पिछला भाग पढ़े:- मेरी फैंटेसी रोलप्ले से चूदाई तक का सफर-1
हिंदी सेक्स कहानी के पिछले पार्ट में आपने पढ़ा कैसे मसाजर मेरी बीवी के कपड़े उतार कर उसको ब्रा-पैंटी में ले आया। अब आगे-
करण अब ललिता की जांघों के बीच अपनी हथेलियां रगड़ रहा था। वह जान-बूझ कर अपने हाथ उसकी पैंटी के किनारों तक ले जाता और फिर पीछे खींच लेता। ललिता का शरीर अब धीरे-धीरे तनने लगा था। अंत में करण ने वही कहा जिसका मुझे इंतजार था, “मैम, ब्रा और पैंटी की वजह से ब्लड मसाज पूरा नहीं हो पा रहा है। अगर आप सहज हों, तो पूरी बॉडी मसाज के लिए इन्हें हटाना पड़ेगा।”
ललिता का चेहरा शर्म से सुर्ख लाल हो गया। और मना कर दिया इस पर मैंने कहां, “निकाल दो बेबी। मैं यही हूं, बस इस सुख को महसूस करो।” फिर ललिता ने ह्म्म कहां करण ने अपने हाथों से अपनी ब्रा का हुक खोला और पैंटी नीचे खिसका दी।
जब वह पूरी तरह निर्वस्त्र हुई तो कमरे की फिजा ही बदल गई। करण ने अपनी पैंट की जिप खोली और अपना अंडरवियर उतारा। जब उसका 10 इंच का फौलादी लंड बाहर निकला, तो मेरी सांसें गले में अटक गई। वह इतना लंबा और मोटा था कि उसे देख कर किसी भी औरत की चूत पानी छोड़ दे। ललिता ने अपनी आंखें थोड़ी सी खोली और जब उसकी नज़र उस विशाल लंड पर पड़ी, तो उसके हलक से एक चीख निकलने वाली थी, जिसे उसने अपनी उंगलियों को दांतों तले दबा कर रोक लिया।
करण ने ललिता की नंगी जिस्म पर अपना भारी जिस्म झुका दिया और अब असली खेल शुरू होने वाला था। वह पूरी तरह निर्वस्त्र बिस्तर पर लेटी थी – दूध जैसी सफेद त्वचा, 34″ के उभरे हुए टाइट दूध बोबे और उनकी गहरी दरार। करण, जो अब खुद नंगा खड़ा था, अपने 10 इंच के काले फौलादी लंड को लहराते हुए उसके करीब आया। उसका लंड किसी मूसल की तरह सख्त और नसदार था। मैंने बहाना बनाया और बाहर जाने का नाटक किया और कहां बेबी में कुछ स्नैक्स लेकर आता हूं। लेकिन मैं वही के वही पर्दे के पीछे छिप कर अपनी पत्नी की तबाही देखने लगा।
करण ने जैस्मिन ऑयल की बोतल उठाई और ललिता की पीठ पर तेल की धार छोड़ दी। उसके हाथ ललिता की चौड़ी और मांसल गांड पर रेंगने लगे। ललिता ने अपनी आँखें बंद कर रखी थी, लेकिन जब करण की मजबूत उंगलियां उसकी गांड के छेद को सहलाने लगी। करण की उंगलियों की उसकी चूत में भी जा रही थी। वह आहें भर रही थी तो वह कांप उठी। फिर करण ने अचानक करण ने उसे झटके से पलटा और उसके दोनों पैरों को हवा में उठा कर चौड़ा कर दिया। अब ललिता की गुलाबी और रसीली चूत पूरी तरह करण के सामने खुली थी।
करण ने अपना 10 इंच का मोटा लंड हाथ में पकड़ा और उसका सुपाड़ा (टोपा) ललिता की चूत के मुहाने पर रगड़ना शुरू किया। ललिता थर-थर कांप रही थी। अचानक करण ने कमर को एक जोरदार झटका दिया और आधा लंड एक ही बार में उसके भीतर उतार दिया।
ललिता की चीख पूरे कमरे में गूंज उठी, “आह्ह्ह! नहीं… अंशुल… ये क्या हो रहा है… इसे रोको! मेरी फट गई… बचा लो मुझे… मर जाऊंगी!” वह दर्द से बिलबिला रही थी क्योंकि उसका भोसड़ा इतने बड़े लंड के लिए तैयार नहीं था।
लेकिन करण पर जैसे कोई जुनून सवार था। उसने ललिता के दोनों हाथों को उसके सिर के ऊपर दबा दिया और पागलों की तरह धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ पूरा 10 इंच का लंड उसकी गहराइयों को नाप रहा था। ललिता बिस्तर पर मछली की तरह तड़प रही थी, “अंशुल… आह्ह्ह… ये फाड़ देगा मुझे…!”
