पिछला भाग पढ़े:- दीदी ने सिखाया मुझे सेक्स करना-9
भाई-बहन सेक्स कहानी अब आगे-
उस रात मैं बस साक्षी दीदी का इंतज़ार कर रहा था। मुझे पता था वो आएँगी, जैसे पहले भी सब के सो जाने के बाद चुप-चाप मेरे कमरे तक आती थी। फोन की घड़ी की हर मिनट की टिक मुझे और बेचैन कर रही थी। मैं बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नज़र बार-बार दरवाज़े पर ही जा रही थी। बाहर से आने वाली हर छोटी आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहा था।
करीब दो बजे हल्की सी दस्तक सुनाई दी। दिल एक-दम तेज़ धड़कने लगा। कुछ सेकंड तक मैं वैसे ही खड़ा रहा, खुद को यकीन दिलाने के लिए कि सच में वही हैं, कोई वहम नहीं। फिर दोबारा दस्तक हुई, इस बार थोड़ी जल्दी में।
मैं धीरे से उठा और दरवाज़ा खोला। वो सामने खड़ी थी। उन्होंने हल्की सी ढीली टी-शर्ट पहनी हुई थी, लेकिन कपड़े के अंदर स्तनों की गोलाई साफ उभर रही थी। हर सांस के साथ उनका हल्का सा उठना गिरना दिखाई दे रहा था और मेरी नज़र वहीं अटक जा रही थी। उनके बाल थोड़ा बिखरे हुए थे। आँखों में नींद और चेहरे पर वही जाना-पहचाना भाव। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस मुझे देखते हुए अंदर आ गई और मैं जल्दी से दरवाज़ा बंद कर दिया।
कमरे में सिर्फ खिड़की से आती हल्की रोशनी थी। उस रोशनी में कपड़ा और पतला लग रहा था, और स्तनों का आकार और साफ दिख रहा था। वो एक पल के लिए मेरे बिल्कुल पास खड़ी रहीं। इतनी पास कि उनकी गर्म सांस मुझे महसूस हो रही थी। उनका ऊपरी हिस्सा हल्का सा आगे था, जैसे वो जानती हों मेरी नज़र कहाँ जा रही है। मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि मुझे खुद सुनाई दे रहा था।
कुछ पल हम दोनों बस चुप खड़े रहे। वहीं पुरानी सी खामोशी, लेकिन उसमें एक अजीब सा खिंचाव था जिसे हम दोनों समझते थे। मुझे साफ महसूस हो रहा था कि वो क्यों आई हैं, और मैं क्यों उनका इंतज़ार कर रहा था।
वो धीरे से आगे बढ़ कर बिस्तर के किनारे बैठ गई। बैठते ही उनका ऊपरी हिस्सा थोड़ा आगे झुक गया और कपड़े के अंदर स्तनों की गोलाई और साफ उभर आई। उसी के साथ नीचे की तरफ कपड़ा जांघों के बीच हल्का सा खिंच गया। मेरी नज़र एक पल के लिए वहाँ जाकर रुक गई, फिर मैंने खुद को संभालते हुए वापस उनके चेहरे की तरफ देखा।
वो चुप थी, लेकिन उन्होंने अपना बैठने का तरीका थोड़ा बदला, जैसे उन्हें पता हो कि मैं कहाँ देख रहा था। इससे कपड़े की लाइन और साफ दिखने लगी। मेरे हाथ अपने आप रुक गए थे, दिल की धड़कन तेज हो रही थी और कमरे की खामोशी और भारी लगने लगी।
मैं अभी भी खड़ा था, उन्हें देखता हुआ, जैसे नज़र हट ही नहीं रही थी। उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए धीमे से कहा, “गोलू… जितना कहते हो, उतना कर पाओगे ना?”
