अपनी ही बड़ी बहन की शादी किसी और के साथ होते देखना किसी भी भाई के लिए बहुत मुश्किल होता है। और जब आप उनसे प्यार करते हों, तो यह दर्द और भी बढ़ जाता है। लेकिन यह कहानी उनकी शादी की नहीं है। यह कहानी उस आख़िरी महीने की है, जो हमने उनकी शादी से पहले साथ बिताया। उस एक महीने में हमने हर पल एक-दूसरे के साथ जिया और अपने प्यार को पहले से कहीं ज़्यादा गहराई से महसूस किया।
सबसे पहले मुझे आपको अपनी दीदी के बारे में बताना होगा, ताकि आप समझ सकें कि हमारे बीच यह सब कैसे हुआ। इसलिए इस कहानी को आराम से पढ़ना, क्योंकि मुझे पता है कि आपको यह कहानी ज़रूर पसंद आएगी।
मेरी बड़ी बहन का नाम जान्हवी है। मैं उन्हें हमेशा जान्हवी दीदी कह कर बुलाता हूं। वह मुझसे तीन साल बड़ी है। उनकी शादी से पहले हमारे घर में मैं, जान्हवी दीदी, मम्मी और पापा रहते थे। मेरा कोई भाई नहीं था, इसलिए घर पर मेरा ज़्यादातर समय जान्हवी दीदी के साथ ही बीतता था। हम दिल्ली में रहते थे। भारत के इस बड़े और मशहूर शहर में अगर मेरे लिए कोई सबसे ज़्यादा खास था, तो वह सिर्फ जान्हवी दीदी थी।
असल में यह कहानी आज से करीब छह महीने पहले की है, जब उनकी शादी तय हुई थी। लेकिन अगर शुरू से बताऊं, तो मेरे अंदर यह उस समय शुरू हुआ जब मैं कॉलेज के पहले साल में था और जान्हवी दीदी अपनी ग्रेजुएशन के आख़िरी साल में थी। उनका सपना था कि वह फ्लाइट अटेंडेंट बनें। इसके लिए वह अपनी इंग्लिश और बोलने का तरीका बेहतर करने की बहुत कोशिश करती थी। वह अलग-अलग एयरलाइंस में इंटरव्यू देती रहती थी और हर बार पहले से बेहतर करने की कोशिश करती थी।
अपने सपने को पूरा करने के लिए वह अपनी फिगर का भी बहुत ध्यान रखती थी। रोज़ योग करती थी, मीठा खाने से बचती थी और हमेशा खुद को फिट रखने की कोशिश करती थी। शायद यही वजह थी कि हमारे पूरे इलाके में उनसे ज़्यादा खूबसूरत लड़की कोई नहीं थी।
लेकिन उस समय तक मैंने उन्हें कभी उस नज़र से नहीं देखा था। मेरे लिए वह सिर्फ मेरी बड़ी बहन थी, और मैं यही सोचता था कि कोई भी भाई अपनी बहन के बारे में गलत तरह से नहीं सोच सकता। मैं उन्हें पसंद करता था, उनका ख्याल रखता था, लेकिन मेरे मन में कभी ऐसा कुछ नहीं आया था।
फिर एक शाम सब कुछ बदल गया। मैं घर के ड्रॉइंग रूम में सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। तभी घर का दरवाज़ा खुला और जान्हवी दीदी अंदर आई। वह पूरी तरह बारिश में भीग चुकी थी। उन्होंने एक हल्की सफेद टी-शर्ट पहन रखी थी जो भीगने की वजह से उनके शरीर से पूरी तरह चिपक गई थी।
उनके गीले बाल गर्दन, गालों और होंठों के पास चिपके हुए थे। पानी की बूंदें उनके चेहरे से फिसलती हुई गर्दन तक जा रही थी। भीगी हुई टी-शर्ट इतनी चिपक गई थी कि उसके नीचे उनके दोनों स्तनों की गोलाई साफ दिखाई दे रही थी। कपड़ा उनके स्तनों से इस तरह चिपका था कि उनका उभार पहले से कहीं ज़्यादा साफ नज़र आ रहा था। चलते समय उनका हल्का-सा हिलना भी साफ दिख रहा था, और मेरी नज़र चाहकर भी वहाँ से हट नहीं रही थी।