करण ने करीब 20 मिनट तक उसे सीधा लिटा कर ठोका। हर बार जब वह अपना पूरा लंड बाहर निकालता और फिर झटके से अंदर डालता, तो ललिता की चूत से ‘चप-चप’ की आवाज आती। वह दर्द में चिल्ला रही थी, लेकिन धीरे-धीरे उस बड़े लंड की रगड़ ने उसकी सिसकियों को कामुक आहों में बदल दिया।
फिर करण ने उसे घुटनों के बल किया और पीछे से उसकी गांड को पकड़ कर डॉग स्टाइल में ठोकना शुरू किया। पीछे से जब उसका मोटा लंड ललिता के कूल्हों से टकराता, तो गपा-गप की आवाज गूंजती। ललिता की पतली कमर करण के हाथों में पूरी तरह भींची हुई थी। वह अब चिल्ला रही थी, “हाँ… और जोर से… फाड़ दो मेरा भोसड़ा… आह्ह्ह!”
अब मुझमें और सब्र नहीं था। मैं पर्दे के पीछे से निकला और ललिता के पास गया। वह मुझे देख कर रोने लगी, “देखो अंशुल… ये क्या कर रहा है…” लेकिन मैंने उसे चूमना शुरू किया और उसके स्तनों को सहलाने लगा। मैंने उसके कानों में कहा, “बेबी, एन्जॉय करो, ये तुम्हारे लिए ही है।”
फिर करण झड़ गया। उसकी चूत से करण वीर्य टपक रहा था। उसके बाद पांच मिनट मैंने ललिता को सहलाया फिर करण ने लंड साफ किया और मैंने गीले कपड़े से ललिता की चूत उसके बाद करण ने ललिता को 69 में लिया उसको लंड चूसने को बोला और करण उसकी चूत चाट रहा था। उसके बाद दोनों फिर से चूदाई के लिए तैयार थे। इस बार मैंने भी उसके मुंह में लंड डाला हुआ था।
करण ने उस दोपहर ललिता को 5 बार चरम सुख तक पहुंचाया। उसकी चूत से पानी बह कर चादर भिगो चुका था। अंत में, करण ने एक आखिरी जोरदार झटका मारा और अपना 10 इंच का लंड ललिता की चूत की गहराई में फंसा कर अपना सारा गरम वीर्य उसके भीतर और उसके पेट पर छोड़ दिया।
ललिता बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। करण का वीर्य उसकी जांघों पर धीरे-धीरे सूख रहा था। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। मेरी आंखों के सामने मेरी पत्नी को एक अजनबी ने जिस बेरहमी से रौंदा था। उसने मेरे भीतर के सोए हुए जानवर को जगा दिया था। मैंने अपनी शर्ट उतारी और ललिता के चेहरे को सहलाते हुए कहा, “बेबी, अब मेरी बारी है।”
ललिता की आँखों में अभी भी हैरानी थी, लेकिन शरीर पूरी तरह जाग चुका था। मैंने करण को इशारा किया। उसने ललिता को बिस्तर के किनारे पर किया और उसके दोनों पैरों को हवा में फैला दिया। करण पीछे से उसकी गांड के हिस्से को ऊपर उठा कर उसकी चूत को मेरे सामने कर दिया।
मेरा 6 इंच का लंड पूरी तरह पत्थर की तरह सख्त था। मैंने एक हाथ से ललिता के 34″ साइज के स्तनों को भींचा और दूसरे हाथ से अपना लंड उसकी गीली और सूजी हुई चूत के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैं अंदर गया, ललिता ने एक लंबी आह भरी। करण पीछे से उसकी गर्दन चूम रहा था और मैं सामने से उसे ठोक रहा था। कुछ ही देर बाद, करण ने अपनी उंगलियां ललिता की गांड के छेद में डाल दी। वह ऊपर-नीचे से घिरी हुई थी। उस रात हम दोनों ने बारी-बारी से उसे तब तक चोदा जब तक कि वह पूरी तरह निढाल होकर सो नहीं गई।
अगले दिन सुबह जब ललिता उठी, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। अब उसे किसी अजनबी से शर्म नहीं आ रही थी। हमने होटल का दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया और ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ का बोर्ड लगा दिया।
करण ने आज ललिता को नहलाने का जिम्मा लिया। बाथरूम में फव्वारे के नीचे, करण का 10 इंच का लंड एक बार फिर ललिता की चूत में गपा-गप उतर रहा था। ललिता दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी और करण पीछे से उसे बेरहमी से चोद रहा था। मैं बाहर सोफे पर बैठ कर यह सब देख रहा था।
