पिछला भाग पढ़े:- मामा जी के साथ मेरी मस्त रंगरलियां-1
मामा जी काम के सिलसिले में महीने में तकरीबन एक बार लुधियाना आते ही थे। जब भी आते मामा जी के और कुलभूषण के हंसी मजाक शुरू हो जाते थे। हर बार के बाद मामा जी के आने के बाद जब कुलभूषण और मामा जी बोतल लेकर बैठ जाते। धीरे-धीरे उनकी बातों में सेक्स की बातें और ज्यादा होने लग गयी।”
“कुलभूषण तो हमेशा के तरह ही मजे ले रहा था – वैसे सच बोलूं, दोनों की बातों में मजा तो मुझे भी आने लगा था l बातों के दौरान मैं कुलभूषण से रात की होने वाली चुदाई का सोच-सोच कर ही मस्त हो जाती थी। यहां तक की उन दोनों की बातों के दौरान मेरी फुद्दी गीली भी होने लग गयी थी।”
“ऐसी ही एक दिन हम तीनों बैठे हुए थे। कुलभूषण ने मामा जी से पूछा, “मामा जी वैसे एक बात तो है, बड़ी छोटी उम्र में पटा लिया आपने शैली मामी को, और सब कुछ कर भी लिया उनके साथ? ऐसा कैसे, मामा जी बताओ तो सही।”
“मामा जी ने जवाब दिया, “कुलभूषन यार, मुझे नहीं जरूरत पड़ती लड़कियां पटाने-वटाने की। मेरे साथ तो एक पटी तो समझो इसके बाद लाइन लग जाती है। जल्दी ही वो लड़की अपनी सहेलियों को, अपनी भाभी को या अपनी ननद को भी मेरे पास ले आएगी।”
“मैँ सोच रही थी आखिर ऐसा भी क्या है मामा जी में जो मामा जी कह रहे हैं कि लड़कियां अपने आप से चली आती हैं इनके पास और साथ ही अपनी सहेलियों भाभी या ननद को भी ले आती है।”
“कुलभूषण हंसते हुए पूछता, “मगर मामा जी एक बात बताओ आपके पास ही क्यों आती थी, और भी तो होंगे?”
“मामा जी बोले, “मेरे एक बात का जवाब दे दे कुलभूषण, तुझे अपने सवाल का जवाब अपने आप ही मिल जाएगा।”
“मैं और कुलभूषण मामा जी की तरफ देखने लगे।”
“मामा जी बोले, “बता कुलभूषण शहद चूसने वाली मक्खियां किस फूल की तरफ ज्यादा जाती हैं।”
“कुलभूषण की जगह मैं बोल पड़ी, “मामा जी ये तो आसान सी बात है, जिस फूल में से मक्खी को ढेर सारा शहद चूसने को मिलता है, वो उसी तरफ ही तो जाएगी।”
“मामा जी ने कुलभूषण से कहा, “कुलभूषण देख क्या अक्लमंदी की बात की किरण ने, जिस फूल में से मक्खी को ढेर सारा शहद चूसने को मिलता है, वो उसी तरफ ही तो जाएगी। – क्या समझा?”