उनकी भीगी हुई टी-शर्ट के नीचे उनके स्तनों का आकार इतना साफ दिख रहा था कि पहली बार मुझे एहसास हुआ कि जान्हवी दीदी कितनी खूबसूरत थी।
उनकी जींस भी भीग कर उनकी लंबी टांगों और भरी हुई जांघों से चिपक गई थी। उनकी पतली कमर और भी ज़्यादा निखर कर सामने आ रही थी। पूरे शरीर पर भीगे कपड़ों का असर ऐसा था कि मैं कुछ पल के लिए टीवी देखना ही भूल गया।
मैंने उन्हें पहले भी हजारों बार देखा था, लेकिन उस शाम वह मुझे बिल्कुल अलग लगी। कुछ सेकंड के लिए मेरी नज़र बस उन पर ही टिक गई। शायद पहली बार मुझे महसूस हुआ कि जान्हवी दीदी सिर्फ मेरी बहन ही नहीं, बल्कि बेहद खूबसूरत लड़की भी थी।
उस शाम के बाद मेरे अंदर कुछ बदल गया था। मुझे खुद समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा था। मैं खुद से नफरत भी करता था, क्योंकि बार-बार वही बारिश वाला पल मेरे दिमाग में घूमने लगता था। फिर भी, जब भी मैं उनके बारे में सोचता, मेरे अंदर एक अजीब-सी खुशी दौड़ जाती।
धीरे-धीरे मैं उनके आस-पास ज़्यादा समय बिताने लगा। जान्हवी दीदी को इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि मेरे दिल में क्या चल रहा था। उनके लिए मैं अब भी वही छोटा और सीधा-सादा भाई था।
कभी हम टीवी का रिमोट लेकर मज़ाक-मज़ाक में झगड़ पड़ते। वह मेरे हाथ से रिमोट छीनने के लिए अचानक मेरे ऊपर झुक जाती। उस समय उनके मुलायम स्तन मेरी बांहों और सीने से हल्के-से दब जाते। यह बस कुछ सेकंड का स्पर्श होता, लेकिन मेरे लिए वही कुछ सेकंड पूरे दिन याद रहने के लिए काफी थे।
कभी वह मेरे बिल्कुल पास आकर खड़ी हो जाती और मुझे महसूस होता कि उनके स्तनों की गर्माहट मेरे कंधे से छू रही है। वह इन छोटी बातों पर ध्यान भी नहीं देती थी, लेकिन मेरे लिए यह हर बार दिल की धड़कन तेज़ कर देने वाला एहसास होता था।
कभी वह नया लिपस्टिक शेड खरीद कर लाती। उसे होंठों पर लगा कर मेरे पास आती और मुस्कुराकर कहती, “जरा देखो तो, कैसा लग रहा है?” फिर वह मेरे गाल पर हल्का-सा किस्स कर देती, ताकि देख सकें कि रंग फैलता तो नहीं। उनके होंठों का वह नरम स्पर्श मेरे गाल पर कुछ सेकंड के लिए रहता, लेकिन उसका असर मेरे दिल पर बहुत देर तक बना रहता।
धीरे-धीरे मेरी पूरी दुनिया जान्हवी दीदी के इर्द-गिर्द घूमने लगी। अब मेरा ध्यान हर समय उन्हीं पर रहता था। वह किस समय कॉलेज से लौटती हैं, कब अपने कमरे में जाती हैं, कब बाल संवारती हैं, कब योग करती हैं और कब रात को सोने जाती हैं, मुझे सब याद रहने लगा था।
मैंने यह आदत बना ली थी कि जहां जान्हवी दीदी हों, कुछ ही देर बाद मैं भी वहीं पहुंच जाऊं। अगर वह बालकनी में खड़ी होकर फोन पर बात कर रही होती, तो मैं भी पानी का गिलास लेकर वहीं चला जाता। अगर वह अपने कमरे का दरवाज़ा आधा खुला छोड़ कर पढ़ रही होती, तो मैं किसी बहाने से उस तरफ निकल जाता।