उनकी ये बात सुन कर मेरे अंदर जैसे अचानक हिम्मत आ गई। मैं उनके थोड़ा और पास गया, दिल जोर से धड़क रहा था। मैंने भी उनकी आँखों में देखते हुए धीमे लेकिन साफ शब्दों में कहा,
“साक्षी दीदी… मैं पूरी कोशिश करूँगा… जितना आप सोच रही हो, उससे भी ज्यादा…”
मेरी बात सुन कर वो मुस्कुरा दीं। उस मुस्कान में एक भरोसा था, जैसे वो मेरे शब्दों को परख रही हों। फिर उन्होंने बिना जल्द-बाज़ी के अपना हाथ अपनी टी-शर्ट के किनारे पर रखा। उनकी उँगलियाँ कपड़े को हल्के-हल्के पकड़ रही थी, जैसे हर पल को महसूस करना चाहती हों।
उन्होंने धीरे-धीरे टी-शर्ट को ऊपर उठाना शुरू किया। पहले कमर दिखी, फिर पेट, फिर छाती का ऊपरी हिस्सा। हर इंच के साथ मेरी सांस रुकती जा रही थी। उन्होंने जल्द-बाज़ी नहीं की, बस धीरे-धीरे कपड़ा ऊपर ले जाती रही, जब तक वो पूरी तरह सिर के ऊपर से निकल नहीं गया।
अब वो मेरे सामने खड़ी थी, गुलाबी रंग की ब्रा पहने हुए। वही रंग उनकी त्वचा पर और उभर कर दिख रहा था। ब्रा के कपड़े के नीचे उनकी गोलाई साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा, जैसे जान-बूझ कर मुझे देखने का समय दे रही हों।
फिर उन्होंने अपने कंधों से ब्रा की स्ट्रैप्स को धीरे-धीरे नीचे सरकाया। हर हरकत बहुत धीमी थी, जैसे वो खुद भी उस पल को लंबा करना चाहती हो। स्ट्रैप्स बाजुओं तक आई, फिर उन्होंने सामने से हुक खोला। कपड़ा ढीला पड़ गया। उन्होंने उसे पकड़ कर नीचे की तरफ सरकाया और अलग रख दिया।
अब वो बिना किसी कपड़े के ऊपर खड़ी थी। उनकी साँसें थोड़ी तेज़ थी और मेरी नज़र हट नहीं रही थी। उन्होंने अपनी बाहें हल्के से सीने के पास लाई, फिर वापस नीचे कर दीं, जैसे झिझक और हिम्मत के बीच खड़ी हों।
फिर उन्होंने अपनी नज़रें नीचे झुकाई और धीरे से अपनी पैंटी की इलास्टिक पकड़ ली। वही गुलाबी रंग, जो उनकी त्वचा पर और उभर रहा था। उन्होंने उसे भी धीरे-धीरे नीचे सरकाना शुरू किया। पहले कमर से नीचे, फिर जांघों तक। हर पल में एक खामोशी थी जो बहुत कुछ कह रही थी।
उन्होंने पैंटी को पैरों से अलग किया और एक तरफ रख दिया। अब वो पूरी तरह नंगी मेरे सामने खड़ी थी। कमरे की हल्की रोशनी उनके शरीर की हर रेखा को नरम तरीके से दिखा रही थी।
मैंने पहली बार उन्हें पूरी तरह देखा तो मेरी सांस अटक गई। नज़र खुद ब खुद ऊपर से नीचे फिसलती चली गई, लेकिन किसी एक जगह ठहर नहीं पा रही थी। फिर भी बार-बार मेरी आँखें उनके स्तनों पर आकर रुक जाती थी। हर सांस के साथ उनका हल्का सा उठना गिरना कमरे की खामोशी में साफ दिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उनकी सांसें भी मेरी तरह बेकाबू हो गई हों।
उन्होंने मेरी नज़र पकड़ ली। एक पल के लिए वो हल्का सा मुस्कुराई, फिर झिझक कर अपने कंधे थोड़े आगे कर लिए, जैसे खुद को ढकना चाहती हों… लेकिन हाथों को ऊपर नहीं लाई। उस झिझक में ही एक इजाज़त छुपी थी।