“लेकिन इसके साथ ही एक अजीब सी बात भी हुई। मामा जी ने मेरी तरफ देखा और अपने लंड को हाथ लगा दिया दिया। और ये मामा जी ने पहली बार किया था – ये पहली बार हुआ था कि मामा जी ने मेरी तरफ देखते हुए अपने लंड को इस तरह से हाथ लगाया हो।”
“ऐसे ही एक दिन हम तीनों बैठे हुए थे। मामा जी हुए कुलभूषण पी रहे थे। तीन तीन पेग दोनों के हो चुके थे।”
“बात फिर वहीं पहुंच गई – मामा जी की आशिक मिजाजी पर।”
“कुलभूषण जब भी मामा जी से मजाक करता, शैली मामी की बात जरूर करता – वजह साफ़ थी मामा जी ने बीस साल के उम्र में अठारह साल की शैली को चोद-चोद कर प्रेग्नेंट कर दिया था।”
“कुलभूषण मामा जी से बोला, “अच्छा मामा जी एक बात बताओ, आप तो बड़ी ही छोटी उम्र में लड़की पटाना सीख गये थे। शैली मामी को तो आपने बीस की उम्र में ही पटा लिया। शैली मामी को पटाने के बाद भी आपने लड़की पटाना जारी रक्खा? अब तक कितनी लड़कियों को पटाया आपने।”
“मामा जी अपने गिलास में से सिप लेकर बोले, “गिनना क्या और गिन कर करना भी क्या है यार कुलभूषण? लड़की आयी, “उसका भी काम करो अपना भी काम करो और मस्त और मस्त हो जाओ।”
“कुलभूषण और मामा जी जोर से हंसे, और मझे शर्म सी आ गयी – “उसका भी काम करो अपना भी काम करो और मस्त हो जाओ।”
“मतलब क्या था मामा जी की इस बात का? लड़की के साथ तो एक ही काम हो सकता था – चुदाई। लड़की को भी चुदाई का मजा दो खुद भी चुदाई का मजा लो।”
“इस तरह की बातें पहले मामा जी मेरे सामने नहीं करते थे। मामा जी अब कुछ ज्यादा ही खुलने लग गए थे l मामा जी ने इस बार भी हल्की सी नज़र मेरे ऊपर डालते हुए अपना लंड अपने पायजामें में पूरी तरह ही इधर-उधर किया और मेरी नज़र से मामा जी की ये हरकत छुपी नहीं रही।”
“मामा जी की ये हरकतें बढ़ती जा रही थी। अब जब भी मैं कुलभूषण और मामा जी के साथ बैठती, हर बार ही मामा जी के बातें सुन कर मेरी आँखों के आगे कुलभूषण का लंड घूम जाता और मेरी फुद्दी गीली हो जाती।”
और अब – मामा जी का जम्बो साइज़ का फुद्दी फाड़ लंड।
“उस दिन तो मामा जी की कुछ ज्यादा ही खुली बातें कर रहे थे। मामा जी ने एक बार नहीं कई बार अपना लंड अपने पायजामे में ठीक से बिठाया और ये करते हुए मामा जी ने हर बार मेरी तरफ जरूर देखा।”
“मामा जी कि इस तरह की बातें सुन कर, और मामा जी को बार बार मेरी तरफ देखते हुए लंड को पयजामे लंड में ठीक करते हुए देख कर मेरे फुद्दी में कुछ हलचल सी होने लगी थी। मेरे सामने कुलभूषण का छह इंच लम्बा लंड घूमने लगा था। मुझे मस्ती से आने लगी थी। मन कर रहा था की कब इनका ये पीना पिलाना खत्म हो और कब कुलभूषण मुझे दबा कर चोदे।”
“ऐसे ही ऊलजुलूल सेक्सी मजाक करते करते मामा जी ने अपना लंड पायजामे में ठीक करते हुए एक बार जब मेरी तरफ देखा तो मुझे कुलभूषण का लंड का ध्यान आ गया और मेरा हाथ अपने आप ही अपनी फुद्दी पर पहुंच गया और मैंने हल्का सा फुद्दी को खुजलाया।”
“मामा जी ने भी मुझे ऐसा करते हुए देख लिया। पता नहीं मामा जी ने क्या समझा, मामा जी ने दुबारा अपना लंड पायजामे में इधर-उधर ठीक और साथ ही मामा जी थोड़ा सा मुस्कुरा भी दिए।”
“मैं मामा जी की साइड में बैठी थी। मेरे फुद्दी पर हाथ फेरते ही मामा जी के पायजामे हल्का सा उभार आ गया – जो मुझे साफ़ दिखाई दे रहा था।”