कई बार वह अलमारी के सामने खड़ी होकर कपड़े चुनती। कभी दुपट्टा कंधे से फिसल जाता, कभी कुर्ती का गला थोड़ा खुल जाता, और मुझे उनके स्तनों की बस एक छोटी-सी झलक मिलती। वह बस एक पल होता, लेकिन मेरे लिए वही पल पूरे दिन के लिए काफी था। उन कुछ सेकंड के बाद ही मुझे महसूस होने लगता कि मेरा लंड धीरे-धीरे सख्त होने लगा था।
जब वह योग करती, तो मैं दूर से उन्हें देखता रहता। हाथ ऊपर उठाते समय उनकी कमर तन जाती, और आगे झुकते समय उनकी छाती और नाजुक हिस्सा कपड़ों के भीतर और उभर कर दिखने लगता। मेरी नज़र चाह कर भी उन पर से हटती नहीं थी। कई बार मुझे अपनी सांसें तेज़ होती महसूस होती और पैंट के अंदर मेरा लंड बेकाबू होने लगता।
कभी वह बिस्तर पर पेट के बल लेटकर पढ़तीं, पैरों को हवा में हिलाती रहती, और मैं दरवाज़े पर खड़ा होकर उनसे कोई बेकार-सा सवाल पूछता, सिर्फ इसलिए कि कुछ देर और उन्हें देख सकूं। कभी वह बाल सुखाते समय सिर झटकती, तो उनकी खुशबू पूरे कमरे में फैल जाती और मैं उसी महक में खो जाता।
रात को अपने कमरे में लेट कर मैं दिनभर के वहीं पल याद करता। उनके स्तनों की झलक, उनकी कमर की लचक, उनके नाजुक हिस्से की हल्की उभरी हुई रेखा, और मेरे बिल्कुल पास से गुजरते समय उनका स्पर्श, सब कुछ बार-बार मेरे दिमाग में घूमता रहता। उन यादों के साथ मेरा लंड फिर से सख्त हो जाता और मैं देर तक छत की तरफ देखता रहता।
जान्हवी दीदी को बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि मैं उन्हें इस तरह देखने लगा था। उनके लिए मैं अब भी वही छोटा और मासूम भाई था। लेकिन मेरे लिए वह सिर्फ मेरी दीदी नहीं रह गई थी। अब उनकी एक छोटी-सी झलक भी मेरे शरीर में आग लगाने और मेरे लंड को तन जाने के लिए काफी थी।
फिर एक दिन शाम को मैं अपने कमरे में बैठा कॉलेज का काम कर रहा था। तभी बिना दरवाज़ा खटखटाए जान्हवी दीदी तेजी से मेरे कमरे में आई। उनके चेहरे पर ऐसी चमक थी जैसी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उनकी आंखें खुशी से चमक रही थी और होंठों पर बड़ी-सी मुस्कान थी।
उन्होंने आते ही कहा, “तुम्हें पता है? मेरा सिलेक्शन हो गया! मुझे फ्लाइट अटेंडेंट की नौकरी मिल गई है।”
कुछ सेकंड के लिए मैं उन्हें बस देखता रह गया। जिस सपने के लिए वह इतने महीनों से मेहनत कर रही थी, वह आखिरकार पूरा हो गया था। अगले ही पल मैंने उठ कर उन्हें बधाई दी। खुशी के मारे वह खुद ही मेरे गले लग गई। उनका शरीर मेरे सीने से कसकर लगा हुआ था। मैं उनकी खुशी महसूस कर सकता था। वह लगातार मुस्कुरा रही थी।
उस दिन के बाद सब कुछ बहुत तेजी से बदलने लगा। कुछ महीनों तक उन्होंने ट्रेनिंग की तैयारी की। कभी दिल्ली में क्लास होती, कभी उन्हें कुछ दिनों के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता। वह पहले से भी ज़्यादा बिजी हो गई थी।
फिर एक दिन उनकी ट्रेनिंग शुरू हो गई और धीरे-धीरे उनकी नई जिंदगी शुरू हो गई। कभी उनकी फ्लाइट दुबई जाती, कभी अमेरिका, तो कभी ऑस्ट्रेलिया। वह दुनिया के अलग-अलग देशों में जाने लगी। बचपन में जो दीदी हर दिन मेरे साथ रहती थी, अब उनसे मिलना बहुत मुश्किल हो गया था।
