरादा नहीं था।” मैंने उनकी तरफ देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा, “लेकिन आप अपने बूब्स छिपाने की कोशिश क्यों कर रही हैं? मैं आपको पहले भी कई बार नंगी देख चुका हूँ।”
मेरी बात सुनते ही नेहा दीदी ने आँखें बड़ी कर ली। उन्होंने तुरंत तेज़ आवाज़ में कहा, “अपनी ज़ुबान संभालो, गोलू! मैं तुम्हारी बड़ी बहन हूँ।”
मैं कुछ कह पाता, उससे पहले ही नेहा दीदी मेरे पास आई। उनके चेहरे पर नाराज़गी साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने एक हाथ से अपने कपड़े संभाले और दूसरे हाथ से दरवाज़ा मेरे सामने बंद कर दिया।
मैं कुछ पल तक बंद दरवाज़े को देखता रहा। मुझे समझ आ गया था कि वह मुझसे नाराज़ हैं, लेकिन मैं अब भी यह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर उनकी नाराज़गी की असली वजह क्या थी। कुछ दिन पहले तक वह मुझसे खुल कर बात करती थी, और अब ऐसा लग रहा था जैसे वह मुझसे दूरी बनाना चाहती हों। भारी मन से मैं नीचे आ गया। तब तक सगाई शुरू होने वाली थी। घर के बाहर लगे बड़े तंबू में सभी रिश्तेदार इकट्ठा होने लगे थे। रंग-बिरंगी लाइटों से पूरा माहौल जगमगा रहा था। बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे और बड़े लोग कुर्सियों पर बैठ कर बातें कर रहे थे।
थोड़ी ही देर में दूल्हा और दुल्हन स्टेज पर आए। सबकी नज़रें उनकी तरफ थी। मैंने भी बाकी लोगों के साथ खड़े होकर उन्हें देखा। उसी दौरान नेहा दीदी नीचे आई, लेकिन वह सीधे लेडीज़ के बीच जाकर बैठ गई। वहाँ जाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था, इसलिए मैं दूर से ही उन्हें देखता रहा।
कुछ देर बाद दोनों ने एक-दूसरे को अंगूठी पहनाई। तालियों की आवाज़ से पूरा माहौल गूँज उठा। सभी लोग मुस्कुरा रहे थे और खुशियाँ मना रहे थे। रिंग सेरेमनी खत्म होते ही तेज़ म्यूज़िक बजने लगा। कुछ ही मिनटों में लगभग सभी लोग डांस फ्लोर की तरफ बढ़ने लगे। माहौल अचानक और भी ज़िंदा हो गया। लेकिन मेरी नज़र अब भी बार-बार सिर्फ नेहा दीदी को ही ढूँढ़ रही थी।
करीब आधे घंटे बाद मुझे आखिरकार एक मौका मिल गया। मैंने देखा कि नेहा दीदी मम्मी के साथ खाने की तरफ जा रही थी। उन्हें देखते ही मैं लगभग दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा।
मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, क्या नेहा दीदी खाना बाद में खा सकती हैं? मुझे उनसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
मेरी बात सुन कर नेहा दीदी एक पल के लिए चुप रह गई। मम्मी के सामने वह कुछ नहीं कह सकी। उन्होंने बस मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में हल्की नाराज़गी भी थी और यह बेचैनी भी कि मैं आखिर उनसे क्या कहना चाहता था।
मम्मी ने मुस्कुरा कर कहा, “ठीक है, लेकिन बात खत्म होने के बाद दोनों खाना ज़रूर खा लेना।”
इतना कह कर मम्मी आगे बढ़ गई। अब मैं और नेहा दीदी आमने-सामने खड़े थे। नेहा दीदी ने अपने दोनों हाथ सीने के सामने बाँध रखे थे, जैसे अब भी मुझसे थोड़ी दूरी बनाए रखना चाहती हों। उनकी आँखें सीधे मेरी आँखों में थी, लेकिन चेहरे पर अब भी वही सख्ती थी जो ऊपर कमरे में थी।
उन्होंने नीले रंग की साड़ी पहन रखी थी, जिसके किनारों पर सुनहरे बॉर्डर की चमक रोशनी में बहुत खूबसूरत लग रही थी। उसी रंग का उनका फिट ब्लाउज़ उनके बदन पर बिल्कुल सटा हुआ था। कपड़े के ऊपर से उनके स्तनों का पूरा आकार साफ दिखाई दे रहा था। हर साँस के साथ ब्लाउज़ का कपड़ा हल्का-सा तन जाता, और मेरी नज़रें बार-बार वहीं ठहर जाती।