“बाद में मुझे लगा कि शायद मुझे मामा जी के सामने इस तरह अपनी फुद्दी पर हाथ नहीं लगाना चाहिए था। मामा जी के पायजामे का उभार देख कर मुझे कुछ शर्म से भी आ रही थी। मगर जो होना था वो तो हो चुका था, तब मैंने उस वक़्त वहां से जाना ही ठीक समझा।”
“मैंने कुलभूषण से कहा, “कुलभूषण मैं चलती हूं, तुम दोनों एन्जॉय करो।”
“मैं जाने के लिए उठी ही थे कि कुलभूषण ने मुझे हाथ से पकड़ कर बिठा दिया और बोला, “अरे किरण मेरी जान, जा कहां रही हो, किचन का काम तो सारा हो चुका है, मजे लो मामा जी की बातों के, महीने में एक बार तो आते हैं यहां।”
“मामा जी ने भी कहा, “अरे बैठो किरण, अभी जा कर भी क्या करोगी कमरे में, कुलभूषण तो यहां बैठा है।”
“और इसके साथ ही मामा जी ने एक बार और अपना लंड फिर से छू लिया। मामा जी के पायजामे का उभार और बढ़ चुका था।”
“अब तक तो मैं भी मामा जी कि इन बातों को मजाक समझ कर दोनों पियक्क्ड़ों की बातों के मजे लेती रहती थी लेकिन उस दिन मामा जी का बार-बार मेरी तरफ देख कर लंड पायजामे में ठीक करना और मुझसे कहना अरे बैठो किरण, अभी जा कर भी क्या करोगी, कुलभूषण तो यहां बैठा है, ऊपर से मामा जी के पायजामे का उभार। मुझे लगा मामा जी मेरे साथ उस दिन कुछ ज्यादा ही खुलने की कोशिश कर रहे हैं।”
“खैर, मैं बैठ तो गयी, लेकिन मेरे जेहन में कुछ अजीब अजीब से ख्याल आने लगे। मामा जी ऐसा बर्ताव आज क्यों कर रहे हैं?
“रात बारह बजे तक ये पीना पिलाना चलता रहा। मैं वहीं बैठी रही। मामा जी का मेरी तरफ देखना और मुझे देखते हुए लंड खुजलाना जारी था।”
“मामा जी के इस तरह मेरी तरफ देखते देखते बार-बार अपना लंड इधर-उधर करते हुए मैं कुछ असहज सी होने लगे थी। मुझे ये मामा जी का ये बर्ताव कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने सोचा कल इस बारे में कुलभूषण से बात करूंगी।”
“साढ़े बारह बज चुके थे। दोनों के पांच पांच पेग हो चुके थे। कुलभूषण ने तो शायद ज्यादा ही पेग ले लिए थे। मामा जी ने ही कहा, “चलो अब बस करते हैं और चलते हैं, साढ़े बारह हो गए हैं। कुलभूषण की तो लगता है पहले ही कुछ ज्यादा हो गयी है।”
“हम तीनों उठे तो मामा जी तो ठीक ठाक थे, मगर कुलभूषण के पैर लड़खड़ा रहे थे”
“मामा जी ने कुलभूषण से पूछा, “कुलभूषण ठीक हो?”
“कुलभूषण ने कोइ जवाब नहीं दिया और लड़खड़ाता हुआ कमरे के तरफ चलने लगा।”
“मैंने और मामा जी ने कुलभूषण को सहारा दिया और कमरे की तरफ ले चले। मामा जी बोले, “इसकी आज कुछ ज्यादा ही हो गयी है, सुबह से पहले नहीं उठेगा ये, पक्की बात है।”
“कुलभूषण को बिस्तर पर लिटा कर मामा जी अपने कमरे में चले गये और हम अपने कमरे में आ गये। खड़े होने के कारण मामा जी के पायजामे का उभार अब और भी साफ़ दिखाई दे रहा था।”
“जिस तरह से मामा जी उस दिन बार-बार मेरी तरफ देखते हुए अपना लंड छू रहे थे और जिस तरह का उभार मामा जी के पायजामे में मुझे दिखाई दे रहा था, उससे एक बात तो साफ़ थी की मामा जी को किसी लड़की के साथ हुई चुदाई की याद आ रही थी, और उनका लंड खड़ा होने लगा था।”
“पता नहीं कैसे मेरे दिमाग में ऐसे ही एक ख्याल सा आया क्या मामा जी ने जान-बूझ कर कुलभूषण को इतनी ज्यादा पीने दी है या फिर पिला दी है? अगर ऐसा है तो क्यों, और किस लिए?”