शुरू-शुरू में मैं हर दिन उनका इंतज़ार करता था। लेकिन समय के साथ हमारे बीच दूरी बढ़ती गई। वह साल में सिर्फ एक बार कुछ दिनों के लिए घर आती थी। उन कुछ दिनों में घर फिर से पहले जैसा लगने लगता, लेकिन जैसे ही वह वापस चली जातीं, घर एकदम खाली-खाली महसूस होता।हम कभी-कभी फोन पर बात कर लेते थे। वह मुझे अपने नए शहरों के बारे में बतातीं, मैं कॉलेज की बातें करता।
धीरे-धीरे मैंने खुद को समझाना शुरू कर दिया। मैं पढ़ाई में लग गया और अपनी जिंदगी में बिजी होने लगा। समय के साथ ऐसा लगा जैसे मैं उनके लिए अपने पुराने एहसासों को पीछे छोड़ रहा हूं। जान्हवी दीदी अब भी मेरे दिल के बहुत करीब थी, लेकिन हमारी जिंदगी की राहें जैसे अलग हो चुकी थी।
फिर लगभग तीन साल बाद एक दिन जान्हवी दीदी का फोन आया। उस समय उन्होंने मम्मी और पापा से कहा कि उन्हें किसी से प्यार हो गया है और वह उससे शादी करना चाहती हैं। उनका बॉयफ्रेंड उसी एयरलाइन में फ्लाइट कैप्टन था। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह हमारी ही जाति से था, इसलिए घर में किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई। मम्मी-पापा जान्हवी दीदी की खुशी से बहुत खुश थे। कुछ ही दिनों में मम्मी पंडित जी के पास गई और शादी की तारीख निकलवाई। मुहूर्त डेढ़ महीने बाद का निकला।
इन तीन सालों में जान्हवी दीदी मुश्किल से कुछ दिनों के लिए ही घर आ पाती थी। इसलिए उन्होंने तय किया कि शादी से पहले वह पूरे एक महीने की छुट्टी लेंगी। इस दौरान वह शादी की तैयारियों में भी हाथ बंटाएंगी और इतने लंबे समय बाद अपने फैमिली के साथ खुल कर समय भी बिताएंगी।
जिस दिन जान्हवी दीदी घर आने वाली थी, उस दिन सुबह से ही मेरा मन किसी और काम में नहीं लग रहा था। लगभग तीन साल बाद मैं उन्हें अपने सामने देखने वाला था। इन सालों में हम फोन पर बात करते रहे थे, लेकिन उन्हें सामने देखने की बात ही अलग थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरे अंदर दबे हुए सारे पुराने एहसास फिर से जाग रहे हों।
शाम को मैं कार लेकर एयरपोर्ट पहुंच गया। बाहर पार्किंग के पास खड़ा होकर मैं लगातार आने-जाने वाले लोगों को देख रहा था। हर बार जब दरवाज़ा खुलता, मेरा दिल तेज़ धड़कने लगता। मैं बस उसी पल का इंतज़ार कर रहा था जब जान्हवी दीदी मेरे सामने होंगी।
कुछ मिनट बाद मैंने उन्हें बाहर आते देखा। एक हाथ में ट्रॉली बैग था और दूसरे कंधे पर उनका पर्स टंगा हुआ था। उन्हें देखते ही मैं कुछ सेकंड के लिए वहीं रुक गया। तीन साल पहले जो लड़की घर से गई थी, वह अब पहले से भी ज़्यादा सुंदर लग रही थी।
उन्होंने हल्के रंग की कुर्ती पहन रखी थी और साथ में फिट जींस। कुर्ती उनके शरीर पर इस तरह बैठी थी कि उनकी बनावट साफ दिखाई दे रही थी। चलते समय उनके स्तनों की भरी हुई गोलाई कपड़े के भीतर साफ उभर रही थी। कुर्ती का कपड़ा उनकी छाती से हल्का-सा चिपका हुआ था, जिससे उनके दोनों स्तनों का आकार पहले से कहीं ज़्यादा साफ दिख रहा था। हर कदम के साथ उनका हल्का-सा हिलना मेरी नज़र को वहीं रोक दे रहा था।