मेरी नज़र नीचे सरकी। उनकी कमर की हल्की सी मोड़, पेट का नरम उठाव, और फिर जांघों के पास आती हुई रेखा… वहां आकर मेरी सांस और तेज़ हो गई। उनके पैरों के बीच की दूरी बहुत कम थी, जैसे वो खुद भी उस नज़र को महसूस कर रही हो। उन्होंने अनजाने में अपनी जांघें थोड़ी और पास कर ली, फिर दोबारा ढीली छोड़ दी। उस छोटे से हिलने में जितना कह दिया गया, उतना शायद शब्दों में नहीं कहा जा सकता था।
कमरे की हल्की रोशनी उनके नाजुक हिस्से तक सीधी नहीं पहुँच रही थी। लेकिन उतनी जरूर थी कि उसकी परछाई और उसकी मौजूदगी महसूस हो सके। मैं देख नहीं रहा था, बल्कि महसूस कर रहा था कि मेरी नज़र वहीं अटक गई है। गला सूख गया था, और मुझे खुद समझ नहीं आ रहा था कि हाथ आगे बढ़ाऊँ या बस यूँ ही खड़ा रहूँ।
कुछ पल बाद उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,”अब… गोलू… अपने कपड़े उतार दो… मैं… मैं और इंतज़ार नहीं कर सकती…
उनकी आवाज़ सुन कर मेरा गला सूख गया। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि खुद सुनाई दे रहा था।
मैंने बिना कुछ बोले अपने कपड़ों को पकड़ा और धीरे-धीरे उतारना शुरू किया। हर हरकत में झिझक थी। पहली बार मैं उनके सामने इस तरह खड़ा था, और मुझे महसूस हो रहा था कि उनकी नजरें मुझ पर ही टिकी हैं। कपड़े हाथ से छूट कर नीचे फर्श पर गिर गए।
मैंने सिर उठाकर उनकी तरफ देखा — वो मुझे ही देख रही थी। उनकी आँखों में हल्की हैरानी थी, जैसे पहली बार मुझे इस तरह देख रही हों। उस नज़र से मेरे अंदर शर्म की एक लहर उठी और मैंने नजरें झुका ली।
कुछ सेकंड तक कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ थी। मुझे लग रहा था जैसे मैं वहीं खड़ा खड़ा और भी छोटा होता जा रहा हूँ, लेकिन फिर उनकी आवाज़ आई, “पास आओ… गोलू…”
मैं धीरे-धीरे उनके करीब गया। हर कदम के साथ दिल की धड़कन और तेज़ होती जा रही थी। अब मैं उनके बिल्कुल सामने था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने पास बैठा लिया।
फिर वो धीरे से पीछे की तरफ लेट गई। उनके बाल तकिये पर फैल गए। हल्की रोशनी में उनके स्तन ऐसे लग रहे थे जैसे पानी की मुलायम लहरें हर सांस के साथ ऊपर नीचे होते हुए। मैं कुछ पल बस उन्हें देखता ही रह गया। उन्होंने अपनी नज़रें मुझ पर टिकाए रखी, फिर बिना कुछ कहे थोड़ा सा करवट बदल कर अपने पैरों को ढीला छोड़ दिया।
मैंने धीमी आवाज़ में कहा, “साक्षी दीदी… शायद… हमें पहले… किस्स करना चाहिए…”
उन्होंने तुरंत अपना सिर हल्का सा ना में हिलाया। उनके होंठों पर एक छोटी सी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में सीधी नज़र। “नहीं…” उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “हमें किस्स की जरूरत नहीं है…”
उन्होंने अपनी उंगलियों अपने नाजुक हिस्से पर रख कर उसको सहलाना शुरू कर दिया, मानो वह अपनी चूत को मेरे लंड के लिए तैयार कर रही हो। मैं खुद को और रोक ना सका और उनके उपर झुक गया। मैं झिझकते हुए उनके ऊपर झुका ही था कि अचानक उन्होंने अपने दोनों पैरों को उठा कर मेरी कमर के चारों तरफ लपेट लिया।