“मैंने सोच लिया कि मामा जी कि इस हरकत के बारे में अगले दिन मैं कुलभूषण से बात करूंगी ही करूंगी।”
“कमरे में आते ही कुलभूषण बिस्तर पर ढेर हो गया। इतनी पीने के बाद भी कुलभूषण अक्सर मुझे चोदता जरूर था और एक एक डेढ़-डेढ़ घंटे तक मुझे चोदता था, और फिर भी कुलभूषण का लंड पानी नहीं छोड़ता था। मगर उस दिन तो कुलभूषण को जैसे कुछ होश ही नहीं था।”
“मैं समझ गयी कि चुदाई तो वो कर नहीं सकता था, फिर भी मैंने कुलभूषण का लंड पकड़ लिया। पांच मिनट लंड के साथ मैं खिलवाड़ करती रही लंड को हिलाती करती रही, आगे-पीछे करती रही, मगर ना तो कुलभूषण के लंड में ही कोइ हरकत हुई ना ही कुलभूषण में। और वो खर्राटे लेता रहा। यहां तक की उसने करवट तक नहीं बदली।”
“मैं समझ गयी, आज फुद्दी का कुछ नहीं होने वाला किरण – कोइ चुदाई-वुदाई नहीं – सो जा। आज फुद्दी सूखी ही रहने वाली थी, जब कि मामा जी की बातें सुन-सुन कर उस दिन मेरा चुदाई करवाने का पूरा पूरा मूड बन चुका था।”
“कुछ देर मैं ऐसे ही लेटी रही। रात बहुत हो चुकी थी और मुझे नींद भी आ रही थी। सोने से पहले पेशाब करने मैं बाथरूम की तरफ चल पड़ी।”
“हमारे इस तीन कमरों वाले घर में दो बाथरूम थे। एक ही बाथरूम में टॉयलेट भी था, मगर दोनों बाथरूम कमरों के साथ जुड़े नहीं थे – आंगन पार करके सामने की तरफ थे। पुराने घरों में बाथरूम ऐसे ही होते थे – बाहर की तरफ।”
“मैं टॉयलेट वाले बाथरूम की तरफ चली गयी। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, अंदर मामा जी खड़े थे, बिलकुल नंगे।”
“मामा जी की साइड मेरी तरफ थी, और चेहरा दीवार की तरफ था। मामा जी की आंखें बंद थी, और मामा जी का लंड हाथ में था – एक-दम खड़ा, एक-दम तना हुआ। मामा जी का लंड तना हुआ सीधा लंड, एक मोटे डंडे की तरह दिखाई दे रहा था।”
“मामा जी का खड़ा लंड मामा जी की कलाई जितना ही मोटा था और कुलभूषण के अच्छे खासे लम्बे लंड से कहीं ज्यादा लम्बा भी था। खड़े लंड में से पेशाब की मोटी धार निकल रही थी।”
“मामा जी के खड़े लंड का गुलाबी टोपा चमक रहा था। मामा जी का लंड मोटा और लम्बा तो था ही, मगर नीचे टट्टों के पास से कुछ ज्यादा ही फूला हुआ था।”
“और टट्टे? बत्तख के अंडों की तरह बड़े बड़े।”
“मामा जी का लंड ऐसा था जिस तरह के लंड के हर लड़की सपने देखती है।”
“मेरी नज़र मामा जी के लंड से हट ही नहीं रही थी। मैं तो बस यही सोच रही थी की ऐसा भी लंड होता है क्या इतना लम्बा, इतना मोटा। मुझे एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा भी लंड किसी इंसान का हो भी सकता है?”