उनकी कमर पहले की तरह पतली थी। जींस उनकी लंबी टांगों और भरी हुई जांघों पर बिल्कुल फिट बैठी थी। खुले बाल कंधों पर गिर रहे थे और चेहरे पर वही मुस्कान थी जिसे देख कर मैं हमेशा सब कुछ भूल जाता था।
उन्हें अपनी तरफ आते देख मेरे सीने में हलचल बढ़ गई। इतने सालों बाद भी उनके सामने आते ही मेरे अंदर वही पुरानी बेचैनी लौट आई थी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब जान्हवी दीदी पहले से भी ज़्यादा सुंदर और मेरे दिल की धड़कन तेज़ कर देने वाली लग रही थी।
जैसे ही वह मेरे पास पहुंची, उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना बैग नीचे रखा और बिना कुछ कहे मुझे गले लगा लिया। मैं भी खुद को रोक नहीं पाया और उन्हें अपनी दोनों बाहों में कस कर पकड़ लिया। तीन साल बाद उन्हें इस तरह अपने इतने करीब महसूस करना मेरे लिए किसी सपने जैसा था।
उनका पूरा शरीर मेरे सीने से लगा हुआ था। कुर्ती के ऊपर से उनके मुलायम स्तन मेरे सीने से हल्के दब रहे थे। जैसे-जैसे मैं उन्हें और कस कर पकड़ता गया, वैसे-वैसे उनकी गर्माहट मुझे साफ महसूस होने लगी।
जान्हवी दीदी ने भी मुझे उतनी ही मजबूती से पकड़ा हुआ था। उनके बालों की खुशबू मेरे चेहरे के पास थी और उनके स्तनों का दबाव मेरे सीने पर साफ महसूस हो रहा था।
जब वह मुझसे अलग हुई, तो मुस्कुरा कर बोली, “क्या हुआ? ऐसे देख क्यों रहे हो?”
मैं हल्का-सा मुस्कुराया और उनकी आंखों में देखते हुए कहा, “कुछ नहीं दीदी… बस आपको इतने दिनों बाद सामने देख कर बहुत अच्छा लग रहा है। मैंने आपको बहुत मिस किया है।”
मेरी बात सुन कर उनके चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान आ गई। उन्होंने प्यार से मेरे गाल को छुआ और बोली, “मैंने भी तुम्हें बहुत मिस किया।”
हम दोनों कार में बैठ गए। मैं ड्राइविंग सीट पर बैठा और जान्हवी दीदी मेरे बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई। उन्होंने सीट बेल्ट लगाई, बालों को पीछे किया और मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखने लगी। मैंने कार स्टार्ट की और हम घर की तरफ चल पड़े। रास्ते भर हम पुरानी बातें करते रहे। वह मुझे अपने फ्लाइट के किस्से सुनाती रही। फिर उन्होंने अपने होने वाले पति के बारे में बताया। वह कैसे मिले, कब दोस्ती हुई और कैसे यह रिश्ता शादी तक पहुंचा।
मैं उनकी हर बात ध्यान से सुन रहा था, लेकिन सच यह था कि मेरा ध्यान बार-बार उनकी तरफ खिंच जा रहा था। सड़क कहीं-कहीं टूटी हुई थी। जैसे ही कार हल्के गड्ढों से गुजरती, उनकी कुर्ती के भीतर उनके स्तनों में हल्का-सा कंपन होता। हर छोटे झटके के साथ उनकी भरी हुई गोलाई धीरे से ऊपर-नीचे होती और मेरी नज़र अनजाने में वहीं टिक जाती।
कुर्ती का कपड़ा उनकी छाती से सटा हुआ था, इसलिए उनके स्तनों की हर हल्की हरकत साफ दिख रही थी। वह आराम से बैठी मुझसे बातें कर रही थी, जबकि मैं बीच-बीच में साइड से उन्हें देखता और फिर तुरंत अपनी नज़र सड़क पर कर लेता। जब कार किसी बड़े गड्ढे से गुजरती, तो उनका शरीर हल्का-सा उछलता और उनके स्तन भी साथ में थरथरा उठते।