दोपहर होते-होते खेल और गहरा गया। हमने ललिता को बीच में लिटाया। करण ने अपना लंड ललिता के मुंह में डाल दिया और मैं उसकी चूत मारने लगा। ललिता अब एक अनुभवी रंडी की तरह व्यवहार कर रही थी। वह करण के काले लंड को ऐसे चूस रही थी जैसे आइसक्रीम हो।
जब करण का लंड उसके हलक तक जाता, तो उसकी आँखें फट जाती। शाम तक ललिता का भोसड़ा इतना ढीला और गीला हो चुका था कि करण का पूरा 10 इंच का मूसल बिना किसी रुकावट के अंदर-बाहर हो रहा था।
दार्जिलिंग की उस तीसरी शाम, कमरे का माहौल पूरी तरह से कामुकता और पसीने की गंध से भर चुका था। ललिता अब तक की चुदाई से अधमरी हो चुकी थी, लेकिन मेरे और करण के भीतर का जानवर अभी शांत नहीं हुआ था। मैंने करण की आँखों में देखा और उसे इशारा किया, आज उसकी गांड की सील तोड़नी थी।
गांड की दर्दनाक शुरुआत-
करण ने ललिता को बिस्तर के किनारे पर पेट के बल लिटाया और उसकी सुडौल गांड को ऊपर की ओर उठा दिया। ललिता समझ गई थी कि अब क्या होने वाला था। वह डर के मारे कांपते हुए बोली, “अंशुल, नहीं… वहां नहीं… बहुत दर्द होगा, वह बहुत मोटा है।”
लेकिन करण ने उसकी एक ना सुनी। उसने ढेर सारा जैस्मिन ऑयल ललिता की गांड के छेद पर डाला और अपनी उंगलियों से उसे फैलाना शुरू किया। जैसे ही करण की मोटी उंगली अंदर गई, ललिता दर्द से कराह उठी। फिर करण ने अपना 10 इंच का फौलादी लंड हाथ में पकड़ा, जो खून की तरह लाल और पत्थर जैसा सख्त हो चुका था। उसने लंड का सुपाड़ा ललिता की गांड के तंग छेद पर टिकाया और एक हल्का दबाव दिया।
ललिता चिल्लाई, “आह्ह्ह! मर गई… बचा लो अंशुल… फट रही है मेरी!”
दोनों तरफ से चूदाई-
तभी मैं उसके सामने आया और अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर सटा दिया। मैंने उसके दोनों हाथों को मजबूती से पकड़ लिया। अब वह दोनों तरफ से घिरी हुई थी।
करण ने कमर का एक जोरदार झटका मारा और अपना आधा लंड उसकी गांड के भीतर उतार दिया। ललिता की एक ऐसी चीख निकली जो शायद पूरे होटल में गूंज गई होगी। उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और उसका पूरा शरीर अकड़ गया। “आह्ह्ह्ह्ह! अंशुल… निकालो इसे… फाड़ दिया उसने… मेरा भोसड़ा और गांड दोनों खत्म हो गए… आह्ह्ह!”
उसी वक्त, मैंने भी अपनी पूरी ताकत से अपना लंड उसकी चूत में जड़ तक उतार दिया। अब ललिता के शरीर के दोनों छेद पूरी तरह से भरे हुए थे। करण पीछे से उसकी गांड मार रहा था और मैं सामने से उसकी चूत।
चरम सीमा का तांडव-
कमरे में ‘चप-चप’ और ‘थप्प-थप्प’ की मिली-जुली आवाज़ें एक खौफनाक संगीत पैदा कर रही थी। करण ने अब अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। वह बेरहमी से धक्के मार रहा था, जिससे ललिता की गांड की खाल खिंच रही थी। हर धक्के के साथ करण का 10 इंच का मूसल उसकी बच्चेदानी तक वार कर रहा था।
उसका चेहरा तकिये में धंसा हुआ था, उसकी सिसकियाँ अब केवल गले की घराहट बन कर रह गई थी। वह बस इतना ही बोल पा रही थी, “ओह… मार डालो मुझे… आह… और जोर से… फाड़ दो मेरी गांड!”
जैसे ही करण पीछे खींचता, मैं आगे धक्का मारता। ललिता का शरीर एक खिलौने की तरह हमारे बीच झूल रहा था। उसके 34″ के दूध बोबे बिस्तर पर बुरी तरह दब और रगड़ रहे थे।
करीब आधे घंटे तक चले इस चुदाई के खेल के बाद, करण का सब्र जवाब दे गया। उसने ललिता की कमर को कस कर पकड़ा और आख़िरी पाँच-छह धक्के इतनी ताकत से मारे कि ललिता के मुँह से आवाज़ तक नहीं निकली। करण ने अपना सारा गरम वीर्य ललिता की गांड के गहरे हिस्से में ही छोड़ दिया। उसी पल मैंने भी अपना डिस्चार्ज उसकी चूत के भीतर खाली कर दिया।
ललिता निढाल होकर गिर पड़ी। उसकी गांड और चूत दोनों से वीर्य और चिपचिपा पानी बाहर बह रहा था। उसके दोनों छेद बुरी तरह सूज कर लाल हो चुके थे। तीन दिनों का वह खेल उस रात अपने चूदाई और कामुक अंजाम तक पहुंचा। मेरी ककोल्ड फैंटेसी ने ललिता को पूरी तरह से एक कामुक दासी में बदल दिया था।