उनकी इस हरकत से मैं एक-दम चौंक गया। उन्होंने मुझे अपने करीब खींच लिया, इतना करीब कि अब हमारे बीच कोई दूरी नहीं बची थी। उनकी साँसें तेज़ थी और उनका चेहरा मेरे कंधे के पास आकर रुक गया। उनके पैरों की पकड़ में एक अजीब सी मजबूती थी, जैसे वो मुझे जाने ही नहीं देना चाहती हों। मैंने आगे बढ़ कर अपने लंड की नोक उनके नाज़ुक हिस्से के उपर रख दी और धीरे-धीरे आगे बढ़ा। मेरा लंड हौले से उनके अंदर बढ़ता रहा। उनके होंठों से एक धीमी सी सिसकारी निकली और उन्होंने मेरी बाहों को कस कर पकड़ लिया। उनका चेहरा मेरे कंधे में छुप गया और उनकी साँसें तेज़ हो गई।
मैंने हल्के से खुद को रोका, और उनकी तरफ देखते हुए धीरे से पूछा, “आप ठीक हो… साक्षी दीदी?”
उन्होंने अपनी आँखें खोल कर मेरी तरफ देखा। कुछ सेकंड तक वो कुछ बोली नहीं, बस मेरी तरफ देखती रहीं जैसे मेरे चेहरे से ही कुछ पढ़ रही हों। फिर बहुत हल्की सी मुस्कान आई और उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “नहीं गोलू… मैं अब ठीक हूँ… तुम मत रुको…”
उनके ये शब्द सुन कर मेरे अंदर की सारी झिझक जैसे टूट गई। मैं फिर से उनके करीब झुक गया। अब हमारे बीच सिर्फ साँसों की गर्माहट और धड़कनों की आवाज़ थी। मैंने अपना सख्त लंड उनके गिले नाज़ुक हिस्से के अंदर धकेलना चाहा, लेकिन मैं पूरी तरह उनके अंदर जा नहीं पा रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जो लड़की इतनी बार सेक्स कर चुकी हो, उसकी चूत का होल इतना छोटा कैसे हो सकता था?
मैं थोड़ा सा रुक गया। शायद जल्दी करने की वजह से सब कुछ ठीक से नहीं हो पा रहा था। मैंने अपनी साँसों को संभालने की कोशिश की और धीरे-धीरे अपने आपको शांत किया।
उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरा, जैसे मुझे जल्द-बाज़ी ना करने का इशारा दे रही हों। उनकी पकड़ अब पहले से नरम थी, और उनकी साँसें भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी।
“धीरे…” उन्होंने बहुत हल्की आवाज़ में कहा, जो मुश्किल से सुनाई दे रही थी, लेकिन उसमें एक साफ एहसास था।
मैंने सिर हिलाया और इस बार खुद को थोड़ा संभाल कर आगे बढ़ने की कोशिश की, जैसे अब सिर्फ उस पल को महसूस करना ज़्यादा जरूरी था, ना कि उसे जल्दी पूरा करना।
इस बार मैंने हौले से अपने लंड का सिर साक्षी दीदी की चूत के उपर रखा और उसे अंदर धकेला। उनके अंदर कि कसावट मुझे लंड के चारों तरफ महसूस होने लगी लेकिन मैंने खुद को रोका नहीं। जैसे ही मैंने एक जोरदार धक्का दिया मेरा पूरा लंड उनके अंदर चला गया। साक्षी दीदी दर्द से तिलमिला उठी, लेकिन उन्होंने मुझे रूकने को कहा नहीं।
उनकी उंगलियाँ अचानक मेरी पीठ में धँस गई, और उनकी साँसें एक-दम से तेज़ हो गई। उनके होंठों से टूटी-फूटी सी आवाज़ें निकल रही थी, दर्द और एक अजीब से सुकून का मिला-जुला एहसास।