लेकिन उस समय सबसे ज़्यादा मेरा ध्यान उनकी पतली कमर पर गया। साड़ी उनकी कमर से इतनी सलीके से बंधी थी कि उनका हर घुमाव साफ उभर रहा था। उनकी नाभि साड़ी की सिलवटों के बीच साफ दिखाई दे रही थी। छोटी, गहरी और बेहद मनमोहक। जब वह हल्का-सा साँस लेती, तो उनके पेट की नरम त्वचा के साथ उनकी नाभि भी जैसे नाच उठती।
मैं कुछ पल तक उन्हें देखता रहा, फिर अपने मन में उठ रहे सवाल को रोक नहीं पाया। मैंने धीमी लेकिन भरी हुई आवाज़ में कहा, “आप मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हैं, नेहा दीदी? बस मुझे सच बता दीजिए।”
मेरी बात सुन कर नेहा दीदी ने कुछ पलों तक मेरी आँखों में देखा। उनके चेहरे की सख्ती थोड़ी नरम पड़ गई। उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “एक घंटे बाद बेसमेंट में मिलो। वहाँ मैं तुमसे आराम से बात करूँगी।”
इतना कह कर उन्होंने बिना कुछ और बोले मेरी तरफ से नज़रें हटा ली और मम्मी के पास जाकर खाने की तरफ बढ़ गई। मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे मन में कई सवाल थे, लेकिन अब कम से कम इतना तय था कि एक घंटे बाद मुझे अपने सारे सवालों के जवाब मिलने वाले थे।
उनके जाने के बाद मैंने खुद को आम दिखाने की कोशिश की। मैं अपने कुछ कज़िन्स के पास जाकर खड़ा हो गया, जो डांस फ्लोर के पास ज़ोर-ज़ोर से मस्ती कर रहे थे। मैं अब भी बेसमेंट में होने वाली हमारी मुलाकात के बारे में सोच रहा था। तभी मेरे एक कज़िन ने मुझे देखा और हँसते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया। “चल, तू भी डांस कर!” उसने बिना मेरी बात सुने मुझे अपने साथ खींच लिया।
मैं भी उनके साथ डांस करने लगा, लेकिन मेरा ध्यान वहाँ बिल्कुल नहीं था। हर कुछ मिनट बाद मेरी नज़र अपनी कलाई घड़ी पर चली जाती। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे समय जानबूझकर बहुत धीरे चल रहा हो। बाहर से मैं मुस्कुरा रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही थी।
आखिरकार पूरा एक घंटा बीत गया। मैंने बहाना बना कर डांस फ्लोर छोड़ दिया और धीरे-धीरे घर के अंदर की तरफ बढ़ा। बेसमेंट का दरवाज़ा घर के सबसे आख़िरी कोने में था। वहाँ रोशनी बहुत कम थी और आम तौर पर कोई भी उस तरफ नहीं जाता था।
मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया। बेसमेंट काफी पुराना और धूल भरा था। इधर-उधर पुराने डिब्बे, टूटे सामान और पार्टी के बचे हुए कुछ सामान पड़े थे। फर्श पर भी कई चीज़ें बिखरी हुई थी, इसलिए मुझे बहुत संभल कर कदम रखना पड़ रहा था।
मैं कमरे के बीच में जाकर रुक गया। ऊपर से आती म्यूज़िक की धीमी आवाज़ अब बहुत दूर से सुनाई दे रही थी। वहाँ हल्का अँधेरा था और हवा में एक अजीब-सी खामोशी फैली हुई थी। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। मैं बस नेहा दीदी का इंतज़ार कर रहा था।
करीब पाँच मिनट बाद दरवाज़ा धीरे से खुला। नेहा दीदी अंदर आई और दरवाज़ा बंद कर दिया। शायद वह जल्दी-जल्दी नीचे आई थी, क्योंकि उनके चेहरे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें चमक रही थी। कुछ बूँदें उनकी गर्दन से उतरती हुई कमर तक आ गई थी। उनकी नाभि के आस-पास भी पसीने की हल्की नमी चमक रही थी, जो मंद रोशनी में उनके बदन को और भी खुबसूरत बना रही थी।
उन्होंने धीमे से कहा, “गोलू…” लेकिन वह अपनी बात पूरी कर पाती, उससे पहले ही मैंने उन्हें हल्के से दीवार की तरफ धकेल दिया। उनकी पीठ दीवार से लग गई। मैंने तुरंत उनके दोनों हाथ ऊपर उठा कर दीवार से सटा दिए और अपनी पकड़ में ले लिया।