वह अपने आने वाले शादी के प्लान के बारे में बोल रही थी, और मैं मुस्कुरा कर उनकी बातों का जवाब दे रहा था। लेकिन अंदर ही अंदर मेरा ध्यान बार-बार उनकी आवाज़, उनकी खुशबू और मेरे ठीक बगल में बैठी उनकी मौजूदगी पर अटक जा रहा था।
करीब एक घंटे बाद हम घर पहुंच गए। जैसे ही जान्हवी दीदी ने घर के अंदर कदम रखा, मम्मी और पापा के चेहरे खुशी से खिल उठे। मम्मी ने उन्हें गले लगा लिया और पापा ने मुस्कुराते हुए उनका माथा चूम लिया। इतने लंबे समय बाद घर में उनकी मौजूदगी से पूरा माहौल बदल गया था।
थोड़ी देर बाद हम सब ड्रॉइंग रूम में सोफे पर बैठ गए। उनकी शादी में ठीक डेढ़ महीना बाकी था और तीन साल बाद वह इतने लंबे समय के लिए घर आई थी, इसलिए बातों का जैसे अंत ही नहीं था। मम्मी शादी की खरीदारी के बारे में पूछ रही थी, पापा रिश्तेदारों की लिस्ट पर बात कर रहे थे, और जान्हवी दीदी हर सवाल का मुस्कुरा कर जवाब दे रही थी।
जान्हवी दीदी मेरे बिल्कुल पास बैठी थी। बात-चीत के दौरान जब मम्मी या पापा उनसे कोई सवाल पूछते, तो जवाब देते समय वह अनजाने में मेरा हाथ पकड़ लेती। उनकी उंगलियां मेरी उंगलियों में फंस जाती और वह उसी तरह मेरा हाथ थामे बातें करती रहती।
शायद उनके लिए यह बस अपनापन था। लेकिन मेरे लिए उनका हाथ अपने हाथ में महसूस करना किसी अलग ही एहसास जैसा था। उनकी हथेली की गर्माहट मेरे हाथ से होते हुए सीधे दिल तक उतर रही थी। कभी वह किसी बात पर हंसती और हंसते-हंसते मेरे हाथ को हल्के से दबा देती। तीन साल की दूरी के बाद जान्हवी दीदी फिर से मेरे बिल्कुल पास थी।
उस रात मैं अपने कमरे में लेटा बहुत देर तक छत को देखता रहा। बाहर से सब कुछ आम लग रहा था। मेरी बड़ी बहन की शादी तय हो चुकी थी। डेढ़ महीने बाद वह किसी और की पत्नी बनने वाली थी। और मैं उनके लिए वही छोटा भाई था, जो बचपन से उनके साथ रहा था।
लेकिन मेरे दिल के अंदर जो था, वह सिर्फ मुझे पता था। मैं आज भी उनसे उतना ही प्यार करता था जितना पहले करता था। शायद उससे भी ज़्यादा। जब भी मैं सोचता कि कुछ ही दिनों बाद वह किसी और की हो जाएंगी, तो मेरे सीने में एक भारीपन उतर आता था।
लेकिन उस समय मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ हफ्तों में मेरी जिंदगी पूरी तरह बदलने वाली है। मैं यह भी नहीं जानता था कि यही एक महीना हमें फिर से इतना करीब ले आएगा कि हम सिर्फ अपने दिल की बात ही नहीं करेंगे, बल्कि एक-दूसरे के लिए अपने प्यार को हर तरह से महसूस भी करेंगे।
यह कहानी उसी महीने की है। उस महीने की, जब हम फिर से करीब आए। जब हमने पहली बार एक-दूसरे को उस नज़र से देखा। जब हमारे बीच छिपी हुई चाहत धीरे-धीरे बाहर आने लगी। जब उन्होंने मेरा लंड अपने होंठों में लिया। और जब मैंने पहली बार अपनी ही दीदी को चोदा।
यह सब शुरू हुआ उनकी घर वापसी के अगले दिन से।