मैं कुछ पल वहीं रुक गया, जैसे उस एहसास को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। उनके शरीर की गर्माहट और कसावट मुझे साफ महसूस हो रही थी। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पकड़ ढीली की, लेकिन मुझे छोड़ा नहीं, जैसे वो चाहती हों कि मैं वहीं रहूँ।
उन्होंने अपना चेहरा थोड़ा ऊपर उठाया, उनकी आँखें आधी बंद थी और साँसें अभी भी भारी थी। बिना कुछ बोले उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया, एक इशारा कि अब मैं रुकूँ नहीं।
मैंने धीरे-धीरे खुद को हिलाना शुरू किया, बहुत संभल कर, ताकि उन्हें ज्यादा तकलीफ ना हो। हर हल्की हरकत पर उनके होंठों से नई सिसकारी निकलती, और उनका शरीर धीरे-धीरे उसी रफ्तार में ढलता चला गया।
मैंने धीरे से उनके कान के पास झुक कर कहा, “दीदी… तुम बहुत टाइट हो…”
उन्होंने मेरी पीठ को कस कर पकड़ लिया, जैसे वो कुछ कहना चाहती हों, लेकिन उनकी आवाज़ साँसों में ही उलझ कर रह गई।
“रुको मत… गोलू…” उन्होंने धीमे से कहा, शब्द टूटते-टूटते निकल रहे थे।
मैंने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बनाए रखी। उनके होंठों से निकलती हर आवाज़ अब और साफ हो रही थी। तभी मेरी नज़र पास पड़ी उनकी पैंटी पर गई। एक पल के लिए मैंने उसे हाथ में लिया, फिर हल्के से उनके होंठों के पास ले गया। उन्होंने मेरी तरफ देखा, आँखों में हल्का सा संकोच था, लेकिन विरोध नहीं।
मैंने उसे उनके होंठों के बीच हल्के से रख दिया। उन्होंने उसे पूरी तरह बाहर नहीं धकेला, बस होंठों से थाम लिया। उनकी साँसें अब उस कपड़े के बीच से निकल रही थी, जिससे उनकी आवाज़ थोड़ी दब गई थी, लेकिन और गहरी महसूस हो रही थी।
मैं उनके और करीब झुक गया और धीरे से उनके कान के पास फुसफुसाया, “दीदी… पोज़िशन बदलें?” मेरी आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें एक साफ चाहत थी।
उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया जैसे बिना शब्दों के ही हामी दे दी हो।
मैंने धीरे-धीरे उनका हाथ थामा और उन्हें हल्के से मोड़ने लगा। वो पहले थोड़ी सी झिझकीं, फिर खुद ही अपने घुटनों के बल आगे की तरफ झुक गई, जैसे समझ रही हों कि मैं क्या चाहता हूँ।
अब उनका चेहरा मुझसे दूर था और उनका शरीर आगे की तरफ झुका हुआ था। उनके बाल आगे गिर कर चेहरे के पास आ गए थे। उनकी पीठ हल्की सी मुड़ी हुई थी, और हर साँस के साथ उनका पूरा बदन ऊपर-नीचे हो रहा था।
उन्होंने अपने दोनों हाथ आगे टिकाए हुए थे, जैसे खुद को संभाल रही हों। उनके कंधे हल्के-हल्के हिल रहे थे, और उनके होंठ अब भी उस कपड़े को थामे हुए थे। उन्होंने एक बार हल्का सा सिर घुमा कर पीछे देखने की कोशिश की, लेकिन फिर खुद ही नज़रें झुका ली।