नेहा दीदी ने एक पल के लिए खुद को छुड़ाने की कोशिश की। उनकी साँसें तेज़ हो गई और उनके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन उस समय मेरे अंदर इतने दिनों की बेचैनी, गुस्सा और चाहत एक साथ उमड़ रही थी।
मैंने बिना कुछ कहे अपने होंठ उनके होंठों पर रख दिए। शुरुआत में उन्होंने चेहरा मोड़ने और अपने होंठ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मैंने उन्हें मजबूती से चूमना जारी रखा। उनकी गुलाब की खुशबू वाली लिपस्टिक का स्वाद धीरे-धीरे मेरे मुँह में घुलने लगा।
कुछ पलों तक उनकी साँसें बहुत तेज़ चलती रही। फिर उनका छटपटाना धीरे-धीरे कम हो गया। उनके होंठ नरम पड़ गए और हमारे होंठ और गहराई से मिलने लगे। हमारी साँसें एक-दूसरे में घुलने लगीं, और बेसमेंट की खामोशी में सिर्फ हमारी तेज़ धड़कनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
जब मुझे लगा कि अब वह पहले की तरह खुद को छुड़ाने की कोशिश नहीं कर रहीं, तो मैंने धीरे से उनके कंधे से साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। इसके बाद मेरी उँगलियाँ उनकी पीठ तक पहुँची और मैंने उनके ब्लाउज़ के हुक एक-एक करके खोल दिए। ब्लाउज़ ढीला पड़ते ही मैंने उनके अंदर पहनी ब्रा का हुक भी खोल दिया। अगले ही पल उनके भरे हुए स्तन आज़ाद होकर मेरे सामने उभर आए।
उनकी गर्दन और कंधों पर पसीने की हल्की नमी चमक रही थी। मैंने झुक कर उनके स्तनों को अपने मुँह में भर लिया। उनके गर्म बदन और पसीने की हल्की नमकीन खुशबू ने मुझे और भी बेचैन कर दिया। उन्होंने आँखें बंद कर ली। उनके स्तन हर तेज़ साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, और उनकी साँसों की गर्माहट मेरे चेहरे से टकरा रही थी।
मैं कभी एक स्तन को अपने होंठों के बीच लेकर धीरे-धीरे चूसता, फिर दूसरे स्तन की तरफ बढ़ जाता। उनकी नरम त्वचा और गर्माहट मेरे मुँह में घुलती जा रही थी। जैसे-जैसे मैं उन्हें चूसता, उनके शरीर से हल्की-हल्की सिहरन उठती और उनकी साँसें और गहरी होती जाती।
मेरी जीभ उनके उभरे हुए निप्पल के चारों तरफ घूम रही थी। हर बार जब मैं उन्हें अपने होंठों के बीच लेकर धीरे से चूसता, उनकी उँगलियाँ मेरी कमर को और कसकर पकड़ लेती। उनके होंठों से दबे-दबे स्वर निकल रहे थे, और उनका सीना मेरी हर हरकत के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैंने बारी-बारी से दोनों स्तनों को लंबे समय तक चूसा। उनके पसीने की हल्की नमकीन परत और उनकी त्वचा की गर्माहट मेरे मुँह में साफ महसूस हो रही थी। उस पल ऐसा लग रहा था जैसे मैं इतने दिनों की सारी तड़प को एक-एक स्पर्श में जी रहा हूँ।
कुछ देर बाद मैं धीरे-धीरे नीचे झुकने लगा। मेरी नज़र उनकी पतली कमर पर ठहर गई, जहाँ पसीने की कुछ छोटी-छोटी बूँदें उनकी नाभि के आस-पास चमक रही थी। मैंने अपनी जीभ से उनकी नाभि के किनारों को हल्के-हल्के छुआ। जैसे ही मेरी जीभ उनकी गहरी नाभि के भीतर पहुँची, उनके शरीर में एक तेज़ सिहरन दौड़ गई।
उन्होंने दीवार से सिर टिका कर लंबी साँस ली, और उनकी उँगलियाँ मेरे बालों में उलझ गई। मैं धीरे-धीरे उनकी नाभि के साथ खेलता रहा, और हर स्पर्श के साथ उनकी साँसें और भारी होती चली गई।
मेरा लंड अब पैंट के अंदर इतना सख्त हो चुका था कि उसे संभालना मुश्किल हो रहा था। मैं जानता था कि उस हालत में कोई जल्द-बाज़ी करना ठीक नहीं होगा। ऊपर घर में इतने लोग थे। इसलिए मैंने गहरी साँस ली, फिर धीरे से अपनी पैंट की चेन खोली। कुछ ही पल बाद मैंने अपना लंड बाहर निकाल लिया। नेहा दीदी चुप-चाप मेरे सामने खड़ी रही। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपनी पतली कमर दीवार से टिकाए मुझे देखती रही, जैसे वह मेरे अंदर उठ रही बेचैनी को पूरी तरह समझ रही हों।
मैंने धीरे से नेहा दीदी का हाथ अपने हाथों में लिया और उसे अपने लंड के पास ले गया। उनकी आँखें मेरी आँखों से मिली। मैंने धीमी लेकिन काँपती हुई आवाज़ में कहा, “मेरा लंड हिला दो, दीदी।”
बिना कुछ कहे उन्होंने मेरा लंड अपनी उँगलियों के बीच पकड़ लिया और अपना हाथ बहुत तेजी से आगे-पीछे चलाने लगी। जैसे ही उनकी उँगलियाँ मेरे लंड पर कस कर बंद हुई, मेरे पूरे शरीर में एक तेज़ झटका सा दौड़ गया। उनकी हथेली की गर्माहट और उँगलियों की मजबूत पकड़ मुझे साफ महसूस हो रही थी। हर बार जब उनका हाथ पीछे जाता, मुझे लगता जैसे मेरे शरीर की सारी बेचैनी उसी पकड़ में सिमट गई हो। जब उनका हाथ आगे आता, तो मेरे मुँह से दबे हुए कराह अपने आप निकलने लगते।
मेरा लंड उनकी पतली कमर के ठीक सामने हिल रहा था। उनकी साड़ी कमर पर कसकर बंधी हुई थी और मेरी नज़र बार-बार उनकी नंगी कमर पर टिक जाती। उनकी उँगलियों की गर्माहट और तेज़ हरकत से मेरे पूरे शरीर में सनसनी दौड़ गई। मैं बस उनकी कमर को देखता रहा और महसूस करता रहा कि मेरा लंड हर सेकंड और ज्यादा सख्त होता जा रहा है।
कुछ ही मिनटों बाद मेरे शरीर में तनाव तेजी से बढ़ने लगा। मेरी साँसें तेज हो गई और मुझे समझ आ गया कि अब मैं खुद को ज्यादा देर तक रोक नहीं पाऊँगा। अगले ही पल मेरा सफेद पानी बाहर निकलने लगा।
पहली गर्म बूंद सीधा उनकी पतली कमर पर गिरी। वह बूंद उनकी मुलायम त्वचा पर मोती की तरह चमकने लगी। उसके तुरंत बाद लगातार कई धारें निकलने लगी और देखते ही देखते उनकी पूरी कमर सफेद पानी से ढक गई। कुछ बूंदें उनकी नाभि के पास तक पहुँची, जबकि बाकी धीरे-धीरे नीचे बहने लगी।
सफेद पानी उनकी कमर से फिसलता हुआ उनकी साड़ी के ऊपर गिरने लगा, जहाँ साड़ी उनके कमर के पास कसकर बंधी थी। कपड़े पर पड़ते ही वह हिस्सा हल्का गीला और चमकदार दिखने लगा। उन्होंने चुप-चाप उसे अपनी त्वचा पर बहने दिया और मेरी तरफ वैसे ही देखती रही। कुछ पल तक हम दोनों वैसे ही खड़े रहे। फिर नेहा दीदी ने मेरी तरफ देख कर पूछा, “हो गया?”
मैंने गहरी साँस लेते हुए सिर हिलाया और कहा, “हाँ, नेहा दीदी।” मैंने धीरे से अपना लंड वापस पैंट के अंदर रखा और अपनी पैंट की चेन बंद कर ली। उधर नेहा दीदी ने भी अपने हाथों से ब्रा ठीक की, फिर ब्लाउज पहन लिया। कुछ ही पलों में उन्होंने खुद को पहले की तरह संभाल लिया।
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए हल्की आवाज़ में कहा, “अब जानना चाहते हो कि मैं तुम्हारे फोन क्यों नहीं उठा रही थी?”
मैंने बिना देर किए कहा, “हाँ, दीदी। और माँ ने भी बताया था कि आप मुझे कोई अच्छी खबर बताना चाहती थी।”
मेरी बात सुन कर नेहा दीदी ने मेरी तरफ देखा और शांत आवाज में बोली, “अच्छी खबर यह है कि माँ-पापा ने मेरे लिए एक लड़का देख लिया है। अब मेरी शादी की बात चल रही है।”
उनके शब्द सुनते ही मैं वहीं का वहीं खड़ा रह गया। कुछ सेकंड तक मुझे समझ ही नहीं आया कि उन्होंने अभी क्या कहा है।
नेहा दीदी ने पास पड़ी एक गंदी कपड़े की चुन्नी उठाई और अपनी साड़ी पर फैले सफेद पानी को धीरे-धीरे साफ करने लगी। उन्होंने कमर के पास भी कपड़ा फेर कर साड़ी को जितना हो सके ठीक किया। फिर बिना कुछ और कहे उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डाली, मुड़ी और बेसमेंट से बाहर चली गई। मैं वहीं खड़ा उन्हें जाते हुए देखता रह गया।