इसके बाद आगे बढ़ कर मैंने अपने दोनों हाथों को उनके मुलायम पिछवाड़े पर रखा और उन्हें अपने पास खींच लिया। उनका खुला पिछवाड़ा और गीला नाज़ुक हिस्सा मेरे सख्त लंड के बेहद करीब थे। फिर एक बार मैंने अपना लंड उनके अंदर धकेला। इस बार साक्षी दीदी का नाज़ुक हिस्सा पूरा फिसलन भरा था। मेरा लंड पूरा उनके अंदर चला गया।
जैसे ही मैंने अपने कूल्हों को आगे-पीछे हिलाना शुरू किया, उनकी साँसें और तेज हो गई। उनके होंठों से दबे-दबे स्वर निकलने लगे, जो कमरे की खामोशी में और गहरे लग रहे थे।
उन्होंने अपने होंठों को हल्का सा काट लिया, जैसे आवाज़ को रोकने की कोशिश कर रही हों, लेकिन फिर भी उनके गले से निकली हर धीमी आह साफ सुनाई दे रही थी। उनके कंधे हल्के-हल्के काँप रहे थे और उनका पूरा शरीर उस लय के साथ चलने लगा था जो मैं बना रहा था।
मैं थोड़ा और करीब झुक गया। उनके बालों की खुशबू मेरे चेहरे से टकराई। मैंने अपनी पकड़ थोड़ी और मजबूत की और उसी रफ्तार को बनाए रखा। अब उनके बदन की हर हरकत मेरे साथ तालमेल बिठा रही थी।
साक्षी दीदी की आवाज़ अब और भी भर्राई हुई लग रही थी, जैसे वो हर एहसास को महसूस कर रही हों। लेकिन शब्दों में बयां नहीं कर पा रही हों। उन्होंने अपने हाथ आगे टिका कर खुद को संभाल रखा था, और हर बार जब मैं आगे बढ़ता, उनकी उंगलियाँ ज़मीन को और कस कर पकड़ लेती।
साक्षी दीदी का स्पर्श इतना गहरा और एहसासों से भरा था कि मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा था। उस पल में सब कुछ जैसे धीमा हो गया था।
मैंने धीरे से कहा, “दीदी… मैं अब रुक नहीं पाऊंगा…”
उन्होंने हल्का सा सिर घुमाया और धीमी आवाज़ में बोली, “गोलू… अभी नहीं…”
मैंने खुद को रोकने की कोशिश की, लेकिन मेरे अंदर की बेचैनी अब बढ़ती जा रही थी। मेरी साँसें तेज हो रही थी और मन काबू से बाहर जा रहा था।
मैंने फिर धीमी आवाज़ में कहा, “मैं अब कंट्रोल नहीं कर पा रहा हूँ…”
अगले ही पल मैंने महसूस किया कि मैं आने लगा हूँ। मेरे शरीर में एक तेज कंपन सा दौड़ गया और मैं पूरी तरह उस एहसास में डूब गया। उस पल मेरे शरीर से निकला सफेद पानी गर्माहट के साथ बाहर आने लगा। वह उनके शरीर से होकर नीचे की तरफ बहता हुआ धीरे-धीरे उनकी टांगों के बीच से फिसलता हुआ बिस्तर तक पहुँचने लगा। उसकी गर्म बूंदें साफ महसूस हो रही थी।
सफेद पानी की धार रुक-रुक कर बाहर आ रही थी, हर बार एक हल्की गर्म लहर के साथ। उसकी मोटी और चिपचिपी बनावट उनके बदन पर फैलती जा रही थी, और धीरे-धीरे नीचे की तरफ बहते हुए बिस्तर पर निशान छोड़ रही थी।
साक्षी दीदी ने अपनी उंगलियों से अपने शरीर पर जमी कुछ बूंदों को धीरे से समेटा। फिर वही उंगलियाँ अपने होंठों तक ले जाकर उन्होंने हल्के से चाट ली, जैसे मुझे देखते हुए जान-बूझ कर कर रही हों।
उन्होंने मेरी तरफ देखा और धीमी आवाज़ में बोली, “गोलू… तुम उतना जोर से नहीं करते जितना मेरा बॉयफ्रेंड करता था…”
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